एक इंसान जैसी ज़िन्दगी जीने के लिए न्यूनतम मज़दूरी कितनी होनी चाहिए?
सुजय
वैसे तो दूरगामी लक्ष्य के तौर पर मज़दूर वर्ग महज़ अधिक मज़दूरी के लिए नहीं लड़ता है, बल्कि मज़दूरी की व्यवस्था के विरुद्ध ही लड़ता है। यानी, उसका अन्तिम लक्ष्य उस व्यवस्था का ख़ात्मा है जिसमें समाज की 8-10 फ़ीसद अल्पसंख्या के पास सारे कल-कारख़ानों, खेतों-खलिहानों और खानों-खदानों का मालिकाना हो और बाक़ी मेहनतकश आबादी अपनी शारीरिक और/या मानसिक श्रमशक्ति को बेचने के लिए बाध्य हो। लेकिन इस दूरगामी लक्ष्य के लिए जागृत, गोलबन्द और संगठित होते हुए उसे अपनी ज़िन्दगी को एक इंसानी ज़िन्दगी बनाये रखने के लिए हर रोज़, हर क़दम पर संघर्ष करना होता है।
यह संघर्ष किस चीज़ के लिए होता है? यह संघर्ष होता है एक मुनाफ़ा-केन्द्रित पूँजीवादी व्यवस्था में अपनी जीवन-स्थितियों और कार्य-स्थितियों को बेहतर बनाने का संघर्ष। इस संघर्ष के सबसे अहम मसलों में से एक होता है एक सम्मानजनक जीवनयापन योग्य मज़दूरी का मिलना। इसके अलावा, आठ घण्टे या उससे कम के कार्यदिवस, स्वैच्छिक ओवरटाइम व दोगुनी दर से ओवरटाइम का भुगतान, साप्ताहिक अवकाश, ईएसआई-पीएफ़, रिहायश का अधिकार, शिक्षा का अधिकार और सामाजिक सुरक्षा के अधिकार वे अन्य मुद्दे हैं, जिन पर मज़दूर वर्ग लड़ने के लिए अपने जीवन की भौतिक परिस्थितियों के कारण ही नियमित तौर पर बाध्य होता रहता है।
दूसरे शब्दों में, बेहतर मज़दूरी, बेहतर कार्य–स्थितियों, जनवादी श्रम अधिकारों की लड़ाई मज़दूर वर्ग के लिए वैसे ही है जैसे साँस लेना। हम जीने के लिए साँस लेते हैं। लेकिन हम साँस लेने के लिए नहीं जीते हैं! इसलिए इन संघर्षों को लड़ते हुए मज़दूर वर्ग को अपने दूरगामी ऐतिहासिक लक्ष्य को कभी नहीं भूलना चाहिए : एक समाजवादी व्यवस्था की स्थापना जिसमें उत्पादन, राज–काज और समाज के पूरे ढाँचे पर मेहनतकश वर्गों का नियन्त्रण हो और फ़ैसला लेने की ताक़त उनके हाथों में हो। मज़दूर वर्ग के लिए यह सीखना अनिवार्य और अपरिहार्य होता है कि वह अपने रोज़मर्रा के संघर्षों को अपने दूरगामी संघर्षों से जोड़े, उन दोनों के बीच के रिश्ते को समझे और उसे समझते हुए अपना क्रान्तिकारी संगठन और आन्दोलन खड़ा करे। इसके लिए, एक क्रान्तिकारी सिद्धान्त की आवश्यकता होती है जो क्रान्तिकारी मार्क्सवाद है। क्रान्तिकारी सिद्धान्त पर आधारित एक क्रान्तिकारी मज़दूर पार्टी जो समूची मेहनतकश जनता के क्रान्तिकारी कोर और नेतृत्व का कार्य करे : ऐसी पार्टी का निर्माण और गठन आज भारत के सभी मेहनतकश लोगों की बुनियादी ज़रूरत है।
लेकिन अभी हम इस विषय पर बात करने के बजाय इस पर बात करेंगे कि तात्कालिक और रोज़मर्रा के संघर्षों में केन्द्रीय महत्व रखने वाला एक प्रश्न न्यूनतम मज़दूरी का है और इस बात की पड़ताल करेंगे कि अगर वैज्ञानिक तौर पर ईमानदार आकलन किया जाय तो आज की महँगाई की मौजूदा दर के अनुसार न्यूनतम मज़दूरी, जो जीवनयापन के लिए उपयुक्त हो, आज के समय में कितनी होनी चाहिए।
