बारह साल, जनता बेहाल
टूटे सपनों का अम्बार! कौन है इसका ज़िम्मेदार ?
मोदी सरकार और उसके तमाम नेता-मन्त्री, सांसद-विधायक-पार्षद देश भर में मोदी सरकार के 12 वर्ष पूरे होने का उत्सव मना रहे हैं। सारे भाजपाई नेता अपने आपको नरेन्द्र मोदी का परमभक्त दिखाने की लज्जाहीन प्रतिस्पर्द्धा में लगे हुए हैं। कहीं कीर्तन हो रहे हैं, कहीं चौकी लग रही है तो कहीं जगराते हो रहे हैं! दावा किया जा रहा है कि नरेन्द्र मोदी ने सार्विक मताधिकार पर आधारित आम चुनावों में चुने हुए प्रधानमन्त्री के तौर पर सबसे अधिक दिनों तक प्रधानमन्त्री रहने का जवाहरलाल नेहरू का कीर्तिमान ध्वस्त कर दिया है। वैसे देखा जाये तो अगर यह सच भी है तो यह अपने आप में कोई उपलब्धि नहीं है। 12 साल में आपने सत्ता में रहते हुए क्या किया, आपके काम का लेखा-जोखा उसके आधार पर बनता है और तभी तय होता है कि 12 साल सत्ता में रहना कोई उपलब्धि है या नहीं! वरना तो एडॉल्फ़ हिटलर भी 12 साल 3 महीने सत्ता में रहा था, पर उसने जर्मनी को कहाँ से कहाँ पहुँचा दिया यह तो सारी दुनिया जानती ही है!
एक ऐसे समय में जब जनता कमरतोड़ महँगाई और विकराल बेरोज़गारी की मार झेल रही है, जब देश के छात्र-युवा बरबाद होती शिक्षा व परीक्षा व्यवस्था का नतीजा भुगत रहे हैं, जब देश के अल्पसंख्यक, विशेष तौर पर, मुसलमान साम्प्रदायिक तनाव और विषवमन के शिकार बन रहे हैं, जब स्त्री-विरोधी व दलित-विरोधी अपराध अपने चरम पर हैं, जब देश के ग़रीब छोटे किसान हर रोज़ तबाह हो रहे हैं और आत्महत्याएँ कर रहे हैं, उस समय नरेन्द्र मोदी के प्रधानमन्त्रित्व के 12 साल पूरे होने का भाजपा द्वारा मनाया जा रहा यह जश्न जनता के दुख-दर्द के साथ क्या एक भद्दा मज़ाक और राजनीतिक अश्लीलता की पराकाष्ठा नहीं है?
नरेन्द्र मोदी-नीत भाजपा सरकार के 12 वर्षों में देश के आम मेहनतकश लोगों ने क्या पाया और क्या खोया है? इसका हिसाब किये बिना यह तय नहीं किया जा सकता है कि पिछले 12 वर्षों का जश्न मनाया जाये या मातम। आइये, जनता को प्रभावित करने वाले आधारभूत आर्थिक मसलों के बारे में कुछ बुनियादी तथ्यों और आँकड़ों पर निगाह दौड़ाते हैं। बढ़ती साम्प्रदायिकता, जातिवाद, क्षेत्रवाद, भाषाई पहचानवाद और पितृसत्तात्मक दमन के मसले भी उतने ही अहम हैं और उन पर चर्चा भी ‘मज़दूर बिगुल’ के पन्नों पर हम करते रहे हैं और आगे भी करते रहेंगे। लेकिन मौजूदा लेख में हम मूलत: और मुख्यत: मोदी सरकार के 12 साल के जनता के लिए आर्थिक नतीजों पर चर्चा को केन्द्रित करेंगे।
बेरोज़गारी का क़हर: मज़दूर और आम घरों के छात्र–युवा तबाहो–बरबाद
सबसे पहले तो यह याद रखने की आवश्यकता है कि बेरोज़गारी के सरकारी आँकड़े ही हास्यास्पद हैं। वजह यह कि उसमें रोज़गारशुदा होने या बेरोज़गार होने का पैमाना ही विचित्र है। इस पैमाने के अनुसार, सर्वेक्षण किये जाने के समय यदि किसी व्यक्ति ने पिछले सप्ताह एक घण्टे भी कोई वैतनिक कार्य किया हो, तो उसे रोज़गारशुदा माना जायेेगा! ‘रोज़गार’ शब्द में ही ‘रोज़’ जुड़ा हुआ है, जिसका अर्थ है वह काम जो वेतन/आय के बदले आप रोज़ नियमित तौर पर करते हों। इसके अनुसार, अगर आप भूख और कुपोषण के मारे हों, काम की तलाश कर रहे हों, और आपको कहीं पर किसी दिन एक दिन का काम दिहाड़ी के आधार पर मिला और संयोग से उसके एक सप्ताह के भीतर सरकारी सर्वेक्षण वाले आपके पास आये, तो आपको एक नौकरीशुदा व्यक्ति के तौर पर सरकारी आँकड़ों में दर्ज कर लिया जायेेगा! लेकिन पहले इन सरकारी आँकड़ों पर ही एक निगाह डाल लेते हैं।
रोज़गार-सम्बन्धी सरकारी आँकड़ों पीरियॉडिक लेबर फ़ोर्स सर्वे–पीएलएफ़एस दर्ज करता है। इसके आँकड़ों के ही हिसाब से देश में बेरोज़गारी दर फ़िलहाल 5.2 प्रतिशत है। एक अन्य अपेक्षाकृत अधिक सन्तुलित स्रोत है सेण्टर फॉर मॉनीटरिंग इण्डियन इकॉनमी (सीएमआईई)। इसके आँकड़ों के अनुसार बेरोज़गारी दर इस समय क़रीब 7.45 प्रतिशत है। जैसा कि हमने ऊपर बताया, वैसे तो ये आँकड़े वास्तविक बेरोज़गारी को ढँकने के लिए ही बनाये जाते हैं, लेकिन अगर इन्हें ही माना जायेे तो इसका अर्थ है कि काम करने योग्य आबादी में से 5.58 करोड़ लोग बेरोज़गार हैं। वास्तविक आँकड़े इससे कहीं ज़्यादा हैं। सीएमआईई के ही आँकड़ों के अनुसार, 20 से 24 साल के लोगों में 44.5 प्रतिशत लोग बेरोज़गार हैं, जिनमें से कइयों के पास स्नातक या उससे ऊपर की डिग्रियाँ हैं। ई-श्रम पोर्टल पर 30.5 करोड़ मज़दूरों ने अपना पंजीकरण करवाया है। ये ऐसे कामगार हैं जो या तो रोज़गार खोज रहे हैं या फिर सामाजिक सुरक्षा योजना का लाभ प्राप्त करना चाहते हैं, क्योंकि वे बेरोज़गार या अर्द्धबेरोज़गार है। ज़ाहिर है, इन आँकड़ों को रोज़गार के सही पैमानों के अनुसार संशोधित किया जाये तो वास्तविक बेरोज़गारी कहीं ज़्यादा निकलती है। यही वजह है कि कई अर्थशास्त्रियों ने बेरोज़गारों की संख्या को 25 से 30 करोड़ से अधिक बताया है। अर्द्धबेरोज़गारी-प्रच्छन्न बेरोज़गारी को इसमें जोड़ दें, तो यह तादाद कुल काम करने योग्य लोगों की आबादी के क़रीब आधे तक पहुँच जाती है। यानी देश की लगभग आधी आबादी बेरोज़गारी, अर्द्धबेरोज़गारी या प्रच्छन्न बेरोज़गारी का शिकार है।
ग़ौरतलब है कि 12 वर्ष पहले सरकार में आने के ठीक पहले नरेन्द्र मोदी-नीत भाजपा के मुख्य वायदों में से एक था बेरोज़गारी को कम करना और प्रति वर्ष 2 करोड़ रोज़गार मुहैया कराना। लेकिन वास्तव में नोटबन्दी और फिर कोविड के भयंकर बदइन्तज़ामी से लागू किये गये लॉक-डाउन के दौरान क़रीब 13 करोड़ लोगों ने रोज़गार खो दिया। अज़ीम प्रेम जी विश्वविद्यालय के एक अध्ययन के अनुसार नोटबन्दी के दौरान और बाद में क़रीब 50 लाख लोगों ने रोज़गार खो दिया। इसके बाद लॉक-डाउन के दौरान रिचा मुखर्जी, केवल कृष्णन और तनुज कंचन के अध्ययन के अनुसार, कोविड लॉकडाउन के दौरान क़रीब 12.2 करोड़ लोगों ने रोज़गार खो दिया। इसमें से 75 प्रतिशत उजरती मज़दूर और स्वरोज़गार-प्राप्त यानी अपना छोटा-मोटा काम करने वाले कैज़ुअल मज़दूर थे। मोदी सरकार के वायदे और उसके द्वारा लागू की गयी जनविरोधी नीतियों के कारण पैदा हुए परिणामों के बीच खाई जितना अन्तर है।
असहनीय है महँगाई की मार, कहाँ गयी मोदी सरकार?
