महाराष्ट्र नगर निगम चुनाव: अहमदनगर नगर निगम चुनाव में भारत की क्रान्तिकारी मज़दूर पार्टी (RWPI) 17 प्रतिशत आबादी की पसन्द बनकर तीसरे स्थान पर रही
चुनावी धाँधली और घोटालों के बीच भाजपा–महायुती की अपेक्षित विजय, भारत की क्रान्तिकारी मज़दूर पार्टी को मिलाजुला प्रतिसाद और आगे की लड़ाई का प्रश्न

निखिल एकडे 

महाराष्ट्र में हुए 2026 नगर निगम चुनाव परिणामों ने एक बार फिर यह स्पष्ट किया है कि वर्तमान चुनाव प्रक्रिया में पूँजी और फ़ासिस्ट हस्तक्षेप का प्रभाव निरन्तर बढ़ रहा है। भाजपा के नेतृत्व वाली महायुती ने 29 में से 23 नगर निगमों में सत्ता स्थापित कर व्यापक विजय हासिल की है। 2014 के बाद के चुनावी इतिहास को देखते हुए यह जीत अप्रत्याशित बिलकुल ही नहीं थी, किन्तु इसके पीछे अपनाये गये साधनों एवं किये गये घपलों ने फ़ासीवाद की कार्यदिशा को फिर से एक बार रेखांकित किया है, जिसमें वह जनवाद का चेहरा बनाये रखते हुए उसे अन्दर से पूरी तरह खोखला किये जा रहा है|

भारत की क्रान्तिकारी मज़दूर पार्टी (RWPI) ने अहिल्यानगर/अहमदनगर में वार्ड 5, पुणे में वार्ड 39, मुंबई में वार्ड 140, 141 से चुनाव में हस्तक्षेप किया. इस चुनाव में भी पूँजीवादी चुनाव प्रणाली में क्रान्तिकारी हस्तक्षेप के सिद्धान्त के अनुरूप तथा सम्पूर्णतः मज़दूर एवं न्यायप्रिय जनता के आर्थिक सहयोग से चुनाव लड़ा। अभियान मज़दूरों एवं युवा स्वयंसेवकों के परिश्रम पर आधारित रहा तथा सर्वत्र मेहनतकश जनता ने इसका उत्साहपूर्वक स्वागत किया।

हम जानते हैं कि पूँजीवादी चुनाव में अंतत: पूँजी की शक्ति ही निर्णायक साबित होती हैं। आर.डब्लू.पी.आई. के उम्मीदवार को अहिल्यानगर/अहमदनगर में 1740 वोट मिले (जो पूरे वोटों में लगभग 17 प्रतिशत है। मज़दूर पार्टी के उम्मीदवारों को मुम्बई में वार्ड 140 में 79, वार्ड 141 में 133, पुणे वार्ड 39 में 456 वोट मिले।

अहिल्यानगर/अहमदनगर में सत्ता पक्ष की ओर से प्राप्त धमकियों एवं प्रलोभनों को नकारते हुए, धमकियों का जनता के समर्थन के बल पर सामना करते हुए मज़दूर पार्टी ने चुनावों में हस्तक्षेप किया। जातिगत आधार पर प्रचार प्रस्तावों को वैचारिक आधार पर पार्टी ने दॄढता से नकारा। मज़दूर वर्गीय विचारधारा और राजनीति पर अडिग रहते हुए भारत की क्रान्तिकारी मजदूर पार्टी 1740 वोट के साथ 17 प्रतिशत आबादी की पसन्द बनकर तीसरे स्थान पर रही। ये भारी समर्थन पार्टी के मज़दूर वर्गीय विचारों, वर्षों से चले आ रहे क्रान्तिकारी सुधार कार्यों एवं आन्दोलनों के प्रति जनता के समर्थन का प्रतीक है। यह युवाओं एवं मज़दूरों द्वारा निर्मित एकता का प्रमाण है और यही एकता हमारी वास्तविक शक्ति तथा दीर्घकालिक संघर्ष की प्रारम्भिक विजय है।

महाराष्ट्र में कुल 29 नगर निगमों में चुनाव हुए और भाजपा के नेतृत्व वाली महायुती ने 29 में से 23 नगर निगमों में सत्ता स्थापित कर विजय हासिल की है। पर इस बड़ी जीत को फ़ासिस्टों को मिला व्यापक जनसमर्थन मानना भारी भूल होगी। पूरी चुनावी प्रक्रिया मतक्षेत्रों के पुनर्गठन, मतदाता सूची में बदलाव, करियरवादी उम्मीदवारों की ख़रीद-फ़रोख़्त, विरोधी नामांकनों को रद्द करवाना, दबाव और धन बल से 68 निर्विरोध निर्वाचन, मिटाई जा सकने वाली स्याही का उपयोग, दोहरे मतदाताओं का प्रयोग और ईवीएम से सम्बन्धित बहुत सारे आरोपों से सनी रही। ये तथाकथित लोकतान्त्रिक चुनाव के भारी बाज़ारीकरण और बड़े पैमाने पर फ़ासिस्ट नियन्त्रण के ठोस संकेत हैं। स्थानीय स्तर पर अलग-अलग रंगों और झण्डों वाली भाजपा–एमीम, भाजपा–कांग्रेस, कांग्रेस–शिवसेना, कांग्रेस–मनसे, शिवसेना–मनसे और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के धड़ों के खुले या छुपे गठबन्धनों ने और चुनावों के बाद इन पूँजीवादी पार्टियों द्वारा सत्ता के समीकरण बिठाने के लिए जो तिकड़मबाज़ी चल रही है, उसने इन दलों की वैचारिक धोखाधड़ी और छलकपट की पूँजीवादी राजनीति को पुनः उजागर किया है।

