चुनावी पार्टियों के फ़ण्ड से काले धन को सफ़ेद करने की स्कीम
ये आँकड़े सभी चुनावबाज़ पार्टियों के ‘काले धन’ और ‘भ्रष्टाचार’ की लड़ाई की पोल खोल देते हैं। असल में आज चुनावी पार्टियाँ ही काले धन को सफ़ेद बनाने के कारोबार में एक नायाब तरीक़़ा है। इससे एक तीर से दो निशाने सध जाते हैं। एक ओर काला धन सफ़ेद हो जाता है, दूसरी ओर पूँजीपति घराने अपना निवेश बेहद समझदारी से करते हैं ताकि हर पाँच साल में होने वाले चुनाव में चाहे कोई भी पार्टी सत्ता में आये वो नीतियाँ अपने आका पूँजीपति घरानों के लिए ही बनाये। ऐसे में जब भी चुनावी पार्टियों के ‘काले धन’ ‘पारदर्शिता’ की बात आती है तो ये तमाम चोर-चोर मौसेरे भाई एक हो जाते हैं, यह एकता दरअसल इनकी वर्ग प्रतिबद्धता के कारण है, मतलब यह कि ये सभी चुनावबाज़ पार्टियाँ मज़दूर-ग़रीब किसान विरोधी नीति बनाने से लेकर पूँजीपतियों को क़ुदरती सम्पदा और मानवीय श्रम लूटाने में एक हैं।






















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