3 तेल कम्पनियों को “नुक़सान” पूर्ति के लिए 11 हज़ार करोड़ की सरकारी मदद
किसी को भी यह लग सकता है कि जनता को पेट्रोलियम उत्पाद सस्ते देने के कारण हुए नुक़सान की पूर्ति के लिए सरकार की तरफ़ से सब्सिडी देना किसी भी तरह से ग़लत नहीं है। लेकिन वास्तव में “घाटा पूर्ति” शब्द जनता को भरमाने का एक शब्द-जाल है। होता यह है कि हर कम्पनी अपने पिछले कारोबार के चक्र के आधार पर मुनाफ़ों का एक लक्ष्य तय करती है और एक चक्र पूरा होने पर जब हिसाब किया जाता है तो जिस चीज़ को वह “नुक़सान” कहते हैं उसका मतलब यह नहीं होता कि उस कम्पनी ने अपने उत्पाद उनकी लागत से कम पर बेचे हैं, बल्कि इसका मतलब यह होता है कि कम्पनी को मुनाफ़ा तो हुआ है लेकिन उतना नहीं जितना वह कमाना चाहती थी और इस पहले से तय लाभ और असली लाभ के बीच के फ़र्क़ को वह “घाटे” का नाम देती है। मिसाल के तौर पर एक कम्पनी 100 करोड़ रुपये निवेश करके 500 करोड़ कमाने का लक्ष्य रखती है, चक्र पूरा होने के बाद उसकी कुल आमदनी 400 करोड़ बनती है तो यह नहीं कहा जाता कि कम्पनी को 300 करोड़ का मुनाफ़ा हुआ बल्कि यह कहा जाता है कि कम्पनी को 100 करोड़ का घाटा पड़ा। यही कुछ तेल कम्पनियों के मामलों में होता है। पहले तो यह तेल कम्पनियाँ जनता की अच्छी तरह से खाल उधेड़कर मोटे मुनाफ़े बटोरती हैं और बाद में सरकार आम जनता से टैक्स के रूप में वसूले पैसे इन कम्पनियों को “घाटा पूर्ति” के नाम पर लुटा देती है। फिर इस भारी ‘सब्सिडी’ की दुहाई देकर तेल और गैस की कीमतें बढ़ाने का खेल शुरू हो जाता है।























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