कुम्भ में भगदड़ : भाजपा के फ़ासीवादी प्रोजेक्ट की भेंट चढ़ी जनता
चन्द्रप्रकाश
इलाहाबाद में कुम्भ मेले में 29 जनवरी को हुई भगदड़ ने फ़ासीवादी भाजपा के बर्बर अमानवीय चेहरे को एक बार फिर उजागर कर दिया है। प्रशासन द्वारा दिये गये आँकड़ों के मुताबिक़ इस भगदड़ में 54 लोग मारे गये हैं लेकिन सोशल मीडिया और कई अन्य यूट्यूब चैनलों पर वायरल चश्मदीदों के वीडियो देखें तो अन्दाज़ा लगाया जा सकता है कि यह संख्या कुछ सौ से लेकर कुछ हज़ार तक भी हो सकती है। लगभग 1800 लोगों के लापता होने की ख़बर प्रशासन द्वारा दी जा रही है। लेकिन सच्चाई यह है कि इस भयंकर हादसे में मरने वालों की वास्तविक संख्या का शायद ही कभी पता चल पायेगा।
वास्तव में 29 जनवरी को भगदड़ की घटना के बाद से ही पूरा प्रशासनिक तन्त्र मीडिया मैनेजमेण्ट में लग गया था। इसे इस तथ्य से ही समझा जा सकता है कि झूँसी के ऐरावत द्वार पर हुई भगदड़ जो संगम नोज पर हुई भगदड़ से कहीं ज़्यादा भयंकर थी, उसकी ख़बर लोगों तक दो दिन बाद यूट्यूब चैनलों के माध्यम से पहुँची। चश्मदीदों के मुताबिक़ भगदड़ के बाद प्रशासन ने वहाँ से कई ट्रक मलबा हटाया, जिसमें अनुमान लगाया जा रहा है कि बहुत से मृतकों के शव भी रहे होंगे। लेकिन इस पूरी घटना पर प्रशासन न केवल चुप्पी साधे रहा बल्कि वीडियो के वायरल होने के बाद इससे अनभिज्ञ होने और जाँच करने की नौटंकी करता है। एक भयावह तथ्य यह भी है कि वायरल वीडियो में जिस चश्मदीद लड़की द्वारा इस पूरी घटना के बारे में बताया जा रहा है, ख़बर है कि वह भी उसके बाद से लापता है। फ़ासीवादी प्रशासनिक मशीनरी द्वारा भाजपा सरकार के चेहरे पर पड़े ख़ून के छींटे साफ़ करने के लिए ऐसे चश्मदीदों को ठिकाने लगाये जाने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।
इतना ही नहीं, उसी दिन एक बाबा की गाड़ी से कुचलकर छः श्रद्धालुओं की मौत हो गयी लेकिन यह ख़बर भी इस बर्बर-रक्त सने दृश्य में खोकर रह गयी। ग़ौरतलब है कि दुर्घटना के तत्काल बाद से ही तमाम भाजपा नेता संवेदनहीनता की सारी हदें तोड़ते हुए एक तरफ़ इसे ‘छोटी-मोटी घटनाएँ’ बताने में लगे हैं। बागेश्वर बाबा जैसे लोग मरने वालों को मोक्ष मिलने की बात कहके इस पूरे हादसे की भयावहता का बर्बर मज़ाक बनाने में लगे हैं। वहीं दूसरी ओर प्रशासन इस बर्बर हादसे के पीछे किसी साज़िश की खोज़ करने में लगा है और इसका ठीकरा भाजपा के विरोधियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के सिर पर फोड़ने की कोशिश की जा रही है।
वास्तव में पूरे कुम्भ मेले को ही भाजपा सरकार ने अपने फ़ासीवादी प्रचार के कार्यक्रम में तब्दील कर दिया था। मेले में भीड़ दिखाने के लिए तमाम रास्तों को ब्लॉक कर दिया गया और कई-कई किलोमीटर पहले ही बैरिकेडिंग कर दी गयी। आये दिन फ़िल्मी सितारों से लेकर नेताओं-मन्त्रियों और अडानी जैसे धनपशुओं के आगमन पर रास्तों का डायवर्जन किया जा रहा है। इलाहाबाद शहर के लोगों तक को अपने रोज़मर्रा के कामों के लिए कई-कई किलोमीटर तक