क्रान्तिकारी मज़दूर शिक्षणमाला – 31 : मार्क्सवादी राजनीतिक अर्थशास्त्र के सिद्धान्त  (खण्ड-2)
अध्याय – 5
संचरण का समय और उसकी लागत

अभिनव

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पूँजीवादी उत्पादन और संचरण की प्रक्रिया में समय लगता है। यानी, औद्योगिक पूँजी के जिस सर्किट का हमने पिछले अध्यायों में अध्ययन किया और उसके जिन विभिन्न रूपों की हमने पड़ताल की, उसके घटित होने में समय ख़र्च होता है। हमने देखा था कि अपने सर्किट में औद्योगिक पूँजी तीन रूप धारण करती है (मुद्रा-पूँजी, उत्पादक-पूँजी और माल-पूँजी) और दो क्षेत्रों में अस्तित्वमान होती है (उत्पादन का क्षेत्र और संचरण का क्षेत्र)। यानी, पूँजी अपने सर्किट के दौरान उत्पादन के क्षेत्र और संचरण के क्षेत्र में मौजूद रहती है। इसके आधार पर हम औद्योगिक पूँजी के सर्किट में लगने वाले समय को दो हिस्सों में बाँट सकते हैं: उत्पादन का समय और संचरण का समय। उत्पादन का समय वह समय है जो पूँजी अपने सर्किट के दौरान उत्पादन के क्षेत्र में बिताती है, जबकि संचरण का समय वह होता है जो पूँजी अपने सर्किट के दौरान संचरण के क्षेत्र में बिताती है। संचरण के क्षेत्र में पूँजी अपने सर्किट के दौरान दो कार्रवाइयों को अंजाम देती है: श्रमशक्ति और उत्पादन के साधनों की ख़रीद और फिर उत्पादित माल की बिकवाली। उत्पादन के क्षेत्र में उत्पादक-पूँजी के रूप में पूँजी अपना प्रकार्य पूरा करती है, यानी बेशी-मूल्य का उत्पादन और साथ ही मूल पूँजी-मूल्य व बेशी-मूल्य से लैस उपयोग-मूल्यों यानी माल का उत्पादन।

संचरण के समय पर चर्चा करने पहले मार्क्स उत्पादन के समय पर चर्चा करते हैं। वजह यह कि इसके ज़रिये संचरण के समय पर चर्चा अधिक स्पष्ट बन जाती है।

उत्पादन का समय

उत्पादन के समय के बारे में जो सबसे पहली बात ग़ौर करने वाली है वह यह है कि उत्पादन के पूरे समय के दौरान श्रम-प्रक्रिया जारी नहीं रहती है। यानी इस दौरान श्रमशक्ति का लगातार उत्पादक उपभोग नहीं हो रहा होता है और जीवित श्रम इस दौरान निरन्तर श्रम के उपकरणों का इस्तेमाल कर कच्चे मालों को उपयोग-मूल्यों में तब्दील नहीं कर रहा होता है। दूसरे शब्दों में, उत्पादन के समय के दौरान श्रमशक्ति निरन्तर सक्रिय नहीं होती है। इसमें कुछ रुकावटें भी आती हैं। इन रुकावटों में से कुछ अनिवार्य होती हैं। इन अनिवार्य रुकावटों के दौरान श्रमशक्ति का उत्पादक-उपभोग तो रुका रहता है, लेकिन उत्पादन की प्रक्रिया जारी रहती है। इन रुकावटों के दौरान उत्पादित हो रहे माल पर प्रकृति की शक्तियाँ सक्रिय होती हैं या वे किसी रासायनिक प्रक्रिया से गुज़र रहे होते हैं, मसलन, कुछ मालों के उत्पादन के दौरान उनको सुखाना या उनका किण्वन (सड़ने की प्रक्रिया) से गुज़रना आवश्यक होता है। इस दौरान मज़दूर काम नहीं कर रहे होते क्योंकि इन आवश्यक प्रक्रियाओं से गुज़रने के बाद ही उत्पादन की प्रक्रिया में आगे की श्रम-प्रक्रिया चलायी जा सकती है। पूँजीपति हमेशा यह प्रयास करता है कि उत्पादन के दौरान श्रम-प्रक्रिया में आने वाली इन रुकावटों को अधिकतम सम्भव छोटा बनाया जाय और इसके लिए वह उन्नत तकनोलॉजी का इस्तेमाल करने की भरसक कोशिश करता है। मार्क्स लिखते हैं:

“लेकिन उत्पादन की प्रक्रिया में ही श्रम-प्रक्रिया में आने वाली रुकावटें और इस प्रकार कार्य-अवधि में आने वाली रुकावटें शामिल होती हैं, यानी ऐसे अन्तराल जिनमें श्रम की वस्तु मानवीय श्रम से किसी रूप में संवर्धित हुए बिना, भौतिक प्रक्रियाओं की कार्रवाई के मातहत होती है। उत्पादन-प्रक्रिया और इसलिए उत्पादन के साधनों का प्रकार्य इन मामलों में जारी रहता है, हालाँकि श्रम-प्रक्रिया और इस प्रकार श्रम के साधनों के रूप में उत्पादन के साधनों का प्रकार्य इस दौरान बाधित रहता है। मिसाल के तौर पर यह बोए जाने वाले मक्के, सेलर में किण्वित होने वाली वाइन, या श्रम की ऐसी सामग्रियों पर लागू होता है जो रासायनिक प्रकियाओं के अधीन होती हैं, जैसा कि चर्मशोधन जैसे कई उद्योगों में होता है। यहाँ उत्पादन का समय कार्य-अवधि से ज़्यादा होता है। दोनों के बीच का अन्तर कार्य-अवधि से उत्पादन के समय के ज़्यादा होने में निहित होता है। यह अन्तर हमेशा इस तथ्य पर आधारित होता है कि उत्पादक-पूँजी उत्पादन के क्षेत्र में सुषुप्त अवस्था में मौजूद होती है, जिस दौरान वह उत्पादन-प्रक्रिया में स्वयं सक्रिय नहीं होती है, या यह श्रम-प्रक्रिया में शामिल हुए बिना ही उत्पादन-प्रक्रिया में काम कर रही होती है।” (वही, पृ. 201)

