Tag Archives: शिशिर गुप्ता

कोलकाता में वाउ मोमो और पुष्पांजलि डेकोरेटर्स के गोदामों में आग से झुलसकर हुई मज़दूरों की मौत

मज़दूर वर्ग अपने तजुर्बे से जानता है कि अभी तक की जो भी सीमित कार्रवाई हुई है, वो सबकुछ बस दिखाने के लिए है। पश्चिम बंगाल में मुख्य विरोधी दल, भाजपा भी मौका भुनाने के लिए विरोध कर रही है, लेकिन तृणमूल कांग्रेस और भाजपा की ये कुत्ताघसीटी सिर्फ़ पूँजीवादी चुनाव प्रणाली में अपनी रोटियाँ सेंकने के लिए है। मज़दूरों का खून पसीना नोचने के सवाल पर इन सारे के सारे दलों में आम सहमति है।

कड़कड़ाती ठण्ड और ‘स्मॉग’ के बीच मज़दूर वर्ग का जीवन

नगर निगम मध्यम वर्गीय इलाक़ों का कूड़ा मज़दूर बस्तियों के पास कहीं पाट कर वहाँ की आबोहवा ज़हरीली बनाते हैं और पूँजीपति खुलेआम बिना फ़िल्टर वाली चिमनियों का प्रयोग करते हैं। यह भी इस पूरी व्यवस्था की वर्गीय पक्षधरता ही है कि परिवहन के क्षेत्र में भी हुई अभूतपूर्व तकनीकी प्रगति का इस्तेमाल सार्वजनिक यातायात को बेहतर बनाने की बजाय अमीरों के लिए लग्ज़री कारों को बनाने में किया जाता है।

भारतीय रेल : वर्ग-समाज का चलता-फिरता आर्इना

ये जनरल डिब्बों में भेड़-बकरियों की तरह चलने वाले 92 प्रतिशत लोग कौन हैं? असल में भारत में लगभग 93 प्रतिशत लोगों के यहाँ उनके परिवार के कुल सदस्यों के द्वारा कमाई जाने वाली राशि 10000 रुपये से भी कम है, जबकि हर परिवार में औसतन 5 लोग रहते हैं। ये 93 प्रतिशत लोग छोटे-मँझोले किसान, खेतिहर मज़दूर, रिक्शेवाले, दिहाड़ी पर काम करने वाले शहरी मज़दूर इत्यादि हैं जिनके दम पर आज भारत तथाकथित विकास की राह पर तेज़ी से आगे बढ़ रहा है, जिनके दम पर ट्रेनों के वातानुकूलित डिब्बों के शीशों को चमकाया जा रहा है, मगर जो ख़ुद शौचालय जैसी मूलभूत आवश्यकताओं की निहायत ही घटिया हालतों वाले डिब्बों में चलने के लिए मजबूर हैं। यहाँ तक कि लम्बी दूरी वाली ट्रेनों में तो शौचालय में ही 5 से 7 लोग भरे होते हैं, इस पूरे समाज का अपने ख़ून-पसीने से निर्माण करने वाली मेहनतकश अवाम के आत्मसम्मान पर भला इससे बड़ा आघात और क्या हो सकता है?

छत्तीसगढ़ में आदिवासियों के ख़ि‍लाफ़ सरकार का आतंकी युद्ध एक नये आक्रामक चरण में

तमाम मुखर आवाज़ों के बर्बर दमन के अलावा राज्यसत्ता सर्वोच्च न्यायालय द्वारा प्रतिबन्ध‍ित किये गये सलवा जुडूम को ही दूसरे नामों से फिर से शुरू करने की कोशिश में है। सलवा जुडूम की ही तर्ज़ पर वहाँ ‘बस्तर विकास संघर्ष समिति’, ‘महिला एकता मंच’ और ‘सामाजिक एकता मंच’ जैसे कई नये समूह उभर कर आ रहे हैं। देश की सबसे भ्रष्ट राज्‍य सरकारों में से एक, छत्तीसगढ़ की रमन सिंह सरकार ”माओवाद” से लड़ने के नाम पर अपने तमाम कुकर्मों पर पर्दा डालने में लगी है।

मोदी सरकार के ख़िलाफ़ बेंगलुरु की स्त्री गारमेंट मज़दूरों ने संभाली कमान

घर, कारखाने से लेकर पूरे समाज में कदम कदम पर पितृसत्ता और बर्बर पूँजीवाद का दंश झेलने वाली महिला मज़दूरों ने इस आन्दोलन की अगुआई की, पुलिसिया दमन का डटकर सामना किया और अपने हक़ की एक छोटी लड़ाई भी जीती। यह छोटी लड़ाई मज़दूर वर्ग के भीतर पल रहे जबर्दस्त गुस्से का संकेत देती है। इस आक्रोश को सही दिशा देकर महज़ कुछ तात्कालिक माँगों से आगे बढ़कर व्यवस्था परिवर्तन की दिशा में मोड़ने की चुनौती आज के दौर की सबसे बड़ी चुनौती है।

ख़ुद की ज़िन्दगी दाँव पर लगा महानगर की चमक-दमक को बरकरार रखते बंगलूरू के पोराकर्मिका (सफ़ाईकर्मी)

आख़िर क्या वजह है कि आज जब विज्ञान और प्रौद्योगिकी में ज़बरदस्त ढंग से बढ़ोत्तरी हो चुकी है यानि की जब सफ़ाई से जुड़ा बहुत सारा काम ऑटोमेटिक मशीनों के द्वारा ही संचालित किया जा सकता है फ़िर भी उसमें मनुष्यों को क्यों लगाया जा रहा है? और लगाया भी जा रहा है तो काम करने के इतने गंदे हालातों में क्यों? जवाबदेह अधिकारियों पर हमें निश्चित तौर पर ऊँगली उठानी चाहिए, पर यह पर्याप्त नहीं होगा क्योंकि अधिकारीयों के क्रूर आचरण के अलावा इस पूरी व्यवस्था का ढांचा भी सफ़ाई कर्मचारियों की दुर्दशा के लिए जिम्मेदार है। यह व्यवस्था ही ऐसी है जिसमें अमीर-ग़रीब की खाई का दिन पे दिन गहराते जाना अवश्यम्भावी है। और ऐसा किया जाता है मजदूरों का श्रम ज्यादा से ज्यादा निचोड़ के, यानि उनके श्रम की कीमत पर अधिकतम मुनाफ़ा बनाने की होड़ में। और इस मुनाफ़ा केन्द्रित व्यवस्था में इसीलिए स्वचालित मशीनों की बजाय मनुष्यों से काम लिया जा रहा है क्योंकि ठेके पर मज़दूरी कराकर इंसानों का खून पीना ‘फिलहाल’ सस्ता है।