सूरत में साप्ताहिक छुट्टी, वेतन बढ़ोत्तरी और आठ घण्टे के काम की माँग को लेकर आन्दोलनरत हैं मज़दूर!
इन मज़दूरों से 15-18 हज़ार के मासिक वेतन पर जानवरों की तरह काम कराया जाता है। 12 घण्टे फ़ैक्टरी के भीतर काम करने के बाद 3-4 घण्टे घर आने-जाने में लग जाते हैं। इसके बाद न तो शरीर को आराम मिल पाता है और न पर्याप्त भोजन। बेहतर शिक्षा और चिकित्सा जैसी बुनियादी सुविधाएँ भी दूर की कौड़ी हैं। फैक्टरी, कारखाने में श्रम कानून लागू नहीं होते हैं। टेक्सटाइल मज़दूरों का कहना है कि काम के पीक सीज़न के दौरान मालिक मन-मुताबिक काम करवाता है और मना करने वाले मज़दूरों को काम से निकाल दिया जाता है। मजबूरन लोगों को दिन-रात जानवरों की तरह खटना पड़ता है। ये हालात सिर्फ़ गुजरात के मज़दूरों के नहीं हैं। देशभर में कमोबेश यही हालात हैं और पिछले 12 सालों में मेहनतकश आबादी की ज़िन्दगी और नारकीय हुई है। श्रम क़ानूनों के ज़रिये जो थोड़े-बहुत अधिकार मज़दूर हासिल कर पाते थे उसे भी भाजपा सरकार ने छीनने का काम किया है।























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