Tag Archives: हरियाणा

हरियाणा श्रम विभाग का ‘वर्क स्लिप घोटाला’: भाजपा सरकार के “सुशासन” में लूट का लाइसेंस और मज़दूरों के अधिकारों पर हमला

जाँच में यह भी सामने आया कि 2.21 लाख पंजीकृत मज़दूरों में से सिर्फ़ 14,240 ही वास्तविक पात्र थे। कई इलाक़ों में पूरे के पूरे गाँव ‘फ़र्ज़ी मज़दूरों’ के गाँव बन गये। कन्यादान, बच्चों की शिक्षा, मकान निर्माण और पेंशन जैसी योजनाओं में जमकर बन्दरबाँट हुई। एक-एक फ़र्ज़ी मज़दूर को औसतन ढाई लाख रुपये तक का लाभ दिलाया गया, जबकि असली निर्माण मज़दूर—जो निर्माण स्थलों पर खून-पसीना बहाता है—90 दिन की वेरिफ़िकेशन प्रक्रिया के लिए दफ़्तर-दफ़्तर भटकता रहता है। बिना रिश्वत के उसका काम नहीं होता है। यह व्यवस्था सीधी-सीधी लूट की व्यवस्था है जिसमें आम जनता पर लादे गये करों से वसूले गये सैकड़ों करोड़ रुपये का नुकसान हुआ और असली मज़दूर अपने हक़ से वंचित रह गये।

मनरेगा मज़दूरों की माँग: ‘पूरे साल काम दो, काम के पूरे दाम दो!’

वैसे तो मनरेगा क़ानून के अन्तर्गत 100 दिन के रोज़गार की बात ही अपने आप में इस देश के मज़दूरों और गरीबों के साथ एक भद्दा मज़ाक़ है क्योंकि ‘रोज़गार’ का मतलब ही है रोज़ किया जाने वाला काम। इसलिए असल माँग तो साल के 365 दिन पक्के रोज़गार की गारण्टी की होनी चाहिए। लेकिन अभी तो सरकार अपने द्वारा ही बनाये क़ानून के तहत 100 दिन का रोज़गार देने से भी भाग रही है। आँकड़ों के अनुसार पूरे देश में और कलायत में भी मनरेगा के तहत सालाना औसतन 25–30 दिन का ही काम मिल पाता है। गाँवों में बढ़ती महँगाई के बीच मज़दूरों द्वारा अपने परिवार का गुज़ारा करना कठिन हो गया है। ऐसे में मनरेगा ही देहाती क्षेत्र में मज़दूरों का एक सहारा है, लेकिन सरकारें लगातार इसके बजट और कार्यदिवसों में कटौती कर रही हैं।

हरियाणा रोडवेज़ की 18 दिन चली हड़ताल की समाप्ति पर कुछ विचार बिन्दु

रोडवेज़ के निजीकरण का मतलब है हज़ारों रोज़गारों में कमी करना। केन्द्र सरकार के ही नियम के अनुसार 1 लाख की आबादी के ऊपर 60 सार्वजनिक बसों की सुविधा होनी चाहिए। इस लिहाज़ से हरियाणा की क़रीब 3 करोड़ की आबादी के लिए हरियाणा राज्य परिवहन विभाग के बेड़े में कम से कम 18 हज़ार बसें होनी चाहिए किन्तु फ़िलहाल बसों की संख्या मात्र 4200 है। हम आपके सामने कुछ आँकड़े रख रहे हैं जिससे ‘हरियाणा की शेरनी’ और ‘शान की सवारी’ कही जाने वाली रोडवेज़ की बर्बादी की कहानी आपके सामने ख़ुद-ब-ख़ुद स्पष्ट हो जायेगी। 1992-93 के समय हरियाणा की जनसंख्या 1 करोड़ के आस-पास थी तब हरियाणा परिवहन विभाग की बसों की संख्या 3500 थीं तथा इन पर काम करने वाले कर्मचारियों की संख्या 24 हज़ार थी जबकि अब हरियाणा की आबादी 3 करोड़ के क़रीब है किन्तु बसों की संख्या 4200 है तथा इन पर काम करने वाले कर्मचारियों की संख्या 19 हज़ार ही रह गयी है।