महँगाई की स्थिति भी बेरोज़गारी की स्थिति से भी ज़्यादा नहीं तो कम-से-कम उतनी ही भयंकर है। हाल में कई राज्यों में विधानसभा चुनावों के ख़त्म होते ही लगभग दस दिनों के भीतर मोदी सरकार ने पेट्रोल, डीज़ल की क़ीमतों में चार बार बढ़ोत्तरी कर उसे औसतन 8 रुपये तक बढ़ा दिया। सीएनजी की क़ीमतों में भी 48 घण्टों के भीतर दो बार बढ़ोत्तरी कर उसे 3 रुपये तक बढ़ा दिया गया। दिल्ली में पेट्रोल रु. 102 के क़रीब पहुँच चुका है। दक्षिण व पूर्व के राज्यों में वह रु. 110-115 के पार हो रहा है। डीज़ल की कीमतें भी रु. 96 से रु. 99 के ऊपर जा रही हैं। सीएनजी की क़ीमतें रु. 80 से रु. 88 तक पहुँच चुकी हैं। रसोई गैस की क़ीमत में पहले रु. 60 की बढ़ोत्तरी की गयी और फिर दोबारा उसमें रु. 29 की बढ़ोत्तरी करके उसे रु. 942-960 तक पहुँचा दिया गया है। यह क़ीमत तो उनके लिए है जिनके पास एलपीजी का कनेक्शन है। एक भारी मज़दूर आबादी, विशेषकर प्रवासी मज़दूर आबादी के पास तो एलपीजी का कनेक्शन भी नहीं होता। इस ग़रीब मेहनतकश आबादी को एलपीजी इससे दोगुनी से तिगुनी क़ीमतों पर मिल पाता है। 19 किलो का कामर्शियल सिलेण्डर क़रीब रु. 2000 से बढ़कर पहले रु. 3051 तक हुआ और जून के पहले सप्ताह में ही इसमें दोबारा बढ़ोत्तरी कर इसे रु. 3114 तक पहुँचा दिया गया है। इसका अर्थ यह है कि बाहर रेहड़ी-ठेलों या खाने की दुकानों पर मिलने वाला खाना भी भारी महँगा होगा और वास्तव में हो भी रहा है। इसकी मार भी उन अकेले रहने वाले युवा मज़दूरों पर पड़ेगी जो घर पर खाना नहीं बना पाते और बाहर खाने को बाध्य होते हैं।
पेट्रोलियम उत्पादों में इस अभूतपूर्व क़ीमत-बढ़ोत्तरी के लिए मोदी सरकार पश्चिम एशिया में ईरान-अमेरिका युद्ध को दोषी ठहरा रही है। यह सच है कि पहले से बढ़ रही क़ीमतों को और ज़्यादा बढ़ाने का काम युद्ध ने किया है, लेकिन अभी भी अन्तरराष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल की क़ीमतें लगभग उतनी ही हैं, जितनी नरेन्द्र मोदी के प्रधानमन्त्री बनने के समय थीं। वास्तविकता यह है कि अन्तरराष्ट्रीय बाज़ार में प्रति बैरल कच्चे तेल के दाम के गिरने पर भी हमारे देश में तेल की क़ीमतों में 2014 से ही, यानी नरेन्द्र मोदी के प्रधानमन्त्री बनने के समय से ही, लगातार बढ़ोत्तरी ही की गयी है। मई 2014 में प्रति बैरल कच्चे तेल की क़ीमत थी 103.4 डॉलर। जून 2026 की शुरुआत में यह पश्चिम एशिया के संकट के बावजूद 92.21 डॉलर प्रति बैरल है। मई 2014 में पेट्रोल की क़ीमत रु. 71 प्रति लीटर के क़रीब थी। जून 2026 में यह रु. 102 प्रति लीटर से ऊपर हो चुकी है। तेल कम्पनियों का मुनाफ़ा 2025-26 में पिछले साल के मुक़ाबले 130 प्रतिशत बढ़कर रु. 77,281 करोड़ से भी अधिक हो गया। यानी, पेट्रोलियम उत्पादों पर लगने वाले अप्रत्यक्ष करों व शुल्कों में पिछले 12 सालों में लगातार बढ़ोत्तरी कर जनता के ऊपर महँगाई के बोझ को बेतरह बढ़ा दिया गया है।
पेट्रोलियम उत्पादों में लगातार बढ़ोत्तरी का अर्थ है हर चीज़ के ख़र्च में भारी बढ़ोत्तरी चाहे वह खान-पान का ख़र्च हो, घरेलू ईंधन का ख़र्च हो, परिवहन का ख़र्च हो, दवाओं व इलाज का ख़र्च हो, फ़र्टिलाइज़र की क़ीमतें बढ़ने के कारण खेती की लागत हो, हर वस्तु की मैन्युफैक्चरिंग व सेवाओं की लागत हो। यानी, पेट्रोलियम उत्पादों में ऐसी भयंकर बढ़ोत्तरी का अर्थ है जनता के लिए आम तौर पर कमरतोड़ महँगाई में और भी ज़्यादा बढ़ोत्तरी। दूसरी बात यह है कि पश्चिम एशिया में युद्ध के कारण क़ीमतों में जो बढ़ोत्तरी हो रही है, उसके प्रभाव से काफ़ी हद तक बचा जा सकता था, अगर मोदी सरकार ने एक बेतुकी विदेश नीति न अपनायी होती और अमेरिका के दबाव की अवहेलना कर रूस से अपेक्षाकृत सस्ता तेल ख़रीदा होता और ईरान पर अमेरिका-इज़रायल के हमले का विरोध किया होता। अब जबकि स्थिति नियन्त्रण से बाहर होती प्रतीत हो रही है तो मोदी सरकार फिर से अमेरिका की आलोचना शुरू कर चुकी है, रूस से तेल ख़रीदने के अपने अधिकार की हिमायत कर रही है और विदेश नीति में कुछ बदलाव लाने का प्रयास कर रही है। विदेश मन्त्री एस. जयशंकर ने फ़िनलैण्ड में बयान दिया कि अमेरिका द्वारा प्रतिबन्धों और टैरिफ़ के लगाये जाने के पहले भी भारत रूस से तेल ख़रीद रहा था, अभी भी ख़रीद रहा है और आगे भी ख़रीदेगा क्योंकि यह लागत और प्रभाविता के आधार पर लिया जाने वाला फ़ैसला है। साथ ही, जयशंकर ने यह भी कहा कि अमेरिका के टैरिफ़ लगाने और हटाने के पीछे कोई उसूल का मसला नहीं है, बल्कि यह सुविधा और व्यवहारवाद पर आधारित नीति है। लेकिन इन बयानों के आने तक भारत में तेल की उपलब्धता और क़ीमतों की स्थिति पहले ही बिगड़ चुकी है। लेकिन ये कारक बाह्य कारक ही हैं और इनके प्रभाव में आने के पहले ही भारी अप्रत्यक्ष करों व शुल्कों के कारण भारत में पेट्रोल, डीज़ल और एलपीजी काफ़ी महँगे हो चुके थे। एक बाह्य कारक ने पहले से बिगड़ी हुई स्थिति को बस और ज़्यादा बिगाड़ने का काम किया है।
पेट्रोलियम उत्पादों पर तमाम कर व शुल्क लगाने के अतिरिक्त, अप्रत्यक्ष करों में आम तौर पर भारी बढ़ोत्तरी की गयी है जिसके कारण भी हर वस्तु व सेवा की क़ीमतों में लगातार बढ़ोत्तरी हुई है। एक आँकड़े से ही आपके सामने तस्वीर साफ़ हो जायेेगी। 2013-14 के वित्तीय वर्ष में, यानी मोदी के प्रधानमन्त्री बनने से पहले अप्रत्यक्ष करों से आने वाला भारत सरकार का कुल राजस्व था रु. 4.95 लाख करोड़। एक दशक बाद 2023-24 में, यानी मोदी सरकार के दस वर्ष बीतते-बीतते यह रु. 14.95 लाख करोड़ पहुँच चुका था। यानी, लगभग तीन गुने की बढ़ोत्तरी। क्या भारत के आम मेहनतकश लोगों की औसत आमदनी में कोई बढ़ोत्तरी हुई है? नहीं! वह तो कम हुई है। वर्तमान वित्तीय वर्ष यानी 2025-26 में अप्रत्यक्ष करों से भारत सरकार को आने वाला राजस्व रु. 15.52 लाख करोड़ पहुँच चुका है। इसमें सबसे बड़ा योगदान था जीएसटी और पेट्रोलियम उत्पादों पर बढ़ते अप्रत्यक्ष करों व शुल्कों का।