उत्पादन की प्रक्रिया में कुछ व्यवधान अनिवार्य होते हैं, मसलन, वह समय जो उत्पादन के तत्वों की आपूर्ति-निर्माण में ख़र्च होता है। लेकिन ये ऐसे व्यवधान होते हैं, जो उत्पादन के लिए अनिवार्य होते हैं और जिनमें श्रम सक्रिय होता है। जैसे, उत्पादन के तत्वों जैसे श्रम के उपकरणों और कच्चे माल को उत्पादन के स्थान तक पहुँचाना, उनकी लोडिंग-अनलोडिंग आदि। इनमें लगने वाला श्रम उत्पादक श्रम होता है और पूँजीपति इस श्रम के शोषण के ज़रिये भी बेशी-मूल्य का विनियोजन करते हैं।

मार्क्स बताते हैं कि चाहे किसी भी वजह से उत्पादन का समय वास्तविक कार्य-अवधि (जिस दौरान श्रमशक्ति का उत्पादक-उपभोग जारी होता है) से ज़्यादा होता है, पूँजीपति हर हालत में इस अन्तर को न्यूनातिन्यून बनाना चाहता है। वजह यह है कि नया मूल्य उसी समय पैदा होता है, जिस समय श्रमशक्ति अपने उत्पादनउपभोग के ज़रिये जीवित श्रम दे रही होती है। इसलिए ऐसा कोई भी समय जिसमें उत्पादन के साधन श्रमशक्ति के उत्पादक-उपभोग के ज़रिये स्वयं उत्पादक-उपभोग से नहीं गुज़र रहे होते, लेकिन उत्पादन के क्षेत्र में मौजूद होते हैं, पूँजीपति को अखरता है। मार्क्स लिखते हैं:

“उत्पादन के समय के कार्य-अवधि से अधिक होने का कारण चाहे जो भी हो…इनमें से किसी भी मामले में उत्पादन के साधन इस रूप में सक्रिय नहीं होते हैं कि वे श्रम को अपने अन्दर समाहित करें। अगर वे कोई श्रम नहीं सोखते, तो वे कोई बेशी श्रम भी नहीं सोखते। इसलिए उत्पादक-पूँजी का तब तक कोई मूल्य-संवर्धन भी नहीं हो रहा होता, जब तक कि वह अपने आपको उत्पादन के समय के उस हिस्से में पाती है, जो कार्य-अवधि से इतर होता है, चाहे ये व्यवधान मूल्य-संवर्धन की प्रक्रिया को पूरा करने के लिए कितने ही अपरिहार्य क्यों न हों। स्पष्ट है कि उत्पादन का समय और कार्य-अवधि जितने अधिक बराबरी के क़रीब आते जायेंगे, दिये गये कालखण्ड में दी गयी उत्पादक-पूँजी की उत्पादकता और मूल्य-संवर्धन उतना ही ज़्यादा होगा। इसलिए पूँजीवादी उत्पादन की प्रवृत्ति यह होती है कि कार्य-अवधि से उत्पादन का समय जितना बेशी होता है उसे उतना कम किया जाय। लेकिन यद्यपि पूँजी का उत्पादन का समय उसकी कार्य-अवधि से अलग हो सकता है, लेकिन उत्पादन के समय में कार्य-अवधि हमेशा शामिल होती है, और उत्पादन का समय कार्य-अवधि से जितना अधिक होता है, वह उत्पादन-प्रक्रिया की ही पूर्वशर्त होता है। इस प्रकार, उत्पादन का समय हमेशा वह समय होता है जो पूँजी उपयोग-मूल्यों का उत्पादन करने और अपना मूल्य-संवर्धन करने में लगाती है, और इस प्रकार उत्पादक-पूँजी के प्रकार्य पूरा करने में लगाती है, हालाँकि इसमें वह समय भी होता है, जिसमें वह या तो सुषुप्त रहती है या फिर बिना मूल्य-संवर्धित हुए उत्पादन करती है।” (वही, पृ. 202-03)

संचरण का समय

सबसे पहले यह याद रखना आवश्यक है कि मूल्य और इसलिए बेशी-मूल्य केवल उत्पादन के समय में ही पैदा होता है और संचरण के समय में केवल बेचने-ख़रीदने की कार्रवाइयाँ होती हैं। यानी यहाँ पूँजी केवल औपचारिक रूपान्तरणों से गुज़रती है: मालरूप से मुद्रारूप और मुद्रारूप से माल रूप। न तो इस काल में उपयोग-मूल्यों का उत्पादन होता है और न ही मूल्य-संवर्धन। यही वजह है कि पूँजीपति संचरण के समय को अधिक से अधिक छोटा करने का प्रयास करते हैं। स्पष्ट है, जितनी जल्दी पूँजीपति उत्पादन के तत्वों की ख़रीद को पूरा कर उत्पादन शुरू कर सकता है और जितनी जल्दी वह उत्पादित माल को बाज़ार में बेच सकता है, उसके लिए उतना ही बेहतर होता है। वह अपना पुनरुत्पादन जल्दी शुरू कर सकता है और साथ ही पूँजी के टर्नओवर की अवधि छोटी हो जाती है।

