नोएडा और मानेसर के मज़दूर संघर्षों में कौन “बाहरी” और कौन “भीतरी”
गायत्री भारद्वाज
जब भी कहीं मज़दूरों की कोई हड़ताल या आन्दोलन शुरू होता है, तो उसमें सक्रिय ट्रेड यूनियन कार्यकर्ताओं और मज़दूर संगठन के राजनीतिक कार्यकर्ताओं पर पुलिस प्रशासन और सरकार “बाहरी तत्व” होने की तोहमत लगाते हैं। उनके अनुसार, जो स्वयं उस शहर या औद्योगिक क्षेत्र में कारखाने में काम नहीं करता, उसे मज़दूरों के मसले पर बोलने का या उनके आन्दोलन में शिरक़त करने का कोई अधिकार नहीं है। यह हुक्मरानों का पुराना “तर्क” है। बल्कि कहना चाहिए कि कुतर्क है। नोएडा के मज़दूर आन्दोलन में सक्रिय मज़दूर कार्यकर्ताओं, श्रम अधिकार कार्यकर्ताओं, छात्र कार्यकर्ताओं और उसका समर्थन करने वाले बुद्धिजीवियों मसलन सत्यम वर्मा, आदित्य आनन्द, रूपेश राय, हिमांशु ठाकुर, सृष्टि, आकृति आदि पर नोएडा पुलिस ने यही “बाहरी” होने का आरोप लगाया। उसी प्रकार मानेसर में गिरफ्तार कार्यकर्ता साथियों श्यामबीर और हरीश पर भी ये ही आरोप लगाये गये हैं। तो हमें इस आरोप का पूरा कुतर्क समझ लेना चाहिए।
“बाहरी” और “भीतरी” की बात करते समय पहला सवाल यह उठता है कि किस वस्तु के बाहर या भीतर? मज़दूर इसी समाज का हिस्सा होते हैं और इस समाज के हिस्से के तौर पर ही वे मालिकों और सरकार से अपनी जायज़ माँगों को लेकर संघर्ष करते हैं। उनके संघर्ष में इस समाज का कोई भी व्यक्ति आवाज़ उठा सकता है चाहे वह स्वयं मज़दूर हो या न हो। चाहे वह छात्र हो, बुद्धिजीवी हो, या जनवादी व नागरिक अधिकार कार्यकर्ता, उन्हें संवैधानिक तौर पर इस बात का पूरा अधिकार है कि वे जनता के किसी भी संघर्ष में हिस्सेदारी कर सकते हैं और उसका समर्थन कर सकते हैं। जब देश का संविधान इस बात की इजाज़त देश के नागरिकों को देता है तो किसी पुलिस विभाग या सरकार के पास यह शक्ति कैसे हो सकती है कि किसी भी संघर्ष में उनकी भागीदारी या उनके समर्थन को ग़ैर-क़ानूनी क़रार दे और गोदी मीडिया का इस्तेमाल कर उसके प्रति देश में दुष्प्रचार करे?
दूसरी बात यह कि अगर मालिकान-प्रबन्धन और मज़दूरों के बीच के विवाद की बात की जाय, तो पुलिस की ही परिभाषा से उसमें “भीतरी” तत्व तो केवल मज़दूर और मालिकान-प्रबन्धन हुए। फिर वहाँ पुलिस, भाजपा के नेता, अन्य पूँजीवादी चुनावी पार्टियों के नेता क्या करने जाते हैं? जब तक कोई क़ानून-व्यवस्था की स्थिति पैदा नहीं होती, तब तक सरकार को मज़दूरों और मालिकान-प्रबन्धन को अपना विवाद स्वयं निपटाने के लिए छोड़ देना चाहिए क्योंकि पुलिसवाले और भाजपा व तमाम पूँजीवादी पार्टियों के नेता भी न तो स्वयं मज़दूर हैं और न ही कारखाना मालिक या प्रबन्धन हैं। फिर मालिकों के हितों की रक्षा करने के नाम पर पुलिस और प्रशासन तथा तमाम पूँजीवादी नेता हड़तालों में दख़लन्दाज़ी क्यों करते हैं? हड़ताल करना तो मज़दूरों का संवैधानिक और क़ानूनी अधिकार है। ऐसा करके वे कोई भी क़ानून नहीं तोड़ रहे हैं, कोई भी असंवैधानिक हरक़त नहीं कर रहे हैं। तो फिर उद्योग जगत और मज़दूर जगत से बाहर की एक “बाहरी” ताक़त यानी पुलिस, प्रशासन व पूँजीवादी पार्टियों के नेता वहाँ क्या करने जाते हैं? यह तो एक श्रम विवाद है! क़ानून के ही अनुसार अगर वहाँ किसी को जाना चाहिए तो वह श्रम विभाग के अधिकारी, मालिक व प्रबन्धन के लोग हैं। लेकिन पुलिस सीधे तौर पर इन हड़तालों को कुचलने में संलग्न होती है। तब “बाहरी” का सवाल नहीं उठता? “बाहरी”- “भीतरी” का सवाल केवल मज़दूरों के प्रतिनिधियों और ट्रेड यूनियन कार्यकर्ताओं व सामाजिक कार्यकर्ताओं के मज़दूर आन्दोलन का समर्थन करने या उसमें भागीदारी करने पर उठता है?