अप्रत्यक्ष करों से आने वाले राजस्व तीन स्रोतों से आते हैं : केन्द्रीय जीएसटी, केन्द्रीय एक्साइज़ शुल्क और कस्टम्स शुल्क। इसमें केन्द्रीय जीएसटी रु. 9.58 लाख करोड़ है, केन्द्रीय एक्साइज़ शुल्क रु. 3.38 लाख करोड़ है और कस्टम्स शुल्क रु. 2.58 लाख करोड़ है। इसमें से केन्द्रीय एक्साइज़ शुल्क में पेट्रोलियम उत्पादों व तम्बाकू उत्पादों पर लगने वाला शुल्क होता है, लेकिन इसका 99 प्रतिशत हिस्सा पेट्रोलियम उत्पादों से ही आता है। वजह यह है कि आप 1 लीटर पेट्रोल की क़ीमत का क़रीब 35 से 40 फ़ीसदी हिस्सा करों के रूप में देते हैं। यानी, अगर अप्रत्यक्ष करों का बोझ हटा दिया जाये तो इस समय भी, जब पश्चिम एशिया के युद्ध के कारण वैश्विक पेट्रो क़ीमतें बढ़ रही हैं, 1 लीटर पेट्रोल की क़ीमत होगी क़रीब रु. 75!
कुल मिलाकर, महँगाई का हमारे देश में इस समय अन्य कारणों के अलावा अगर कोई सबसे बड़ा कारण है, तो वह है मोदी सरकार द्वारा पिछले 12 वर्षों में जनता के ऊपर लादा गया अप्रत्यक्ष करों का भारी बोझ। अगर इस बोझ को तत्काल 50 प्रतिशत कम कर दिया जाये, तो महँगाई में भारी कमी आ सकती है। लेकिन मोदी सरकार ऐसा नहीं करेगी क्योंकि इससे सरकारी राजस्व में कमी आयेगी और नेताओं, मन्त्रियों, नौकरशाहों, पुलिस व सशस्त्र बलों के अफ़सरों के ऐशो-आराम, ख़िदमत, कुलीन जीवन, सुरक्षा और ऐय्याशी पर होने वाला ख़र्च कम करना पड़ेगा। और सरकारी राजस्व में जो कमी होगी उसे पूरा करने के लिए मोदी सरकार कारपोरेट पूँजीपति वर्ग और धनिक वर्गों पर प्रत्यक्ष प्रगतिशील कर लगा नहीं सकती, क्योंकि भाजपा को हर चुनाव से पहले लाखों करोड़ रुपयों का चन्दा उन्हीं के पास से आता है। 2014 में कारपोरेट कर यानी पूँजीपति वर्ग पर लगने वाला कर था 34 से 35 प्रतिशत। 2017-18 में ही छोटे और मँझोले पूँजीपतियों पर, यानी रु. 50 करोड़ तक के टर्नओवर वाली कम्पनियों पर कर की दर को घटाकर 25 प्रतिशत कर दिया गया। सितम्बर 2019 में मोदी सरकार ने कराधान क़ानून (संशोधन) ऐक्ट पारित किया और सभी कम्पनियों के लिए 22 प्रतिशत के कारपोरेट कर की दर को लागू कर दिया। नयी मैन्युफ़ैक्चरिंग इकाइयों के लिए इसे घटाकर 15 प्रतिशत कर दिया गया। यानी, अमीरों, सेठों, बड़े व्यापारियों के वर्ग पर करों के बोझ को घटाया जा रहा है, जबकि आम मेहनतकश जनता के ऊपर करों के बोझ को बढ़ाया जा रहा है। इन दोनों क़दमों से, यानी अप्रत्यक्ष कर घटाने और प्रत्यक्ष करों को बढ़ाने से, पूँजीवादी शासक वर्ग की आन्तरिक एकता ही ख़तरे में पड़ जायेेगी। इसलिए मन्दी के मौजूदा दौर में पूँजी के हितों की शिद्दत से सेवा में लगी मोदी सरकार ऐसे क़दम कतई नहीं उठाने वाली है।
नर्क बनती मज़दूरों की जीवन–स्थितियाँ और कार्य–स्थितियाँ
मज़दूरों और मेहनतकशों के जीवन और कार्य स्थितियाँ कैसी हैं? यानी, जिनके पास किसी प्रकार का काम है, उनकी स्थिति क्या है? भारत में नौकरीशुदा लोगों की कुल संख्या सरकारी आँकड़ों के अनुसार 56.2 करोड़ हैं। इनमें से 90 प्रतिशत से भी ज़्यादा लोग अनौपचारिक मज़दूर हैं, यानी, ठेका, दिहाड़ी, कैज़ुअल मज़दूर, गिग वर्कर, रेहड़ी-खोमचे वाले, घरेलू कामगार, या तथाकथित स्वरोज़गार-प्राप्त मज़दूर, जिनके पास कोई आठ घण्टे का कार्यदिवस, साप्ताहिक छुट्टी, डबल रेट से ओवरटाइम भुगतान, पक्का रोज़गार, पीएफ़, ईएसआई, आदि के अधिकार नहीं हैं। सरकारी आँकड़ों के ही अनुसार, पंजीकृत अनौपचारिक मज़दूरों में से 92 प्रतिशत को रु. 10 हज़ार या उससे कम मज़दूरी/आय मिलती है। यानी, 40 करोड़ से ज़्यादा अनौपचारिक मज़दूर 10-12 हज़ार रुपये प्रति माह पर जीवन व्यतीत कर रहे हैं! हम जानते हैं कि यह जीवन कैसा होता है। इसका अर्थ होता है लगातार भुखमरी और कुपोषण की रेखा पर जीना। इसका अर्थ होता है कि हम अपने बच्चों और परिवार को गुणवत्ता वाला दवा-इलाज, शिक्षा और रिहायश तक मुहैया नहीं करा सकते। ओवरटाइम लगाने के बाद भी हालत रेत में से तेल निकालने के समान होती है।
यही कारण है कि मौजूदा कमरतोड़ महँगाई के दौर में देश के अलग-अलग क्षेत्रों में मज़दूरी बढ़ाने और डबल रेट से ओवरटाइम के भुगतान की माँगों को लेकर मज़दूर सड़कों पर उतर रहे हैं और हर राज्य में ही सरकारें उनका दमन कर रही हैं। क्या जीवनयापन–योग्य मज़दूरी की माँग करना कोई अपराध है? ईमानदारी से आकलन किया जाये तो एक मज़दूर-मेहनतकश के परिवार को जीने की न्यूनतम बुनियादी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए आज के समय में कम-से-कम रु. 30,000 प्रति माह चाहिए। 10-15 हज़ार रुपये में मज़दूर परिवार भला कैसे एक इंसान जैसा जीवन जी सकता है? 12-12 घण्टे कमरतोड़ ग़ुलामी के बाद भी देश का मज़दूर अपने बच्चों को पोषणयुक्त भोजन, शिक्षा, दवा-इलाज तक मुहैया नहीं करा सकता।
उपरोक्त स्थिति के कारण, मज़दूरों के बीच आत्महत्या करने की प्रवृत्ति भी हालिया दिनों में बढ़ी है। नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो के अनुसार भारत में होने वाली कुल आत्महत्याओं में से 31 प्रतिशत दिहाड़ी मज़दूरों की आत्महत्याएँ हैं। ऐसे में, मज़दूर-मेहनतकश जब अपनी माँगों को उठाते हैं, तो उन्हें “देशद्रोही”, “राष्ट्र-विरोधी”, आदि घोषित कर दिया जाता है। क्या इस देश में सुई से लेकर जहाज़ तक बनाने वाले बहुसंख्यक मज़दूर–मेहनतकश नहीं शामिल हैं? क्या ‘देश’ का मतलब केवल परजीवी धन्नासेठों, कारखाना–मालिकों, ठेकेदारों और बिचौलियों की जमात है?
