अमानवीयता की हदें पार कर रही है क्यूबा में अमेरिकी साम्राज्यवाद की घेराबन्दी

आनन्द

अब यह दिन के उजाले की तरह साफ़ हो चुका है कि पश्चिम एशिया में ईरान के ख़िलाफ़ युद्ध में अमेरिकी साम्राज्यवाद को मुँह की खानी पड़ी है। ईरान में मिली यह शिकस्त अमेरिकी साम्राज्यवाद के पतन की सबसे ताज़ा मिसाल है। यह पतनशील अमेरिकी साम्राज्यवाद आज दुनिया के तमाम हिस्सों में मानवद्रोही कारनामों के पुराने सारे कीर्तिमान ध्वस्त कर रहा है। अमेरिका के पिछवाड़े में स्थित द्वीपीय राष्ट्र क्यूबा में अमेरिकी हस्तक्षेपों और अमानवीय प्रतिबन्धों व घेराबन्दियों का लम्बा इतिहास रहा है। पिछले छह दशकों के दौरान अमेरिका ने क्यूबा की क्रान्ति को कुचलकर उसका नामोनिशान मिटाने के लिए उसे अपने खेमे में लाने के लिए अनगिनत साज़िशें रची हैं। परन्तु इस समय अमेरिकी साम्राज्यवाद जो कुछ क्यूबा में कर रहा है उसमें उसने अमानवीयता की सारी हदें पार कर कर दी हैं।

पिछले तीन महीने से ट्रम्प नीत अमेरिका ने क्यूबा की अर्थव्यवस्था का गला घोंटने के लिए उस पर अमानवीय तेल घेराबन्दी लगायी हुई है। हालाँकि 1959 की क्यूबा की साम्राज्यवाद-विरोधी क्रान्ति के बाद से ही अमेरिकी साम्राज्यवाद ने क्यूबा पर विभिन्न तरीक़ों से आर्थिक प्रतिबन्ध लगाता आया है, परन्तु वर्तमान तेल घेराबन्दी विशेष रूप से ख़तरनाक है क्योंकि इसकी वजह से उस देश की बिजली आपूर्ति बाधित हो गई है। चूँकि क्यूबा बिजली उत्पादन के लिए बड़े पैमाने पर तेल आयात पर निर्भर है, इसलिए अमेरिका द्वारा लगाई गई तेल घेराबन्दी के कारण गम्भीर बिजली संकट पैदा हो गया है, जो क्यूबा के लोगों के जीवन और आजीविका पर बेहद प्रतिकूल प्रभाव डाल रहा है। क्यूबा की अर्थव्यवस्था लगभग ठप हो चुकी है। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि क्यूबा के लोग इस समय एक मानवीय विपदा का सामना कर रहे हैं जो अमेरिकी साम्राज्यवाद की अमानवीय हरकतों का प्रत्यक्ष परिणाम है।

ज्ञात हो कि इस वर्ष की शुरुआत में वेनेज़ुएला के राष्ट्रपति मादुरो का अपहरण कर वेनेज़ुएला के तेल पर नियंत्रण स्थापित करने के बाद, ट्रम्प-नीत अमेरिकी साम्राज्यवाद ने वेनेज़ुएला से क्यूबा को होने वाली तेल आपूर्ति पर रोक लगा दी थी। इसके साथ ही ट्रम्प प्रशासन ने उन सभी देशों से अमेरिका में आने वाले उत्पादों पर भारी शुल्क लगा दिया, जो क्यूबा को तेल बेचते थे। चूँकि क्यूबा में बिजली अधिकांशत: आयातित तेल से बनायी जाती है इसलिए क्यूबा में तेल भेजने पर अमेरिका द्वारा प्रतिबन्ध लगाने की वजह से वहाँ इस समय एक भीषण मानवीय संकट पैदा हो गया है। इस द्वीपीय राष्ट्र में रोज़ाना लम्बे समय तक बिजली की भयंकर कटौती हो रही है जिसकी वजह से न सिर्फ़ लोगों का अँधेरे में रहना पड़ रहा है बल्कि वहाँ एक गम्भीर खाद्य संकट भी पैदा हो गया है। इसकी वजह यह है कि क्यूबा में भोजन पकाने, उसके परिवहन और भण्डारण की व्यवस्था लगभग पूरी तरह से बिजली पर निर्भर है। इस प्रकार, अमानवीय तेल प्रतिबन्ध ने लगभग एक करोड़ क्यूबाई लोगों को भुखमरी के कगार पर पहुँचा दिया है क्योंकि लोगों को आधे पेट सोना पड़ रहा है।

