Category Archives: शिक्षा और रोज़गार

गुड़गांव- मानेसर में उठी वेतन बढ़ोतरी और मज़दूरों के जायज़ हक-अधिकारों की लड़ाई अब पूरे गुड़गांव, बिनौला, धारूहेड़ा और बावल सहित ऑटोमोबाइल और एक्सपोर्ट क्षेत्रों में फैल रही है। मज़दूरों की मांगें पूरी तरह जायज़ हैं—न्यायपूर्ण वेतन, बेहतर कार्य-परिस्थितियाँ और ठेका प्रथा का अंत। बिगुल मज़दूर दस्ता की अपील है कि गुरुग्राम, दिल्ली और पूरे एनसीआर के मज़दूर एक साझा मांग-पत्र तैयार करें और तालमेल कमेटी बनाकर इस संघर्ष को आगे बढ़ाएँ।

गुड़गांव- मानेसर में उठी वेतन बढ़ोतरी और मज़दूरों के जायज़ हक-अधिकारों की लड़ाई अब पूरे गुड़गांव, बिनौला, धारूहेड़ा और बावल सहित ऑटोमोबाइल और एक्सपोर्ट क्षेत्रों में फैल रही है। मज़दूरों…

भारतीय शिक्षा व्यवस्था और विज्ञान के विकास की पोल खुल गयी एआई समिट और गलगोटिया यूनिवर्सिटी प्रकरण में

ऐसा नहीं है कि यह विज्ञान और तर्कणा विरोधी बातें बस बयानबाज़ी तक सीमित हैं। सरकार द्वारा सांस्थानिक रूप से छद्म विज्ञान को बढ़ावा देने की पूरी कोशिश की जा रही है। सरकार द्वारा शिक्षा को लेकर लायी गयी तमाम नितियाँ और उठाये गये सारे क़दम यह साफ़-साफ़ बताते हैं कि कैसे योजनाबद्ध तरीक़े से शिक्षा का निजीकरण किया जा रहा है और इसे बर्बाद किया जा रहा है। छात्रों के तर्क करने की शक्ति पर हमला किया जा रहा है, उनकी आलोचनात्मक क्षमता को बाधित करके उसे सचेतन तौर कुन्द किया जा रहा है, वे सरकार की किसी भी नीति या बात पर सवाल न खड़ा करें, बस चुपचाप अनुशासित होकर फ़ासीवादी सरकार के हुक्म की तामील करें इसके लिए ही उन्हें अवैज्ञानिक और अतार्किक बनाने की पुरज़ोर कोशिश की जा रही है ताकि उन्हें आसानी से फ़ासीवादी उन्मादी भीड़ का हिस्सा बनाया जा सके। पाठ्यक्रम से उद्भव के सिद्धान्त, पीरियॉडिक टेबल आदि विषयों का हटाया जाना, इतिहास का मिथ्याकरण करना आदि इसी दूरगामी फ़ासीवादी परियोजना के परिणाम हैं।

पूँजीवादी व्यवस्था और युवा आबादी को अनियमित व अनौपचारिक क्षेत्र में धकेले जाने की बाध्यता

इस रिपोर्ट से तीन बातें बहुत स्पष्ट हैं। पहला, युवा आबादी के लिए पक्के व नियमित रोज़गार के अवसर तेज़ी से घटते जा रहे हैं। युवाओं को अनियमित और अनौपचरिक क्षेत्रों में काम के लिए धकेला जा रहा है। दूसरे, देश में अलग-अलग राज्यों के स्तर पर रोज़गार सृजन में बहुत असमानता है। तीसरे, कार्यस्थल तथा रिहाइश में दूरी के चलते आवागमन काम के समय में अतिरिक्त समय का बोझ बढ़ा देता है।

मोदी सरकार द्वारा ग्रामीण रोज़गार गारण्टी क़ानून (मनरेगा) को ख़त्म करने की चाल को नाकाम करो!

मनरेगा को समाप्त करना और कृषि के पीक सीज़न में 60 दिनों की तथाकथित ‘काम बन्दी’ लागू करना, दरअसल धनी किसानों और ग्रामीण पूँजीपति वर्ग को सस्ते मज़दूरों की निरन्तर सप्लाई सुनिश्चित करने की योजना है। तथ्य यह साबित करते रहे हैं कि मनरेगा के चलते ग्रामीण मज़दूरों की सौदेबाज़ी की ताक़त बढ़ी थी और वे दिहाड़ी मज़दूरी को लेकर बेहतर मोल-भाव कर पा रहे थे। लेकिन मनरेगा के ख़त्म होने से और 60 दिनों के ‘कार्य बन्दी’ के बाद बेरोज़गार मज़दूरों को मजबूरी में कम मज़दूरी पर काम करने के लिए बाध्य किया जायेगा। यही मोदी सरकार की वास्तविक मंशा है—ग्रामीण और शहरी श्रम बाज़ार को पूँजीपतियों के पक्ष में पूरी तरह झुका देना।