मज़दूरों की जीवन-स्थितियों में उनकी रिहायश, पीने के पानी, साफ़-सफ़ाई की व्यवस्था भी शामिल है। आप किसी भी शहर की मज़दूर बस्ती में चले जायेें आपको एक जैसे ही हालात मिलेंगे। न तो पीने के लिए साफ़ पानी है, न पानी का कनेक्शन है, पानी के टैंकरों के सामने लोग सुबह-सुबह लाइन लगाये खड़े रहते हैं, कई जगह शौचालय और नालियों की उपयुक्त व्यवस्था तक नहीं है। मकान ऐसे हैं, जो एक इंसान के परिवार के रहने के लिए कतई उपयुक्त नहीं कहे जा सकते हैं। 2024 में चदचन, होसिने, तमिल सेल्वन व अन्य अध्येताओं द्वारा किये गये अध्ययन (2024) के अनुसार अधिकांश मज़दूरों के घरों में हवा आने-जाने की कोई जगह नहीं है, साफ़ पीने का पानी उपलब्ध नहीं है, अपशिष्ट प्रबन्धन की कोई व्यवस्था नहीं है, सैनीटेशन की कोई व्यवस्था नहीं है।
अगर सुरक्षा इन्तज़ामात की बात करें, तो उसकी स्थिति भी भारत के कारखानों में दयनीय है। तमाम कारखाना मालिक व कम्पनियाँ अपनी लागत को घटाने और मुनाफ़े की दर को बढ़ाने के लिए मज़दूरों को सुरक्षा के उपकरण व अन्य इन्तज़ाम मुहैया नहीं कराते हैं। नतीजतन, डायरेक्टोरेट जनरल फैक्टरी एडवाइस सर्विस एण्ड लेबर इंस्टीट्यूट्स के अनुसार पिछले एक दशक में ज्ञात घटनाओं के अनुसार हर वर्ष औसतन 1000 से 1300 मज़दूर औद्योगिक दुर्घटनाओं में मारे जाते हैं। घायलों की संख्या इससे कहीं ज़्यादा है, जिसमें मज़दूर ऐसी अपंगता के शिकार हो जाते हैं कि उन्हें काम ही नहीं मिल सकता। केवल पंजीकृत कारखानों में ही 2017 से 2020 के दौरान हर वर्ष औसतन 1109 मज़दूर औद्योगिक दुर्घनाओं में मर रहे थे और क़रीब 4000 घायल हो रहे थे।
ऊपर से मज़दूरों की वास्तविक आमदनी में भी लगातार गिरावट जारी रही है। पीरियॉडिक लेबर फ़ोर्स सर्वे के अनुसार 2024 में पक्की नौकरी वाले नियमित मज़दूरों की वास्तविक मज़दूरी (यानी, अपनी मज़दूरी से वे जितनी वस्तुएँ व सेवाएँ वास्तव में ख़रीद सकते हैं) 2019 के स्तर से 1.7 प्रतिशत कम थी। अनौपचारिक व असंगठित क्षेत्र के ठेका, दिहाड़ी, कैज़ुअल मज़दूरों की वास्तविक मज़दूरी में आर्थिक सर्वेक्षण के मुताबिक -1 प्रतिशत की दर से गिरावट जारी रही है। ग्रामीण मज़दूरों की वास्तविक मज़दूरी 2014 से 0 प्रतिशत से कुछ अधिक दर से बढ़ी है, जो कि अन्य कारकों से प्रति-सन्तुलित की जाये, तो ठहरावग्रस्त या गिरती हुई वास्तविक मज़दूरी मानी जायेेगी। वहीं स्वरोज़गार-प्राप्त मज़दूरों की वास्तविक आमदनी में 2019 के मुकाबले 5 प्रतिशत की गिरावट हुई है। गिग वर्करों (प्लेटफार्म व डिलिवरी मज़दूर) की वास्तविक आय 2019 से 2022 के दौरान ही क़रीब 24 प्रतिशत गिर गयी थी।
इन भयंकर स्थितियों को विस्फोट की ओर जाने से रोकने के लिए मोदी सरकार की ओर से फ़्री राशन की भीख (5 किलो अनाज) देश की 57 प्रतिशत जनता को दिया जाता है। इससे क्या होगा? जब देश की जनता को सम्मानजनक और जीवन जीने योग्य वेतन वाला काम चाहिए तो उसे यह भीख दी जाती है। भोजन सुरक्षा के अधिकार के तहत देश की मेहनतकश आबादी को राशनिंग की सुविधा तो मिलनी ही चाहिए। लेकिन वह नौकरियाँ और सम्मानजनक वेतन का विकल्प नहीं हो सकता है। मोदी सरकार का यह क़दम इसलिए भी पूँजीपतियों को फ़ायदा पहुँचाता है क्योंकि इसके ज़रिये पूँजीपतियों के सिर से सारी ज़िम्मेदारी हट जाती है, यह औसत मज़दूरी पर कम होने का दबाव पैदा करता है और कुल मिलाकर इस राशनिंग का ख़र्च देश की जनता ही उठाती है। इस फ़्री राशन योजना पर सरकार पाँच वर्ष में क़रीब 11.8 लाख करोड़ रुपये ख़र्च करती है। यह पैसा कहाँ से आता है? सरकारी ख़ज़ाने से जो जनता के करों से ही भरा जाता है। यानी जनता पर ही पहले अप्रत्यक्ष करों का बोझ बढ़ाओ, उसके बाद इससे मिलने वाले राजस्व से एक छोटी–सी राशि फ़्री राशन में लगा दो और साथ में वाहवाही लूट लो! इसे एक हाथ से चार आना देना और दूसरे हाथ से आठ आना ले लेना कहते हैं। इस योजना से देश की करोड़ों की मेहनतकश आबादी को कुछ ख़ास हासिल भी नहीं होता, सिवाय भुखमरी-कुपोषण रेखा पर जैसे-तैसे जीवन व्यतीत करने के। और यह योजना भी मोदी सरकार का अहसान नहीं है, बल्कि देश की जनता के पैसे से ही चलने वाली योजना है।
