झूठे व खोखले जुमलों के अलावा भाजपा घरेलू कामगारों को कुछ नहीं दे सकती!
बिगुल संवाददाता
सभी पूँजीवादी चुनावों में तमाम पूँजीवादी चुनावबाज़ पार्टियाँ मज़दूरों-मेहनतकशों को लुभाने के नये-नये हथकण्डे अपनाती रहती हैं । इस बार दिल्ली विधानसभा में भाजपा ने अपनी “फ्री रेवड़ियों” से मतदाताओं को खूब लुभाने की कोशिश की। भाजपा ने दिल्ली में अपनी चुनावी पारी शुरू करने के लिए तमाम जुमले फेंके। महिलाओं को 2500₹ देने का वायदा करना, कभी ग़रीब जनता को ‘अटल कैण्टीन’ के तहत 5 रुपये में भरपेट खाना देना, बुढ़ापा पेन्शन योजना दोबारा शुरू करने जैसे तमाम गुलाबी सपने भाजपा दिल्ली की जनता को दिखा रही थी। इस जुमलों की दौड़ कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के नेता भी पीछे नहीं थे और भाजपा को पूरी तरह टक्कर दे रहे थे।
इसी कड़ी में भाजपा ने कुछ “वायदे” घरेलू कामगारों से भी किये, जो मज़दूर वर्ग के सबसे ज़्यादा शोषित, दमित और उत्पीड़ित हिस्सों में से एक हैं। भाजपा अपने घोषणापत्र में घरेलू कामगारों से “सम्मान” और “सुरक्षा” की बात कर रही थी और निम्नलिखित माँगे चुनाव जीतने पर लागू करने की बात कर रही थी :
1) घरेलू कामगारों के लिए 10 लाख का जीवन बीमा।
2) 5 लाख का दुर्घटना बीमा।
3) घरेलू कामगारों के बच्चों के लिए छात्रवृति।
4) 6 महीने का वेतन सहित मातृत्व अवकाश।
इन चार वायदों के आधार पर भाजपा दिल्ली में मौजूद लाखों घरेलू कामगारों का वोट हासिल करना चाहती थी। यह कुछ वैसे ही वायदे है जो भाजपा ने 2014 में सत्ता में आने से पहले किये थे। साथ में एक सवाल बनता ही है कि चुनाव के समय ही भाजपा को घरेलू कामगारों की याद क्यों आयी? इसका जवाब भी आसान है: ताकि उनका वोट लिया जा सके। केन्द्र में तो भाजपा की सरकार 10 सालों से मौजूद है। तो फिर इस मोदी सरकार ने पिछले 10 सालों में ऐसी योजना एक कानून बनाकर देश भर में लागू क्यों नहीं की? इन घोषणाओं की भी बात करें तो अगर भाजपा जीत भी जाती है तो इसे लागू नहीं करेगी। भाजपा की केन्द्र और साथ ही राज्य सरकारों का अब तक का ट्रैक रिकॉर्ड ही ऐसा है : मुँह फाड़कर वायदे करो, लेकिन उसे कभी लागू न करो! और बार-बार किये जाने वाले इस धोखे और वायदा-ख़िलाफ़ी का कुछ बुनियादी कारण भी हैं।
इसका सबसे पहला कारण यह है कि भाजपा असल में धन्नासेठों, कोठी मालिकों और पूँजीपतियों की पार्टी है, जो स्वयं घरेलू कामगारों के सबसे बड़े शोषक और उत्पीड़क हैं। आज मज़दूर वर्ग की सबसे बड़ी दुश्मन भाजपा ही है क्योंकि यह पूँजीपति वर्ग की फ़ासीवादी पार्टी है। ज़ाहिर है कि इसका यह अर्थ नहीं कि पूँजीपतियों के ही दम पर चलने वाली अन्य पूँजीवादी पार्टियाँ मसलन कांग्रेस, सपा, बसपा, राजद, आप और संशोधनवादी पार्टियाँ मसलन सीपीआई, सीपीएम, सीपीआई एमएल लिबरेशन मज़दूर वर्ग और मेहनतकशों की मित्र हैं; वे भी पूँजीपति वर्ग के ही किसी न किसी हिस्से की सेवा करती हैं। लेकिन एक फ़ासीवादी पूँजीवादी पार्टी के रूप में मज़दूर वर्ग के सबसे बर्बर, नंगे दमन और पूँजीपतियों की सबसे बेशर्म तरीक़े से सेवा करने का काम भाजपा के समान अन्य कोई धन्नासेठों की पार्टी आज नहीं कर सकती है, जब पूँजीपति वर्ग मन्दी से बिलबिला रहा है। यही भाजपा है जो मज़दूरों के सभी श्रम क़ानून ख़त्म कर चार लेबर कोड ला रही है, जिसके बाद मज़दूरों को लूटना और आसान हो जायेगा। चार लेबर कोड लागू होने के बाद महिलाओं से भी रात की शिफ्ट में भी काम करवाया जायेगा। ऐसी पार्टी से घरेलू कामगार क्या किसी ऐसे क़दम की उम्मीद कर सकती हैं, जो उनके लिए कल्याणकारी और लाभप्रद हो?
