कर्नाटक और तेलंगाना में न्यूनतम वेतन वृद्धि : नाकाफ़ी और देरी से लागू की गयी बढ़ोत्तरी

सनी

कर्नाटक और तेलंगाना में बिना किसी प्रत्यक्ष हड़ताल आन्दोलन के दोनों राज्यों में सत्तासीन कांग्रेस सरकारों ने न्यूनतम वेतन में वृद्धि कर ख़ुद को मज़दूर-हितैषी घोषित किया है। निश्चित ही यह वेतन-वृद्धि स्वागतयोग्य बात है लेकिन कांग्रेस की राज्य सरकारों द्वारा की गयी यह वृद्धि नाकाफ़ी है, हालाँकि हरियाणा और उत्तर प्रदेश में भाजपा सरकारों द्वारा की गयी बढ़ोत्तरियों से यह निश्चित ही ज़्यादा है। यह बढ़ोत्तरी तब हुई है जब पूरे देश में हड़ताल आन्दोलन की लहर कभी ऊपर तो कभी नीचे होते हुए जारी है। इस साल पानीपत, बरौनी, मानेसर, नोएडा से लेकर सूरत आदि शहरों में मज़दूरों ने स्वत:स्फूर्त हड़ताल कर दी। हर जगह ही मज़दूरों की हड़तालों को राज्य की भाजपा सरकारों ने कुचलने का काम किया। इसमें नोएडा में हुए मज़दूर आन्दोलन को सबसे अधिक पुलिसिया दमन का सामना करना पड़ा है और अभी भी उत्तर प्रदेश की ग़ैर-क़ानूनी और असंवैधानिक दमनकारी हरक़तें जारी हैं, ताकि पूँजीपतियों को यह सन्देश सम्प्रेषित किया जा सके कि उनके “धन्धा करने की सहूलियत” में मज़दूर अधिकारों की बाधा नहीं आने दी जायेगी। बहरहाल, हड़ताल के दबाव में हरियाणा में सरकार ने वेतन में 30-35 प्रतिशत वृद्धि की तो वहीं और उत्तर प्रदेश में यह महज़ 20 प्रतिशत तक ही हुई है।

कर्नाटक और तेलंगाना द्वारा वेतन-वृद्धि पर कई वामपन्थी और लिबरल तालियाँ बजा रहे हैं लेकिन असल बात तो यह है कि यह कांग्रेस की मज़दूरों के प्रति पक्षधरता नहीं बल्कि देश भर में जारी हड़ताल आन्दोलन के दबाव की वजह से हुआ है। दूसरी बात यह है कि यह बढ़ोत्तरी भी नाकाफ़ी है। इसके अलावा, कर्नाटक में यह केवल 83 उद्योगों के मज़दूरों पर लागू होगी और 19 उद्योगों को इससे बाहर रखा गया है। इन 19 उद्योगों में गारमेण्ट, हैण्डलूम, पावरलूम, अगरबत्ती, बीड़ी, खेती और उससे सम्बन्धित पेशे, ईंट, रबर, चाय और कॉफ़ी शामिल हैं जिनके 10 लाख से अधिक मज़दूरों को मौजूदा वेतन वृद्धि से बाहर रखा गया है। कर्नाटक में आख़िरी वेतन वृद्धि 2023 में हुई थी जो केवल 34 उद्योगों के मज़दूरों के लिए थी जबकि राज्य की अधिकांश मज़दूर आबादी के लिए आख़िरी वेतन वृद्धि 2017 में हुई थी। कर्नाटक में पिछले एक दशक में यह केवल चौथी बार है जब न्यूनतम वेतन बढ़ाया गया है हालाँकि क़ायदे से सरकार को बढ़ती महँगाई दर के अनुसार हर वर्ष ही वेतन-वृद्धि करनी चाहिए। तेलंगाना में तो पिछले 12 साल से न्यूनतम वेतन में वृद्धि ही नहीं हुई थी।

