जनता के विरोध से घबराकर उत्तर प्रदेश सरकार ने एक बार फिर लगाया एस्मा!
उत्तर प्रदेश में आगामी विधान सभा चुनावों तक हड़ताल करने पर रहेगी पाबन्दी!

बिगुल संवाददाता

उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार ने एक बार फिर उत्तर प्रदेश में सरकारी संस्थानों में किसी भी प्रकार की हड़ताल पर रोक लगा दी है। शायद उत्तर प्रदेश इस देश का अकेला राज्य है जहाँ नियम से हर साल हड़ताल पर आवश्यक सेवा अनुरक्षण क़ानून (ESMA) का इस्तेमाल करके रोक लगायी जाती रही है। वैसे तो एस्मा जैसे दमनकारी क़ानून का किसी लोकतान्त्रिक देश में होने का कोई मतलब नहीं है और इसका हर उपयोग दरअसल इसका दुरुपयोग ही है, लेकिन योगी सरकार ने इस क़ानून के ‘इस्तेमाल’ के ही सारे रिकॉर्ड तोड़ दिये हैं! वास्तव में हाल ही में नोएडा समेत उत्तर प्रदेश के अन्य इलाक़ों में हुए मज़दूर आन्दोलनों और योगी सरकार की जनविरोधी नीतियों के चलते जनता के बीच बढ़ते असंतोष ने योगी सरकार को इस मज़दूर-कर्मचारी विरोधी क़ानून की शरण में एक दफ़ा फिर जाने को मजबूर किया है। इस क़दम ने दरअसल उत्तर प्रदेश सरकार की घबराहट को एक बार फ़िर उजागर कर दिया है और साबित कर दिया है कि जनान्दोलनों से भयाक्रान्त सत्ता ही ऐसा कर सकती है।

2017 में सत्तासीन होने के बाद से ही योगी सरकार प्रतिरोध की हर आवाज़ को दबाने की कोशिश में लगी हुई है। इसी कड़ी में योगी सरकार ने एक बार फिर से आने वाले छह महीने यानी कि आगामी विधान सभा चुनावों तक किसी भी प्रकार की हड़ताल पर पाबन्दी लगायी है। जैसा कि हम पहले बता चुके हैं कि यह फ़ैसला कुख्यात आवश्यक सेवा अनुरक्षण क़ानून (ESMA) के तहत लिया गया है। प्रदेश के सरकारी विभागों के साथ-साथ यह फ़ैसला निगमों, बोर्डों, प्राधिकरणों, नगर निगमों और स्थानीय निकाय के कर्मचारियों पर भी लागू होगा। हड़ताल करने वाले कर्मचारियों को 6 महीने तक की जेल या जुर्माना या दोनों हो सकता है। सवाल यह उठता है कि आख़िर योगी सरकार को यह क़दम उठाने की ज़रूरत क्यों पड़ी है?

सच तो यह है कि अपने शासन को लेकर आश्वस्त किसी भी हुक़्मरान को ऐसा करने की कोई ज़रूरत पड़नी नहीं चाहिए। आम तौर पर भी पूँजीवादी व्यवस्था के अन्तर्गत, जोकि बहुसंख्यक मेहनतकशों पर अल्पसंख्यक धन्ना-सेठों का शासन होता है, शासक वर्ग कभी भी निश्चिन्त नहीं बैठ सकते! उन्हें हर वक़्त ही जनता का भय और उससे भी ज़्यादा, उनकी सम्भावित संगठित एकता का भय सताता रहता है। पूँजीवादी राज्य द्वारा जनता की सहमति लेकर उनपर शासन करने के तमाम विचारधारात्मक तन्त्रों और प्रक्रियाओं को प्रभावशाली बनाने और साथ ही दमनात्मक तन्त्र को चाक-चौबन्द रखने और समय पड़ने पर सक्रिय करने के बावजूद शासकों के लिए इस भय के वस्तुगत कारण पूँजीवाद में मौजूद रहते ही हैं। मज़दूर वर्ग की हड़तालों को ग़ैर-क़ानूनी घोषित करने और हड़ताल करने के अधिकार पर ही रोक लगा देने के पीछे भला और कौन से कारण हो सकते हैं? जहाँ तक फ़ासीवादी शासन का सवाल है, उसके लिए तो जनता से यह भय, अन्य किसी भी प्रकार के पूँजीवादी शासन से अधिक वास्तविक होता है। फ़ासीवादी शासन के लिए दिक़्क़त यही बात बन जाती है कि जनता के हर प्रतिरोध को दबाने-कुचलने के बाद भी लोग प्रतिरोध करना नहीं छोड़ते हैं। इसके लिए ज़िम्मेदार खुद फ़ासीवादी सरकारों की नीतियाँ ही होती हैं। उत्तर प्रदेश में योगी सरकार के आतंकराज के तहत बेगुनाह मुसलमानों के घरों पर बुलडोज़र चलाने से लेकर मज़दूर कार्यकर्ताओं पर फ़र्जी मुक़द्दमे थोपने तक फ़ासीवादी दमन के हर प्रकार के हथियार को आज़माया जा रहा है। लेकिन तब भी उत्तर प्रदेश सरकार का सुख-चैन नदारद है! कारण सबके सामने हैं।