टर्नओवर का अर्थ होता है पूँजीपति द्वारा निवेशित मुद्रा-पूँजी का मूल्य-संवर्धित होकर वापस मुद्रा-रूप में उसके हाथों में आना। इसमें लगने वाले समय को टर्नओवर अवधि कहते हैं। पूँजी के दूसरे खण्ड के दूसरे हिस्से में मार्क्स टर्नओवर और पूँजी के मूल्य-संवर्धन की सालाना दर पर उसके प्रभावों को स्पष्ट करते हैं। अभी इतना समझ लें कि यदि पूँजीपति के टर्नओवर की अवधि छोटी है तो उसकी सालाना मुनाफ़े की दर ज़्यादा होगी और यह पूँजीपतियों के लिए काफ़ी मायने रखता है। संचरण के समय को कम-से-कम बनाकर पूँजीपति अपने टर्नओवर की गति को भी बढ़ाने का प्रयास करता है। उसके घटते टर्नओवर काल में भी उत्पादन का समय सापेक्षिक तौर पर घटता रहे और संचरण का समय सापेक्षिक तौर पर बढ़ता रहे, यह हमेशा उसकी कोशिश होती है।

मार्क्स बताते हैं कि साधारण माल उत्पादन (C – M – C) के मामले में माल उत्पादक के लिए संचरण की पहली कार्रवाई ज़्यादा अहम होती है, यानी उसके माल का बिकना (C – M)। इसके बाद, उसके पास मुद्रा होती है, जिसके बदले वह कोई भी माल ख़रीद सकता है। यानी, उसके लिए M – C एक सहज और सुलभ कार्य होता है। लेकिन पूँजीवादी उत्पादन (M – C – M’) के मामले में पूँजीपति के लिए M – C, जो उसके लिए संचरण की पहली कार्रवाई है, इतनी आसान चीज़ नहीं होती है। वजह यह कि वह अपने द्वारा निवेशित की जा रही मुद्रा-पूँजी को वांछनीय मात्रा और अनुपात में उत्पादन के साधनों और श्रमशक्ति में तब्दील कर सके, इसके लिए उपयुक्त स्थितियाँ हमेशा मौजूद नहीं होती हैं। कई बार कोई यन्त्र या कच्चा माल बाज़ार में उपयुक्त मात्रा में मौजूद नहीं होता, तो कभी उत्पादन के लिए आवश्यक श्रमशक्ति का भी अभाव होता है।

इसके अलावा, संचरण की दूसरी कार्रवाई (C’ – M’) तो पूँजीपति के लिए अहम होती ही है क्योंकि इसके बिना उसकी मूल्य-संवर्धित पूँजी वापस मुद्रा-रूप में उसके पास नहीं आती। उसका उत्पादित माल स्वयं उसके लिए कोई उपयोग-मूल्य नहीं होता और उसका मुद्रा-रूप में तब्दील होना, यानी उसका बिकना पूँजीपति के लिए अनिवार्य होता है। इसके बिना, वह अपने पुनरुत्पादन की प्रक्रिया को जारी नहीं रख सकता है। इस कार्रवाई को सम्पन्न करने के लिए पूँजीपति स्वयं अपने मार्केटिंग एजेण्ट का काम कर सकता है, वह इसके लिए सेल्समैन व सेल्सवुमन रख सकता है। या फिर वह अपना पूरा उत्पादित माल एक बार में व्यापारिक पूँजीपति को बेच सकता है और उत्पादित माल की बिक्री के काम को व्यापारिक पूँजीपति अंजाम दे सकता है। इसके बदले में औद्योगिक पूँजीपति व्यापारिक पूँजीपति को मज़दूरों के शोषण के ज़रिये निचोड़े गये बेशी मूल्य का एक हिस्सा देता है। आगे हम देखेंगे कि इसके बावजूद औद्योगिक पूँजीपति फ़ायदे में ही रहता है क्योंकि अगर वह माल की बिकवाली के काम को स्वयं अंजाम देता तो उसे भी इसके लिए दुकान खोलनी पड़ती, मज़दूर रखने पड़ते और ऊपर से माल की बिकवाली पूरी होने पर ही उसके पास उसकी संवर्धित पूँजी पूर्ण रूप में मुद्रा-रूप में आती और उसके टर्नओवर का समय बढ़ जाता। बहरहाल, पूँजीपति या तो बिक्री एजेण्ट का काम स्वयं करेगा, या उसके लिए मज़दूर रखेगा या फिर वह व्यापारिक पूँजीपति को अपना समूचा उत्पादित माल बेचेगा जो उसे अन्तिम उपभोक्ता को बेचने का काम करेगा। जो भी हो, इस काम में कुछ श्रम भी ख़र्च होता है और इसकी कुछ अन्य लागतें होती हैं। यह चर्चा मार्क्स को उत्पादक और अनुत्पादक श्रम के विषय पर लाती है। इस बारे में बुनियादी बातें मार्क्स पहले ही पूँजी के पहले खण्ड में कर चुके हैं और यहाँ पर यह चर्चा केवल संचरण के श्रम के विशिष्ट सन्दर्भ में दुहरायी गयी है।

संचरण (ख़रीद बिक्री की कार्रवाई) में लगने वाला श्रम: उत्पादक या अनुत्पादक?

सबसे पहले उत्पादक व अनुत्पादक श्रम के बारे में कुछ बुनियादी बातों को याद कर लेते हैं। पूँजी के नज़रिये से उत्पादक श्रम वह है जो बेशी मूल्य पैदा करे। ज़ाहिरा तौर पर, इसके लिए उसे उपयोग-मूल्य, यानी कोई उपयोगी वस्तु या सेवा भी पैदा करनी होगी क्योंकि उपयोग-मूल्य ही मूल्य और बेशी मूल्य का भौतिक आधार होता है। कोई भी श्रम जो उपयोग मूल्य पैदा करता है, वह सामाजिक दृष्टि से उत्पादक श्रम है। लेकिन हर उपयोग-मूल्य माल नहीं होता है। वह प्रत्यक्ष व्यक्तिगत उपभोग के लिए पैदा की गयी वस्तु या सामग्री भी हो सकती है। वह पूँजी की दृष्टि से उत्पादक श्रम की श्रेणी में नहीं आयेगा। जो श्रम पूँजीपति वर्ग के लिए बेशी मूल्य समेत मूल्य पैदा करे, वह पूँजी की दृष्टि से उत्पादक श्रम की श्रेणी में आता है।

