क्रान्तिकारी मज़दूर शिक्षणमाला – 33 : मार्क्सवादी राजनीतिक अर्थशास्त्र के सिद्धान्त  (खण्ड-2)
अध्याय – 6
पूँजी का टर्नओवर (जारी)

अभिनव

इस लेखमाला की सभी किश्‍तें इस लिंक से पढें

अचल चल पूँजी (जारी)

जैसा कि हमने देखा, चल और अचल पूँजी का अन्तर उनकी प्राकृतिक विशिष्टताओं या उनके गतिमान होने या एक स्थान पर स्थिर होने से नहीं निर्धारित होता है। न ही उनकी अन्तिम तौर पर पहचान इस बात से होती है कि उनके तत्व भौतिक तौर पर माल में स्थानान्तरित होते हैं या नहीं क्योंकि अचल पूँजी के मामले में कुछ ऐसे आपवादिक तत्व हैं जो माल में भौतिक तौर पर स्थानान्तरित होते हैं (मसलन, खाद) और चल पूँजी के मामले में कुछ ऐसे आपवादिक तत्व हैं, जो माल में भौतिक तौर पर स्थानान्तरित नहीं होते (मसलन, सहायक सामग्रियाँ जैसे ग्रीस, ल्यूब्रिकेण्ट, आदि)। तो फिर चल और अचल पूँजी के बीच अन्तर करने का आधारभूत पैमाना क्या है? जैसा कि हमने ऊपर ज़िक्र किया है, इनके बीच अन्तर मूलत: इस आधार पर किया जाता है कि इनके तत्व अपने मूल्य को माल के मूल्य में किस प्रकार स्थानान्तरित करते हैं: एक उत्पादन चक्र में या फिर कई उत्पादन चक्रों में।

चल पूँजी वह होती है जो उन तत्वों पर लगती है जो अपना मूल्य एक उत्पादन-चक्र में यानी एक ही बार में उत्पादित होने वाले माल में स्थानान्तरित कर देती है। आम तौर पर, इसके अधिकांश तत्व भौतिक तौर पर भी माल में स्थानान्तरित हो जाते हैं, हालाँकि इसके कुछ अपवाद होते हैं, जैसा कि हमने ऊपर ज़िक्र किया है। इसका एक महत्वपूर्ण निहितार्थ यह हुआ कि चल पूँजी के तत्वों को हर उत्पादन-चक्र के समापन के साथ भौतिक तौर पर पुनर्नवीकृत करना होता है।

जैसा कि सहज ही समझा जा सकता है, चल पूँजी में मज़दूरी और कच्चे माल व सहायक सामग्रियों पर होने वाला ख़र्च शामिल होता है और श्रमशक्ति और कच्चे माल व सहायक सामग्रियाँ इसके भौतिक तत्व होते हैं। ये वे तत्व हैं जो अपना मूल्य एक उत्पादन-चक्र में ही माल के मूल्य में स्थानान्तरित कर देते हैं और, ग्रीस, तेल, ल्यूब्रिकेण्ट आदि जैसी सहायक सामग्रियों के अपवाद को छोड़ दें, तो ये भौतिक तौर पर, यानी एक उपयोग-मूल्य के तौर पर भी, उत्पादित माल में स्थानान्तरित हो जाते हैं। यानी, उनका मूल्य पूर्ण रूप में संचरित होता है और हर उत्पादन-चक्र के बाद उनका पुनर्नवीकरण करना आवश्यक होता है। पूँजीपति के हाथों में चल पूँजी को पुनर्नवीकृत करने हेतु मुद्रा-पूँजी का मौजूद होना उत्पादन को जारी रखने की पूर्वशर्त होता है। यानी, कच्चे माल और मज़दूरी पर होने वाले ख़र्च के लिए उसके हाथ में मुद्रा-पूँजी हर उत्पादन-चक्र की शुरुआत में मौजूद होनी चाहिए। ज़ाहिर है कि चल पूँजी के कई टर्नओवर अचल पूँजी के एक टर्नओवर में समाये होते हैं।

