Category Archives: बुर्जुआ मीडिया / संस्कृति

नोएडा में हुई हिंसा के मसले पर तमाम अख़बारों और मीडिया चैनलों में ‘मज़दूर बिगुल’ के ख़िलाफ़ लगातार झूठी, ग़लत व भ्रामक खबरें फैलायी जा रही हैं। ‘मज़दूर बिगुल’ इन तमाम झूठी, बेबुनियाद और ग़लत ख़बरों को सिरे से खारिज करता है और ऐसे झूठे व भ्रामक आरोपों का खण्डन करता है।

‘जहाँ तक नोएडा में हुई घटना की जाँच का मामला है, हमें यूपी पुलिस की विश्वसनीयता पर बिल्कुल भी भरोसा नहीं है। हमारा मानना है कि यूपी पुलिस इस मसले की निष्पक्ष जाँच कर ही नहीं सकती है। इस धारणा के पर्याप्त सबूत यूपी पुलिस ने खुद ही अपनी कारगुज़ारियों के ज़रिये पिछले दिनों में दिए हैं! इसलिए हम मांग करते हैं कि तमाम साक्ष्यों की उच्च स्तरीय न्यायिक तथा फॉरेसिक जाँच हो और इस पूरे मामले को ही उच्च स्तरीय न्यायिक जाँच हो।

भाजपा और आरएसएस के झूठे प्रचार से सावधान!!

‘ऑपइण्डिया’ ने मज़दूर बिगुल के ख़िलाफ़ एक झूठा प्रचार करते हुए वीडियो पोस्ट किया जिसमें ‘ऑपइण्डिया’ यह दावा कर रहा है कि मज़दूर बिगुल ने हिंसा करवायी या हिंसा करने के लिए कहा। ‘ऑपइण्डिया’ के ग़लत इरादे से किये गये इस झूठे प्रचार के ख़िलाफ़ मज़दूर बिगुल ने उन्हें एक क़ानूनी नोटिस भेजा है और आगे की सख़्त क़ानूनी कार्यवाई कर रहा है।

मज़दूरों का जीवन तो मीडिया में कहीं दिखता ही नहीं था, अब उनकी मौत भी ‘ख़बर’ नहीं रही

नागपुर ही नहीं, देशभर में लगातार कारख़ानों में हो रही दुर्घटनाओं में मज़दूरों की मौतें हो रही हैं। हर साल हज़ारों मज़दूर अपनी जान गँवा देते हैं या बुरी तरह घायल होते हैं। इसकी ज़िम्मेदारी पूरी तरह कारख़ाना मालिकों की होती है जो सुरक्षा उपायों पर पैसे और समय ख़र्च करके अपने मुनाफ़े में ज़रा भी कमी नहीं आने देना चाहते। उनके लिए यह फ़ालतू का ख़र्च है क्योंकि मज़दूर का श्रम और उसकी जान सस्ते में उपलब्ध है। उनके टुकड़ों पर पलने वाले सरकारी अफ़सर और नेता भी उन हत्याओं के लिए उतने ही ज़िम्मेदार हैं जो इस अँधेरगर्दी को देखकर आँखें मूँदे रहते हैं। लेकिन दिनभर टुच्ची और मसालेदार ख़बरें और नफ़रती प्रचार में डूबे टीवी चैनलों के लिए यह रिपोर्ट करने का मसला नहीं है।

‘एप्सटीन फ़ाइल्स’: पूँजीवाद की सड़ांध और गलाज़त को बेनक़ाब करता और दुनियाभर के शासक वर्गों की “नैतिकता” और “आदर्शों” की कलई खोलता सबसे बड़ा काण्ड

‘एप्सटीन फ़ाइल्स’ के उजागर होने से यही बात साबित होती है कि पूँजीवाद में मानव शरीर, मुख्यतः मेहनतकश वर्ग की स्त्रियों और यहाँ तक की मासूम बच्चियों का शरीर, महज़ श्रम शक्ति के लिए ही शोषित नहीं होता, बल्कि विलासिता की वस्तुओं के तौर पर भी उसका उपभोग किया जाता है। यह पूँजीवाद का वह घिनौना सच है, जिसे महज़ एक साइड इफ़ेक्ट नहीं कहा जा सकता। बल्कि यह तो इसका एक अनिवार्य लक्षण है।

अडाणी की लूट उजागर करने पर स्वतन्त्र पत्रकारों को नोटिस – अब देश को बेधड़क लूट रहे धनकुबेरों का नाम लेना भी गुनाह!