पैदल चलना और बिना वजह की बैरीकेडिंग में फँसना-जूझना पड़ रहा है। घण्टों जाम लगना हर दिन की बात बन चुकी है। इन तमाम क़वायदों के ज़रिये करोड़ों लोगों के कुम्भ में पहुँचने का शोर मचाया गया। प्रधानमन्त्री मोदी से लेकर मुख्यमन्त्री योगी और पूरा भाजपा और संघ परिवार लोगों को कुम्भ में आने के लिए आमन्त्रित कर रहा था ताकि लोगों की बड़ी संख्या को इकट्ठा किया जा सके और इस अवसर को अपनी फ़ासीवादी राजनीति की ‘दिव्य और भव्य’ छवि लोगों के दिमाग़ में पैठाने के लिए इस्तेमाल किया जा सके। लगातार अल्पसंख्यकों के विरुद्ध बयानबाज़ी और कुम्भ में उनके आने पर तरह-तरह की चेतावनी और धमकियाँ देकर साम्प्रदायिक उन्माद का माहौल बनाया जा रहा था। संघ के तमाम अनुषंगी संगठन कहीं हिन्दू राष्ट्र का नया संविधान बनाने तो कहीं किसी और तरीक़े से साम्प्रदायिक ज़हर उगलने में लगे थे ताकि यहाँ पहुँचने वाली आबादी के दिलो-दिमाग़ में ज़हर घोला जा सके।
दूसरी तरफ़ इस महाकुम्भ में ‘वीआईपी श्रद्धालुओं’ के लिए अलग इन्तज़ाम किये गये थे। यानी एक तरफ़ जहाँ जनता को जितनी आफ़त और मुसीबत पार करके संगम पहुँचना पड़ रहा था, वहीं दूसरी कथित वीआईपी श्रद्धालुओं और पैसे वालों के लिए पूरा प्रशासन पलक पाँवड़े बिछाकर खड़ा था। ऐसे वीआईपी श्रद्धालुओं के तमाम इण्टरव्यू भी इण्टरनेट पर घूम रहे हैं जहाँ वह किसी तरह की असुविधा न होने और योगीजी/मोदीजी द्वारा बहुत अच्छा इन्तज़ाम करने की बातें कर रहे हैं। इन धनपशुओं के लिए कुम्भ को सजाने और दुनिया की सबसे बड़ी टेण्ट सिटी ‘महाकुम्भ नगर’ बसाने के लिए इलाहाबाद से लेकर देश के कई राज्यों के 50,000 से ज़्यादा मज़दूरों से बेहद कम मज़दूरी पर दिन-रात काम कराया गया। सबसे ज़्यादा शोषण की शिकार महिलाएँ रहीं, जिन्हें बहुत कम मज़दूरी पर खटाया गया। कई जगहों पर नाबालिग़ बच्चे भी अपने माता-पिता के साथ काम कर रहे थे। इनमें से अधिकांश मज़दूर आसपास के झुग्गी बस्तियों के बाशिन्दे थे। लेकिन सरकार ने कुम्भ शुरू होते ही इन झुग्गी बस्तियों को ढकने के लिए लोहे की चद्दरों की लम्बी और ऊँची दीवार खड़ी कर दी। इन बस्तियों में पार्किंग और सड़क बनाने के नाम प्रशासन द्वारा ज़बरदस्ती कई घरों पर बुलडोजर चला दिया गया था। ‘दिव्य कुम्भ भव्य कुम्भ’ के उन्मादी प्रचार के बीच इन झुग्गियों में रहने वाले हज़ारों परिवार बिजली, पानी, शौचालय और जीवन की बुनियादी ज़रूरतों के भयंकर अभाव से जूझ रहे हैं और नारकीय जीवन जीने को मज़बूर हैं। पाखण्ड के ऐसे अश्लील और निर्लज्ज प्रदर्शन की शायद ही कोई मिसाल देखने को मिलेगी।
बर्बरता की बहुत-सी कहानियों का तो कोई सुराग ही नहीं है। 11 जनवरी को कुम्भ में पाइपलाइन बिछाने का काम कर रहे एक बीमार नाबालिग़ मज़दूर की लगातार काम लिए जाने और समय पर समुचित इलाज़ ना मिल पाने की वजह से मौत हो गयी।