दूसरी और कहीं ज़्यादा अहम बात यह है कि इन दोनों राज्यों में हालिया वेतन-वृद्धि वास्तविकता में कितनी लागू होगी यह अभी देखना होगा। क्योंकि काग़ज़ों पर दिखाये जाने वाले वेतन और मज़दूरों के हाथ में पहुँचने वाले वेतन में कम-से-कम सभी असंगठित क्षेत्र के मज़दूरों के मामले में ज़मीन-आसमान का अन्तर होता है। श्रम-मन्त्रालय के ई-श्रम पोर्टल के आँकड़ों के अनुसार भारत में 94.11 फ़ीसदी अनौपचारिक क्षेत्र के मज़दूरों की मज़दूरी 10 हज़ार रुपये से भी कम है जबकि काग़ज़ों पर न्यूनतम वेतन लगातार बढ़ता रहा है। वैसे अब तो मोदी सरकार ने चार लेबर कोड लागू कर काग़ज़ों पर भी श्रम अधिकारों को लागू करने की बाध्यता को लगभग ख़त्म कर दिया है। मोदी सरकार ने न्यूनतम वेतन सम्बन्धी ‘झंझट’ को ख़त्म करने के लिए प्रतिदिन के लिए राष्ट्रीय तल-स्तरीय मज़दूरी यानी नेशनल फ़्लोर लेवल मज़दूरी को रु. 178 करने की घोषणा की है जो कि महीने में पाँच हज़ार रुपये से कम बनती है। दूसरा, वेतन-वृद्धि को लागू करवाने वाली पहले ही पंगु संस्था श्रम विभाग को मोदी सरकार ने लेबर कोड के ज़रिये हटाकर ट्रिब्युनल बनाने की घोषणा की है जो केवल नाममात्र की संस्था होगी और इसमें काग़ज़ी वृद्धि को फैक्ट्रियों में लागू करवाने की क्षमता नहीं होगी।

अब पूँजीपति वर्ग की जैसी फ़ितरत होती है उसके अनुसार कर्नाटक और तेलंगाना के पूँजीपति इसे ख़ुद स्वेच्छा से तो लागू करने से रहे। बल्कि उन्हें तो इस काग़ज़ी वृद्धि से भी तक़लीफ़ हो रही है। कर्नाटक में पूँजीपतियों के संघ और कुछ कम्पनियों ने हाई कोर्ट में इस वेतन-वृद्धि को चुनौती तक दे दी है। मालिकों द्वारा इस मसले पर काफ़ी चिल्ल-पों मचायी जा रही है कि वे मज़दूरी पर काफ़ी ख़र्च करते हैं। हम मज़दूर अच्छी तरह से जानते हैं कि यह सरासर झूठ है। असल में मज़दूरी पर पूँजीपतियों का निवेश उनके कुल पूँजी निवेश के अनुपात में साल-दर-साल घटता गया है। भारतीय अर्थव्यवस्था और पूँजीपति जिस आर्थिक संकट के भँवर में फँसे हैं उसका सारा बोझ वे मज़दूरों पर ही डाल देना चाहते हैं और उन्हें सरकारों द्वारा काग़ज़ों पर भी किसी भी कि़स्म की वेतन-वृद्धि नागवार गुज़रती है। हम इसपर आगे चर्चा करेंगे लेकिन पहले उस वेतन-बढ़ोत्तरी पर बात कर लेते हैं जिसे लेकर पूँजीपति इतना विचलित हो रहे हैं।

कर्नाटक ने मई 2026 में जो वेतन वृद्धि की है उसके अनुसार कर्नाटक को तीन क्षेत्रों में बाँटा गया है। इन क्षेत्रों में कर्नाटक सरकार की नयी घोषणा के अनुसार बंगलुरु, अन्य शहरों व जि़ला मुख्यालयों में व अन्य क्षेत्रों में एक अकुशल मज़दूर का वेतन क्रमश: ₹23,376, ₹21,251 व ₹19,319 होगा; अर्द्धकुशल मज़दूर का वेतन ₹25,714, ₹23,376 व ₹21,251.30 तथा कुशल मज़दूर का वेतन ₹28,285, ₹25,714 व ₹23,376 होगा। तेलंगाना में नयी वेतन दर की घोषणा के अनुसार नगर निगम, नगर पालिका व ग्रामीण क्षेत्रों में अकुशल मज़दूर को क्रमश: ₹16,000, ₹15,000 व ₹14,000 मज़दूरी मिलेगी; अर्द्धकुशल मज़दूर को क्रमश: ₹17,000, ₹16,000 व ₹15,000 तथा कुशल मज़दूर को ₹18,500, ₹17,500 व ₹16,500 मिलेंगे।