इसके अलावा, ऐसा श्रम भी हो सकता है जो सामाजिक दृष्टि से और आम तौर पर पूँजी की दृष्टि से उत्पादक न हो, लेकिन किसी विशिष्ट पूँजीपति के लिए वह उत्पादक हो सकता है क्योंकि वह उसे उत्पादक क्षेत्र में काम करने वाले उद्यमी पूँजीपति द्वारा निचोड़े गये बेशी मूल्य का एक हिस्सा विनियोजित करने में सक्षम बनाता है। व्यापारिक पूँजीपति द्वारा रखे गये मज़दूर का श्रम जो शुद्ध रूप से ख़रीद और बिक्री के कार्य में लगा होता है, इस तीसरी श्रेणी में आता है। वह न तो कोई उपयोग-मूल्य पैदा करता है और न ही वह कोई मूल्य पैदा करता है। वह पूँजी की दृष्टि से और सामाजिक तौर पर अनुत्पादक श्रम है।

अत: शुद्ध रूप से संचरण की गतिविधियों में लगने वाला श्रम अनुत्पादक श्रम होता है। वह कोई उपयोग-मूल्य व मूल्य पैदा नहीं करता है और इसलिए बेशी-मूल्य भी पैदा नहीं करता है। इसमें लगी श्रमशक्ति के लिए भुगतान पूँजीपति द्वारा उस मूल्य से किया जाता है जो उत्पादक श्रम द्वारा पैदा होता है। ऐसा हो सकता है कि संचरण में लगे श्रमिक को यह भुगतान आंशिक रूप से व्यापारी और आंशिक तौर पर ग्राहक द्वारा किया जा सकता है। उस सूरत में भी ग्राहक द्वारा किया जा रहा भुगतान या तो उसके वेतन/मज़दूरी से आता है, या फिर अगर ग्राहक पूँजीपति या भूस्वामी हुआ तो बेशी मूल्य के एक हिस्से से आता है। जो भी हो, संचरण में लगे मज़दूरों की मज़दूरी का भुगतान उत्पादन के क्षेत्र में पैदा हुए मूल्य के किसी न किसी रूप से ही किया जाता है, चाहे वह मुनाफ़ा हो या स्वयं किसी ग्राहक की मज़दूरी।

लेकिन क्या इसका यह अर्थ है कि संचरण में लगे मज़दूर का शोषण नहीं होता है? नहीं। व्यापारिक पूँजीपति द्वारा रखे गये उजरती मज़दूर का शोषण होता है। कैसे? यह मज़दूर भी अपनी श्रमशक्ति ही व्यापारिक पूँजीपति को बेचता है। श्रमशक्ति का मूल्य सामाजिक तौर पर निर्धारित होता है। अगर श्रमशक्ति का सामाजिक मूल्य 4 घण्टे के सामाजिक श्रम की नुमाइन्दगी करता है और यह मज़दूर 8 या 10 घण्टे के बराबर सामाजिक श्रम देता है, तो इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि उसका श्रम संचरण के क्षेत्र लगा अनुत्पादक श्रम है और कोई मूल्य व बेशी-मूल्य नहीं पैदा करता है। शोषण इस तथ्य में ही निहित है कि वह अपने श्रमशक्ति के पुनरुत्पादन के लिए आवश्यक सामाजिक श्रम की मात्रा से अधिक सामाजिक श्रम पूँजीपति को दे रहा है। मार्क्स लिखते हैं:

“मामले को सरल बनाने के लिए मान लें कि ख़रीद और बिक्री का काम करने वाला एजेण्ट एक ऐसा आदमी है जो अपना श्रम बेचता है। वह और C – M और M – C के प्रकार्यों को सम्पन्न करने में अपनी श्रमशक्ति और अपने श्रमकाल को ख़र्च करता है। और इस प्रकार वह इसके बूते उसी प्रकार जीता है जैसे कि कोई और कताई करके या दवा की गोलियाँ बनाकर जीता है। वह एक आवश्यक कार्य कर रहा है, क्योंकि स्वयं पुनरुत्पादन प्रक्रिया में ही अनुत्पादक प्रकार्य भी शामिल होते हैं। वह भी किसी भी दूसरे आदमी की तरह काम करता है, लेकिन उसका श्रम न तो कोई मूल्य पैदा करता है और न ही कोई उत्पाद। वह स्वयं उत्पादन के अनिवार्य अनुत्पादक ख़र्चों में शामिल है। उसकी उपयोगिता एक अनुत्पादक प्रकार्य को उत्पादक प्रकार्य में, या अनुत्पादक श्रम को उत्पादक श्रम में बदल डालने में नहीं है। अगर ऐसा रूपान्तरण महज़ इन प्रकार्यों को एक हाथ से दूसरे हाथ में रूपान्तरित कर देने मात्र से सम्भव होता तो यह एक चमत्कार होता। उल्टे वह इसलिए उपयोगी है क्योंकि अब इन अनुत्पादक प्रकार्यों में समाज की श्रमशक्ति और श्रमकाल का एक अपेक्षाकृत छोटा हिस्सा लगा हुआ है। इसके अलावा, मान लें कि वह एक साधारण उजरती मज़दूर है, चाहे उसे कुछ ज़्यादा मज़दूरी ही क्यों मिलती हो। एक उजरती मज़दूर के तौर पर उसका भुगतान चाहे जो भी हो, वह दिन के एक हिस्से में बिना किसी भुगतान के काम करता है। हो सकता है वह प्रतिदिन आठ घण्टे के श्रम के मूल्यउत्पाद को भुगतान के रूप में प्राप्त कर रहा हो, जबकि वह कुल दस घण्टे काम कर रहा हो। वह जो दो घण्टे का बेशी श्रम कर रहा है, वह बाक़ी आठ घण्टे के आवश्यक श्रम के ही समान कोई मूल्य नहीं पैदा कर रहा है, हालाँकि इस आवश्यक श्रम के ही बूते सामाजिक उत्पादक का एक हिस्सा उसे स्थानान्तरित होता है।” (वही, पृ. 209-10, ज़ोर हमारा)