इलाहाबाद विश्वविद्यालय में छात्र आन्दोलन को मिली शानदार जीत के मायने

फ़ासीवादी मोदी सरकार के सत्तासीन होने के बाद से ही देशभर में लोकतान्त्रिक आवाज़ों और जनवादी स्पेस का गला घोंटा जा रहा है। देश की सभी संस्थाओं में ऊपर से नीचे तक फ़ासीवादी जकड़बन्दी लगातार मज़बूत होती जा रही है। भाजपा सरकार द्वारा मेहनतकश जनता पर हमले का दौर बदस्तूर जारी है। चार लेबर कोड मेहनतकशों पर अब तक का सबसे बड़ा फ़ासीवादी हमला है। इसी तरह कुछ साल पहले मोदी सरकार द्वारा लागू ‘राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020’ मेहनतकश अवाम के घरों के बच्चों पर एक बड़ा हमला था। जैसे-जैसे नयी शिक्षा नीति पर अमल हो रहा है, वैसे-वैसे उसकी सच्चाई भी आम जनता के सामने खुलती जा रही है। विश्वविद्यालयों में बेतहाशा फ़ीस वृद्धि हो रही है। इलाहाबाद विश्वविद्यालय में पिछले चार सालों में नियमित कोर्स के लिए छः गुना से ज़्यादा फ़ीस बढ़ायी जा चुकी है और हर साल 10 फ़ीसदी की फ़ीस वृद्धि की जा रही है।

मिड-डे-मील के तहत आने वाले स्कूलों की संख्या में अभूतपूर्व कमी! सरकारी स्कूलों की संख्या में भी भारी कमी!

कहने के लिए सरकार शिक्षा को हर किसी का अधिकार बताती है लेकिन असलियत इससे कोसों दूर है। पढ़ाई-लिखाई भी आज उन लोगों की ज़ागीर बन कर रह गयी है जिनके पास पैसा है। सरकारी शिक्षा तंत्र को बर्बाद कर दिया गया है जिसकी वज़ह से ग़रीब-मेहनतकश आबादी से आने वाले बच्चे शिक्षा से दूर होते जा रहे हैं। मिड-डे-मील में कमी और सरकारी स्कूलों के बन्द होने का असर बच्चों के साथ-साथ इस स्कीम के तहत काम करने वाले वर्कर्स पर भी पड़ेगा। देश में 26 लाख मिड-डे मील वर्कर्स हैं, जिनकी नौकरियाँ भी ख़तरे में हैं। भाजपा सरकार द्वारा इस योजना को बर्बाद किये जाने के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने की ज़रूरत है। यह बेहतर पोषण और शिक्षा के बुनियादी अधिकार को आम मेहनतकश आबादी के बच्चों से छीनने की तैयारी है।

शिक्षा के निजीकरण की भेंट चढ़ गया यूपी के छात्र उज्जवल का जीवन

 उज्जवल ने अपने वीडियो सन्देश में इस पूँजीवादी व्यवस्था का असली चेहरा उजागर कर दिया था। उसकी यह मृत्यु केवल एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि उन तमाम आम घरों के छात्रों की भी है, जो आज बढ़ती फ़ीसों, घटती सीटों और घटते अवसरों की मार झेल रहे हैं। आज अधिकांश कैम्पसों में छात्रावासों की कमी, महंगी कैण्टीनें, खराब मेस, मेडिकल सुविधाओं का अभाव, साइकिल स्टैण्ड की कमी, शिक्षकों की कमी एक आम परिदृश्य है। लड़कियों के लिए “पिंक टॉयलेट” या “पिंक हॉल” जैसी घोषणाओं का महज़ दिखावा किया जा रहा है जबकि सच इस नौटंकी से कोसों दूर है। यह सब मिलकर बताता है कि शिक्षा किस तरह से आम छात्रों की पहुँच से बाहर होती चली जा रही है।

दिल्ली का जानलेवा प्रदूषण और आँगनवाड़ी केन्द्रों, बच्चों व आँगनवाड़ीकर्मियों के प्रति सरकार की अनदेखी!!