उत्तर प्रदेश में इस वक़्त बिजली संकट से त्राहि-त्राहि मची हुई है। लोगों में भयंकर गुस्सा है। एक तरफ़ भीषण गर्मी से लोग परेशान हैं वहीं दूसरी तरफ़ प्रदेश में बिजली का भी ज़बरदस्त संकट चल रहा है। शहरों में कई घण्टों तक बिजली की कटौती हो रही है। गाँवों और कस्बों का तो और बुरा हाल है। कई दिनों तक बिजली नहीं आ रही है। स्मार्ट मीटर लगाये जाने के बाद से बिजली के बिल भी बढ़कर आने लगे हैं। इसके अलावा सरकार द्वारा हाल ही में बिजली दरों में 10 प्रतिशत की बढ़ोतरी की गयी थी, जिसे बाद में जनदबाव में विद्युत विनियामक आयोग ने अवैध करार दिया। बिजली विभाग के निजीकरण तथा कर्मचारियों की पर्याप्त संख्या न होने से काम के अतिरिक्त दबाव को लेकर भी कर्मचारियों में गुस्सा है।

आम जनता बिजली कटौती से तो परेशान है ही, साथ में गैस सिलेण्डर, पेट्रोल, डीज़ल की लगातार बढ़ती क़ीमतों ने उसकी कमर तोड़ दी है। महँगाई का बुलडोज़र लोगों को रौन्द रहा है। परीक्षाओं में हो रही धाँधली से नौजवानों का भविष्य अन्धेरे में है। छात्र, नौजवान, मज़दूर, कर्मचारी कहीं अपनी माँगों को लेकर सड़कों पर न आ जायें इसलिए योगी सरकार एस्मा लगाकर पहले ही इस गुस्से को दबा देना चाहती है। वह इसमें कितनी कामयाब होती है यह तो वक़्त ही बतायेगा!

