जीएसटी 2.0 : पाँव के नीचे से ज़मीन खिसकती देखकर मोदी-शाह सरकार द्वारा जनता के साथ एक और धोखाधड़ी
सच तो यह है कि जीएसटी में “सुधार” से कोई बुनियादी फ़र्क नहीं आयेगा और महँगाई दर में मामूली-सा अन्तर आयेगा, जबकि ज़रूरत यह थी कि इन अप्रत्यक्ष करों को समाप्त या लगभग समाप्त किया जाता, विशेष तौर पर उन वस्तुओं और सेवाओं पर जिनका उपयोग आम तौर पर आम मेहनतकश जनता करती है। शिक्षा, चिकित्सा, आदि बुनियादी सुविधाओं और उनसे जुड़ी वस्तुओं व सेवाओं पर तो जीएसटी लगाने का कोई अर्थ ही नहीं है। मोदी सरकार ने उन्हें ख़त्म करने के बजाय उनमें मामूली-सी कमी की है और इसी का डंका बजाकर श्रेय लेने की कोशिश कर रही है।























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