भारत का न्यूनतम मज़दूरी क़ानून (1948) उस पद्धति के बारे में कुछ नहीं बताता है, जिससे न्यूनतम मज़दूरी का आकलन होता है। आकलन की पद्धति के बारे में आम तौर पर 1957 में हुए 15वें भारतीय श्रम सम्मेलन द्वारा स्थापित मानदण्डों और मापदण्डों का पालन किया जाता है। इसके अलावा, इस पद्धति को सर्वोच्च न्यायालय के कुछ निर्णयों के आधार पर, जैसे कि रेप्टाकोज़ एण्ड कं. बनाम उसके मज़दूर के मुक़दमे में दिया गया निर्णय, संशोधित भी किया गया है। 15वें श्रम सम्मेलन के तहत इस बात की अनुशंसा की गयी कि न्यूनतम मज़दूरी के आकलन में एक चार सदस्यों के परिवार को आधार बनाया जाना चाहिए। इसके आधार पर भोजन सम्बन्धी आवश्यकता (न्यूनतम 2700 कैलोरी), बुनियादी सुविधाएँ जैसे कि प्रति परिवार 72 गज कपड़ा, सरकारी निम्न वेतन वर्ग के मकानों के अनुसार मकान किराया भत्ता, ईंधन, लाइटिंग, और विविध ख़र्चों के लिए 20 प्रतिशत अतिरिक्त भत्ता न्यूनतम मज़दूरी के आकलन में शामिल होनी चाहिए। सरकारों के लिए यह अनिवार्य होना चाहिए कि पाँच वर्ष से कम की अवधि में न्यूनतम मज़दूरी को संशोधित करें। इस संशोधन को आधिकारिक सरकारी राजपत्र द्वारा प्रकाशित होना चाहिए। साथ ही, 30 दिन की न्यूनतम मज़दूरी 26 दिन के आधार पर आकलित होनी चाहिए, यानी वेतन समेत साप्ताहिक अवकाश के साथ। इसके अलावा, न्यूनतम मज़दूरी के आकलन में अकुशल, अर्द्धकुशल, कुशल व अतिकुशल श्रमिक के आधार पर, अलग-अलग राज्यों में महँगाई के अलग-अलग स्तर के आधार पर, रोज़गार के प्रकार के आधार पर अन्तर मौजूद होते हैं। अन्तत:, एक परिवर्तनीय महँगाई भत्ता जो कि उपभोक्ता क़ीमत सूचकांक से बँधा होता है, मिलना चाहिए। यानी बढ़ती महँगाई के अनुसार महँगाई भत्ता मिलना चाहिए।
ग़ौरतलब है कि 1957 के श्रम सम्मेलन की अनुशंसाओं में शिक्षा, दवा-इलाज पर होने वाला ख़र्च उपयुक्त रूप से न्यूनतम मज़दूरी के आकलन में शामिल ही नहीं है। 1957 के श्रम सम्मेलन ने ‘विविध’ के उपशीर्षक के तहत इन ख़र्चों को आकलित मान लिया है, जिसके लिए 20 प्रतिशत भत्ता देने की सिफ़ारिश की गयी है। सर्वोच्च न्यायालय के उपरोक्त उल्लिखित निर्णय (रेप्टाकोज़ एण्ड कं. बनाम उसके मज़दूर) के अनुसार शिक्षा व दवा-इलाज का ख़र्च न्यूनतम मज़दूरी के आकलन में शामिल होना चाहिए।
लेकिन अगर आप सभी राज्यों द्वारा निर्धारित न्यूनतम मज़दूरी के आकलन को देखेंगे तो आप पाएँगे में अक्सर उनमें यह उपशीर्षक मौजूद ही नहीं है! यानी मज़दूर को न्यूनतम मज़दूरी के आकलन में एक ऐसा प्राणी मान लिया गया है, जिसे बस जीने की ख़ुराक दे दी जाय, ताकि अगले दिन वह कारखाने की शिकंजी में नींबू की तरह अपने शरीर को निचुड़वाने के लिए आ सके! उसके बच्चे और उसके परिवार को गुणवत्ता वाली शिक्षा, दवा-इलाज व अन्य मानवीय सुविधाएँ प्राप्त होती हैं या नहीं, यह न्यूनतम मज़दूरी के आकलन में क़ानूनन शामिल नहीं है। इसे अस्पष्ट रखा गया है और जानबूझकर ऐसा किया गया है। इसी प्रकार, परिवहन के ख़र्च को भी न्यूनतम मज़दूरी के आकलन का एक भिन्न और बाध्यताकारी उपशीर्षक नहीं बनाया गया है