हरियाणा में नगर परिषद, नगर निगम, नगर पालिका के कर्मचारियों की हड़ताल समाप्त

हड़ताल का नेतृत्व नगरपालिका कर्मचारी संघ, हरियाणा ने किया था जोकि जोकि सर्व कर्मचारी संघ, हरियाणा से सम्बन्ध रखता है। 16 दिन की हड़ताल का कुल परिणाम यह निकला की कर्मचारियों की तनख्वाह 11,700 से बढ़ाकर 13,500 कर दी गयी है। पक्का करने की माँग, ठेका प्रथा ख़त्म करने की माँग और समान काम का समान वेतन देनें की माँग पर सरकार ने वही पुराना कमेटी बैठने का झुनझुना कर्मचारी नेताओं को थमा दिया जिसे लेकर वे अपने-अपने घर आ गये। इस चीज़ में कोई दोराय नहीं है कि फ़िलहाली तौर पर मिल रहे संघर्षों के हासिल को अपने पास रख लिया जाये और आगे के संघर्षों की तैयारी की जाये। किन्तु फ़िलहाल और लम्बे समय से देश सहित हरियाणा प्रदेश में भी मज़दूर-कर्मचारी आन्दोलनों में अर्थवाद पूरी तरह से हावी है।

हरियाणा के नगर पालिका, नगर निगम और नगर परिषदों के कर्मचारी हड़ताल पर

ज्ञात हो कि केन्द्र की तरह राज्य स्तर पर भी भजपा ने जनता से लोकलुभावन वायदे किये थे। सरकार बनने के चार साल बाद चुनावी घोषणापत्र गपबाजियों से भरे हुए पुलिन्दे प्रतीत हो रहे हैं। अब जबकि हरियाणा में सरकार को बने हुए 4 साल होने को हैं, तो आम जनता का सरकार की नीतियों और कारगुजारियों पर सवाल खड़े करना लाज़िमी है। भाजपा ने कच्चे कर्मचारियों को पक्का करने, वेतन बढ़ाने, सुविधाएँ देने, हर साल लाखों नये रोज़गार सृजित करने जैसे सैकड़ों वायदे कर्मचारियों से किये थे। किन्तु अब भाजपा के नेता कान में रुई-तेल डालकर सो रहे हैं। किये गये वायदे पूरे करना तो दूर कर्मचारियों के आर्थिक हालात और भी खस्ता करने पर भाजपा सरकार कटिबद्ध दिखायी दे रही है। हर विभाग को धीरे-धीरे ठेकेदारों के हाथों में सौंपा जा रहा है। हरियाणा लोक सेवा चयन आयोग से लेकर तमाम विभागों में घपलों-घोटालों का बोलबाला है। हर जगह की तरह हरियाणा में नगर निगम, नगर पालिका और नगर परिषद के तहत आने वाले सफ़ाई कर्मचारियों के हालात सबसे खस्ता हैं।

आईएमटी रोहतक की आइसिन कम्पनी के मज़दूरों के संघर्ष की रिपोर्ट

स्थानीय प्रशासन, स्थानीय नेताओं, श्रम विभाग के छोटे से लेकर बड़े अधिकारियों यानी हर किसी के दरवाज़े पर मज़दूरों ने दस्तक दी, किन्तु न्याय मिलने की बजाय हर जगह से झूठे दिलासे ही मिले। अब मज़दूर आबादी को तो हर रोज़ कुआँ खोदकर पानी पीना पड़ता है, तो कब तक धरना जारी रहता! आख़िरकार क़रीब 3 महीने के धरने-प्रदर्शन के बाद आइसिन के मज़दूरों का आन्दोलन क़ानूनी रूप से केस-मुक़दमे जारी रखते हुए धरने के रूप में ख़त्म हो गया। ज़्यादातर ठेके, ट्रेनी और अन्य मज़दूर काम की तलाश में फिर से भागदौड़ के लिए मजबूर हो गये। कम्पनी में ठेके पर नयी भर्ती फिर से कर ली गयी और उत्पादन बदस्तूर जारी है। अब कोर्ट-कचहरी में मज़दूरों को कितना न्याय मिला है, सामने है ही; और आइसिन के श्रमिकों को कितना मिलेगा, यह भी सामने आ ही जायेगा। और देर-सवेर कोर्ट के माध्यम से कुछ होता है तो भी ‘देरी से मिलने वाला न्याय’; न्याय नहीं समझा जा सकता!

हरियाणा में धर्मनिरपेक्षता के मूल्यों की उड़ रही धज्जियाँ

70 साल की आज़ादी के बाद भी जिस देश (तमाम प्राकृतिक साधन-सम्पन्न) में क़रीब 30 करोड़ नौजवान बेरोज़गार हों और वहाँ रोज़गार कोई मुद्दा ही ना हो और मीडिया दिन-रात हिन्दू-मुस्लिम की फ़ालतू बहस में टाइम पास करता रहे, आये दिन किसान आत्महत्या करते हों, आधी से ज़्यादा महिलाओं में ख़ून की कमी हो तो इस देश के नौजवानों को तय करना है कि वे कैसा समाज चाहते हैं!