आज जिस स्तर पर भाजपा खुले आम पूँजीपतियों के लिए काम कर रही है, यह किसी से शायद ही छिपा हो। ऐसे में थोड़ी-सी सच्चाई भी जनता को पता चलना सत्ता में बैठे फ़ासीवादियों को गवारा नहीं है। लोग पहले ही महँगाई, बेरोज़गारी, महँगी शिक्षा, महँगी स्वास्थ्य सेवाओं आदि जैसे मुद्दों से परेशान हैं। भाजपा और संघ की लाख कोशिशों के बावजूद हिन्दू–मुस्लिम, मन्दिर–मस्जिद, हिन्दुस्तान–पाकिस्तान जैसे नकली मुद्दे बड़ा रूप अख़्तियार नहीं कर पा रहे हैं। इसके उलट, बिहार में अडाणी को सस्ते दर पर ज़मीन देने, गडकरी के बेटे के एथेनॉल घोटाले से लेकर वोट चोरी का मामला छिपाये नहीं छिप रहा है। ऐसे में रही-सही मीडिया की आज़ादी इनके गले में हड्डी बन रही है।

स्वतंत्र पत्रकारिता पर हो रहे फ़ासीवादी हमलों के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाओ!

बीते दिनों न्यूज़क्लिक व न्‍यूज़लॉण्‍ड्री के दफ़्तर पर आयकर विभाग की छापेमारी हुई। कहने को तो आयकर विभाग इन न्यूज़ चैनलों के यहाँ “सर्वे” के लिए पहुँचा था लेकिन यह कैसा सर्वे था जिसमें आयकर विभाग इन न्यूज़ चैनलों की वित्तीय रिपोर्ट निकालने के बजाय वहाँ काम कर रहे लोगों के फ़ोन और लैपटॉप ज़ब्त कर रहा था? उनकी निजी जानकारियाँ इकट्ठा कर रहा था?

टीआरपी घोटाला: पूँजीवादी मीडिया का नंगा रूप

वैसे तो मीडिया को लोकतंत्र का चौथा खम्भा कहा जाता है लेकिन जो लोकतंत्र आम मेहनतकश जनसमुदाय के ख़ून-पसीने की कमाई को हड़प कर ही अस्तित्वमान रह सकता हो और अपने ख़िलाफ़ उठने वाले हर जनवादी आवाज़ को पुलिस-प्रशासन के दम पर कुचलने पर आमादा हो, ऐसे लोकतंत्र का हर खम्भा जनता के सीने में बेरहमी से धँसा होता है। इससे मीडिया भी अछूता नहीं है। मीडिया का पूरा खेल पूँजी के इर्द-गिर्द चलता है।

पूँजीपतियों के टुकड़खोर मीडिया के मुक़ाबले जनता का वैकल्पिक मीडिया खड़ा करना होगा

नशे की ख़ुराक बाँट रहे पूँजीपतियों के मीडिया के मुक़ाबले जनता का वैकल्पिक मीडिया खड़ा करना होगा – वृषाली भारतीय मीडिया ने यूँ तो पिछले कुछ वर्षों में ज़्यादा खुले…

इलेक्ट्रोनिक व सोशल-मीडिया पर चल रहे कारनामे

किसी नेता के भाषण में आये लोगों की भीड़ को फ़ोटोशॉप द्वारा कई गुना बढ़ा-चढ़ाकर दिखाना। किसी नेता के भाषण या पार्टी की रैलियों के वीडियो को एडिट करके और प्रभावशाली बनाके पेश करना। विरोधियों के वाक्यांश को इस तरह से काट-छाँट कर पेश करना जिससे कि वे लोगों के मन में नकारात्मक प्रभाव डाले। इनके अलावा भी बहुत तरह से वे इन कामों को अंजाम देते हैं जिसके लिए 10 से 12 लाख तक की सालाना तनख्वाह देकर वे अपनी कम्पनी के लिए एनालिस्ट के पोस्ट पर इंजीनियर्स को रखते हैं। हमारे पहचान का एक बीटेक का छात्र है जिसने ऐसी ही एक कम्पनी में इण्टर्नशिप (ट्रेनिंग) की थी। उस समय वे लोग 2014 के लोकसभा चुनाव के लिए भारतीय जनता पार्टी के लिए काम कर रहे थे।

सिर पर छत की ख़ातिर नैतिकता की नीलामी के लिए मजबूर लोग

इस सर्वेक्षण में 2,040 लोगों ने हिस्सा लिया और 28% लोगों ने माना कि वे आर्थिक तंगी के कारण मकान का किराया नहीं दे सकते, इस कारण उनको अपने साथी, दोस्त, मकान मालिक के साथ यौन संबंधों में रहना पङता है। एक और सर्वेक्षण के अनुसार बेघरों के लिए काम करने वाली संस्था होमलैस चैरिटी ने एक रिपोर्ट जारी की कि होमलैस सर्विस इस्तेमाल करने वाले लोगों की ओर से रिपोर्ट की गयी कि वह बेघरी के डर से असहमत यौन संबंध में रहते हैं। इस रिपोर्ट में ना सिर्फ औरतें बल्कि मर्द भी शामिल हैं।