और उसे भी “विविध” का हिस्सा “मान लिया” गया है! जानबूझकर इन बुनियादी उपशीर्षकों को शामिल किये जाने को या तो अस्पष्ट रखा गया है या फिर उन्हें शामिल ही नहीं किया गया है। इससे तमाम राज्य सरकारों को इन वाजिब श्रम अधिकारों का उल्लंघन करने का अवसर मिल जाता है क्योंकि भारत में श्रम का प्रश्न संविधान की समवर्ती सूची में है। यानी उस पर केन्द्र और राज्य की सरकारें दोनों ही निर्णय ले सकती हैं।
नतीजतन, मिसाल के तौर पर, उत्तर प्रदेश राज्य सरकार को प्रभावत: यह अधिकार मिल जाता है कि वह 2012 से 2025 के बीच कोई मज़दूरी संशोधन न करे और न्यूनतम मज़दूरी को रु. 11,000 के बराबर रखे, जो भीख समान है! अन्य अधिकांश राज्यों की स्थिति भी ऐसी ही है। दिल्ली जैसे विकसित राज्य में भी अलग-अलग श्रेणियों में उच्चतम श्रेणियों के लिए भी न्यूनतम मज़दूरी मुश्किल से 20 हज़ार पहुँचती है। बाक़ी सभी जानते हैं कि हर राज्य में पूँजीपति कुशल व अतिकुशल श्रमिकों को भी अप्रेण्टिस, हेल्पर आदि का नाम देकर अकुशल मज़दूर के तौर पर रखते हैं! यहाँ तक कि सरकारी एजेंसियाँ भी इस बात को जानती हैं। लेकिन इस पर कोई भी सरकार मज़दूरों के पक्ष में कोई क़दम नहीं उठाती और ऐसी कम्पनियों पर कोई कार्रवाई नहीं की जाती है।
इसके अलावा, भारत सरकार एक राष्ट्रीय फ़्लोर लेवल न्यूनतम मज़दूरी भी निर्धारित करती है, जिससे नीचे कोई राज्य सरकार अपनी न्यूनतम मज़दूरी को नहीं रख सकती है। सुनकर आपको अच्छा लगा होगा! क्या आपको पता है कि वर्तमान समय में भारत सरकार द्वारा निर्धारित यह फ़्लोर लेवल न्यूनतम मज़दूरी क्या है? राष्ट्रीय फ़्लोर लेवल न्यूनतम मज़दूरी है रु. 178 प्रति दिन! यानी, महीने का लगभग रु. 5340! किसी राज्य को इससे कम न्यूनतम मज़दूरी रखने की आवश्यकता ही क्या है! यह फ़्लोर लेवल किस प्रकार की गणना से तैयार किया गया है? क्या यह मज़दूरों के साथ केन्द्र सरकार का एक भद्दा मज़ाक नहीं है? सबसे पहले भारत के प्रधानमन्त्री और गृहमन्त्री को इस न्यूनतम मज़दूरी पर जीवन व्यतीत करके दिखाना चाहिए क्योंकि काम करने हेतु शिक्षण और प्रशिक्षण के स्तर के अनुसार तो उनकी स्थिति 95 प्रतिशत शहरी मज़दूरों से कम ही ठहरेगी! नतीजा यह है कि न्यूनतम मज़दूरी को विभिन्न राज्य सरकारों ने बेहद कम रखा है। इतना कम कि एक इंसानी ज़िन्दगी जी पाना उस मज़दूरी पर सम्भव ही नहीं है।
कुछ राज्यों में औसत न्यूनतम मज़दूरी पर एक निगाह डालें: दिल्ली में यह अलग-अलग श्रेणियों के औसतन रु. 18,456 से रु. 21,000 के बीच है, उत्तर प्रदेश में यह अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग कुशलता श्रेणियों के लिए औसतन रु. 13,000 से 16,000 के बीच में है, हरियाणा में यह अकुशल के लिए रु. 15,220 से लेकर कुशल के लिए रु. 18,500 के बीच है, गुजरात में यह रु. 13,325 से रु. 13,585 के क़रीब है, महाराष्ट्र में यह रु. 12,700 से रु. 15,532 है, आन्ध्र प्रदेश में यह रु. 11,798 से रु. 15,951 है, तमिलनाडु में यह रु. 13,800 से रु. 