राजनीतिक-आर्थिक-सामाजिक क्रान्ति को अलग-अलग करके देखना अवैज्ञानिक है

आर्थिक शोषण सामाजिक उत्पीड़न के ऐतिहासिक सन्दर्भ व पृष्ठभूमि को बनाता है और सामाजिक उत्पीड़न बदले में आर्थिक शोषण को आर्थिक अतिशोषण में तब्दील करता है। यही कारण है कि 10 में से 9 दलित-विरोधी अपराधों के निशाने पर ग़रीब मेहनतकश दलित होते हैं और यही कारण है कि मज़दूर आबादी में भी सबसे ज़्यादा शोषित और दमित दलित जातियों के मज़दूर होते हैं। आर्थिक शोषण और सामाजिक उत्पीड़न के सम्मिश्रित रूपों को बनाये रखने का कार्य शासक वर्ग और उसकी राजनीतिक सत्ता करते हैं। यही कारण है कि इस आर्थिक शोषण और सामाजिक उत्पीड़न को ख़त्म करने का संघर्ष वास्तव में पूँजीपति वर्ग की राजनीतिक सत्ता के ध्वंस और मेहनतकशों की सत्ता की स्थापना का ही एक अंग है।

शहीद ऊधमसि‍ंह पार्क में शहीदों के सपनों को पूरा करने का संकल्प लि‍या

7 वर्ष की आयु के बाद उधम सिंह का पालन पोषण अनाथालय में हुआ लेकिन जलियांवाला हत्याकाण्ड का बदला लेकर देश का दाग धोने के जुनून में वो अपनी तमाम बाधाओं को पार करते हुए लंदन तक पहुंचे और वहां पर माइकल ओ डायर को ढेर किया। और इसी जुनून ने प्रेमचन्द की लेखनी को निरंतर गतिमान रखा।

राष्ट्रीय अनुसूचित-जाति आयोग का भी दलित-विरोधी चेहरा उजागर हुआ

दलि‍त-उत्पीड़न इस घटना का संज्ञान लेते हुए राष्ट्रीय अनुसूचि‍त आयोग के सदस्य ईश्वर सिंह ने गांव के दौरे के दौरान दोषि‍यों को सजा दि‍लवाने का आश्वासन दि‍या था। लेकि‍न पि‍छले डेढ़ माह की कार्रवाई के बाद एससी/एसटी आयोग का भी दलि‍त वि‍रोधी चेहरा उजागर हो गया है। पहले तो आयोग द्वारा पहली सुनवाई की तारीख को परि‍वार को देर से सूचि‍त कि‍या गया ताकि ‍पुलि‍स-प्रशासन मामले को समझौते में नि‍पटा दे जैसा कि‍प्राय: हरि‍याणा में दलि‍त उत्पीड़न की घटना में होता है। इस कारण हरि‍याण पुलि‍स बार-बार परि‍वार के बयान लेने के बहाने चक्‍कर लगवाती रही ताकि ‍परि‍वार-जन थककर मुआवजा लेकर शांत बैठ जायें। लेकि‍न परि‍वार-जन और अखि‍ल भारतीय जाति‍वि‍रोधी मंच ने ऋषि‍पाल के न्याय के संघर्ष के सख्त कदम उठाने की ठान रखी थी, इसलि‍ए पुलि‍स-प्रशासन का प्रयास असफल रहा। इसके बाद एससी/एसटी आयोग ने दूसरी सुनवाई पर परि‍वार-जन, मामले की जाँच कर रहे पुलि‍स अधि‍कारि‍यों को तलब कि‍या। परि‍वार-जन को उम्मीद थी कि देश की राजधानी के एससी/एसटी आयोग में न्याय मि‍लेगा। लेकि‍न एससी/एसटी आयोग हरि‍याणा के ईश्वर सिंह ने एकतरफा सुनवाई में परि‍वार को दोषी पुलि‍सकर्मियों पर से केस वापस लेने के लि‍ए डराया-धमकाया और मुआवज़ा वापस लेने की धौंस जमाई। आयोग के सदस्य ईश्वर सिंह की बदनीयत का इस से भी पता चलता है कि ‍उन्होंने सुनवाई में दलि‍त परि‍वार की क़ानूनी मदद के लि‍ए आये वकील को भी बाहर कर दि‍या। वैसे हरि‍याणा में वि‍पक्ष पार्टी होने के कारण कांग्रेस से जुड़े नेता ईश्वर सिंह भाणा गाँव के दौरे में लम्बी-चौडी़ बातें कर रहे थे लेकि‍न आयोग के बन्द कमरे में नेता जी ने बता दि‍या कि वह भी पुलि‍स-प्रशासन और दबंगों के साथ हैं।