असल बात यह है कि संचरण के क्षेत्र में काम करने वाला मज़दूर कोई मूल्य न पैदा करते हुए भी शोषित होता है क्योंकि वह अपनी श्रमशक्ति के पुनरुत्पादन के लिए आवश्यक सामाजिक श्रम से ज़्यादा सामाजिक श्रम देता है। दूसरी बात, पूँजीपति वर्ग के लिए आम तौर पर यह अनुत्पादक श्रम होने के बावजूद उपयोगी है क्योंकि यह पूँजीवादी पुनरुत्पादन की प्रक्रिया का अभिन्न अंग है और साथ ही यह पूँजीवादी उत्पादन के अनिवार्य अनुत्पादक ख़र्च को सामाजिक तौर पर कम कर देता है। इस रूप में यह उद्यमी पूँजीपति के मुनाफ़े की दर को बढ़ाता है क्योंकि अगर हर उद्यमी पूँजीपति स्वयं संचरण के क्षेत्र के सारे कामों को अपने मातहत रखे तो संचरण की लागत कहीं ज़्यादा होगी, टर्नओवर काल कहीं ज़्यादा होगा, मुनाफ़े की सालाना दर कम होगी और पुनरुत्पादन की प्रक्रिया रुक-रुककर चलेगी। व्यापारिक पूँजीपति C’ – M’ के कार्य को सम्पन्न करने का काम करता है और यह वह कई उद्यमी पूँजीपतियों के लिए करता है। नतीजतन, संचरण के काम को एक जगह पर बड़े पैमाने पर संकेन्द्रित किया जाता है, बड़े स्तर पर काम को अंजाम देने से ख़र्च कम हो जाते हैं। बदले में व्यापारिक पूँजीपति औद्योगिक पूँजीपति से निचोड़े गये बेशी मूल्य का जो हिस्सा लेता है, वह उस ख़र्च से कहीं कम होता है जो औद्योगिक पूँजीपति को तब उठाना पड़ता अगर वह स्वयं संचरण का यानी व्यापारिक पूँजीपति की भी भूमिका निभाता।

मार्क्स बताते हैं कि C’ – M’ के काम को पूरा करने की एक समय-सीमा भी होती है। ग़ौरतलब है कि उत्पादित मालों का बिकना एक निश्चित समय में ज़रूरी होता है क्योंकि उसके बाद वे अपने उपयोग-मूल्य और मूल्य दोनों को ही खोना शुरू कर देते हैं। इससे पहले कि माल प्रकृति की शक्तियों के असर के कारण ख़राब होने लगें और अपना उपयोग-मूल्य व मूल्य खोने लगें, उनका बिकना अनिवार्य होता है। साथ ही, अगर माल ज़्यादा टिकाऊ प्रकृति का हो, तो भी उसका जल्दी बिकना अनिवार्य होता है क्योंकि श्रम की उत्पादकता के बढ़ने के साथ यही माल पहले से कम क़ीमत में बाज़ार में उपलब्ध हो जाता है और पुराने माल को भी अब इस नयी, कम क़ीमत पर बिकना होता है। इसलिए दुकान की शेल्फ़ों में पड़े हुए अनबिके मालों का हर बीतता दिन पूँजीपति पर भारी होता है। यही कारण है कि पूँजीपति आम तौर पर बेहद क्षणभंगुर प्रकृति के मालों के उत्पादन का काम हाथ में नहीं लेते और उन्हें पहले ही माल की आपूर्ति का ऑर्डर मिल गया हो, तो ही वे ऐसे मालों का उत्पादन शुरू करते हैं।

इसके बाद, मार्क्स संचरण की लागतों के प्रश्न पर आते हैं। मार्क्स संचरण की लागतों को तीन श्रेणियों में बाँटते हैं : शुद्ध रूप से संचरण की कार्रवाइयों की लागत, भण्डारण की लागत और परिवहन की लागत। इसमें से पूर्ण रूप से अनुत्पादक ख़र्च पहला वाला है। बाक़ी दोनों विशिष्ट और भिन्न रूप में उत्पादक ख़र्च हैं, और उनके लगने वाला श्रम भी इन अर्थों में उत्पादक है और पूँजीपति इन लागतों को क़ीमत में जोड़ता है और साथ ही इसमें लगने वाले श्रम का शोषण कर बेशी मूल्य भी निचोड़ता है।

संचरण की लागत

सबसे पहले मार्क्स शुद्ध संचरण की लागत की बात करते हैं क्योंकि ये पूँजीवादी उत्पादन की अनिवार्य अनुत्पादक लागतें होती हैं।