कुल मिलाकर, पिछले 10-12 वर्षों में मज़दूरों की जीवन-स्थितियाँ और कार्य-स्थितियाँ बद से बदतर होती गयी हैं। मज़दूरों के लिए जीवन इतना नारकीय पहले कभी नहीं था। हम मज़दूर-मेहनतकश इस बात को अच्छी तरह से जानते हैं।
छात्रों–युवाओं के भविष्य के साथ शर्मनाक खिलवाड़
पिछले 12 वर्षों में देश के छात्रों-युवाओं के जीवन और भविष्य के साथ जो खिलवाड़ मोदी सरकार ने किया है, वह भी अभूतपूर्व और आश्चर्यजनक है। 2015 से 2026 के बीच में आधिकारिक तौर पर दर्ज मामलों के अनुसार कुल 148 परीक्षा घोटाले हुए हैं और 87 परीक्षाएँ रद्द हुई हैं, जिससे क़रीब 10 करोड़ छात्र बुरी तरह से प्रभावित हुए हैं। पहले भी परीक्षा घोटाले और पेपर लीक होते थे, लेकिन इस स्तर पर ये घपले भारत के इतिहास में पहली बार हुए हैं। ग़ौरतलब है कि अब तक इन घपलों पर दर्ज़ किये गये मुक़दमों में केवल एक व्यक्ति को दण्ड मिला है! सीबीआई और ईडी को हर प्रकार के राजनीतिक विपक्ष के बारे में सारे सुराग़ और सूचनाएँ दैवीय रूप से प्राप्त हो जाते हैं, लेकिन इन घपलों पर ये संस्थाएँ अभी तक कुछ भी नहीं कर पायी हैं। सीबीआई ने इनमें से 17 और ईडी ने इनमें से 11 मामलों की “जाँच” की जिसमें एक भी व्यक्ति को सज़ा नहीं मिली! यानी, जब मोदी सरकार के दौर में हुए परीक्षा घपलों की जाँच की बारी आती है, तो ये जाँच एजेंसियाँ फिसड्डी साबित होती हैं। जहाँ इन एजेंसियों को वाक़ई काम करना चाहिए, वहाँ तो इनके नतीजे ज़ीरो हैं! इनका इस्तेमाल मोदी सरकार द्वारा बस हर प्रकार के राजनीतिक विरोध और विपक्ष को कुचलने के एक राजनीतिक हथियार के रूप में किया जा रहा है। 2024 के नीट घोटाले के आरोपी को सज़ा मिलना तो दूर की बात, ज़मानत मिल गयी क्योंकि सीबीआई ने चार्जशीट ही नहीं दायर की! उच्चतर शिक्षा के लिए होने वाली राष्ट्रीय परीक्षा सी.यू.ई.टी. में भी तमाम अनियमितताएँ लगातार होती ही रहती हैं। यही हाल देश में होने वाली अन्य प्रतिस्पर्द्धी परीक्षाओं का भी है, चाहे वे राज्य सेवा आयोगों की हों या केन्द्रीय परीक्षाएँ हों। ऐसी हालत तो आज़ाद हिन्दुस्तान की तारीख़ में कभी नहीं पैदा हुई थी।
मोदी सरकार द्वारा बनायी गयी एनटीए कैसे काम करती है, कौन इसे संचालित करता है, इसकी वार्षिक रपटें कहाँ हैं, पारदर्शिता की व्यवस्था, जवाबदेही की कोई व्यवस्था कहाँ है, यह कोई नहीं जानता! ऐसा तब है जबकि इस एजेंसी के हाथ में करोड़ों छात्रों-युवाओं का भविष्य है। हाल में हुई नीट परीक्षा में 22 लाख छात्रों ने दिनों-रात एक करके कड़ी मेहनत की और परीक्षा दी। कई आम मध्यवर्गीय परिवारों ने तो अपने बच्चों की तैयारी के लिए ही भारी कर्ज़ लिये, ज़मीनें गिरवी रखीं, गहने बेचे और अपना सबकुछ इसके लिए दाँव पर लगा दिया। जब छात्रों ने महीनों मेहनत के बाद यह परीक्षा दी तो उसके बाद परीक्षा ही पेपर लीक के कारण रद्द हो गयी।
इसके बाद से कई छात्र आत्महत्या कर चुके हैं और लाखों अवसाद का शिकार हो गये हैं। जब यह काण्ड हो रहा था, तो शिक्षा मन्त्री धर्मेन्द्र प्रधान भाजपा की ओर से राज्य चुनावों के प्रबन्धन में व्यस्त थे! ये ख़बरें भी सामने आ चुकी हैं कि जिन लोगों को नीट पेपर लीक घोटाले में मुख्य आरोपियों के रूप में गिरफ़्तार किया जा रहा है, वे तो बस प्यादे हैं, जबकि असली कर्ता-धर्ता लोग सत्ताधारी पार्टी यानी भाजपा से रिश्ता रखने वाले ऊँची रसूख़ वाले लोग हैं। इस पूरे मसले की क़ायदे से उच्च स्तरीय न्यायिक जाँच होनी चाहिए, तभी सच्चाई सामने आ सकती है। फ़िलहाल तो उत्तर प्रदेश से लेखपाल पद के लिए होने वाली परीक्षाओं में पेपर लीक को लेकर छात्रों व परीक्षार्थियों का आन्दोलन भी शुरू हो चुका है। योगी सरकार हमेशा की तरह इस आन्दोलन पर दमन का पाटा चला रही है, लेकिन छात्रों-युवाओं ने भी हिम्मत का परिचय दिया है और योगी सरकार के नग्न अन्याय के विरुद्ध अपना आन्दोलन जारी रखा है। बदले की भावना से मूर्खता की हद तक जाकर दमन करने वाली योगी सरकार ने उन तीन कोचिंग संस्थानों को भी विविध कारण बताकर सील कर दिया जिन्होंने आन्दोलनरत परीक्षार्थियों का समर्थन किया था!
