महान साहित्यकार मक्सिम गोर्की के स्मृति दिवस (18 जून) के अवसर पर
“लोग दुख सहने की शक्ति कहाँ से लाते हैं?”
“वे इसकी आदत डाल लेते हैं,”
— माँ ने एक आह भरते हुए उत्तर दिया।
(‘माँ‘ उपन्यास से)
“आदमी का हृदय जब वीर कृत्यों के लिए छटपटाता हो तो इसके लिए वह सदा अवसर भी ढूँढ लेता है। जीवन में ऐसे अवसरों की कुछ कमी नही है और अगर किसी को ऐसे अवसर नहीं मिलते,तो समझ लो कि वह काहिल है या फ़िर कायर या यह कि वह जीवन को नहीं समझता। “
(‘बुढ़िया इजरगिल‘ से)
“मैं मानव-जाति से प्रेम करता हूँ और चाहता हूँ कि उसे किसी भी तरह से दुःख न पहुँचाऊँ, परन्तु इसके लिये न तो हमें भावुकता का दामन पकड़ना चाहिए और न ही चमकीले शब्द- जाल और खूबसूरत झूठ की टट्टी खड़ी करके जीवन के भयानक सत्य को हमें छिपाना चाहिए ! ज़रूरी है कि हम जीवन की ओर मुँह करें और हमारे हृदय तथा मस्तिष्क में जो कुछ भी शुभ और मानवीय है, उसे जीवन में उड़ेल दें।”
(‘जीवन की राहों पर’ से)













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