जैसा कि हम पहले भी ज़िक्र कर चुके हैं, चल पूँजी और अचल पूँजी का अन्तर केवल उद्यमी उत्पादक पूँजी के लिए ही मायने रखता है। वाणिज्यिक या सूदखोर पूँजी के लिए, यानी उस पूँजी के लिए जो किसी उद्यमी (औद्योगिक या खेतिहर) उत्पादक उपक्रम में नहीं लगी है, यह अन्तर कोई मायने नहीं रखता है। वजह यह है कि यहाँ अन्तर का आधार ही यह है कि उत्पादन के विभिन्न तत्व अपने मूल्य को उत्पादित माल में किस तरीक़े से स्थानान्तरित करते हैं। एक व्यापारी केवल उत्पादित माल बेचता है, वह माल के उत्पादन में नहीं लगा होता है। उसकी कुल पूँजी में माल-पूँजी और मुद्रा-पूँजी होती है, लेकिन उसकी पूँजी कभी उत्पादक-पूँजी का रूप नहीं लेती है। वहीं एक सूदखोर केवल मुद्रा-पूँजी रखता है। वह उसे एक निश्चित समय के लिए ऋण लेने वाले को देता है, जिसे ऋणी व्यक्ति उस निश्चित समय के समाप्त होने के बाद ब्याज के साथ वापस करता है। निश्चित तौर पर, यह ब्याज वह ऋणी व्यक्ति विनियोजित किये गये बेशी मूल्य में से देता है (अगर वह पूँजीपति या भूस्वामी है) या फिर वह ऋणी व्यक्ति यह ब्याज अपनी मज़दूरी या वेतन से देता है (अगर वह उजरती श्रमिक है)। लेकिन इतना स्पष्ट है कि व्यापारी या सूदखोर के लिए चल अचल पूँजी का अन्तर ही अप्रासंगिक है।

इस बात को न समझ पाने के कारण चल और अचल पूँजी के विषय में क्लासिकीय बुर्जुआ राजनीतिक अर्थशास्त्रियों ने कई ग़लतियाँ कीं। मसलन, ऐडम स्मिथ चल पूँजी (circulating capital) को संचरणशील पूँजी (capital in circulation), यानी वे तत्व जो एक हाथ से दूसरे हाथ में बिक्री के द्वारा स्थानान्तरित होते हैं, से गड्ड-मड्ड कर बैठे। इस भ्रम के आधार पर स्मिथ ने यह दावा किया कि व्यापारिक पूँजीपति की समस्त पूँजी चल पूँजी है क्योंकि उसके सभी तत्व बिक्री के लिए होते हैं और इसलिए उसकी समूची पूँजी का मूल्य संचरित होता है। दूसरी ओर, स्मिथ के लिए अचल पूँजी वह पूँजी है जिसके तत्व न सिर्फ़ भौतिक तौर पर संचरित नहीं होते, बल्कि जिसका मूल्य भी संचरित नहीं होता! मार्क्स ने इस ग़लती की आलोचना करते हुए कहा कि अचल पूँजी के तत्व मसलन मशीनें, यन्त्र व उपकरण आदि भी बिकते हैं, यानी संचरित होते हैं, क्योंकि उनका उत्पादन करने वाला पूँजीपति अन्य पूँजीपतियों को इन्हें बेचता है। इसके अलावा, अचल पूँजी का मूल्य भी टुकड़ों-टुकड़ों में उत्पादित मालों की श्रृंखला में स्थानान्तरित होता है, हालाँकि उसके तत्व भौतिक रूप में उत्पादित माल में रूपान्तरित नहीं होते। इस रूप में कोई भी पूँजी ऐसी नहीं होती जिसका मूल्य संचरित ही हो। स्मिथ उपयोग-मूल्य और मूल्य को भी भ्रमित कर बैठते हैं और इसीलिए यह दावा करते हैं कि अचल पूँजी संचरित ही नहीं होती क्योंकि उसके तत्व भौतिक तौर पर उत्पादित माल में स्थानान्तरित नहीं होते। साथ ही, मार्क्स बताते हैं कि चल पूँजी के तत्व भी भौतिक तौर पर तब तक संचरित नहीं होते जब तक कि वे उत्पादन की प्रक्रिया में संलग्न होते हैं और इस मायने में चल पूँजी के तत्व भी तब तक “अचल” या फिक्स्ड ही रहते हैं।

