मानेसर की कई फैक्टरियों में मज़दूरों स्वतः स्फूर्त हड़ताल जारी!
मानेसर की कई फैक्टरियों में मज़दूरों स्वतः स्फूर्त हड़ताल जारी! मानेसर में मुंजाल शोवा, रिचा, सत्यम जैसी कम्पनियों के बाद आज कई अन्य फैक्टरियों में हड़ताल शुरू हो गयी है।…
मानेसर की कई फैक्टरियों में मज़दूरों स्वतः स्फूर्त हड़ताल जारी! मानेसर में मुंजाल शोवा, रिचा, सत्यम जैसी कम्पनियों के बाद आज कई अन्य फैक्टरियों में हड़ताल शुरू हो गयी है।…
मज़दूरों के संघर्ष के दवाब के कारण बढ़ा हरियाणा में न्यूनतम वेतन! आन्दोलन के दबाव में हरियाणा सरकार को मज़दूरों के लिए न्यूनतम मज़दूरी बढ़ाने की घोषणा करनी पड़ी! गुड़गाँव-मानेसर…
नोएडा औद्योगिक क्षेत्र में रिचा एक्सपोर्ट कम्पनी के मज़दूरों ने पूरे फैक्टरी क्षेत्र की गलियों में घूमते हुए रैली निकाली और सभी मज़दूरों से इस हड़ताल में शामिल होने का…
गुड़गाँव-मानेसर के हड़ताल की लपटें पहुॅंची नोएडा तक! नोएडा के फेज़ 2 के रिचा ग्लोबल में अपनी जायज़ माँगों को लेकर हुई हड़ताल की शुरुआत! मानेसर में जारी हड़ताल की…
रिचा कम्पनी के मज़दूरों की हड़ताल का दूसरा दिन। हर ज़ोर जुल्म की टक्कर में, संघर्ष हमारा नारा है! वेतन बढ़ोतरी की मांग को लेकर पूरे गुड़गांव–मानेसर पट्टी के मज़दूर…
गुड़गांव- मानेसर में उठी वेतन बढ़ोतरी और मज़दूरों के जायज़ हक-अधिकारों की लड़ाई अब पूरे गुड़गांव, बिनौला, धारूहेड़ा और बावल सहित ऑटोमोबाइल और एक्सपोर्ट क्षेत्रों में फैल रही है। मज़दूरों…
ईरान पर अमेरिका-इज़रायल का यह हमला एक बार फिर साबित करता है कि जब तक साम्राज्यवादी- पूँजीवादी व्यवस्था क़ायम रहेगी, तब तक मानवता को विनाशकारी युद्धों और असीम पीड़ा का सामना करना पड़ेगा। पश्चिम एशिया, विशेषकर ईरान, अपने तेल और गैस संसाधनों के कारण अमेरिकी सैन्य आक्रामकता का शिकार बना हुआ है। इराक, सीरिया और यमन पहले ही इन युद्धों से तबाह हो चुके हैं, और अब ईरान को भी अस्थिरता की ओर धकेला जा रहा है। हालाँकि ईरान की जवाबी कार्यवाई को देखकर अब अमेरिका और इज़राइल को हर बीतते दिन के साथ यह बात स्पष्ट होती जा रही है कि ईरान इराक़ या वेनेज़ुएला नहीं है और यह साम्राज्यवादी युद्ध ख़ुद अमेरिकी साम्राज्यवाद के लिए काफी मंहगा साबित हो रहा है।
भारत सरकार का पक्ष शुरू से ही फ़िलिस्तीनी आवाम के मुक्ति-संघर्ष के समर्थन में रहा है मगर भाजपा के सत्तासीन होने के बाद से फ़िलिस्तीन के प्रति इनके रुख में काफ़ी तेज़ी से बदलाव आया है। नरेन्द्र मोदी इज़रायल का दौरा करने वाले पहले प्रधानमंत्री बन चुके हैं। जहाँ वह एक तरफ़ अरब देशों के विदेश मंत्रियों को फ़िलिस्तीन के प्रति भारत के समर्थन का भरोसा दिलाते हैं, वहीं दूसरी ओर इज़रायल के साथ उनकी प्रगाढ़ होती मित्रता किसी से छुपी हुई नहीं है और अब तो वह इज़रायल के भ्रमण पर भी जा रहें है। यह पूरी तरह साफ़ है कि भाजपा की केन्द्र सरकार ने इज़रायल को अन्तरराष्ट्रीय समर्थन देकर उसके नरसंहार को परोक्ष रूप से जायज़ ठहराया है। यह फ़िलिस्तीन की जनता की पीठ में छुरा घोंपने के समान है। भले ही कागजों पर वे फ़िलिस्तीनी राज्य का समर्थन करने का ढोंग करते हों लेकिन ये ढोंग अन्तरराष्ट्रीय मंच पर अपनी छवि बचाने की एक खोखली और शर्मनाक कोशिश मात्र हैं। यह एक बार फिर मोदी सरकार के दोमुँहें और अवसरवादी चरित्र को बेनकाब करता है।
बड़े पैमाने पर सिलेण्डर की कालाबाज़ारी शुरू हो गयी है। अमीर तो पैसे के दम पर ब्लैक में सिलेण्डर हासिल कर ले रहे हैं, लेकिन ग़रीबों के घरों में चूल्हा जलने पर भी संकट आ गया है। प्रवासी मज़दूरों-मेहनतकशों की बड़ी आबादी के पास गैस कनेक्शन नहीं है, इसलिए वे छोटे सिलेण्डरों का इस्तेमाल करते हैं। अब उन्हें मजबूरन 300-400 रुपये किलो गैस ख़रीदना पड़ रहा है। कुछ मज़दूर बस्तियों से लोग पलायन करने को मजबूर हैं। 7 मार्च को सरकार ने घरेलू एलपीजी सिलेण्डर में 60 रुपये और कमर्शियल सिलेण्डर में 115 रुपये बढ़ा दिये।
आज के समय में जब क्रान्तिकारियों के सपनों पर धूल की चादर डाली जा रही है, ऐसे संस्थानों का महत्व पहले से कहीं अधिक बढ़ गया है। नौजवान भारत सभा की विरासत को 100 साल पूरे होने कि इस ऐतिहासिक घड़ी में इस केन्द्र की शुरुआत इस बात का प्रतीक है कि जो मशाल भगतसिंह और उनके साथियों ने जलायी थी वो अभी भी बुझी नहीं है। यह केन्द्र शहीदों के सपनों को पूरा करने की दिशा में एक मील का पत्थर साबित होगा। साथ ही, इस शुरुआत से प्रेरणा लेते हुए जगह-जगह ऐसे संस्थानो के निर्माण की पहल ली जायेगी। आगे सनी ने बात रखते हुए बताया कि कैसे आज से क़रीब दो दशक पहले जब उन्हें इसी स्थान पर शुरू किये गये शहीद भगतसिंह पुस्तकालय के बारे मे पता चला तो वह और उन जैसे ही कई छात्रों ने मिल कर इस मुहिम से जुड़कर इसे आगे बढ़ाने का फैसला लिया था। पुस्तकालय एक ऐसा केन्द्र बनता चला गया जहाँ केवल विचारों का आदान-प्रदान ही नहीं होता था बल्कि वहाँ से पूरे इलाके में लोगों की ज़िन्दगी से जुड़ी समस्याओं के समाधान के लिये पहल ली जाती थी। आज जब हम इस यात्रा के एक नये चरण में प्रवेश कर रहे हैं तो यह भी यहाँ रहने वाले लोगों के संघर्षों का ही परिणाम है। इस संस्थान की एक-एक ईंट जनसहयोग से लगी है। मौजूदा फ़ासीवादी दौर में जब लोगों के सामने नकली दुश्मन खड़ा कर उन्हें असली मुद्दों से गुमराह किया जा रहा है, उन्हें अपने ही हितों के ख़िलाफ़ खड़ा किया जा रहा है तब इस तरह के केन्द्रों की ज़रूरत पहले से कहीं अधिक हो जाती है। सभा में आगे बच्चों ने सामूहिक गीत की प्रस्तुति दी। ‘हम मेहनत करने वाले सब एक हैं’ गीत के ज़रिये हर क़िस्म के भेद मिटा कर सभी मेहनतकश लोगों को एकजुट होने का संदेश दिया।
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