भाजपा और संघ परिवार के गाय-प्रेम और गोरक्षा के बारे में सोचने के लिए कुछ सवाल
अगर आपके दरवाज़े कोई गोरक्षा, लव जिहाद, ‘चीन का ख़तरा’, ‘पाकिस्तान का ख़तरा’ जैसे फ़र्ज़ी मसले लेकर आता है तो उसे उचित रूप में “खर्चा-पानी” देकर दफ़ा करें। हमारा दुश्मन हमारे देश के भीतर है। जब हम कम मज़दूरी के ख़िलाफ़ लड़ते हैं तो हमें दबाने के लिए पूँजीपति और फासीवादी सरकार की पुलिस और गुण्डे आते हैं; जब हम बेहतर कार्यस्थितियों की माँग करते हैं, तो हमें मौजूदा व्यवस्था और सरकार दबाती है; जब हम समानता और इज़्ज़त से भरी ज़िन्दगी माँगते हैं तो हमें कुचलने के लिए मालिक, ठेकेदार, जॉबर, व्यापारी, धनी फ़ार्मर व ज़मीन्दार आ जाते हैं। तो हम किसी चीनी या पाकिस्तानी नकली दुश्मन से लड़ने को क्यों बावले हों? चीन और पाकिस्तान के मज़दूर-मेहनतकश भी अपने हुक्मरानों से उसी क़दर तंग हैं, जिस क़दर हम यहाँ के फ़ासीवादी शासकों से तंग हैं। वे तो हमारे भाई-बहन हैं। उनसे हमारी भला क्या दुश्मनी? क्या वे हमें यहाँ दबाने और लूटने आते हैं? कौन हमें यहाँ दबा और लूट रहा है? कौन हमें गोरक्षा और लव-जिहाद जैसे फ़र्ज़ी मसलों पर लड़ा रहा है ताकि हम टूट जायें और कमज़ोर रहें?






















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