यह बढ़ोत्तरी आज की महँगाई की तुलना में क़तई नाकाफ़ी है। यह बात हर उस व्यक्ति को स्पष्ट तौर पर पता होगी जो आज मेहनत-मशक्क़त कर अपनी गुज़र-बसर कर रहा है या जो मेहनतकश आबादी के जीवन से वास्ता रखता हो। राशन, कपड़ा, यातायात आदि की क़ीमतें, गैस, खाद तथा पेट्रोल-डीज़ल की बढ़ी क़ीमतों के कारण आसमान छू रही हैं। थोक महँगाई मई 2026 में अप्रैल 2025 की 8.26 प्रतिशत से छलाँग लगाकर 9.68 प्रतिशत हो गयी। इसका असर खुदरा महँगाई में बढ़ोत्तरी में आना तय है। ईरान पर अमेरिका-इज़रायल धुरी द्वारा थोपे साम्राज्यवादी युद्ध और भारत सरकार की विचित्र विदेश नीति के चलते यह संकट और ज़्यादा गहराया है। हाल में रसोई गैस के संकट में ग़रीबों के जीवन के दुख-तकलीफ़ सड़कों पर हड़ताल आन्दोलन के लावे के रूप में बह निकले। ईरान पर अमेरिका-इज़रायल द्वारा थोपा युद्ध फ़िलहाल थम गया है लेकिन आपूर्ति-श्रृंखलाएँ जिस क़दर प्रभावित हुई हैं फ़िलहाल यह कहा जा सकता है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था और ख़ास तौर पर भारतीय अर्थव्यवस्था को सम्भलने में लम्बा वक़्त लगेगा। मई में खाद्य महँगाई दर 4.8% तक पहुँच गयी है और आम महँगाई दर 3.93% हो गयी है। इस कमरतोड़ महँगाई में कर्नाटक और तेलंगाना सरकार द्वारा की घोषित वेतन अगर मज़दूरों को मिल जाए तब भी यह नाकाफ़ी है।

अन्तरराष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) ने न्यूनतम मज़दूरी के लिए जीवनयापन-योग्य मज़दूरी की अपनी परिभाषा प्रस्तावित की है। मज़दूर परिवार के खाद्य वस्तुओं, आवास, स्वास्थ्य, बच्चों की शिक्षा, यातायात, कपड़े, आपातकाल व अन्य उपयोगिताओं पर तात्कालिक महँगाई के दर के अनुसार ख़र्च जोड़कर उसे प्रति परिवार मज़दूर संख्या से विभाजित कर इसकी गणना की जाती है। अंकेर शोध संस्थान ने 2025 में आईएलओ के उपरोक्त दिशा-निर्देशों के अनुसार भारत के तमाम राज्यों में जीवनयापन योग्य मज़दूरी की गणना की है। हालाँकि यह शोध एक साल पुराना है व इस शोध में कई ख़र्चों की गणना सटीक प्रतीत नहीं होती है क्योंकि कई जगह ख़र्च को कम करके आँका गया है। फ़िलहाल हम इस शोध के आँकड़ों को ही लेकर यह दिखाने का प्रयास करेंगे कि ख़ुद बुर्जुआ मानकों के अनुसार भी कर्नाटक और तेलंगाना सरकार की वेतन वृद्धि नाकाफ़ी है।