इतने में हरियाणा के मुख्यमन्त्री नायब सिंह सैनी ने सोचा कि दमन के मामले में वह भला पीछे कैसे रह सकते हैं! तो रोहतक में एक टीचर को निलम्बित कर दिया गया जो कॉकरोच जनता पार्टी के दिल्ली के प्रदर्शन में धर्मेन्द्र प्रधान के इस्तीफ़े की माँग का समर्थन करने गया था! केन्द्र सरकार समेत भाजपा की सभी सरकारें इस समय बुरी तरह से भयाक्रान्त है। देश में आर्थिक और सामाजिक स्थितियाँ तेज़ी से उनके हाथों से निकलती जा रही हैं और जनता का धीरज धीरे-धीरे जवाब दे रहा है। साम्प्रदायिक दंगे और तनाव फैलाने की भी एक सीमा होती है, जिस प्रकार हर चीज़ की एक सीमा होती है। जनता को जब रोटी-रोज़गार, पढ़ाई-परीक्षा और दवा-इलाज तक नहीं मिलेंगे, तो वह अपना जीवन भला कैसे जी सकती है? लड़ने और जूझने के अलावा उसके पास रास्ता भी क्या बचता है? देश में ऐसे हालात निर्मित हो रहे हैं और डरे हुए हुक्मरानों की तरह भाजपा सरकारें भी इस मुग़ालते में हैं कि डण्डा चलाकर जनता को दबा दिया जायेेगा। ऐसी ग़लतफ़हमियों की बड़ी क़ीमत पिछले दो दशकों में ही दुनिया के कई देशों के शासक वर्ग को चुकानी पड़ी है। बहरहाल, शिक्षा के क्षेत्र में पिछले एक दशक से जारी दीर्घकालिक घोटाले पर वापस लौटते हैं।
अभी विभिन्न प्रतिस्पर्द्धी परीक्षाओं में जारी घोटाले का ख़ुलासा हो ही रहा था कि स्कूली शिक्षा का घोटाला यानी सीबीएसई घोटाला सामने आ गया। इसमें मोदी सरकार के तहत सीबीएसई ने एक कम्पनी कोएम्प्ट एडुटेक को परीक्षा पुस्तिकाओं की जाँच की व्यवस्था का ठेका दिया था। इस कम्पनी का नाम पहले ग्लोबरेना टेक्नॉलोजीज़ था और इसने 2019 और 2023 में तेलंगाना में भी परीक्षा व्यवस्था निर्मित करने का ठेका लिया था। नतीजा यह था कि भयंकर अनियमितताओं के कारण 23 छात्रों ने आत्महत्या कर ली थी। लेकिन फिर भी मोदी सरकार ने इसी कम्पनी को सीबीएसई की परीक्षा पुस्तिकाओं की जाँच की व्यवस्था का कार्य दिया! इस कम्पनी की ‘ऑन स्क्रीन मार्किंग’ व्यवस्था का नतीजा यह था कि परीक्षा पुस्तिकाओं की जाँच में भयंकर गड़बड़ियाँ हुईं, उत्तीर्णता प्रतिशत गिर कर 85.2 प्रतिशत पहुँच गया और नतीजतन 17 लाख परिवार इससे प्रभावित हुए। छात्रों की उत्तर पुस्तिकाओं के अपठनीय स्कैन, उनकी ग़लत मार्किंग और फिर सीबीएसई पोर्टल का ही धराशायी हो जाना, इसी घपले के खुलने की प्रक्रिया में हुआ! यह सारा कुकर्म किसलिए हुआ? इसलिए क्योंकि मोदी सरकार के तहत देश के नवयुवकों के भविष्य को अभूतपूर्व और नग्न रूप में पूँजीवादी मुनाफ़े की चक्की में पिसने के लिए छोड़ दिया गया है। ग़ौरतलब है कि कोएम्प्ट एडुटेक का मालिक वीएसएन राजू मनिपाल ग्लोबल एडुकेशन सर्विसेज़ से जुड़ा है। मनिपाल ग्लोबस एडुकेशन सर्विसेज़ का मालिक टी.वी. मोहनदास पाई प्रधानमन्त्री मोदी का कट्टर समर्थक है। क्रोनोलॉजी तो आप समझ ही रहे होंगे! वीएसएन राजू को सेवा का मेवा मिला है और बेगुनाह छात्रों को ईमानदारी और मेहनत का दण्ड मिला है।
अब जबकि इस शिक्षा व परीक्षा घोटालों पर मोदी सरकार और विभिन्न राज्य भाजपा सरकारों की ऐसी-तैसी हो रही है और घर-घर में छीछालेदर हो रही है, तो दिखाने के लिए सीबीएसई के कुछ अधिकारियों का दूसरे विभागों में तबादला कर दिया गया है। शिक्षा मन्त्री ने मौखिक तौर पर ज़िम्मेदारी भी ली है और छात्रों की नसीहत दी है कि इधर-उधर ध्यान न दें, फिर से परीक्षा की तैयारी करें! कहना होगा कि आज फ़ासीवादी सत्ता में बैठे नेताओं-मन्त्रियों और उच्च नौकरशाहों की जनता के प्रति संवेदनहीनता सारी हदें पार कर चुकी हैं। बहरहाल, इन सफ़ाइयों और तरहम–बरहम से क्या होगा? पिछले 12 वर्षों में हुए क़रीब डेढ़ सौ परीक्षा घपलों में बरबाद हुई नौजवान ज़िन्दगियों का हिसाब कौन करेगा?
छोटे ग़रीब किसानों की बदहाल होती ज़िन्दगी
एक ओर देश के धनी फ़ार्मर व कुलक अधिक से अधिक लाभकारी मूल्य की माँग करते रहे हैं और आज भी कर रहे हैं, और सरकारी एमएसपी व्यवस्था के लाभार्थी हैं, जो कि अनाजों की क़ीमतों पर निरन्तर बढ़ने का दबाव पैदा करती है, वहीं दूसरी ओर छोटे व परिधिगत किसानों (जिनके पास 2 हेक्टेयर से कम ज़मीन है) के हालात दिन-पर-दिन बद से बदतर होते जा रहे हैं। धनी फार्मरों व पूँजीवादी ज़मीन्दारों के समान न तो इनके पास संस्थागत ऋण के सरकारी तन्त्र तक पहुँच है और, कुछ अपवादों को छोड़ दें तो, न ही इनके पास सरकारी मण्डियों तक सीधी पहुँच है। नतीजतन, ये धनी पूँजीवादी फार्मरों व ज़मीन्दारों से भारी ब्याज दरों पर कर्ज़ लेने को बाध्य होते हैं, जिसको न चुका पाने के कारण ही इस वर्ग में ज़मीन गवाँकर मज़दूर बनने की प्रवृत्ति और साथ ही आत्महत्या की घटनाएँ आम हैं। हर वर्ष ही हज़ारों और कई बार लाखों किसान कर्ज़ के कारण ज़मीनें गवाँकर ग्रामीण सर्वहारा की क़तार में शामिल हो रहे हैं। वहीं दूसरी ओर, खेती में लगे लोगों में होने वाली आत्महत्याओं में से 56 प्रतिशत खेतिहर मज़दूरों की है, वहीं दूसरी ओर 43 प्रतिशत किसान हैं। किसानों की आत्महत्याएँ लगभग पूर्णत: छोटे और परिधिगत किसानों के बीच हुई हैं, धनी कुलकों-पूँजीवादी फ़ार्मरों व ज़मीन्दारों के बीच नहीं! धनी पूँजीवादी फ़ार्मरों को जिस संकट का सामना करना पड़ रहा है, वह तो वही संकट है जिसका सामना मन्दी के दौर में सभी छोटे और मँझोले पूँजीपतियों को करना पड़ रहा है।