लतीफपुर गाँव का रहने वाला गोरेलाल अपने बूढ़े माँ-बाप का इकलौता लड़का था। इस भीषण ठण्ड में बिना सुरक्षा उपकरणों और काम की बेहद कठिन परिस्थितियों के कारण वह ठण्ड की चपेट में आ गया था। ठण्ड लगने की वजह से बीमार इस मज़दूर का इलाज करवाने के बजाय कुम्भ में ठेकेदारों ने उससे दिन-रात काम करवाया जिसके कारण वह काम के दौरान ही बेहोश होकर गिर पड़ा और कुछ समय बाद उसकी मौत हो गयी। ठेकेदार के इस कुकर्म को छिपाने के लिए पुलिस ने शव को छिपा दिया और परिजनों को बिना सूचना दिये लाश को जला दिया।
इसी तरह इसके पहले कुम्भ की तैयारी के दौरान सरायइनायत के जगबन्धन गाँव में हाइटेंशन तार खींचने के दौरान टावर के गिरने से 7 मज़दूर बुरी तरह घायल हो गये थे। जिसमें सलीम नाम के एक मज़दूर का पैर भी कट गया था और अन्य 6 लोग ( कासिम, अब्दुल, अनिरुद्ध, आमिर, पुतुल शेख़, छुट्टन) बुरी तरह घायल हो गये थे। लेकिन इन्हें न ढंग का इलाज़ मिला और न ही कोई मुआवज़ा। ऊपर लिखे नामों को पढ़कर साफ़ पता लगाया जा सकता है कि कुम्भ को सजाने और छोटे से लेकर बड़े इन्तज़ाम करने वाले हिन्दू-मुस्लिम दोनों धर्मों के मज़दूर ही हैं। लेकिन जनता के बीच आपसी नफ़रत पैदा करने और कुम्भ के आयोजन मजदूरों-मेहनतकशों के खून धब्बे छिपाने के लिए साम्प्रदायिक उन्माद फैलाने की मुहिम चलायी जा रही है।
31 दिसम्बर को नासिर नामक आईडी से कुम्भ में बम धमाका करने की धमकी को टीवी मीडिया में “हिंदुओं के ख़िलाफ़ मुसलमानो के जिहाद” के रूप में पेश किया गया। बाद में पता चला किया यह आरएसएस से जुड़ा आयुष नाम का एक नौजवान था जो नासिर के नाम से आईडी बनाकर नफ़रत फैला रहा था।
इस ज़हर को फैलाने में मीडिया और भाजपा-संघ परिवार कितने योजनाबद्ध ढंग से काम कर रहा है, इसे समझने के लिए उत्तर प्रदेश सरकार के सूचना एवं जनसम्पर्क विभाग के निदेशक शिशिर द्वारा कुम्भ के प्रसारण हेतु जारी गाइडलाइंस को पढ़ा जा सकता है। यह गाइडलाइन नहीं बल्कि एक तरह का फ़रमान है कि मीडिया खबरों को किस तरह प्रोजेक्ट करें जिससे सरकार का प्रचार हो और चुनाव के लिए नफ़रत की फ़सल बोयी जा सके।
योगी सरकार द्वारा 70 स्टोरी की एक सूची भेजी गयी है जिसमें बताया गया है कि क्या कवर करना है? किनका साक्षात्कार लेना है? हेडलाइंस और थीम की स्टोरी क्या होगी? यानी कौन-कौन सी ख़बरें किस रूप में मीडिया चैनल द्वारा दिखायीं और अखबारों में छापी जायेंगी? आदि।
‘जूना अखाड़ा: विश्वासघात से उभरना’, ‘नागा साधु: सनातन धर्म की आरक्षित सेना …. जिसने मुगलों को चौंका दिया’ नामक थीम में मुगलों के ख़िलाफ़ युद्धों और झड़पों में उनकी भागीदारी के बारे में बताया गया है। इस थीम को इसलिए रखा गया है ताकि गोदी मीडिया इससे मुसलमानों के ख़िलाफ़ नफ़रती स्टोरी तैयार कर सके। पिछले कुछ दिनों से कुम्भ के बारे में झूठ की बुनियाद पर खड़ी जिस तरह की उन्मादी खबरें आ रहीं इससे इस बात को आसानी से समझा जा सकता है।