स्मिथ के अलावा, क्लासिकीय बुर्जुआ राजनीतिक अर्थशास्त्र के शिखर-पुरुष रिकार्डो से भी चल व अचल पूँजी के अन्तर के सन्दर्भ में गम्भीर ग़लतियाँ हुईं, जिन्हें मार्क्स ने दुरुस्त किया। एक तरफ़ रिकार्डो स्थिर पूँजी के अचल पूँजी वाले तत्वों में केवल मशीनों व श्रम के अन्य उपकरणों को शामिल करते हैं और कच्चे माल को इसमें शामिल नहीं करते, वहीं दूसरी तरफ़ वह चल पूँजी में भी कच्चे मालों को शामिल नहीं करते। नतीजतन, कच्चा माल ही इस विषय में उनकी चर्चा से अन्तर्धान हो जाता है। इसके अलावा, रिकार्डो चल पूँजी में केवल मज़दूरी को शामिल करते हैं और चल पूँजी को परिवर्तनशील पूँजी से गड्ड-मड्ड कर बैठते हैं। नतीजतन यहाँ भी उनके विभाजन से कच्चा माल ग़ायब ही हो जाता है। चूँकि रिकार्डो एकमात्र श्रमशक्ति को चल पूँजी का तत्व बताते हैं और इस प्रकार चल पूँजी को परिवर्तनशील पूँजी के साथ गड्डमड्ड करते हैं, इसलिए वे मूल्य बेशी मूल्य के उत्पादन की प्रक्रिया की भी सही व्याख्या नहीं कर पाते क्योंकि चल पूँजी का रिश्ता केवल इस बात से होता है कि उसके तत्व किस प्रक्रिया में अपने मूल्य को माल में स्थानान्तरित करते हैं, कि इस बात से कि मूल्य बेशी मूल्य का उत्पादन कैसे होता है। इस प्रकार रिकार्डो के विमर्श में श्रम का मूल्य उत्पादित करने वाला चरित्र ग़ायब हो जाता है।

मार्क्स बताते हैं कि इस मामले में स्मिथ और रिकार्डो से पहले आये फ़िज़ियोक्रैट राजनीतिक अर्थशास्त्री ज्यादा विकसित थे क्योंकि उन्होंने चल व अचल पूँजी की चर्चा केवल इस सन्दर्भ में की कि उत्पादन के विभिन्न तत्व किस रूप में अपने मूल्य को उत्पाद में स्थानान्तरित करते हैं और किस रूप में उनका पुनरुत्पादन करना आवश्यक होता है।

मार्क्स अचल पूँजी के बारे में लिखते हैं:

“पूँजी के एक हिस्से का निवेश स्थिर पूँजी के रूप में, यानी उत्पादन के साधनों पर, किया जाता है जो तब तक श्रम-प्रक्रिया के कारकों के रूप में काम करते हैं जब तक वे अपने उस स्वतन्त्र उपयोग-रूप को बनाये रखते हैं, जिसमें वे श्रम-प्रक्रिया में प्रवेश करते हैं। उत्पादित उत्पाद, और इसलिए जिस हद तक वे उत्पाद में रूपान्तरित हो जाते हैं उस हद तक उसके निर्माण में लगे तत्व भी, उत्पादन-प्रक्रिया से बाहर चले जाते हैं और उत्पादन के क्षेत्र से एक माल के रूप में संचरण के क्षेत्र में चले लाते हैं। दूसरी ओर, श्रम के उपकरण कभी भी उत्पादन-प्रक्रिया में प्रवेश करने के बाद उससे बाहर नहीं जाते। उनका विशिष्ट प्रकार्य ही उन्हें इसी क्षेत्र में सीमित रखता है। निवेश किये गये पूँजी-मूल्य का एक हिस्सा इसी रूप में अचल रहता है, जो कि इस समूची प्रक्रिया में श्रम के उपकरणों के प्रकार्य से निर्धारित होता है। जैसे-जैसे श्रम का कोई उपकरण अपना काम करता है और ख़र्च होता जाता है, उसके मूल्य का एक हिस्सा माल में स्थानान्तरित हो जाता है, जबकि दूसरा हिस्सा श्रम के उपकरणों में और इस प्रकार उत्पादन-प्रक्रिया में ही अचल रूप में मौजूद रहता है। इस प्रकार से अचल या असंचरित मूल्य तब तक धीरे-धीरे कम होता जाता है, जब तक कि श्रम का उपकरण पूरी तरह से ख़र्च हो जाये और इस प्रकार अपने मूल्य को लम्बे या छोटे दौर में बार-बार दुहराई जाने वाली श्रम-प्रक्रियाओं की श्रृंखला से उत्पादित होने वाले उत्पादों के ढेर पर वितरित कर दे। जब तक श्रम के उपकरण प्रभावी बने रहते हैं और इसलिए उन्हें उसी प्रकार के नये उपकरणों से बदलना नहीं पड़ता, कुछ स्थिर पूँजी मूल्य उनमें अचल रूप में मौजूद होता है, जबकि मूल्य का एक दूसरा हिस्सा, जो कि मूलत: अचल था, उत्पाद में स्थानान्तरित हो जाता है और इस प्रकार मालों के स्टॉक के एक अंग के रूप में संचरित होता है।” (वही, पृ. 237-38, अनुवाद हमारा)