छोटे व परिधिगत किसानों की सबसे बड़ी समस्या क्या है? यह समस्या है खेती की लगातार बढ़ती लागत की। एक छोटे या परिधिगत किसान को भी प्रति एकड़ 25 से 30 हज़ार रुपये खेती के लिए लगाने पड़ते हैं, जो अक्सर उसके पूरे जीवन की बचत से भी ज़्यादा होता है। ऐसे में, वह धनी किसानों व ज़मीन्दारों से ऋण लेने के लिए बाध्य होता है, जिसकी वार्षिक दर 24 से 60 प्रतिशत के बीच हो सकती है। मॉडीफ़ाइड बीज, विशिष्टीकृत फ़र्टिलाइज़र और पेस्टिसाइडों की क़ीमतों में भारी बढ़ोत्तरी हो रही है, सरकार सब्सिडी में वास्तविक कटौती कर रही है और साथ ही संस्थागत ऋण तक ग़रीब किसानों की पहुँच नहीं है। नतीजतन, छोटे पैमाने की खेती इन ग़रीब किसानों को देती कुछ भी नहीं है, उल्टे जो भी उनके पास बचा होता है, वह भी निचोड़ लेती है। यही कारण है कि किसानों की क़रीब आधी आबादी ने मौक़ा मिलते ही, यानी कोई पक्की नौकरी या आय का पक्का स्रोत मिलते ही खेती छोड़ने की इच्छा जतायी है। मोदी सरकार के 12 वर्षों में किसानों के बीच सबसे बुरी हालत इन छोटे व परिधिगत किसानों की हुई है, जो कि कुल भूमि का मालिकाना रखने वाले किसानों में से 86 प्रतिशत हैं! ये वह आबादी है जो पहले ही अर्द्धमज़दूर बन चुकी है क्योंकि इनकी घरेलू आय का 70 फ़ीसदी से भी ज़्यादा हिस्सा मज़दूरी से आता है।
पिछले कुछ दिनों में फ़र्टिलाइज़र की क़ीमतों में पश्चिम एशिया में जारी युद्ध के कारण भी भारी बढ़ोत्तरी हुई है। इसका बोझ भी ग़रीब किसानों पर ही सबसे ज़्यादा पड़ा है। ग़रीब किसानों के लिए क़ायदे से सरकार को सस्ते संस्थागत ऋण की व्यापक तौर पर व्यवस्था करनी चाहिए, कृषि की लागत को कम करने के लिए इनपुट्स को अधिक से अधिक सब्सिडी पर देना चाहिए और इस सब्सिडी के लिए धनी वर्गों पर विशेष कर या शुल्क लगाना चाहिए। यह बात सच है कि ये सब्सिडियाँ मिल भी जाएँ तो एक मुनाफ़ा-केन्द्रित पूँजीवादी व्यवस्था में छोटे पैमाने की खेती का कोई भविष्य नहीं होता। लेकिन ग़रीब किसानों की उपरोक्त माँगें उनकी वास्तविक माँगें हैं और तात्कालिक तौर पर राहत के लिए आवश्यक माँगें हैं। पूँजीवादी व्यवस्था की इस सच्चाई को ग़रीब किसान आबादी अपने अनुभवों से स्वयं समझती जाती है कि बड़ी मछली छोटी मछली को अन्तत: निगल ही जाती है। लेकिन आज के समय में धनी वर्गों पर विशेष कर लगाकर उनके लिए खेती के लागत-दाम को कम करना एकदम जायेज़ माँग है।
इसके अलावा ग़रीब किसानों और खेतिहर व ग्रामीण मज़दूरों की एक अन्य बेहद अहम माँग है मनरेगा योजना को संशोधित रूप में बहाल करना। संशोधित रूप में क्यों? क्योंकि 100 दिन के रोज़गार को ‘रोज़-गार’ नहीं कहा जा सकता! इसके तहत साल भर का काम मिलना चाहिए, या फिर जीवनयापन-योग्य बेरोज़गारी भत्ता मिलना चाहिए। इसके अलावा, मनरेगा के काम के बदले में तय न्यूनतम मज़दूरी मिलनी चाहिए, न कि ‘भुखमरी रेखा मज़दूरी’। इन संशोधनों के साथ मोदी सरकार को मनरेगा क़ानून को बहाल करना चाहिए, ऐसी माँग गाँव के ग़रीबों की एक प्रमुख माँग बनती है।
मनरेगा को हटाने का मोदी सरकार का प्रमुख कारण यह था कि मनरेगा के कारण ग्रामीण, विशेषकर खेतिहर, मज़दूरी पर बढ़ने का दबाव पैदा होता है। यह गाँव के पूँजीपति वर्ग, विशेषकर खेतिहर पूँजीपति वर्ग यानी धनी फ़ार्मरों-कुलकों व ज़मीन्दारों के हितों के विपरीत जाता है। इसलिए ऊपर से जो भी बयान कुछ फ़ार्मर संघों ने दिये हों, लेकिन मनरेगा का हटाया जाना उनके लिए बेहतर है। वरना जितना बड़ा आन्दोलन धनी फ़ार्मरों और पूँजीवादी ज़मीन्दारों ने मोदी सरकार द्वारा लाभकारी मूल्य की व्यवस्था पर चोट करने वाले पहले दो खेती क़ानूनों के ज़रिये किया था, उतना ही बड़ा आन्दोलन उन्हें ग़रीब किसानों, काश्तकारों व खेतिहर मज़दूरों के मनरेगा को हटाये जाने के मुद्दे पर भी करना चाहिए था! लेकिन इस पर एक मरगिल्ला सा बयान देकर ज़्यादातर पूँजीवादी फ़ार्मरों के संघों ने खानापूर्ति कर ली! इससे भी यह साफ़ हो जाना चाहिए कि किसान कोई एक वर्ग नहीं हैं। किसानों के समुदाय में ही धनी पूँजीवादी फ़ार्मरों और ज़मीन्दारों का वर्ग है जिनके अपने हित हैं, जबकि दूसरी ओर मेहनतकश छोटे व परिधिगत किसानों का वर्ग है जो किसी के उजरती श्रम का शोषण नहीं करते, जिनकी अपनी अलग माँगें हैं। दोनों के हित एक समान हो ही नहीं सकते हैं।
निष्कर्ष के तौर पर…
हमने 12 सालों के दौरान मोदी सरकार के प्रदर्शन के केवल कुछ आर्थिक मसलों पर ध्यान केन्द्रित किया है। हम इस दौरान हुए घोटालों-घपलों, राजकीय दमन, काले क़ानूनों को पारित किये जाने पर अभी कोई चर्चा नहीं कर रहे हैं। इसके अलावा, हम इस पर भी बात नहीं कर रहे हैं कि अपनी उपरोक्त नाकामियों के कारण ही मोदी सरकार, भाजपा और संघ परिवार लगातार साम्प्रदायिक तनाव की सिगड़ी को गरमाते रहते हैं, ताकि देश की मेहनतकश जनता और आम मध्यवर्गीय जनता मसलों को ग़ैर-मसला समझ ले और ग़ैर-मसलों को मसला। साथ ही, हम इस बेहद महत्वपूर्ण परिघटना पर भी अभी बात नहीं कर रहे हैं कि किस प्रकार पिछले 12 वर्षों में भारतीय राज्यसत्ता के समूचे उपकरण और तन्त्र पर संघ परिवार और भाजपा ने आन्तरिक तौर पर कब्ज़ा करने का काम किया है, चाहे वह पुलिस हो, सशस्त्र बल हों, नौकरशाही हो, ईडी, सीबीआई व केन्द्रीय चुनाव आयोग जैसी संस्थाएँ हों, या फिर न्यायपालिका ही क्यों न हो। और हम इस पर भी बात अभी नहीं कर रहे हैं कि किस प्रकार भारत में किसी भी प्रकार की निष्पक्षता व स्वतन्त्रता का तत्व रखने वाले किसी भी अख़बार, समाचार चैनल व अन्य मीडिया संस्थानों का मोदी सरकार ने व्यवस्थित तौर पर ख़ात्मा कर डाला है। यह बेवजह नहीं है कि टीवी न्यूज़ चैनल देखने वालों की संख्या तेज़ी से गिरती जा रही है और अख़बार के पाठकों की संख्या भी आबादी में निरपेक्ष बढ़ोत्तरी के बावजूद लगभग गिर रही है। जनता का ही बड़ा हिस्सा इन भर भरोसा नहीं करता और इन्हें ‘गोदी मीडिया’ की संज्ञा देता है। जगह-जगह जनता के धरनों, विरोध-प्रदर्शनों से गोदी मीडिया के लोगों को खदेड़ने का काम स्वयं जनता कर रही है। बात इस पर भी ज़रूर ही की जानी चाहिए कि किस प्रकार पिछले 