14,500 के बीच है, तेलंगाना में यह हालिया बढ़ोत्तरी के बाद रु. 16,000 से रु. 20,000 के बीच है, केरल में रु. 15,120 से रु. 21,330 के बीच है, मध्यप्रदेश में यह रु. 12,425 से रु. 16,769 है, राजस्थान में तो यह रु. 7,410 से अतिकुशल के लिए मात्र रु. 9,334 है (देश में सबसे कम न्यूनतम मज़दूरी में से एक), बिहार में यह रु. 11,336 से अतिकुशल के लिए रु. 17,472 है, पश्चिम बंगाल में यह रु. 10,400 के क़रीब है, पंजाब में यह रु. 13,486 से अतिकुशल के लिए रु. 16,601 है, हिमाचल प्रदेश में रु. 11,820 से रु. 15,390 के बीच है। कर्नाटक सरकार ने हालिया दिनों में न्यूनतम मज़दूरी में सबसे ज़्यादा बढ़ोत्तरी (60 फ़ीसदी) की है, जिसके बाद वहाँ न्यूनतम मज़दूरी अकुशल मज़दूरों के लिए रु. 19,300 (तीसरे श्रेणी के राज्य क्षेत्र में) से कुशल मज़दूरों के लिए रु. 31,100 (पहले श्रेणी के राज्य क्षेत्र में) हो गयी है। लेकिन क़ायदे से तीसरे स्तर के राज्य क्षेत्र में अकुशल मज़दूरों की ही मज़दूरी कम-से-कम रु. 30,000 होनी चाहिए।
दूसरी बात यह है न्यूनतम मज़दूरी की उपरोक्त दरें आधिकारिक दरें हैं जो काग़ज़ों में ज़्यादा लागू होती हैं, हक़ीक़त में कम। विशेष तौर पर अनौपचारिक मज़दूरों के लिए (जो औपचारिक और अनौपचारिक दोनों ही सेक्टरों में काम करते हैं) ये मामूली न्यूनतम मज़दूरी दरें भी अधिकांश राज्यों में लागू नहीं होतीं। ये दरें आठ घण्टे के काम के लिए हैं। लेकिन अधिकांश राज्यों में अनौपचारिक मज़दूरों को 2 से 4 घण्टे का ओवरटाइम लगाने के बाद भी ये बेहद कम न्यूनतम मज़दूरी दरें प्राप्त नहीं होतीं। यानी, मालिकों, कम्पनियों व प्रबन्धनों को पहले ही बेहद कमज़ोर कर दिये गये श्रम क़ानूनों का उल्लंघन करने की पूरी आज़ादी दे दी गयी है। अगर मज़दूर अपने श्रम अधिकारों के लिए आन्दोलन करते हैं तो उन पर और श्रम अधिकार कार्यकर्ताओं पर ग़ैर-ज़मानती धाराएँ लगा कर फ़र्जी मुक़दमे थोप दिये जाते हैं, उन्हें “आतंकवादी”, “पाकिस्तानी एजेण्ट”, “देशद्रोही” आदि क़रार दे दिया जाता है, जैसा कि नोएडा मज़दूर आन्दोलन के मामले में योगी सरकार और उसकी पुलिस ने किया है। लेकिन जब मालिकान–प्रबन्धन नंगे तौर पर बरसों–बरस न्यूनतम मज़दूरी तक नहीं देते और अन्य सभी श्रम अधिकारों का उल्लंघन करते हैं, तो उनके साथ मोदी सरकार, योगी सरकार और अन्य भाजपा राज्य सरकारें क्या करती हैं? उन्हें करों से छूट दी जाती है, सस्ती ज़मीन, बिजली और पानी दिये जाते हैं, उनके कर्ज़ माफ़ कर दिये जाते हैं! “देश के विकास” के लिए यह ज़रूरी है कि पूँजीपतियों को मज़दूरों के शरीरों को रौंदकर आगे बढ़ने दिया जाय, क्योंकि धन्नासेठ और उनके नेता–नौकरशाह ही तो देश हैं, और वे आगे बढ़ेंगे तभी तो देश आगे बढ़ेगा! इसके बदले में ये ही पूँजीपति हर चुनाव में भाजपा को लाखों करोड़ का चुनावी चन्दा देते हैं। बदले में भाजपा सरकारें उनकी तानाशाहाना मैनेजिंग कमेटियों का काम करती हैं।
