‘इण्टरनेशनल’ के रचयिता के 135वें स्मृति दिवस पर
यूजीन पोतिए : उनकी पच्चीसवीं बरसी के अवसर पर
लेनिन
पिछले साल, 1912 के नवम्बर में, फ़्रांसीसी मज़दूर कवि, सर्वहारा वर्ग के प्रसिद्ध गीत, “इण्टरनेशनल” (“उठ जाग, ओ भूखे बन्दी,” आदि) के लेखक यूजीन पोतिए की मृत्यु को हुए पच्चीस वर्ष पूरे हो गये। (उनकी मृत्यु 1887 में हुई थी।)
उनके इस गीत का सभी यूरोपीय तथा अन्य भाषाओं में अनुवाद हो चुका है। कोई भी वर्ग चेतन मज़दूर चाहे जिस देश में वह पहुँच जाये, क़िस्मत उसे चाहे जहाँ ढकेलकर ले जाये, भाषा-विहीन, नेत्र-विहीन, अपने देश से दूर कहीं वह चाहे जितना अजनबी महसूस करे – “इण्टरनेशनल” (मज़दूरों के अन्तर्राष्ट्रीय गीत) की परिचित टेकों के माध्यम से वह वहाँ अपने लिए साथी और मित्र ढूँढ़ सकता है।
तमाम देशों के मज़दूरों ने अपने सर्वप्रमुख योद्धा, सर्वहारा कवि के इस गीत को अपना लिया है और उसे सर्वहारा वर्ग का विश्वव्यापी गीत बना दिया है।
और, इसलिए आज सभी देशों के मज़दूर यूजीन पोतिए की स्मृति का सम्मान करते हैं। उनकी पत्नी और पुत्री जीवित हैं और जिस तरह इण्टरनेशनल के लेखक ने अपना सारा जीवन ग़रीबी में बिताया था, उसी तरह वे भी ग़रीबी में रह रही हैं। यूजीन पातिये का जन्म 4 अक्टूबर 1816 को पेरिस में हुआ था। जब उन्होंने अपना पहला गीत लिखा तब उनकी उम्र चौदह वर्ष की थी। उस गीत का शीर्षक था : “स्वतंत्रता चिरजीवी हो!” 1848 में पूँजीपति वर्ग के साथ मज़दूरों की जब वह महान लड़ाई छिड़ी तब एक योद्धा के रूप में वह बैरीकेडों पर मौजूद थे।
पोतिए का जन्म एक ग़रीब परिवार में हुआ था और अपना सारा जीवन वह एक सर्वहारा ही बने रहे। अपनी रोटी कमाने के लिए एक पैकर के रूप में वह काम करते थे। बाद में वह कपड़ों पर नमूनों को उतारने का काम करने लगे थे।
1848 के बाद से फ़्रांस के जीवन में जितनी भी बड़ी घटनाएँ घटीं, उनका साथ पोतिए ने अपने जुझारू गीतों से दिया था। अपने इन गीतों के द्वारा पिछड़े हुए लोगों की चेतना को उन्होंने जागृत किया था, मज़दूरों का एकताबद्ध होने के लिए आह्वान किया था, और फ़्रांस के पूँजीपति वर्ग और उसकी पूँजीवादी सरकारों की खिल्ली उन्होंने उड़ाई थी।
महान पेरिस कम्यून (1871) के दिनों में वह उनके एक सदस्य चुने गये थे। चुनाव में जो छत्तीस सौ मत पड़े थे उनमें से उन्हें तैंतीस सौ बावन मिले थे। कम्यून की, सर्वहारा वर्ग की उस प्रथम सरकार की सभी गतिविधियों में उन्होंने भाग लिया था।
कम्यून के पतन के बाद पोतिए को इंग्लैंड और बाद में अमेरिका भाग जाना पड़ा। उनके प्रसिद्ध गीत ‘इण्टरनेशनल” की रचना जून 1871 में, आप कह सकते हैं कि मई की रक्तरंजित पराजय के अगले दिन हुई थी।
कम्यून को कुचल दिया गया किन्तु पोतिए के “इण्टरनेशनल” ने उनके विचारों को पूरे संसार में फैला दिया है और आज वह पहले कभी से भी अधिक ज़िन्दा हैं।
1876 में, देश से निष्कासित अवस्था में पोतिए ने एक कविता लिखी थी, “अमेरिका के मेहनतकशों का फ़्रांस के मेहनतकशों के नाम सन्देश”। इसमें उन्होंने बताया था कि पूँजीवाद के जुवे के नीचे मज़दूरों का जीवन कैसा होता है। उन्होंने उसमें उनकी ग़रीबी, उनकी कमरतोड़ मेहनत, उनके शोषण, और अपने लक्ष्य की भावी विजय के प्रति उनके दृढ़ विश्वास का विवरण प्रस्तुत किया था।
कम्यून के नौ वर्ष बाद पोतिए फ़्रांस लौट आये थे। वहाँ तुरन्त वह मज़दूरों की पार्टी में शामिल हो गये थे। उनकी कविताओं का प्रथम खण्ड 1884 में प्रकाशित हुआ था और “क्रान्तिकारी गीत” के शीर्षक से उनकी रचनाओं का दूसरा खण्ड 1887 में छपा था।
मज़दूर कवि द्वारा रचे गये अनेक दूसरे गीत उनकी मृत्यु के बाद प्रकाशित हुए।
8 नवम्बर 1887 को पेरिस के मज़दूर यूजीन पोतिए के अवशेषों को पेरे लाशेज की उसी क़ब्रिस्तान में दफ़नाने के लिए ले गये थे, जिसमें उन कम्यूनार्डों (कम्यून के वीरों) के शेषांशों को दफ़न किया गया था, जिनकी हत्या की गयी थी। शव-यात्रा से लाल झण्डे को छीन लेने की कोशिश में पुलिस ने भीड़ पर बर्बर हमला किया। उनकी शव-यात्रा में नगर के विशाल जनसमुदाय ने भाग लिया। सभी दिशाओं से “पोतिए चिरजीवी हों!” के नारे गूँज रहे थे।
पोतिए ग़रीबी की हालत में मरे। किन्तु, वह एक ऐसा स्मारक छोड़ गये हैं, जो वास्तव में मनुष्य द्वारा रची गयी किसी भी चीज़ से अधिक स्थायी है। गीतों के माध्यम से प्रचार करने वाले महानतम लोगों में से एक वह थे। जिस समय उन्होंने अपना पहला गीत रचा था, उस समय मज़दूर समाजवादियों की संख्या अधिक से अधिक दसियों में गिनी जाती थी। अब यूजीन पोतिए के ऐतिहासिक गीत को करोड़ों मज़दूर जानते हैं।
प्रावदा, अंक 2,
सम्पूर्ण ग्रन्थावली, खण्ड 36, पृष्ठ 223-224
3 जनवरी, 1913
मज़दूर बिगुल, नवम्बर 2022













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