अंकेर शोध संस्थान के अनुसार कर्नाटक के बंगलुरु शहर में महँगाई की दर की रोशनी में जीवनयापन योग्य मज़दूरी 2025 में ₹25,246, अन्य शहरों में ₹22,522 और ग्रामीण क्षेत्रों के लिए क़रीब ₹20,000 होनी चाहिए। हमने ऊपर ही देखा कि वेतन बढ़ोत्तरी के बाद बैंगलोर में एक अकुशल मज़दूर का वेतन है ₹23,376, अन्य शहरों व जि़ला हेडक्वार्टर में ₹21,251 और अन्य इलाक़ों में ₹19,319.36। तीनों क्षेत्रों में अकुशल मज़दूर के लिए यह बढ़ोत्तरी कम है। काग़ज़ पर अर्द्धकुशल और कुशल मज़दूर का नया वेतन अंकेर शोध संस्थान की गणना पर खरा उतरता है। अब यही तुलना करते हुए हम तेलंगाना की नयी वेतन दर को देख सकते हैं। तेलंगाना में 2025 की महँगाई की दर के अनुसार अंकेर शोध संस्थान के अनुसार हैदराबाद में ₹24,890 होना चाहिए था, अन्य शहरों में ₹22,522 और ग्रामीण क्षेत्रों के लिए क़रीब ₹17,000 होना चाहिए। तेलंगाना में नवीनतम काग़ज़ी वेतन इस प्रकार हैं : म्युनिसिपल कॉरपोरेशन ज़ोन में अकुशल मज़दूर को ₹16,000, मुन्सिपैलिटी ज़ोन में ₹15,000 और ग्रामीण क्षेत्रों के ज़ोन में ₹14,000। कुशल और अर्द्धकुशल मज़दूरों का वेतन भी इस पैमाने पर खरा नहीं उतरता है। अंकेर शोध संस्थान के एक साल पुराने जीवनयानप योग्य मज़दूरी के प्रस्ताव से भी कर्नाटक और हैदराबाद में अधिकतम मज़दूरों का नवीनतम वेतन कम है।

यह भी हम जीवनयापन योग्य मज़दूरी की बात कर रहे हैं जिसे आईएलओ प्रस्तावित करता है जिसकी अंकेर शोध संस्थान द्वारा 2025 की महँगाई दर के अनुसार गणना की गयी है। जैसा हमने ऊपर कहा कि ये गणनाएँ सटीक नहीं प्रतीत होती हैं और इसमें ख़र्चों को कम करके आँका गया है। दूसरी बात यह कि ग्रामीण और शहरी मज़दूरों के लिए एक समान न्यूनतम वेतन तय होना चाहिए जो उपरोक्त शोध प्रस्तावित नहीं करता है। वास्तव में महँगाई को देखते हुए आज ग्रामीण और शहरी मज़दूरों का वेतन कम से कम ₹30,000 होना ही चाहिए और कर्नाटक और तेलंगाना में हुई वृद्धि इस मामले में काफ़ी पीछे है।

यह वेतन वृद्धि भी कांग्रेस की सरकारों ने किसी भलमनसाहत से नहीं बल्कि इन राज्यों में सम्भावित मज़दूर आन्दोलन की लहर से घबराकर की है क्योंकि सतह के नीचे इन दोनों राज्यों में भी मज़दूरों का गुस्सा और उनकी नाराज़गी पनप रही थी। कर्नाटक में पूँजीपति इसका कड़ा विरोध करने में लगे हैं। उनके अनुसार मज़दूरी पर वे पहले ही बेहद अधिक “ख़र्चा” कर रहे हैं और इसे और बढ़ाना सरासर अन्याय है! जैसा कि हमने ऊपर बताया, यह कोरा झूठ है। असलियत यह है कि पूँजीपतियों द्वारा मज़दूरी पर होने वाला निवेश लगातार ही घटाया गया है और पूँजीपति इसे और भी कम कर देना चाहते हैं। पहली बात तो यह है कि पूँजीपति मज़दूरी पर “ख़र्च” नहीं बल्कि निवेश करते हैं, जो मज़दूरों के श्रम से पैदा मुनाफ़े के साथ उनके पास वापस आ जाता है। मालिक का मुनाफ़ा मज़दूर के शोषण के ज़रिये हासिल होता है। मज़दूरी और कुछ नहीं बल्कि एक मज़दूर की श्रमशक्ति की क़ीमत होती है और एक मज़दूर श्रमकाल के एक हिस्से से अपनी मज़दूरी के बराबर मूल्य पैदा करता है तो बाक़ी हिस्सा मालिक बेशी-मूल्य के रूप में हड़पता है। यही उसके मुनाफ़े का आधार होता है। मालिक हर-हमेशा कोशिश करता है कि मज़दूरी कम की जाये ताकि मुनाफ़ा और उसकी दर को बढ़ाया जा सके। मुनाफ़ा और मज़दूरी व्युत्क्रमानुपाती होते हैं। इसको गोल करके कर्नाटक के पूँजीपति कोर्ट में और मीडिया में नंगा झूठ बोल रहे हैं। उनके अनुसार, कर्नाटक सरकार द्वारा की गयी वेतन-बढ़ोत्तरी उनका दमन है और उनके धन्धा करने के संवैधानिक हक़ का हनन है! पूँजीवादी मानकों से इन सेठों-व्यापारियों का कहना सही भी है क्योंकि पूँजीवादी जनवाद का मर्म ही मज़दूरों के लिए यह है कि पूँजीपतियों को मज़दूरों का शोषण करने की आज़ादी मिले! इसपर चोट पूँजीवादी संविधान का उल्लंघन नहीं होगा तो क्या होगा? “धन्धा करने की आज़ादी” का मतलब ही है मुनाफ़ा कमाने की आज़ादी, चाहे इसके लिए पूँजीपतियों को मज़दूरों की हड्डियों का चूरा बनाकर ही क्यों न बेचना पड़े। बहरहाल, कोर्ट में कर्नाटक के मालिकों के एक संघ ने चार लेबर कोड का हवाला देकर भी मौजूदा बढ़ोत्तरी को निरस्त करने की अपील की है। उनका यह भी दावा है कि यह वेतन-बढ़ोत्तरी भयंकर आर्थिक बर्बादी लाएगी और आर्थिक संकट को और बढ़ावा देगी। अचरज तब होता है जब वे कहते हैं कि वे हर साल ही मज़दूरों के वेतन बढ़ाकर देते रहे हैं! उनकी बातें सुनकर ऐसा लगता है जैसे कर्नाटक के मालिकों के कुल निवेश का बड़ा हिस्सा मज़दूरी पर ही “ज़ाया” होता है और यह बढ़ी हुई मज़दूरी ही आर्थिक संकट का कारण है! इनकी चोरी तब पकड़ी जाती है जब हम ऐतिहासिक तौर पर कर्नाटक के उद्योगों में मज़दूरी पर निवेश को देखते हैं। यह लगातार कम होता गया है। यह कर्नाटक के भिन्न उद्योगों के लिए तालिका – 1 से स्पष्ट है।