थीम 27 में कहा गया है कि कुम्भ में स्नान करने के कारण मानव को होने वाले स्वास्थ्य लाभ ने वैज्ञानिकों को चकित कर दिया। इस थीम के तहत महाकुम्भ को मीडिया में विज्ञान के ऊपर आध्यात्म की विजय के रूप में दिखाया जा रहा है और इसी सिलसिले में आईआईटी वाले बाबा का खूब प्रचार किया जा रहा है कि उन्होंने लाखों की सैलरी वाली नौकरी छोड़कर भौतिकता के बजाय अध्यात्म का रास्ता अपना लिया। लेकिन वहीं दूसरी तरफ़ भारत के आईआईटी संस्थानों से पास 38 फ़ीसदी छात्र बेरोज़गारी में धक्के खा रहे है और रोज़गार पाने वाले अधिकांश नौजवान बेहद कम वेतन में काम करने को मज़बूर हैं। कोटा जैसे शहरों में NEET और JEE की तैयारी करने वाले छात्रों की बड़े पैमाने पर आत्महत्याएँ हो रही हैं। इस पर गोदी मीडिया चुप्पी साध कर बैठी है।
थीम 22 रोज़गार के मुद्दों से ही जुड़ी है जिसकी हेडलाइन है – “रोज़गार भरमार : महाकुम्भ की महिमा अपरम्पार”। इसमें कहा गया है कि मीडिया चैनल्स इस बात को दिखाएँ कि कुम्भ के आयोजन से किस तरह लाखों लोगों को रोज़गार मिला और किस तरह भाजपा सरकार के कार्यकाल में भारी मात्रा में नौजवानों को रोज़गार दिये गये हैं। लेकिन जिन्हें 2-3 महीने के लिए कुम्भ में काम मिला भी है क्या वे दो तीन महीनों में कुम्भ ख़त्म होने के बाद भूसा खाकर जिन्दा रहेंगे? “महाकुम्भ नगर” को बसाने और मेले में जिन्हें काम मिला भी है उनका वेतन बेहद कम है, सफाई करने वाले कर्मचारी बताते हैं कि उनसे 12-14 घण्टे काम कराया जाता है जिसके लिये वेतन 8 से 10 हजार ही है यानी एक दिहाड़ी मजदूर से काफ़ी कम, और ऊपर से ठेकेदारों द्वारा उसमें से भी कुछ पैसे काट लिए जाते हैं। बिना कोई सुरक्षा उपकरण मुहैया कराये काम कराये जाने और ठण्ड से बचने के लिए कोई समुचित इन्तज़ाम न होने के कारण लगातार ये मज़दूर बीमार हो रहे हैं। नाबालिग़ गोरेलाल की मौत इसका एक उदाहरण भी है।
महाकुम्भ में आम जनता की स्थिति और पैसों का खेल
सरकार द्वारा जारी फ़रमान और अपने गोदी चरित्र के अनुसार गोदी मीडिया कुम्भ की प्रशंसा के पुल बाँध रही है लेकिन ज़मीनी हक़ीक़त कुछ और ही है। मोदी-योगी की तस्वीरों के साथ जगह-जगह लगे बैनरों-पोस्टरों में सामाजिक समता और समरसता की बड़ी-बड़ी बातें लिखीं हैं लेकिन भारतीय समाज के वर्गीय ढाँचे के आधार पर कुम्भ में टेण्ट का भी वर्गीकरण किया गया है। ग़रीबों के लिए अलग, मध्यवर्गीय आबादी के लिए अलग और धन्नासेठों के लिए अलग। कल्पवास तथा लोगों के रुकने ठहरे के लिए बनाये गये टेण्ट्स के ज़रिये सरकार और कई निजी कम्पनियाँ मोटा मुनाफ़ा कमा रही हैं। इन लक्जरी टेण्ट में एक रात रुकने के लिए 12000 से लेकर 100000 तक वसूले जा रहे हैं।
मीडिया में ज़ोर-शोर से प्रचार किया जा रहा है कि आम आबादी के लिए निःशुल्क टेण्ट्स की व्यवस्था है लेकिन उनके क्या हालात हैं, इसको मीडिया नहीं बताता। अधिकतर शौचालय भयंकर रूप से गन्दे हैं, किसी टेण्ट में पानी नहीं है तो कहीं बिजली नहीं पहुँच रही है। शौचालय की ख़राब स्थिति और बिजली न होने आदि कई मुद्दों को लेकर सेक्टर 7 और 8 में 15 जनवरी को लोगों ने प्रदर्शन भी किया था। उनकी शिकायत थी कि अमीरों और नेताओं के लिए उच्च कोटि के टेण्ट और आम आबादी के लिए खराब टेण्ट लगाये गये हैं। सरकार का यह रवैया बेहद भेदभाव वाला है।