ऐसे में, सबसे पहले यह सवाल उठाना लाज़िमी है कि जायज़ तौर पर हमारी न्यूनतम मज़दूरी कितनी होनी चाहिए? तभी हम एक ठोस माँग के साथ जागृत, गोलबन्द और संगठित हो सकते हैं और उसके लिए संघर्ष कर सकते हैं। साथ ही, यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि राष्ट्रीय फ़्लोर लेवल न्यूनतम मज़दूरी के तौर पर इसी न्यूनतम मज़दूरी को स्थापित किया जाना चाहिए ताकि कोई राज्य सरकार श्रम के मसलों के संविधान की समवर्ती सूची में होने को आधार बनाकर उसका उल्लंघन न कर सके। आइये, मौजूदा उपभोक्ता क़ीमत सूचकांक के आधार पर इसका आकलन करें कि एक इंसान जैसी ज़िन्दगी जीने के लिए एक मज़दूर परिवार को कितनी न्यूनतम मज़दूरी प्राप्त होनी चाहिए। हमने नीचे दी गयी तालिका में किये गये आकलन के लिए मुख्य तौर पर राष्ट्रीय घरेलू उपभोग व्यय सर्वेक्षण, राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण, उपभोक्ता क़ीमत सूचकांक आदि की सूचनाओं का संसाधन व प्रयोग किया है। इसमें हमने उन सभी वस्तुओं व सेवाओं पर ख़र्च को शामिल किया है जो आज के दौर में एक मेहनतकश परिवार के लिए अपरिहार्य हैं। इसके लिए, 4 से 5 लोगों के परिवार की कल्पना की गयी है (औसत परिवार आकार 4.38 सदस्यों का है)। और इसके अलावा हर वस्तु या सेवा पर होने वाले औसत ख़र्च को अनुमानित किया गया है।
आज के समय में इसमें एक ख़र्च और जोड़ा ही जाना चाहिए: प्रति माह मोबाइल रीचार्ज पर होने वाला ख़र्च जो कि औसतन रु. 700 से रु. 1200 तक आता है। अब अगर उपरोक्त नियमित औसत ख़र्चों की न्यूनतम सीमा, माध्यमिक स्तर और उच्चतम सीमा को जोड़ा जाय, तो एक सामान्य मानवीय जीवन के लिए चार से पाँच व्यक्तियों के एक परिवार को प्रति माह कम-से-कम रु. 26,000 से रु. 32,000 तक होना चाहिए। साथ ही, याद रखें, अगर आकस्मिक ख़र्च होते हैं, जैसे कोई भी विपदा, बड़ी बीमारी, अस्पताल में भर्ती, शादी-ब्याह, आदि, तो परिवार के पास कुछ भी बचा नहीं होगा ख़र्च के लिए और वह उधार लेने को मजबूर होगा! यानी, 30-32 हज़ार रुपये की मासिक मज़दूरी पर भी मज़दूर केवल अपने नियमित ख़र्चों को प्रबन्धित कर सकते हैं। लेकिन आकस्मिक और विशेष स्थितियों में वे कर्ज़ लेने को बाध्य होंगे। लेकिन नियमित ख़र्चों के लिए भी कम से कम 30 से 32 हज़ार न्यूनतम मज़दूरी होनी ही चाहिए। लेकिन हमारे देश में 90 फ़ीसदी से ज़्यादा अनौपचारिक मज़दूरों की औसत मासिक आय 10 से 12 हज़ार रुपये के क़रीब है! यह हमारी मानवीय गरिमा पर चोट नहीं है तो क्या है? हमें कीड़ा-मकोड़ा और कॉकरोच समझा जाता है। हमें न तो इंसान माना जाता है और न ही इंसानों जैसा बर्ताव हमारे साथ किया जाता है। पूँजीपतियों के लिए हम बोझा ढोने वाले पशुओं से ज़्यादा और कुछ नहीं हैं, जिन्हें बस जीने की ख़ुराक़ दे दी जाय और बदले में वे कमरतोड़ मेहनत कर धन्नासेठों की तिजोरियाँ भर सकें, उनकी औलादों की ऐय्याशियों का ख़र्च उठा सकें, उनकी सात पुश्तों का भविष्य सुरक्षित कर सकें, जबकि हमारे बच्चे हमेशा भूख और कुपोषण की रेखा पर जियें, दवा-इलाज से वंचित रहें, शिक्षा उनकी पहुँच से बाहर रहे और हम पुश्त-दर-पुश्त रोज़ ग़ुलामों के समान खटने का अभिशप्त हों।