तीसरी बात, ऐतिहासिक तौर पर भी देखें तो हर प्रकार के नेता व राजनीतिक कार्यकर्ता, चाहे वे मज़दूरों के प्रतिनिधि हों, किसानों के प्रतिनिधि हों, या फिर पूँजीपति वर्ग के प्रतिनिधि हों, हर प्रकार के संघर्ष में जाते रहे हैं, चाहे वे उनके इलाके या पेशे में हों या किसी और इलाके या पेशे में। अगर कोई ट्रेड यूनियन कार्यकर्ता, छात्र कार्यकर्ता, या कोई भी सामाजिक व राजनीतिक कार्यकर्ता मज़दूर आन्दोलन के समर्थन में जाता है या मज़दूर संघर्षों में भागीदारी करता है और इसके आधार पर उसे “बाहरी” बताया जाता है तो महात्मा गाँधी चम्पारन के किसान आन्दोलन के लिए “बाहरी तत्व” थे, भगतसिंह, राजगुरू, सुखदेव, चन्द्रशेखर आज़ाद भी अपने इलाकों से बाहर जहाँ भी स्वतन्त्रता संग्राम में हिस्सेदारी कर रहे थे, वे उनके लिए “बाहरी तत्व” थे, और अंग्रेज़ सरकार उस समय इस प्रकार का प्रचार करती भी थी कि ये “बाहरी तत्व” हैं। वैसे तो नरेन्द्र मोदी भी बनारस के लिए एक “बाहरी तत्व” हैं, क्योंकि एक गुजराती का बनारस में क्या काम? योगी आदित्यनाथ उर्फ़ अजय सिंह बिष्ट भी उत्तराखण्ड से बाहर हर जगह “बाहरी तत्व” ही माने जाने चाहिए।
आप देख सकते हैं कि किस प्रकार पूँजीपति वर्ग, उसकी सरकार और उसकी पुलिस मज़दूरों को उनके संघर्ष में समाज से काट देने की साज़िश करती है। धन्नासेठों और अमीरज़ादों को तो अपनी हितों की नुमाइन्दगी करने के लिए कहीं से भी नेता और कार्यकर्ता मिल सकते हैं, चाहे वे उनके वर्ग, जाति या इलाके से हों या न हों। लेकिन जब मज़दूर अपने जायज़ हक़ों के लिए लड़ते हैं, तो समाज के बाक़ी प्रगतिशील समूहों, व्यक्तियों, दलों आदि से उनको काट दिया जाता है यह कहकर कि वे लोग “बाहरी” हैं। वास्तव में, जनता और उसके संघर्षों के लिए कोई बाहरी तत्व है तो वह पूँजीवादी सरकारें, पूँजीपति वर्ग और उनका पुलिस व प्रशासन हैं क्योंकि जनता का संघर्ष ही उनके ख़िलाफ़ है। लेकिन उनको “भीतरी” बना दिया जाता है! और मज़दूरों के संघर्ष के वास्तविक सहयात्रियों, समर्थकों और भागीदारों को “बाहरी” घोषित कर उनके विरुद्ध दुष्प्रचार किया जाता है। नोएडा में गिरफ्तार किये गये मज़दूर व ट्रेड यूनियन कार्यकर्ताओं, बुद्धिजीवियों, छात्रों आदि को भी पुलिस यही बोलकर जनता के सामने “बाहरी” साबित करने की कोशिश कर रही है। लेकिन इस परिभाषा से ही श्रम विवाद के मामले में “भीतरी” तो कमिश्नर लक्ष्मी सिंह भी नहीं हैं और उत्तर प्रदेश के मुख्यमन्त्री योगी आदित्यनाथ भी नहीं हैं। आदित्यनाथ को भी केरल से लेकर बंगाल और मध्य प्रदेश से लेकर हिमाचल प्रदेश में चुनावी रैली नहीं करनी चाहिए क्योंकि वे भी वहाँ “बाहरी” ही हैं।
ये बातें मज़दूर वर्ग को धोखा देने और उसे मूर्ख बनाने के लिए की जाती हैं। इन पर मज़दूर वर्ग और आम मेहनतकश जनता को कभी ध्यान नहीं देना चाहिए और ऐसी बातों का पुरज़ोर विरोध करना चाहिए। यह मज़दूर वर्ग को अकेला और निहत्था कर देने, बाक़ी जनता से उसे काट देने की साज़िश का हिस्सा है। और जब मज़दूर वर्ग जनता के बाक़ी हिस्सों से कट जाता है, तो उसका दमन करना पूँजीवादी व्यवस्था के लिए आसान हो जाता है। नोएडा और मानेसर में भी भाजपा की राज्य सरकारें, उसकी पुलिस और उसका गोदी मीडिया यही पुराना ‘टेम्पलेट’ इस्तेमाल कर रहा है। मज़दूरों को इस साज़िश को पहचानना चाहिए और इसे नाक़ाम करना चाहिए। न्याय के संघर्ष में कोई भी “बाहरी” नहीं होता क्योंकि न्याय की सोच ही सार्वभौमिक है और कोई स्वयं व्यक्तिगत तौर पर किसी अन्याय से प्रभावित हो या न हो, उसे उस अन्याय के विरुद्ध आवाज़ उठाने का पूरा जनवादी व संवैधानिक अधिकार होता है।
मज़दूर बिगुल, अप्रैल-मई 2026













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