ठण्ड से बचने के लिए सरकार की तरफ से कोई समुचित इन्तजाम न होने की वजह से हज़ारों लोग खुले में ज़मीन पर रात गुजारने को मज़बूर हैं जिसके कारण लोग बीमार भी पड़ रहे हैं। मीडिया द्वारा कुम्भ में बनाये गये अस्पतालों का ख़ूब बखान किया जा रहा है। लेकिन वहाँ दवा-इलाज़ को समुचित इन्तज़ाम नहीं है। लोगों की शिकायत है कि वहाँ भी भेदभाव किया जा रहा है। संघ व भाजपा से जुड़े व अधिकारियों-नेताओं के सम्पर्क के लोगों और धन्नासेठों के इलाज़ का इन्तज़ाम तत्काल कर दिया जा रहा है लेकिन ग़रीबों और वहाँ काम करने वाले मज़दूरों को इलाज पाने काफ़ी दिक्कत झेलनी पड़ रही है और लेट-लतीफ़ी का शिकार होना पड़ रहा है। बहुतों को इलाज़ भी नहीं मिला पा रहा है।
एक तो पहले ही भारत के अस्पतालों में चिकित्सकों की भारी कमी है दूसरा इलाहाबाद व आसपास के ज़िलों के अस्पतालों से चिकित्सकों की ड्यूटी कुम्भ में लगने की वजह से अन्य अस्पतालों में जाने वाले मरीज़ों को इलाज़ नहीं मिल पा रहा है क्योंकि वहाँ डॉक्टर्स की संख्या काफ़ी कम हो गयी है।
यह बात समझने वाली है कि इस महाकुम्भ में सरकार हज़ारों करोड़ का ख़र्च “हिन्दुओं को पाप से मुक्ति” दिलाने के लिए नहीं बल्कि वोट बैंक की राजनीति और धन्नासेठों-कारोबारियों-ठेकेदारों के मोटे मुनाफ़े के लिए कर रही है। इलाहाबाद और उत्तर प्रदेश ही नहीं, दिल्ली, हरियाणा, बिहार, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, पंजाब और राजस्थान से लेकर देश के अलग-अलग इलाकों में महाकुम्भ के इश्तेहार के बड़े-बड़े बैनर-पोस्टर लगाये गये हैं। इसमें मोदी और भाजपा के अन्य नेताओं की तस्वीरें लगी हैं। ये पोस्टर बैनर लोगों को कुम्भ आने के लिए आमन्त्रित कर रहे हैं।
दरअसल कुम्भ जैसे धार्मिक मेलों में भारी भीड़ इकट्ठा होने के पीछे लोगों की धार्मिक भावनाओं के अलावा मीडिया चैनल और संघ काडरों द्वारा महाकुम्भ में जाने को लेकर अपने आप को “सच्चा हिन्दू” साबित करने का प्रचार प्रसार भी है।
भारत में पुनर्जागरण प्रबोधन का कोई सुसंगत और व्यवस्थित कार्यभार पूरा न होने तथा भारत में पूँजीवाद का विकास क्रान्तिकारी रास्ते से न होने की वजह से भारत में समाज में पुरानी मूल्य-मान्यताएँ बनी हुई है। जनवाद और विज्ञान-तर्कणा की ज़मीन बेहद कमजोर होने तथा धार्मिक रूढ़ियों और अन्धविश्वासों के बने होने का फ़ायदा यह फ़ासीवादी ताक़तें उठाती हैं।
ऐसे किसी भी धार्मिक आयोजन में सरकार की भूमिका केवल व्यवस्था और प्रबन्धन की हो सकती है, लेकिन फ़ासीवादी भाजपा सरकार यहाँ आयोजक बनी बैठी है और ऐसी अपनी फ़ासीवादी मुहिम को आगे बढ़ाने के लिए एक प्रोजेक्ट के तौर पर इस्तेमाल कर रही है। आज ज़रूरत है कि भाजपा और संघ परिवार के इस फ़ासीवादी प्रोजेक्ट की सच्चाई को लोगों तक पहुँचाया जाये और लोगों को उनकी ज़िन्दगी के असली सवालों पर लामबन्द किया जाये।
मज़दूर बिगुल, फरवरी 2025
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