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वीबी-ग्रामजी: रोज़गार की गारण्टी या ग्रामीण मज़दूरों के अधिकारों में कटौती

सरकारी आँकड़ों के अनुसार, जुलाई 2026 में वीबी-ग्रामजी के तहत केवल 7.67 करोड़ व्यक्ति-दिवस रोज़गार पैदा हुआ, जबकि जुलाई 2025 में मनरेगा के तहत 15.33 करोड़ व्यक्ति-दिवस रोज़गार मिला था। व्यक्ति-दिवस का मतलब है—एक व्यक्ति को एक दिन का मिला रोज़गार। यानी एक साल में रोज़गार में क़रीब 50 प्रतिशत की भारी गिरावट आयी है। सरकार भले ही नयी योजना को ‘गारण्टी’ और ‘विकास’ के नाम से प्रचारित करे, लेकिन ज़मीन पर सवाल यह है कि जब रोज़गार ही घट रहा है तो यह कैसी रोज़गार गारण्टी है?

मज़दूर दिवस का संकल्प: लड़कर लेंगे सारे हक़! हरियाणा के कलायत ब्लॉक में साझा कार्यक्रम

1 मई, मज़दूर दिवस के संकल्प को लेकर हरियाणा के कलायत ब्लॉक में मज़दूर-कर्मचारी संगठनों द्वारा साझा कार्यक्रम आयोजित किया गया। मज़दूर दिवस पर आयोजित इस कार्यक्रम में मज़दूर आन्दोलन की चुनौतियों और प्रतिरोध पर एक हॉल मीटिंग की गयी। कार्यक्रम में सर्व कर्मचारी संघ, क्रान्तिकारी मनरेगा मज़दूर यूनियन, आँगनवाड़ी, आशा और मिड-डे मील यूनियनों ने भागीदारी की।

मनरेगा मज़दूरों की माँग: ‘पूरे साल काम दो, काम के पूरे दाम दो!’

वैसे तो मनरेगा क़ानून के अन्तर्गत 100 दिन के रोज़गार की बात ही अपने आप में इस देश के मज़दूरों और गरीबों के साथ एक भद्दा मज़ाक़ है क्योंकि ‘रोज़गार’ का मतलब ही है रोज़ किया जाने वाला काम। इसलिए असल माँग तो साल के 365 दिन पक्के रोज़गार की गारण्टी की होनी चाहिए। लेकिन अभी तो सरकार अपने द्वारा ही बनाये क़ानून के तहत 100 दिन का रोज़गार देने से भी भाग रही है। आँकड़ों के अनुसार पूरे देश में और कलायत में भी मनरेगा के तहत सालाना औसतन 25–30 दिन का ही काम मिल पाता है। गाँवों में बढ़ती महँगाई के बीच मज़दूरों द्वारा अपने परिवार का गुज़ारा करना कठिन हो गया है। ऐसे में मनरेगा ही देहाती क्षेत्र में मज़दूरों का एक सहारा है, लेकिन सरकारें लगातार इसके बजट और कार्यदिवसों में कटौती कर रही हैं।