मार्क्स बताते हैं कि अचल पूँजी के तत्व का मूल्य भी पूँजी के सभी तत्वों के मूल्य समान संचरित होता है, हालाँकि यह प्रकिया चल पूँजी के तत्वों से अलग तरीक़े से होती है। उनका चल पूँजी से अन्तर सिर्फ़ इतना है कि वे एक लम्बी प्रक्रिया में टुकड़े-टुकड़े में अपने मूल्य को संचरित करते हैं। मार्क्स लिखते हैं:

“पूँजी-मूल्य का वह हिस्सा जो श्रम के उपकरणों में फिक्स्ड रहता है, वह भी किसी भी अन्य हिस्से के रूप में संचरित होता है। जैसा कि हमने देखा है, समूचा पूँजी-मूल्य सतत् संचरण में रहता है, और इसलिए इस अर्थ में, समस्त पूँजी ही चल पूँजी है। लेकिन अभी तक हमने पूँजी के जिस हिस्से पर विचार किया है उसका संचरण विशिष्ट प्रकार का है। पहली बात तो यह कि यह अपने उपयोग-रूप में संचरित नहीं होता। बल्कि यह इसका मूल्य है जो संचरित होता है, और यह टुकड़ों-टुकड़ों में धीरे-धीरे होता है… इसके मूल्य का एक हिस्सा तब तक फिक्स्ड ही रहता है जब तक यह काम करना जारी रखता है, और इस प्रकार उन मालों से भिन्न बना रहता है जिनके उत्पादन में यह सहायता करता है। स्थिर पूँजी के इस हिस्से की यह विशिष्टता ही इसे अचल पूँजी का रूप देती है। उत्पादन-प्रक्रिया में निवेशित पूँजी के अन्य सभी भौतिक संघटक तत्व इस विशिष्ट रूप के विपरीत चल या तरल पूँजी का अंग होते हैं।” (वही, पृ. 238, अनुवाद हमारा)

चूँकि चल पूँजी के सभी तत्व एक उत्पादन-प्रक्रिया में ही अपने मूल्य को उत्पादित माल में स्थानान्तरित कर देते हैं, इसलिए हर उत्पादन-चक्र के बाद उनका पुनर्नवीकरण आवश्यक होता है, वरना उत्पादन-प्रक्रिया की निरन्तरता को क़ायम नहीं रखा जा सकता। इसमें श्रमशक्ति, कच्चा माल और सहायक सामग्री शामिल होते हैं। सहायक सामग्री के विषय में एक अपवाद केवल यही है कि वह भौतिक तौर पर उत्पाद में स्थानान्तरित नहीं होती है, बल्कि केवल उसका मूल्य एक उत्पादन-चक्र में उत्पाद में स्थानान्तरित हो जाता है। मार्क्स लिखते हैं:

“उत्पादन-प्रक्रिया में प्रवेश करने वाली तरल पूँजी अपने समूचे मूल्य को उत्पाद में स्थानान्तरित कर देती है, और इसलिए अगर उत्पादन-प्रक्रिया को बिना किसी बाधा के चलाना है तो उत्पाद की बिक्री के ज़रिये लगातार उसको पुनर्नवीकृत करना अनिवार्य होता है।” (वही, पृ. 261, अनुवाद हमारा)

