जब तक इंसानों के हाथों इंसानों का शोषण जारी रहेगा, तब तक मार्क्स के क्रान्तिकारी विचार शासक वर्गों को दु:स्वप्न देते रहेंगे
पूँजीवादी संकट एक दोहरी सम्भावना को जन्म देते हैं: पूँजीवाद से बेहतर एक न्यायपूर्ण और समानतामूलक व्यवस्था की स्थापना यानी समाजवाद की स्थापना या फिर पूँजीवादी व्यवस्था द्वारा पैदा विनाश का उत्तरोत्तर बर्बरता, यानी प्रतिक्रियावाद, तानाशाही, युद्ध और तबाही, की ओर जाना। एक क्रान्तिकारी वैज्ञानिक के तौर पर इन दोनों सम्भावित नतीजों की पहचान ज़रूरी है। लेकिन हमारा क्रान्तिकारी आशावाद हमें यह भी बताता है कि प्रबल सम्भावना यह है कि ऐसी बर्बरता की मंज़िल पूर्ण हो, इससे पहले दुनिया भर की मेहनतकश जनता उठ खड़ी होगी और समाज को एक क्रान्तिकारी परिवर्तन की ओर ले जायेगी, वह पूँजीवाद को दुनिया को तबाह नहीं करने देगी।























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