बिगुल मज़दूर दस्ता और दिशा छात्र संगठन की ओर से नोएडा में मज़दूर कार्यकर्ताओं को उत्तर प्रदेश पुलिस द्वारा अगवा किये जाने के विरोध में बनारस के शास्त्री घाट पर प्रदर्शन कर ज्ञापन सौंपा गया।
गुड़गाँव (हरियाणा) के रिको ऑटो इण्डस्ट्रीज़ के कम्पनी गेट के पास ‘मज़दूर बिगुल’ अख़बार का वितरण अभियान चलाया गया
गुड़गाँव (हरियाणा) के रिको ऑटो इण्डस्ट्रीज़ के कम्पनी गेट के पास ‘मज़दूर बिगुल’ अख़बार का वितरण अभियान चलाया गया बिन हवा न पत्ता हिलता है! बिन लड़े न कुछ भी…
दिल्ली के करावल नगर इलाक़े में क्रान्तिकारी अख़बार ‘मज़दूर बिगुल’ का प्रचार अभियान चलाया गया
दिल्ली के करावल नगर इलाक़े में क्रान्तिकारी अख़बार ‘मज़दूर बिगुल’ का प्रचार अभियान चलाया गया दिल्ली के करावल नगर इलाक़े में क्रान्तिकारी अख़बार ‘मज़दूर बिगुल’ का प्रचार अभियान चलाया गया।…
बजा बिगुल मेहनतकश जाग! चिंगारी से लगेगी आग!! बिगुल मज़दूर दस्ता के सदस्यों द्वारा शाहबाद डेरी ( दिल्ली ) में चलाया गया ‘मज़दूर बिगुल’ अख़बार का प्रचार अभियान
बजा बिगुल मेहनतकश जाग! चिंगारी से लगेगी आग!! बिगुल मज़दूर दस्ता के सदस्यों द्वारा शाहबाद डेरी ( दिल्ली ) में चलाया गया ‘मज़दूर बिगुल’ अख़बार का प्रचार अभियान। 19 अगस्त…
4 जुलाई, शुक्रवार को दक्षिण दिल्ली के कुसुमपुर पहाड़ी में मज़दूर बिगुल अख़बार की हॉकिंग की गयी और डोर-टू-डोर अभियान चलाया गया
दक्षिण दिल्ली के कुसुमपुर पहाड़ी में मज़दूर बिगुल अख़बार की हॉकिंग की गयी और डोर-टू-डोर अभियान चलाया गया बजा बिगुल मेहनतकश जाग! चिंगारी से लगेगी आग!! 4 जुलाई, शुक्रवार को…
उजाले के दरीचे – क्रांतिकारी गीतों का संग्रह
विहान आपके बीच आया है एक अंधेरे समय में अंधेरे के बारे में सच्चाइयां बयान करते और उजाले की उम्मीदों के गीतों काे लेकर, जिन्दगी की तकलीफों और जद्दोजहद के…
तमाम तिलचट्टे, छछून्दर और चूहे बदहवास क्यों भाग रहे हैं इधर-उधर?
कोविशील्ड वैक्सीन बनाने वाली कम्पनी का मालिक अदार पूनावाला लन्दन भाग गया। वह कह रहा है कि भारत में उसकी जान को ख़तरा था। अब वह यूरोप में ही वैक्सीन बनाने की बात कर रहा है। पूनावाला को सरकार ने वैक्सीन बनाने के लिए सारे सरकारी नियमों में ढील देकर 3000 करोड़ रुपये का अनुदान दिया था और कहा था कि यह वैक्सीन जनता को मुफ़्त दी जायेगी। अब पूनावाला इसे सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रतिष्ठानों को 400 रुपये और निजी अस्पतालों को 600 रुपये में बेच रहा था।
क्या आतंकवाद वाक़ई देश और दुनिया की सबसे बड़ी समस्या है?
अख़बारों और टीवी चैनलों से लेकर सोशल मीडिया तक में अक्सर आतंकवाद का मुद्दा छाया रहता है। टीवी स्टूडियो और अख़बारों के सम्पादकीय पृष्ठों पर देश के नामी-गिरामी रक्षा विशेषज्ञ और रिटायर्ड पुलिस अधिकारी व नौकरशाह हमें बताते हैं कि आतंकवाद देश की सबसे बड़ी समस्या है। हमें बताया जाता है कि देश के बाहर और भीतर देश को कमज़ोर करने वाली ताक़तें आतंकी कार्रवाइयाँ अंजाम देने का षडयंत्र रच रही हैं। सरकार भी इन विशेषज्ञों की राय को संजीदगी से लेते हुए हर साल रक्षा बजट में इज़ाफ़ा करती रहती है। लेकिन अगले साल आतंकवाद का मुद्दा और ज़्यादा ज़ोर-शोर से उछलने लगता है और सैन्यबलों के आधुनिकीकरण की माँग पहले से भी ज़्यादा ज़ोर पकड़ने लगती है। सिर्फ़ हमारे ही देश के नहीं, बल्कि दुनियाभर के हुक्मरान आतंकवाद को सबसे बड़ी समस्या और चुनौती के रूप में पेश करते रहे हैं। ये बात दीगर है वे कभी भी आतंकवाद को बढ़ावा देने में ख़ुद की भूमिका की कभी बात नहीं करते।
गीत – नेताओं को न्यौता! / शैलेन्द्र
तुम सेठों के संग पेट जनता का काटो,
तिस पर आज़ादी की सौ-सौ बातें छाँटो।
हमें न छल पायेगी यह कोरी आज़ादी,
उठ री, उठ, मज़दूर-किसानों की आबादी।
आपस की बात :लेखक को बधाई
अगस्तजिस बात ने मुझे सबसे ज़्यादा प्रभावित किया वो है सैद्धान्तिक स्तर पर ज़रा भी समझौता किये बग़ैर विनम्र बने रहना, ज्ञानी होने के अहंकार को पास ना फटकने देना। ‘कम्युनिस्टों’ के अन्दाज़-ए-बयाँ अम्बेडकर के मुद्दे पर हमेशा तिरस्कारपूर्ण रहे हैं, ये लेख बड़ा ही सुखद बदलाव है। जिग्नेश मेवानी में वे सम्भावनाएँ अभी नज़र आती हैं कि जाति तोड़ो आन्दोलन से वर्ग विहीन आन्दोलन की तरफ़ जा सकें, दूसरे रिपब्लिकन तो कब के पतन को प्राप्त हो चुके। अम्बेडकर के मूल्यांकन में ये एहतियात ख़ास तौर से क़ाबिले तारीफ़ है कि कोई अम्बेडकरवादी बिना बिदके कुछ ज़रूर सीख सकता है।






















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