ऐतिहासिक तौर पर यह तालिका मालिकों द्वारा कुल निवेश में मशीनरी और तकनोलॉजी पर बढ़ती हिस्सेदारी को भी दर्शाती है। यानी मालिक मज़दूरी पर निवेश को लगातार सापेक्षिक तौर पर कम करते जा रहे हैं। वास्तव में, जिस चीज़ की जाँच होनी चाहिए वह यह है कि कुल पूँजी निवेश में उत्पादन के साधनों पर होने वाले निवेश की तुलना में मज़दूरी पर निवेश कितना हुआ है। पूँजीवादी उत्पादन का आम नियम होता है कि पूँजीपतियों की आपसी प्रतिस्पर्द्धा उन्हें लगातार श्रम की उत्पादकता को बढ़ाने के लिए मशीनों व तकनोलॉजी पर निवेश को बढ़ाने के लिए बाध्य करती है और लम्बी दूरी में हमेशा ही कुल पूँजी निवेश में उत्पादन के साधनों पर निवेश मज़दूरी पर निवेश के सापेक्ष बढ़ता है। ऐसा तब भी सम्भव है जब निरपेक्ष रूप में मज़दूरी पर निवेश भी बढ़ा हो क्योंकि कुल पूँजी निवेश ही उससे कहीं तेज़ गति से बढ़ा होता है। असल बात है उत्पादन के साधनों पर निवेश और मज़दूरी पर होने वाले निवेश का अनुपात, जो दीर्घकालिक प्रवृत्ति के रूप में पूँजीवाद में हमेशा ही बढ़ता है। इसे पूँजी का आवयविक संघटन बढ़ना कहा जाता है। कर्नाटक और तेलंगाना में मामले में भी यह बढ़ा है, जबकि कोर्ट में वे मज़दूरी पर होने वाले “ख़र्च” का दुखड़ा रो रहे हैं। तालिका से साफ़ है कि साल दर साल पूँजीपतियों ने कच्चे माल, मशीनरी और अन्य मालों पर ख़र्च बढ़ाया है जबकि मज़दूरी पर होने वाला ख़र्च लगातार घटाया है। पूँजीवादी व्यवस्था में यह होना लाज़िमी है, जैसा कि हमने ऊपर बताया है। (इसके बारे में विस्तार में जानने के लिए देखें: क्रान्तिकारी मज़दूर शिक्षण माला – 15 : सापेक्षिक बेशी मूल्य का उत्पादन, अभिनव, मज़दूर बिगुल नवम्बर 2023) इसे ही मार्क्स ने पूँजी का आवयविक संघटन का बढ़ना कहा था यानी स्थिर पूँजी (मशीनरी, कच्चा माल, अन्य सहायक सामग्री, आदि पर होने वाला पूँजी निवेश) और परिवर्तनशील पूँजी (मज़दूरी पर होने वाला पूँजी निवेश) का अनुपात, जो कि ऐतिहासिक तौर पर बढ़ता रहता है।