चल अचल पूँजी के इस विभाजन में बुनियादी बात है इस बात पर विचार करना कि उत्पादन के विभिन्न तत्व अपना मूल्य किस तरीक़े से उत्पादित माल में स्थानान्तरित करते हैं। उनका भौतिक तौर पर उत्पादन की प्रक्रिया में फिक्स्ड होना अपने आप में यह तय करने का बुनियादी तत्व नहीं है कि वे चल पूँजी हैं या अचल पूँजी। अचल पूँजी कई उत्पादन-चक्रों तक उत्पादन की प्रक्रिया में फिक्स्ड रहती है। लेकिन चल पूँजी भी एक उत्पादन-चक्र के दौरान उत्पादन की प्रक्रिया में फिक्स्ड ही रहती है। मार्क्स लिखते हैं:

“तरल पूँजी के तत्व भी उत्पादन-प्रकिया में उसी स्थायी रूप में फिक्स्ड होते हैं – अगर उसे निरन्तरतापूर्ण होना है – जितना कि अचल पूँजी के तत्व होते हैं। लेकिन जहाँ चल पूँजी के तत्व जो इस प्रकार फिक्स्ड होते हैं उन्हें भौतिक रूप में लगातार पुनर्नवीकृत किया जाता है (अगर वे उत्पादन के साधन हैं तो उसी प्रकार के नये तत्वों द्वारा; अगर वह श्रमशक्ति है तो बार-बार दुहराई जाने वाली ख़रीद के द्वारा), वहीं दूसरी ओर अचल पूँजी के तत्व जब तक काम करना जारी रखते हैं, उनका पुनर्नवीकरण नहीं किया जाता और न ही उनकी ख़रीद को बार-बार दुहराया जाता है। कच्चा माल व सहायक सामग्री लगातार उत्पादन-प्रक्रिया में मौजूद होते हैं, लेकिन वे हमेशा पुरानी क़िस्म की नयी चीज़ें होते हैं, क्योंकि इसी क़िस्म की पुरानी चीज़ें उत्पादित माल के निर्माण में ख़र्च हो जाती हैं। उतनी ही निरन्तरता के साथ श्रमशक्ति भी उत्पादन-प्रक्रिया में मौजूद होती है, लेकिन बार-बार दुहराई जाने वाली अपनी ख़रीद के साथ, और अक्सर नये व्यक्तियों के साथ। लेकिन वही इमारतें, मशीनें, आदि इसी बार-बार दुहराई जाने वाली उत्पादन प्रक्रिया में काम करना जारी रखते हैं, जबकि तरल पूँजी का टर्न ओवर बार-बार होता रहता है।” (वही, पृ. 248, अनुवाद हमारा)

यहाँ पहुँचकर मार्क्स चल और अचल पूँजी के अन्तर पर अपनी चर्चा को विराम देते हैं। इसके बाद, मार्क्स पूँजी के सकल टर्नओवर (aggregate turnover of capital) की चर्चा पर आते हैं, जो पूँजीवादी उत्पादन पद्धति के विश्लेषण में पुनरुत्पादन से जुड़ा एक अहम प्रश्न है।

मार्क्स इससे पहले पूँजी के दूसरे खण्ड में एडम स्मिथ और रिकार्डो की चल व अचल पूँजी के बारे में समझ की विस्तृत आलोचना पेश करते हैं। उसके कुछ बिन्दुओं पर हमने संक्षेप में चर्चा की है। हमने अपने लिए जो तात्कालिक कार्यभार तय किया है, उसके अन्तर्गत हम मार्क्स द्वारा रखी गयी इन आलोचनाओं के विस्तार में नहीं जा सकते। क्लासिकीय बुर्जुआ राजनीतिक अर्थशास्त्र की विभिन्न मसलों पर और आम तौर पर उसकी पहुँच और पद्धति के सवाल पर मार्क्स की क्रान्तिकारी वैज्ञानिक आलोचना के विषय में हम कभी अलग से विस्तार से लिखेंगे। लेकिन फिलहाल हम मार्क्स द्वारा पूँजी के सकल टर्नओवर पर विस्तृत चर्चा करेंगे, जिससे कि पूँजीवादी व्यवस्था में पुनरुत्पादन के प्रश्न से जुड़ी समस्याओं पर अपनी चर्चा को आगे बढ़ा सकें।

(अध्याय 6 अगले अंक में जारी)

 

मज़दूर बिगुल, अप्रैल-मई 2026