इसके अलावा, बिजली कटौती के कारण अस्पतालों का कामकाज भी बुरी तरह प्रभावित हुआ है, क्योंकि वे पर्याप्त बिजली के बिना संचालित नहीं हो सकते। नतीजतन, क्यूबा में तेल प्रतिबन्धों से एक स्वास्थ्य संकट भी पैदा हो गया है। यह एक त्रासद विडम्बना है कि दुनिया में चिकित्सा सेवाओं के मामले में मिसाल पेश करने वाला क्यूबा आज चिकित्सीय संकट से गुज़र रहा है। बिजली आपूर्ति के अभाव में जहाँ भोजन ख़राब हो रहा है, वहीं जल आपूर्ति भी प्रभावित हो रही है क्योंकि पानी के पम्प काम नहीं कर पा रहे हैं। इसके अतिरिक्त, क्यूबा में विमान के ईंधन की किल्लत के कारण वहाँ अनेक उड़ानें रद्द करनी पड़ी हैं, जिससे पर्यटकों के आगमन पर निहायत ही प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। इससे क्यूबा की उस अर्थव्यवस्था को भारी नुक़सान पहुँच रहा है, जो पर्यटन पर काफ़ी हद तक निर्भर है। क्यूबा में जारी यह मानवीय संकट ट्रम्प-नीत अमेरिकी साम्राज्यवाद की उस सुनियोजित नीति का प्रत्यक्ष परिणाम है, जिसका उद्देश्य क्यूबा की जनता को घुटने टेकने के लिए मजबूर करना है। ट्रम्प प्रशासन की ये नीतियाँ ही क्यूबा में पैदा हुए मानवीय संकट का मुख्य कारण हैं।

क्यूबा पर थोपा गया तेल प्रतिबन्ध पहले से ही संकटग्रस्त द्वीपीय राष्ट्र की अर्थव्यवस्था पर एक घातक प्रहार से कम नहीं है। ज्ञात हो कि कोविड महामारी के कारण क्यूबा की अर्थव्यवस्था को गम्भीर क्षति पहुँची थी क्योंकि पर्यटकों की संख्या में भारी गिरावट आई थी। अभी क्यूबा कोविड के झटके से उबरने का प्रयास कर ही रहा था तभी उसे 2025 के उत्तरार्ध में आए हरीकेन मेलिसा की वजह से भारी तबाही का सामना करना पड़ा। वह अभी उस प्राकृतिक आपदा से पूरी तरह उबर भी नहीं पाया था कि उसे साम्राज्यवाद द्वारा थोपी गई एक और आपदा—तेल घेराबन्दी—का सामना करना पड़ रहा है। अमेरिकी साम्राज्यवाद मानवद्रोही चरित्र उस समय पूरी तरह उजागर हो गया जब ईरान में युद्ध के बढ़ते खतरे के बीच ट्रम्प ने खुले तौर पर कहा कि उन्हें “क्यूबा पर कब्ज़ा करने का सम्मान” प्राप्त होगा। यह बयान एक ऐसी साम्राज्यवादी शक्ति की बौखलाहट की निशानी है  जो अपने पतन को स्वीकार नहीं कर पा रही है। यह साफ़ तौर पर दर्शाता है कि मुनाफ़े की दर में गिरावट के संकट से उबरने की कोशिश में साम्राज्यवाद मानवता को एक अन्धी सुरंग की ओर धकेल रहा है।

क्यूबा में जारी भीषण मानवीय संकट के बीच ही क्यूबा पर आत्मसमर्पण करने के लिए दबाव डालने के मक़सद से अमेरिका ने वहाँ के क्रान्तिकारी नेता और पूर्व राष्ट्रपति राउल कास्त्रो पर दो अमेरिकी विमानों को गिराने के 30 साल पुराने मामले में सज़ा सुना दी। ग़ौरतलब है कि कास्त्रो की उम्र इस समय 94 वर्ष की है और कयास लगाये जा रहे हैं कि वेनेजुएला के राष्ट्रपति मादुरो की ही तरह अमेरिका कास्त्रो को भी अगवा करके अमेरिका में मुक़दमा चला सकता है। ट्रम्प उम्मीद कर रहा है कि क्यूबा पर प्रतिबन्धों को सख़्त करने की वजह से वहाँ की सत्ता गिर जाएगी और अमेरिका की मनपसन्द राष्ट्रपति चुन लिया जाएगा। अगर ऐसा नहीं होता है तो ट्रम्प क्यूबा में सैन्य हस्तक्षेत्र करने से भी बाज़ नहीं आएगा।

ऐतिहासिक रूप से क्यूबा की जनता ने साम्राज्यवाद-विरोधी संघर्ष की शानदार मिसाल पेश की है। साथ ही हम यह भी नहीं भूल सकते कि क्यूबा ने दुनिया भर के दूरदराज़ इलाक़ों में प्राकृतिक आपदाओं के समय अपने डॉक्टरों और चिकित्सा मिशनों को भेजकर मानवता की सेवा की अप्रतिम मिसाल पेश की है। आज जब क्यूबा स्वयं भीषण संकट के दौर से गुजर रहा है, तब दुनिया भर की मेहनतकश जनता को इस संकट की घड़ी में क्यूबा के लोगों के साथ एकजुटता व्यक्त करनी चाहिए। भारत के मज़दूर वर्ग को भी क्यूबा की जनता के प्रति अपनी एकजुटता जाहिर करते हुए भारत सरकार पर दबाव बनाना चाहिए कि वह क्यूबा में घेराबन्दी ख़त्म करने के लिए अमेरिका पर कूटनितिक दबाव बनाये। दुनियाभर के मेहनतकश जनसमुदाय की एकजुटता के बूते ही क्यूबा इस संकट से बाहर निकल सकता है।

 

मज़दूर बिगुल, जून 2026