) शुद्ध संचरण की लागतें : इसमें पूर्ण रूप से मालों की ख़रीद और बिकवाली की कार्रवाइयों में होने वाले ख़र्च शामिल हैं। मिसाल के तौर पर, पूँजीपति द्वारा बहीखाते रखने, बिक्री व ख़रीद के एजेण्टों को काम पर रखने समेत बिक्री व ख़रीद की प्रक्रिया से जुड़े सभी ख़र्च शामिल हैं। स्वर्ण मुद्रा के दौर में, बेशी उत्पाद के हेतु अतिरिक्त स्वर्ण मुद्रा के लिए सोने के उत्पादन पर लगने वाला अतिरिक्त श्रम भी सामाजिक तौर पर श्रम के अनुत्पादक ख़र्च की श्रेणी में आता था क्योंकि सामाजिक श्रम आपूर्ति की एक निश्चित मात्रा इसमें भी ख़र्च होती थी, और सोने की और कोई उपयोगिता नहीं थी, सिवाय इसके लिए वह संचरण के माध्यम का काम करता था। आज के दौर में यह बात लागू नहीं होती क्योंकि न तो सोने की मुद्रा प्रचलन में है और न ही शुद्ध रूप से काग़ज़ी मुद्रा स्वर्ण-समर्थित रह गयी है। शुद्ध फियेट मुद्रा को छापने का ख़र्च बेहद मामूली होता है और सरकार उसे भी जनता से करों के ज़रिये वसूल लेती है। बहरहाल, खाता-बही रखने व पूर्ण रूप से बिक्री व ख़रीद में लगे श्रम व सामग्रियों पर किया जाने वाला ख़र्च पूँजीपति के लिए पूर्ण रूप से अनुत्पादक ख़र्च होता है। इसे वह क़ीमतों में नहीं जोड़ सकता और पूँजीपतियों के बीच की प्रतिस्पर्द्धा इस बात को सुनिश्चित करती है। इसमें लगने वाला श्रम कोई मूल्य व बेशी-मूल्य नहीं पैदा करता है। नतीजतन, इस पर होने वाला ख़र्च पूँजीपति द्वारा किये जाने वाले पूँजी ख़र्च में जुड़ता है और इस प्रकार उसके लाभप्रदता को कुछ कम करता है। लेकिन यह पूँजीपति के लिए आवश्यक ख़र्च है। खाता-बही रखना पूँजीपति के लिए उसके द्वारा उत्पादन में जारी मूल्यों के प्रवाह और यहाँ तक कि क़ीमतों को निर्धारित करने के लिए आवश्यक होता है। साथ ही, बिक्री व ख़रीद में होने वाला ख़र्च उत्पादन के साधनों की आपूर्ति को निर्मित करने और साथ ही उत्पादित माल की बिकवाली के लिए अनिवार्य होता है।

) भण्डारण की लागतें : इसे आपूर्ति-निर्माण की लागतें भी कहा जाता है। माल-पूँजी का भण्डारण (जिसमें एक ख़रीदार के तौर पर पूँजीपति द्वारा किया जाने वाला आपूर्ति-निर्माण और बिकवाली के लिए उत्पादित माल का भण्डारण दोनों ही शामिल हैं) महज़ संचरण के लिए आवश्यक नहीं है। यह इसलिए भी आवश्यक है कि माल के उपयोग-मूल्य व मूल्य में होने वाले किसी भी ह्रास को रोका जा सके या न्यूनातिन्यून बनाया जा सके। भण्डारण में लगने वाला श्रम उपयोग-मूल्य में कुछ भी नहीं जोड़ता, वह कोई नया उपयोग-मूल्य नहीं पैदा करता है। नतीजतन, सामाजिक तौर पर यह श्रम अनुत्पादक है। लेकिन पूँजीपतियों के लिए यह श्रम उत्पादक श्रम है क्योंकि यह मूल्य व बेशी-मूल्य में ह्रास को रोकता है और अगर वह नहीं होता तो माल के मूल्य व बेशी-मूल्य में ह्रास होता। इसलिए नकारात्मक तौर पर यह मूल्य “पैदा” कर रहा है, इन अर्थों में क्योंकि वह मूल्य की एक मात्रा की हानि होने से रोकता है। इस प्रकार भण्डारण में लगने वाला श्रम सामाजिक तौर पर अनुत्पादक है लेकिन पूँजी के लिए उत्पादक है। औसत तौर पर भण्डारण में अनिवार्यत: होने वाले ख़र्च को पूँजीपति अपनी क़ीमतों में शामिल करता है, इसमें लगने वाले श्रम का शोषण कर उससे भी बेशी मूल्य विनियोजित करता है। मार्क्स लिखते हैं:

“संचरण की वे लागतें जो महज़ मूल्य के रूप में होने वाले परिवर्तन से पैदा होती हैं, यानी आदर्श रूप में संचरण से पैदा होती हैं, वे मालों के मूल्य में शामिल नहीं होती हैं। जहाँ तक पूँजीपति का प्रश्न है, उन ख़र्च पूँजी के हिस्से उत्पादक रूप से ख़र्च होने वाली पूँजी में होने कटौती होते हैं। अब हम जिन संचरण की लागतों पर विचार करेंगे उनकी प्रकृति अलग है। वे उत्पादन की उन प्रक्रियाओं से ही पैदा हो सकती हैं, जो संचरण के क्षेत्र में जारी रहती हैं और इसलिए जिनका उत्पादक चरित्र महज़ संचरण के रूप से छिपा रहता है। ऐसा भी हो सकता है कि सामाजिक दृष्टि से वे और कुछ नहीं बल्कि केवल लागतें, यानी श्रम का अनुत्पादक ख़र्च हों, चाहे जीवित रूप में या वस्तुकृत रूप में, लेकिन ठीक इसी वजह से उनका वैयक्तिक पूँजीपति के लिए एक मूल्य पैदा करने वाला प्रभाव होता है, और वे मालों की बिक्री क़ीमत में जुड़ती हैं। यह इस साधारण से तथ्य से प्रदर्शित होता है कि ये लागतें एक ही उत्पादन के क्षेत्र में लगी विभिन्न वैयक्तिक पूँजियों के लिए अलग-अलग हो सकती हैं। माल के क़ीमत में उन्हें जोड़ने की कार्रवाई का अर्थ है कि वे जिस हद तक वैयक्तिक पूँजीपति के ऊपर पड़ती हैं, उसी अनुपात में उनका वितरण हो जाता है। लेकिन हर वह श्रम जो मूल्य जोड़ता है, वह बेशी-मूल्य भी जोड़ सकता है और पूँजीवाद के आधार पर जोड़ता ही है, क्योंकि जो मूल्य वह निर्मित करता है वह स्वयं उस श्रम की सीमा पर निर्भर करता है, जबकि जो बेशी-मूल्य वह निर्मित करता है वह उस भुगतान की सीमा पर निर्भर करता है जो पूँजीपति इसके लिए उसे करता है। इस प्रकार, जहाँ वे लागतें जो मालों को बिना उनके उपयोग-मूल्य में कोई इज़ाफ़ा किये महँगा बना देती हैं, सामाजिक रूप से उत्पादन के अनिवार्य अनुत्पादक ख़र्च हैं, वहीं वैयक्ति पूँजीपति के लिए वे समृद्धि का स्रोत हो सकती हैं।” (वही, पृ. 214)