12 वर्षों में देश में एक ऐसा माहौल बना दिया गया है कि यहाँ मुसलमान होना एक गुनाह बनता जा रहा है, मुसलमानों को किराये पर मकान नहीं मिलते, नौकरी मिलने में भी भारी दिक्कतों को सामना करना पड़ता है, और अफ़वाहों के आधार पर मॉब लिंचिंग, मार-पीट, हमलों आदि का ख़तरा तो निरन्तर ही मँडराता रहता है। ऐसी स्थिति कैसे पैदा हो गयी है? क्योंकि साम्प्रदायिक विषवमन करने वाले ‘फ्रि़ंज’ यानी हाशिये के भाजपा नेता व संघी तत्व निरन्तर अपना काम करते रहते हैं, समाज में साम्प्रदायिकता का ज़हर घोलते रहते हैं और खुलेआम धर्म संसदों में हत्याकाण्ड करने के ऐलान होते हैं, लेकिन देश की क़ानून-व्यवस्था व न्यायपालिका उसका कोई स्वत: संज्ञान नहीं लेती, हालाँकि सड़क के आवारा कुत्तों की नियति क्या हो, इसका संज्ञान भी हमारे देश में न्यायपालिका ले लेती है! हम मौजूदा आलेख में स्थान की सीमा के कारण इस पर भी बात नहीं कर पा रहे हैं कि 12 वर्षों में भारत में स्त्री-विरोधी अपराध अभूतपूर्व रूप से बढ़े हैं और पहली बार इसमें सत्ताधारी पार्टी या उससे जुड़े लोगों का नाम इतनी बारम्बारता के साथ आया है। इसके अलावा, हम इस पर भी अलग से किसी लेख में चर्चा करेंगे कि इन्हीं 12 वर्षों में दलित-विरोधी अपराधों में भी बेतरह बढ़ोत्तरी हुई है और विशेषकर मेहनतकश दलितों के जीवन और उनकी गरिमा पर बेतहाशा चोटें की गयी हैं।
उपरोक्त मसलों पर भी लम्बी और सकर्मक चर्चा होनी चाहिए क्योंकि यह हम मेहनतकशों के लिए ज़रूरी है कि हम इन बातों को समझें। लेकिन अभी हम मोदी सरकार के 12 वर्षों के दौरान देश की जनता, यानी शहरी व ग्रामीण मज़दूरों, छोटे व परिधिगत किसानों, आम मध्यवर्ग, छात्रों-युवाओं के सामाजिक-आर्थिक हालात के बद से बदतर होते जाने की ही चर्चा कर रहे हैं। अगर सिर्फ़ मोदी सरकार के 12 साल के इस रिपोर्ट कार्ड पर ही एक संक्षिप्त निगाह डाल ली जाये, तो यह साफ़ हो जाता है कि देश में इस क़दर पूँजीपरस्त और अमीरपरस्त सरकार शायद कभी नहीं आयी है।
इसमें कोई ताज्जुब की बात भी नहीं है क्योंकि पूँजी की सबसे सक्रियता के साथ, तानाशाहाना अन्दाज़ में सेवा करने का काम पूँजीपति वर्ग के अन्य किसी भी नुमाइन्दे की तुलना में फ़ासीवादी नुमाइन्दे कहीं ज़्यादा प्रभावी रूप में करते हैं।
निश्चित तौर पर, अन्य सभी पूँजीवादी पार्टियों की सरकारें भी पूँजीपति वर्ग की ही मैनेजिंग कमेटी होती हैं और उन्हीं के हितों की सेवा करती हैं। लेकिन दीर्घकालिक संकट के दौर में मुनाफ़े की गिरती औसत दर के संकट के कारण भारत ही नहीं दुनिया के कई देशों में पूँजीपति वर्ग ने अपने धनबल के बूते धुर-दक्षिणपंथी और धुर मेहनतकश-विरोधी सरकारें बनवायी हैं। दीर्घकालिक मन्दी का एक अहम चक्र 2007-08 में वैश्विक तौर पर शुरू हुआ था और उसका असर भारत की अर्थव्यवस्था तक 2010-11 तक आने लगा था। इसके बाद ही देश में जनता के बढ़ते असन्तोष को सोखकर मोदी सरकार के सत्ता में आने की ज़मीन अण्णा हज़ारे के इण्डिया अगेंस्ट करप्शन की मुहिम ने तैयार की थी। इसमें अरविन्द केजरीवाल ने भी अहम भूमिका निभायी थी और उसकी ‘आम आदमी पार्टी’ आज भी हर प्रदेश में भाजपा की चुनावी जीत की ज़मीन तैयार करने का काम करती है, चाहे कुछ राज्यों में सीधे ‘आप’ और भाजपा की ही टक्कर क्यों न हो।
बहरहाल, संकट के दौर में पूँजीपति वर्ग यह चाहता है कि उसकी मुनाफ़े की औसत दर क़ायम रहे या बढ़े और यह केवल एक रास्ते से सम्भव होता है: जनविरोधी नीतियों और मज़दूर-विरोधी नीतियों के ज़रिये।
ये नीतियाँ क्या हैं? ये नीतियाँ हैं मज़दूरों की वास्तविक मज़दूरी, मेहनतकश जनता के वास्तविक आमदनी को कम करना ताकि मुनाफ़े की दर को बढ़ाया जा सके; तमाम सरकारी उपक्रमों का निजीकरण करना और उन्हें औने–पौने दामों पर अम्बानियों–अडाणियों को सौंपना; प्राकृतिक संसाधनों को, जो कि समूचे देश की साझा सम्पदा है, पूँजीपतियों के हाथों में सौंपना और इसके लिए जनता से उसकी साझी जल–जंगल–ज़मीन छीनना; इन दोनों क़दमों के ज़रिये पूँजीपति वर्ग के लिए लाभप्रद निवेश के नये अवसर पैदा किये जाते हैं; इसके अलावा, जनता पर अप्रत्यक्ष करों का बोझ बढ़ाना ताकि पूँजीपति वर्ग पर प्रत्यक्ष करों को कम किया जा सके और उनके कर–उपरान्त मुनाफ़े की दर को बढ़ाया जा सके; साथ ही, हर प्रकार के कल्याणकारी नीतियों को न्यूनातिन्यून बनाना, ग़रीब किसानों के लिए सब्सिडी को कम करते जाना जिससे कि पूँजीपति वर्ग को तमाम ऋण माफ़ियाँ, टैक्स हॉलीडे, लगभग मुफ़्त बिजली, पानी, ज़मीनें आदि दी जा सकें; और अन्त में, हर प्रकार के श्रम विनियमन को समाप्त करना (जैसा कि चार लेबर कोड लाकर मोदी सरकार ने किया है) जिससे कि मज़दूरों के श्रम–अधिकारों का हनन कर अपनी लागत को कम करने में मदद मिले और साथ ही हर प्रकार के वित्तीय विनियमन को समाप्त करना (जिससे कि पूँजीपति वर्ग को पूँजी प्राप्त करने, सट्टेबाज़ी करने और वित्तीय हेर–फेर करने में मदद मिले; यह सारा काम मोदी सरकार पूँजीपति वर्ग के लिए ‘धन्धा करने की सहूलियत’ देने, यानी ‘ईज़ ऑफ़ डूइंग बिज़नेस’ के नाम पर करती रही है।
ठीक यही नीतियाँ हैं, जिन्हें मोदी सरकार ने पिछले 12 वर्षों में युद्धस्तर पर लागू किया है और जिन सामाजिक-आर्थिक प्रभावों और परिणामों की हमने ऊपर चर्चा की है, वे इन्हीं जनविरोधी, मज़दूर-विरोधी, आम मेहनतकश-विरोधी, आम मध्यवर्ग-विरोधी नीतियाँ हैं। यह है मोदी सरकार के 12 वर्षों का रिकॉर्ड।
इसके बावजूद, नग्नता और अश्लीलता के साथ सत्ताधारी पार्टी के नेता-मन्त्री इसका जश्न मना रहे हैं! यह जनता के ज़ख़्मों पर नमक रगड़ने के समान है।
मज़दूर बिगुल, जून 2026













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