दूसरी बात, छात्रवृत्ति, जीवन बीमा और दुर्घटना बीमा की बात भी लफ़्फ़ाज़ी के अलावा कुछ नहीं है। आज सबके लिए निःशुल्क व समान शिक्षा और निःशुल्क बेहतर अस्पताल होने चाहिए ताकि हर इन्सान की बुनियादी ज़रूरतें पूरी हो सकें। इसके उलट भाजपा निजीकरण की हिमायती है, जिससे पूँजीपतियों को फ़ायदा पहुँचाया जा सके। इसलिए भाजपा के यह सारे वायदे ख्याली पुलाव की तरह हैं। घरेलू कामगारों की असल माँग यानी मज़दूर का दर्जा देने की बात भाजपा नहीं करेगी, अन्य मज़दूरों की तरह घरेलू कामगारों के लिए भी क़ानून बने यह बात भाजपा नहीं करेगी। वह तो अन्य मज़दूरों के लिए श्रम कानूनों का सफ़ाया करने पर तुली है, तो घरेलू मज़दूरों को मज़दूर का कानूनी दर्जा देकर उनके लिए श्रम कानून क्या लायेगी? इसलिए भाजपा के वायदों पर किसी भी घरेलू कामगार साथी को यक़ीन नहीं करना चाहिए।
भाजपा घरेलू कामगारों के “मान सम्मान” का कितना ख़्याल रखती है इसका अन्दाज़ा इसी से लगाया जा सकता है जब भाजपा, झारखण्ड के महिला मोर्चे की नेता सीमा पात्रा ने 29 वर्षीय घरेलू कामगार को बुरी तरीके से बेल्ट और रॉड से पीटा था, नतीजतन घरेलू कामगार को अस्पताल में भर्ती करवाना पड़ा था। यह केवल एक उदाहरण है। भाजपा के तमाम नेता आये दिन घरेलू कामगारों का उत्पीड़न और अपमान करने के लिए सुर्खियों में आते रहते हैं। इसकी वजह है: फ़ासीवादी मज़दूरों को इन्सान मानते ही नहीं हैं। वे उन्हें जानवर या अपना पालतू समझते हैं। यही वजह है कि इस तरह के बर्बर मामलों में सबसे ज़्यादा भाजपा के नेता व समर्थक ही फँसते हैं। न जाने कितनी घटनाएँ सोशल मीडिया या अख़बारों तक पहुँच भी नहीं पाती है।
दिल्ली के चुनावों में भाजपा अपनी नैया पार लगाने के लिये घरेलू कामगारों के लिए भी जुमले फेंक रही थी। अब भाजपा की सरकार दिल्ली में तमाम चुनावी जोड़-तोड़, चुनावी घपलों, चुनाव आयोग के जादुई स्पर्श और आम आदमी पार्टी की नालायकी और जनविरोधी हरक़तों से पैदा हुए गुस्से के कारण जीत चुकी है। दिल्ली में हम घरेलू कामगारों की संख्या लगभग 8 लाख है, इसलिए हमें लुभाने के लिए तमाम घोषणाएँ की जा रही थीं। भाजपा भी कर रही थी व अन्य पूँजीवादी पार्टियाँ भी कर रही थीं। बता दें कि किसी भी भाजपा शासित राज्य में सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद भी घरेलू कामगारों के लिए कोई भी क़ानून नहीं बनाया गया है, यहाँ तक कि हमें मज़दूर का दर्ज़ा तक नहीं दिया गया। इसलिए दिल्ली में भी भाजपा घरेलू कामगारों के लिए कुछ नहीं करने वाली है।
अब जबकि दिल्ली में भाजपा की सरकार बन चुकी है तो घरेलू कामगारों को किये गये वायदों के सवाल पर घरेलू कामगारों को भाजपा सरकार को घेरना होगा और जवाबदेही लेनी होगी। लड़कर ही हम अपने हक़ हासिल कर सकते हैं।
मज़दूर बिगुल, फरवरी 2025
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