इस प्रकार भण्डारण में लगने वाला श्रम पूँजीपति के नज़रिये से उत्पादक होता है। वह इसमें लगने वाले श्रम के शोषण के ज़रिये बेशी-मूल्य भी विनियोजित करता है। लेकिन सामाजिक दृष्टि से यह श्रम अनुत्पादक होता है क्योंकि यह उपयोग-मूल्य के मामले में कोई भी इज़ाफ़ा नहीं करता है। लेकिन यह मूल्य का ह्रास रोकता है। अगर यह श्रम न ख़र्च हो, तो पूँजीपति के माल के उपयोग-मूल्य व मूल्य दोनों का ह्रास होगा। इस रूप में, नकारात्मक तौर पर देखें तो यह पूँजीपति के लिए मूल्य “पैदा” करता है। और ठीक इसीलिए यह वैयक्तिक पूँजीपति के लिए उत्पादक श्रम की श्रेणी में आता है।

) परिवहन की लागतें: मार्क्स बताते हैं कि परिवहन की लागतें व उसमें लगने वाला श्रम कई प्रकार का होता है। एक तरफ़ पूँजीपति को उत्पादन के साधनों और कभी-कभी श्रमशक्ति को भी किसी अन्य स्थान से उत्पादन के स्थान पर लाना पड़ता है। यह श्रम उत्पादन की प्रक्रिया की शुरुआत के लिए ही अनिवार्य होता है। वहीं पूँजीपति जब तक उत्पादित माल को उत्पादन के स्थान से बिक्री के स्थान तक नहीं पहुँचाता, जहाँ उसका माल अन्तिम उपभोक्ता द्वारा ख़रीदे जाने और उपभोग के लिए तैयार हो, तब तक उत्पादन की प्रक्रिया जारी ही रहती है क्योंकि मालों का मूल्य के तौर पर वास्तवीकरण बिकने के साथ और उपयोग-मूल्य के तौर पर वास्तवीकरण उपभोग के साथ ही होता है। इसलिए उत्पादित माल को उत्पादन के स्थान से अन्तिम बिक्री के स्थान तक पहुँचाने में लगने वाला परिवहन का श्रम (और उसकी लागतें) पूँजीवादी उत्पादन के लिए अनिवार्य होती हैं। इसलिए परिवहन की गतिविधि तकनीकी तौर पर उत्पादन के क्षेत्र से बाहर होने के बावजूद संचरण के क्षेत्र में उत्पादन की गतिविधि के जारी रहने का प्रतिनिधित्व करती हैं और वे उत्पादक लागत व श्रम की श्रेणी में आती हैं। ये गतिविधि अपने आप में संचरण की कार्रवाई नहीं बल्कि उत्पादन की ही कार्रवाई के लिए अनिवार्य होती हैं।

मार्क्स बताते हैं कि जैसे-जैसे पूँजीवाद का विकास होता है, वैसे-वैसे परिवहन स्वयं एक स्वतन्त्र और विशालकाय पूँजीवादी उद्योग में तब्दील होता जाता है। दूर-दराज़ के बाज़ारों तक उत्पादित मालों को पहुँचाना और दूर-दराज़ के बाज़ारों से उत्पादन के साधनों को उत्पादन के स्थान तक पहुँचाना और कई बार श्रमशक्ति को उत्पादन के स्थान तक पहुँचाना पूँजीवादी उत्पादन व्यवस्था के विकास के साथ अनिवार्य और अपरिहार्य होता जाता है। इसके साथ पूँजीवादी देशों में परिवहन का एक विराटकाय ताना-बाना सघन और व्यापक तौर पर विकसित होता जाता है।

जैसा कि हमने पहले भी देखा, परिवहन किसी भी अन्य पूँजीवादी उद्योग के समान माल-उत्पादन करता है, हालाँकि इसके द्वारा उत्पादित माल कोई उपयोगी वस्तु नहीं बल्कि एक उपयोगी प्रभाव या सेवा होता है और उसका उत्पादन और उपभोग एक साथ ही सम्पन्न होता है। इस माल के उत्पादन की प्रक्रिया ही उसके उपभोग की प्रक्रिया भी होती है। यह उपयोगी प्रभाव होता है मालों व व्यक्तियों का स्थान-परिवर्तन। श्रम की उत्पादकता के विकास के साथ इस उद्योग का माल भी सस्ता होता जाता है और पूँजीपतियों के लिए अपने मालों की ढुलाई की प्रति-इकाई लागत घटती जाती है। शिपिंग, वाणिज्यिक सड़क परिवहन, रेलवे द्वारा माल ढुलाई की व्यवस्था अधिक से अधिक दैत्याकार रूप धारण करती जाती है और साथ ही पास के बाज़ारों में आपूर्ति के लिए परिवहन के अन्य साधन भी पूँजीवादी आधार पर विकसित होते जाते हैं।

चूँकि यह एक उत्पादक गतिविधि है इसलिए इसमें लगने वाला श्रम भी उत्पादक श्रम होता है। यह मूल्य पैदा करता है और पूँजीवादी उत्पादन के आधार पर यह परिवहन के क्षेत्र के पूँजीपतियों के लिए बेशी-मूल्य भी पैदा करता है। चूँकि यह मूल्य पैदा करने वाली उत्पादक गतिविधि है इसलिए इसकी लागत माल की क़ीमत में जुड़ती है। इसलिए परिवहन की गतिविधि औपचारिक तौर पर संचरण के क्षेत्र में चलने के बावजूद उत्पादन का ही जारी रहना है और एक उत्पादक गतिविधि है। मार्क्स लिखते हैं:

“यहाँ पर पैकिंग, श्रेणीकरण, आदि जैसी संचरण की लागतों के तमाम विवरणों के विस्तार में जाने की कोई आवश्यकता नहीं है। आम नियम यह है कि ऐसी सभी संचरण लागतें जो केवल माल के रूप में परिवर्तन के आधार पर पैदा होती हैं वे कोई मूल्य नहीं जोड़ती हैं। वे केवल मूल्य का वास्तवीकरण करने या उसे एक रूप से दूसरे रूप में परिवर्तित करने की लागतें हैं। इन लागतों में ख़र्च होने वाली पूँजी (और साथ ही श्रम जिसे यह पूँजी निर्देशित करती है) पूँजीवादी उत्पादन के अनिवार्य अनुत्पादक ख़र्च में शामिल होती है। इन लागतों को भरपाई बेशी उत्पाद, और सम्पूर्ण तौर पर पूँजीपति वर्ग के नज़रिये से बेशी-मूल्य या बेशी-उत्पाद में से कटौती करके होती है, ठीक उसी प्रकार जैसे जिस समय में मज़दूर अपने उपभोग के साधन ख़रीदता है, वे उसके लिए खोये हुए समय के समान होता है। लेकिन परिवहन की लागतें कहीं ज़्यादा महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं और इसलिए यहाँ उन पर संक्षेप में विचार करना ज़रूरी है।” (वही, पृ. 225-26, ज़ोर हमारा)

परिवहन की लागतों के उत्पादक चरित्र को स्पष्ट करते हुए आगे मार्क्स लिखते हैं:

“परिवहन द्वारा उत्पादों की मात्रा में कोई बढ़ोत्तरी नहीं होती है। परिवहन के कारण उनके प्राकृतिक गुणों में जो परिवर्तन आ सकता है, अपवादों को छोड़कर, वह कोई इरादतन पैदा किया गया उपयोगी प्रभाव नहीं होता है, बल्कि एक ऐसी बुराई है जिससे बचा नहीं जा सकता। लेकिन चीज़ों का उपयोग मूल्य केवल उनके उपभोग में ही वास्तवीकृत होता है, और उनके उपभोग के लिए उनके स्थान में परिवर्तन आवश्यक हो सकता है, और इसलिए परिवहन उद्योग की अतिरिक्त उत्पाद प्रक्रिया भी अनिवार्य हो सकती है। इस प्रकार, इस उद्योग में निवेशित उत्पादक पूँजी ले जाये या ले आये जा रहे उत्पादों में मूल्य जोड़ती है, आंशिक तौर पर परिवहन के साधनों के मूल्य के स्थानान्तरण के ज़रिये और आंशिक तौर पर परिवहन के कार्य द्वारा जोड़े गये मूल्य के ज़रिये। परिवहन के कार्य द्वारा जो मूल्य जोड़ा जाता है, वह, जैसा कि समस्त पूँजीवादी उत्पादन के साथ होता है, मज़दूरी और बेशी-मूल्य में विभाजित होता है।” (वही, पृ. 226-27)

दूसरे शब्दों में, परिवहन उद्योग में लगा श्रम उत्पादक श्रम होता है जो उपयोग-मूल्य और मूल्य दोनों पैदा करता है और चूँकि यह उद्योग भी पूँजीवादी आधार पर संगठित होता है, इसलिए यह श्रम इस क्षेत्र के पूँजीपति के लिए बेशी-मूल्य भी पैदा करता है। इसके द्वारा पैदा मूल्य उत्पाद के मूल्य में जुड़ता है। यानी, परिवहन की लागत माल की क़ीमत में शामिल होती है।

इस प्रकार, औपचारिक तौर पर हम संचरण की तीन प्रकार लागतों की बात कर सकते हैं। लेकिन इसमें केवल पहली श्रेणी यानी शुद्ध रूप से संचरण की कार्रवाई की लागतें, यानी बेचने-ख़रीदने की प्रक्रिया की लागतें और उसमें लगने वाला श्रम ही अनुत्पादक लागतें व अनुत्पादक श्रम है। बाक़ी दोनों क़िस्म की लागतें, यानी भण्डारण की लागतें और परिवहन की लागतें माल की क़ीमत में शामिल होती हैं और इसमें लगने वाला श्रम पूँजीपति के लिए उत्पादक होता है। उसके शोषण के ज़रिये भी पूँजीपति बेशी-मूल्य विनियोजित करता है। इसमें से भण्डारण की लागतें पूँजीपति की दृष्टि से उत्पादक लागतें हैं, लेकिन सामाजिक दृष्टि से वे अनुत्पादक लागतें हैं क्योंकि वे उपयोग-मूल्य में कुछ भी नहीं जोड़तीं। लेकिन परिवहन की लागतें न सिर्फ़ वैयक्तिक पूँजीपति के लिए उत्पादक लागतें हैं, बल्कि सामाजिक दृष्टि से भी उत्पादक लागतें हैं क्योंकि जब तक उत्पादित माल उस स्थान तक नहीं पहुँच जाता जहाँ वह अपने उपभोग के लिए तैयार हो तब तक उत्पादन की प्रक्रिया जारी मानी जाती है, और साथ ही, जब तक उत्पादन के तत्व उत्पादन के स्थान पर नहीं पहुँच जाते तब तक उत्पादन की प्रक्रिया शुरू ही नहीं हो सकती और इसलिए उनका उत्पादन के स्थान पर पहुँचाया जाना उत्पादन की कार्रवाई के लिए अनिवार्य होता है। इसका संचरण से सीधा कोई सम्बन्ध नहीं होता है, हालाँकि औपचारिक तौर पर ये गतिविधियाँ आयोजित संचरण के क्षेत्र में होती हैं।

 

मज़दूर बिगुल, जनवरी 2026

 

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