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तालिका मानवीय जीवन के लिए अनिवार्य न्यूनतम मासिक ख़र्च का एक सामान्य आकलन |
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| 1 लीटर दूध | 57-62 रु. (एक चार से पाँच व्यक्तियों के परिवार में प्रतिदिन औसतन एक लीटर दूध ख़र्च होता है। उसके अनुसार, 30 दिन के लिए लगभग 1800 से 1860 रुपये) |
| 1 किलो चीनी | 55-60 रु. (आम तौर पर महीने में चार से पाँच लोगों का परिवार 8 से 10 किलो चीनी खाता है, तो 30 दिन का करीब 500 से 600 रुपये) |
| 1 किलो नमक | 27-30 रु. (एक माह में आम तौर पर 1 से 1.5 किलो की खपत होती है एक परिवार में, तो 30 दिन में औसतन 30 से 45 रुपये) |
| 1 किलो सामान्य चावल | 45-50 रु. (एक माह में आम तौर पर 25 से 30 किलो चावल ख़र्च होता है तो एक माह में कुल 1200 से 1450 रु.) |
| 1 किलो दाल (सभी दालों का औसत) | 107 रु. (एक परिवार आम तौर पर 3.5 से 4.5 किलो प्रति माह खाता है, तो कुल 375 से 474 रुपये) |
| प्रति माह पारिवारिक सब्ज़ी व फल ख़र्च | क़रीब 1500 से 3000 रुपये प्रति माह |
| खाद्य तेल पर प्रति माह औसत पारिवारिक ख़र्च | 4 से 4.5 लीटर प्रति माह, औसत खपत के आधार पर क़रीब 800 से 1000 रुपये प्रति माह |
| अण्डों पर प्रति माह औसत ख़र्च | औसतन एक 4 से 5 लोगों के परिवार में प्रति माह 36 से 45 अण्डों की खपत होती है, प्रति अण्डा क़ीमत अभी रु. 6-7., कुल ख़र्च 250 से 315 रुपये प्रति माह |
| मांस व मछली पर औसत मासिक पारिवारिक ख़र्च | 900 से 1250 रुपये |
| चाय व कॉफी पर प्रति माह ख़र्च | औसतन महीने में 300 से 1000 रुपये के बीच |
| मसालों पर प्रति माह ख़र्च | 675 से 800 रुपये प्रति माह |
| रसोई ईंधन पर प्रति माह ख़र्च | कनेक्शन होने पर 700 से 1000 रुपये, कनेक्शन न होने पर कम-से-कम 2500 रुपये |
| पेय जल पर प्रति माह ख़र्च | शहरों में आम तौर पर 200 से 1000 रुपये; गाँवों में यह लगभग शून्य है क्योंकि अक्सर पीने योग्य जल भी शून्य ही होता है! |
| बिजली पर प्रति माह ख़र्च | औसत मध्यवर्गीय घर में कम से कम 2000-2500 रुपये; निर्धन घरों में औसतन 300 से 800 रुपये |
| घर किराये पर औसत ख़र्च | 5 से 15 हज़ार रुपये |
| औसत पारिवारिक ख़र्च शिक्षा पर | 500 रुपये (निर्धन परिवार) से लेकर 5000 रुपये (आम मध्यवर्गीय परिवार) तक |
| औसत स्वास्थ्य ख़र्च | रु. 300 से रु. 410 प्रति व्यक्ति प्रति माह, यानी 4 लोगों के परिवार में क़रीब 1500-1600 रुपये प्रति माह |
| औसत परिवहन ख़र्च | 1500 से 3000 रुपये (जो सार्वजनिक परिवहन और/या टू-व्हीलर इस्तेमाल करते हैं) |
| औसत ख़र्च कपड़ों और जूतों पर | 1200 से 1900 रुपये प्रति माह |
| टिकाऊ वस्तुओं (जैसे फर्नीचर, फिक्सचर, टीवी, फ़्रिज वगैरह) पर औसत मासिक ख़र्च | 1200 से 1800 रुपये प्रति माह |
| टॉलेटरीज़ पर औसत मासिक ख़र्च | 400 से 900 रुपये प्रति माह |
मज़दूर बिगुल, जून 2026













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