दिल्ली की आँगनवाड़ियों में लाखों बच्चे रोज़ाना जाते हैं लेकिन उनके प्रति सरकार पूरी तरह से आँख मूँद कर बैठी है! वायु प्रदूषण के बढ़ते ही सीएम ऑफ़िस के लिए 5.5 लाख के ‘एयर प्यूरिफ़ायर’ ख़रीद लिये जाते हैं लेकिन आँगनवाड़ियों और स्कूलों को खुला रखकर बच्चों को मरने के लिए छोड़ दिया जाता है। वायु प्रदूषण की चपेट में सबसे अधिक मेहनतकश आबादी और उनके घरों से आने वाले बच्चे आते हैं क्योंकि न तो उनके लिये एयर प्यूरीफ़ायर है, ना ही वे बेहतर पोषण हासिल कर सकते हैं और बीमार पड़ने पर न उन्हें बेहतर चिकित्सा सुविधा मिल पाती है। आँगनवाड़ी में जाने वाले अधिकांश बच्चे मज़दूरों-मेहनतकशों या निम्न-मध्यम वर्गीय परिवारों से आते हैं जिनके लिए उपरोक्त कारणों की वज़ह से इस जानलेवा प्रदूषण से बचने का कोई विकल्प सरकार ने नहीं छोड़ा है! आँगनवाड़ी केन्द्रों, बच्चों व आँगनवाड़ीकर्मियों के प्रति यह लापरवाही एक बार फ़िर भाजपा सरकार के जन-विरोधी, आँगनवाड़ीकर्मी-विरोधी चेहरे को हमारे सामने उजागर करती है।

बेरोज़गारी की आग अब टेक व आईटी सेक्टर के खाते-पीते मज़दूरों को भी ले रही है अपनी ज़द में

पिछले महीने प्राइवेट सेक्टर के स्वर्ग कहे जाने वाले टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (टीसीएस), और उसके बाद पूरे आईटी सेक्टर में, तब खलबली मच गयी जब कम्पनी ने 12,000 कर्मचारियों की छँटनी का खुलासा किया। इनमें से कई मँझोले स्तर के खाते-पीते, 6 से 10 साल काम कर चुके कर्मचारी भी हैं। नौकरी से निकाले जाने वाले इन कर्मचारियों को उनकी छँटनी के बारे में पहले से कोई सूचना या कोई नोटिस भी नहीं दी गयी है। टीसीएस कर्मचारियों के अनुसार हर दिन दर्जनों कर्मचारियों को मैनेजर के दफ़्तर में बुलाकर धमकाया जा रहा है कि अगर वे “स्वेच्छा” से नौकरी से इस्तीफ़ा नहीं देते हैं तो उनकी वेतन रोक दी जायेगी और उन्हें ‘ब्लैकलिस्ट’ कर दिया जायेगा जिससे उन्हें भविष्य में कोई दूसरी कम्पनी नौकरी नहीं देगी। आईटी सेक्टर के कार्यपद्धति के जानकारों का यह कहना है कि इस तरीक़े से डरा-धमका कर “स्वैच्छिक” इस्तीफ़ा लेना आईटी सेक्टर में एक आम बात है जो हर कम्पनी करती है। यह इसलिए किया जाता है ताकि इस मसले पर कम्पनियों की अपनी जबावदेही ख़त्म हो जाये और औद्योगिक विवाद अधिनियम जैसे बचेखुचे श्रम क़ानूनों और छँटनी-सम्बन्धी क़ानूनों में उन्हें न उलझना पड़े। बिना नोटिस के छँटनी करना और फिर डरा-धमका कर “स्वैच्छिक” इस्तीफ़ा लेने पर मजबूर करना – यह पूरी प्रक्रिया निहायत ही ग़ैरक़ानूनी है। लेकिन बिडम्बना यह है कि टीसीएस, विप्रो, इन्फोसिस, एचसीएल जैसी बड़ी-बड़ी कम्पनियाँ यह सब श्रम विभाग और सरकार के शह पर करती हैं। आख़िर मज़ाल है किसी की जो “विकसित भारत” के विकास रथ के इन अग्रिम घोड़ों के तरफ़ आँख भी उठाकर देख सके!

राजस्‍थान में भाजपा राज में जर्जर स्‍कूल व्‍यवस्‍था की भेंट चढ़े सात मासूम बच्‍चे

इन नेताओं के बच्चे प्राइवेट और नामी स्कूलों में पढ़ते हैं, वहीं आम जनता के बच्चे सरकारी स्कूलों की लापरवाही की भेंट चढ़ जाते हैं। भाजपा की शिक्षा व्यवस्था को लेकर मंशा तब और साफ़ हो जाती है जब खुद राज्य के शिक्षा मन्त्री मदन दिलवर यह कहते हैं कि “स्कूलों की मरम्मत करना कोई घर का काम नहीं है जो अपनी जेब से पैसे देकर करवा लें।” वहीं दूसरी तरफ़ इसी सरकार द्वारा राष्ट्रीय शिक्षा नीति, हेफा, पीएम ई-विद्या योजना आदि जैसी स्कीमों को लागू करके शिक्षा का निजीकरण करने और निजी संस्थानों को लूटने की खुली छूट दी जा रही है। दिलवर जी केवल अपने घर के लिए जनता का पैसा लेते हैं, लेकिन घर से कुछ देते नहीं हैं।