यहाँ यह ज़िक्र करना भी उपयोगी होगा कि जब पूँजी का आवयविक संघटन समूची अर्थव्यवस्था में ही औसत तौर पर बढ़ता है, तो यह मुनाफ़े की गिरती दर की प्रवृत्ति का कारण बनता है और पूँजीवादी आर्थिक संकट को जन्म देता है। यहाँ यह समझना काफ़ी होगा कि अधिक मुनाफ़ा हासिल करने के लिए क़ीमत-प्रतिस्पर्धा में उलझे पूँजीपति अपने इस क़दम की वजह से मुनाफ़े को दीर्घकालिक तौर पर गिरता हुआ पाते हैं और आर्थिक संकट के भँवर में उलझ जाते हैं। अगर हम कर्नाटक के उद्योगों की उपरोक्त तालिका देखें तो यह साफ़ है कि ऐतिहासिक तौर पर पूँजी का आवयविक संघटन बढ़ता रहा है। यही प्रक्रिया जब पूरी अर्थव्यवस्था के पैमाने पर चलती है तो यह मुनाफ़े की औसत दर को गिराती है और आर्थिक संकट को जन्म देती है।

मौजूदा वैश्विक और देशव्यापी पूँजीवादी आर्थिक संकट के लिए जो आधारभूत कारक ज़िम्मेदार है वह यही लाभप्रदता का संकट है, जिसके पीछे वास्तव में पूँजी का बढ़ता आवयविक संघटन उत्तरदायी है, लेकिन जिसका ठीकरा पूँजीपति हमेशा की तरह वेतन-वृद्धि पर डालना चाहते हैं, ताकि मज़दूरों की मज़दूरी को न्यूनातिन्यून बनाकर रखा जा सके।

कर्नाटक के पूँजीपतियों का हाई कोर्ट में यह दावा कि उनका मज़दूरी पर “ख़र्चा” बढ़ता जा रहा है सच्चाई से मीलों दूर है। सच तो यह है कि लगातार ही कर्नाटक, तेलंगाना और भारत के अन्य राज्यों में पूँजीपति मज़दूरों को बेहद कम मज़दूरी पर खटा रहे हैं और उनका बस चले तो वे मज़दूरों को मुफ़्त में खटाकर अपना “राष्ट्र-निर्माण” करते रहें! कर्नाटक और तेलंगाना की सरकारों ने जो वेतन-वृद्धि की है वह देश भर में जारी हड़ताल व आन्दोलन के दबाव के चलते हुई है।

हमने देखा कि एक तो यह वेतन वृद्धि सभी मज़दूरों के लिए लागू नहीं होगी और यह नाकाफ़ी भी है। सभी पेशे के मज़दूरों को यह हक़ मिले और न्यूनतम वेतन रु. 30,000 मिले, इसके लिए मज़दूरों को अपनी कमर कसनी होगी। साथ ही, काग़ज़ों पर जो वेतन पारित हुआ है वह वास्तव में लागू हो इसके लिए मज़दूरों को एकजुट होकर संघर्ष करना होगा। साथ ही, आज ज़रूरत है कि कर्नाटक और तेलंगाना ही नहीं बल्कि पूरे देश के मज़दूर उचित मज़दूरी के हक़ के लिए आवाज़ उठाएँ और इसके लिए एक देशव्यापी मज़दूर आन्दोलन खड़ा करें तभी सत्तासीन सरकारें हमारी बात सुनेंगी।

 

मज़दूर बिगुल, जून 2026