इसके अलावा यह फ़ैसला ऐसे समय में लिया गया है जब उत्तर प्रदेश में मज़दूरों के स्वतःस्फूर्त आन्दोलनों का उभार देखा गया। योगी सरकार पहले ही मज़दूर आन्दोलन को कुचलने के तमाम हथकण्डे अपना चुकी है। हाल ही में हमने देखा कि नोएडा में अपनी जायज़ माँगों को लेकर हड़ताल कर रहे मज़दूरों के आन्दोलन का योगी सरकार द्वारा न सिर्फ़ बर्बर दमन किया गया बल्कि ग़ैरक़ानूनी तरीक़े से गिरफ़्तार करके सैकड़ों मज़दूरों और मज़दूर कार्यकर्ताओं को जेल में डाल दिया गया। दो मज़दूर कार्यकर्ताओं को देश के लिए ख़तरा बताकर रासुका जैसा दमनकारी क़ानून लगा दिया गया। यही नहीं, निर्दोष मज़दूर व छात्र कार्यकर्ताओं पर 10-11 फ़र्ज़ी एफ़आईआर दर्ज की गयीं ताकि उन्हें महीनों तक जेल में रखा जा सके और ज़मानत मिलने की पूरी प्रक्रिया को ही नामुमकिन बना दिया जाये। इसके बाद मज़दूरों को मज़दूर दिवस (1 मई) मनाने से रोकने के लिए पूरे ज़िले में धारा 163 दी गयी ताकि मज़दूर अपनी क्रान्तिकारी विरासत को जान न सके और न ही उसे मनाने के लिए एकजुट हो सकें। दरअसल योगी सरकार जो रिपोर्ट कार्ड अपने पूँजीपति आकाओं के सामने पेश करना चाहती है उसके लिए इस तरह की असंवैधानिक, ग़ैर-क़ानूनी व दमनकारी कार्रवाइयों को अंजाम देना ज़रूरी भी बन जाता है। हालांकि इस प्रकार के अप्रत्याशित नंगे दमन के बूते तात्कालिक तौर पर कोई भी दमनकारी सत्ता मुर्दा शान्ति स्थापित करने में कामयाब हो भी जाये लेकिन दूरगामी तौर पर इसके नतीजे कुछ और ही होते हैं। इतिहास इस बात का गवाह है कि मज़दूर वर्ग का संघर्ष दमन से पैदा होने वाले अल्पकालिक झटकों और उतार-चढ़ाव के बावजूद आगे बढ़ता है और दमन प्रतिरोध को ख़त्म नहीं कर सकता है। जैसा कि हमने ऊपर इंगित किया था यह पहली बार नहीं है जब योगी सरकार ने मज़दूरों-कर्मचारियों  के हड़ताल करने के मूलभूत अधिकार को कुचला हो और उसपर रोक लगायी हो। इससे पहले भी योगी सरकार एस्मा जैसे दमनकारी क़ानून को लगभग हर साल लागू कर चुकी है। चुनावों से पहले इस क़ानून को 2021 में भी वह लागू कर चुकी है। यह फ़ैसला यह दिखाता है कि योगी सरकार जनान्दोलनों से भयभीत है और उसे रोकने की तमाम कोशिशें कर रही है। यह यह भी बताता है कि 2027 में वह हर क़ीमत पर सत्ता में वापसी चाहती है।

उत्तर प्रदेश में लगे एस्मा का खास महत्व है। इसे हमें उत्तर प्रदेश के विभिन्न विभागों में बढ़ते असंतोष को दबाने के क्रम में देखने की ज़रूरत है। इस समय उत्तर प्रदेश में गहराते आर्थिक संकट, बिजली संकट और इन संकटों की वजह से बढ़ते जनाक्रोश की परिस्थिति से निपटने के लिए एस्मा लगाया गया है। अगले साल उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। चुनावों से पहले योगी सरकार अपने कुशासन और जनविरोधी शासन के ख़िलाफ़ किसी भी तरह के प्रतिरोध को पनपने से पहले ही कुचल देने कि कोशिशें कर रही है। इसीलिए योगी सरकार कभी एस्मा लगाती है तो कभी मज़दूर कार्यकर्ताओं के ऊपर रासुका जैसा दमनकारी क़ानून लगा दिया जाता है ताकि लोग अपनी बुनियादी माँगों मसलन शिक्षा, चिकित्सा, रोज़गार, आवास, न्यूनतम वेतन आदि के लिए एकजुट और संगठित न हो सकें।

आज योगी सरकार द्वारा एस्मा लगाये जाने के जनविरोधी फ़ैसले का विरोध हर इंसाफ़पसन्द आवाज़ को करना चाहिए। यह असल में योगी सरकार की फ़ासीवादी नीतियों का ही हिस्सा है कि आज लोगों की आवाज़ को दबाने के लिए इस प्रकार के जनविरोधी फैसलों को लोगों पर थोपा जा रहा है और हड़ताल करने के बुनियादी संवैधानिक अधिकार तक को छीना जा रहा है। इसके साथ ही एस्मा के दमनकारी क़ानून को खत्म करने की माँग भी एक बेहद बुनियादी जनवादी माँग है। इस क़ानून का इस्तेमाल मज़दूरों के आन्दोलनों को दबाने के लिए हर मौक़े पर सरकारों द्वारा किया जाता रहा है। यह एक मज़दूर-विरोधी क़ानून है। इसकी मुख़ालिफ़त न सिर्फ़ मज़दूर वर्ग को करनी चाहिए बल्कि दमन-उत्पीड़न के ख़िलाफ़ खड़े हर इंसान को करनी चाहिए।

 

मज़दूर बिगुल, जून 2026