यह भी स्पष्ट हुआ कि किसी भी प्रकार की जनवादी मोर्चा की राजनीति मज़दूर वर्ग को फ़ासीवाद-विरोधी संघर्ष में कहीं नहीं ले जाएगी। जनवादी मोर्चों का यथार्थ पुनः खुलकर सामने आया तथा मज़दूर वर्ग के नेतृत्व वाले फासीवाद-विरोधी जन आन्दोलन की आवश्यकता एवं महत्त्व पुनः रेखांकित हुआ। चुनावी ज़मीन के अलावा तृणमूल स्तर पर फ़ासीवादी हमलों के प्रतिरोध हेतु मज़दूर वर्ग के शक्तिशाली आन्दोलन को खड़ा करने की आवश्यकता अब और अधिक तीव्र हुई है।

मजदूर मेहनतकश जनता का संघर्ष जारी रहेगा

इन हालात में अहमदनगर/अहिल्यानगर में मिला समर्थन निश्चित ही ज़रूरी सीख देता है | भारत की क्रान्तिकारी मज़दूर पार्टी (RWPI) के नेतृत्व में लड़कर जनता ने अब तक जो कुछ भी प्राप्त किया – चाहे वह पीने के पानी की पाइपलाइन हो, बिजली के ट्रांसफॉर्मर हो, साफ गटर-नालियाँ हों अथवा बच्चों का स्कूल में प्रवेश – इन सभी को हमने सामूहिक संघर्ष, दबाव निर्माण एवं सत्ता को विवश कर हासिल किया है। इससे यह बात रेखांकित होती है कि विचारधारात्मक-राजनीतिक प्रचार-प्रसार के साथ ही जनता के असली हक़ों के संघर्ष और निरन्तर क्रान्तिकारी सुधार कार्य वह तरीका है जिसे मज़दूर वर्ग के राजनितिक कार्यकर्ताओं को लगन के साथ लागू करना होगा और पूँजीवादी चुनावी राजनीति का सशक्त विकल्प जनता के सामने रखना होगा | अन्य जगहों पर आर.डब्लू.पी.आई. को मिला कम समर्थन एक तरफ क्रान्तिकारी विचारधारा और राजनीति की जनता में कमज़ोर पैठ को दर्शाता है, और दूसरी तरफ़ हर तरीक़े की अस्मितावादी राजनीति, विशेष तौर पर धर्म, जाति, और प्रान्त के नाम पर की जाने वाली राजनीति के प्रभाव को दर्शाता है। चुनावों में भाजपा के बाद ओवैसी की पार्टी (एमीम) जैसी मुस्लिम अस्मितावादी और शिवसेना जैसी मराठी अस्मितावादी पार्टी को मिली ‘सफलता’ इसी को दर्शाती है।

चुनाव आते-जाते रहेंगे, किन्तु मज़दूर एवं मेहनतकश वर्ग का वास्तविक संघर्ष सड़क पर है – सम्मानजनक जीवन हेतु, रोजगार-शिक्षा-स्वास्थ्य जैसे मूलभूत अधिकारों हेतु तथा पूँजीवाद और विशेषतः फ़ासीवाद के विरुद्ध क्रान्तिकारी सामाजिक आंदोलन के निर्माण हेतु।

आने वाले दिनों में ज़्यादातर नगर निगमों में पुनः फ़ासीवादी भाजपा नेतृत्व वाली महायुती और कुछ एक नगर निगमों में दूसरी चुनावबाज़ पार्टीओं का शासन स्थापित होने वाला है। नगर निगमों में बिल्डरों, ठेकेदारों, दलालों, व्यापारियों और बड़े–छोटे पूँजीपतियों के हाथ में सत्ता पहले की तरह बनी रहेगी। लूट, निजीकरण, ठेकेदारी व्यवस्था, नगरीय जनसुविधाओं की कमी, बस्तियों की बदहाली, नशाख़ोरी, अपराध तथा जाति-धर्म-भाषा आधारित संघर्ष यथावत् बने रहेंगे। पूंजीपति वर्ग की लूट पहले की तरह जारी रहेगी – केवल उसकी लूट के आपसी बँटवारे में छोटा-मोटा परिवर्तन होगा।

इसके ख़िलाफ़ मज़दूर-मेहनतकश आबादी का कार्यभार है मज़दूर वर्गीय राजनीति के आधार पर एकजुट होना तथा अन्याय के विरुद्ध संघर्ष करना। पूँजीवादी चुनाव उसका मात्र एक छोटा एवं सीमित अंग है। वास्तविक संघर्ष सड़कों पर, संगठित मज़दूर समुदायों में और सामाजिक आन्दोलनों के माध्यम से संचालित होता है। अन्ततः मजदूर-मेहनतकश जनता को राजनीतिक दृष्टि से सजग होकर, संगठित शक्ति बनकर संघर्ष करना होगा – तभी उसे अपने अधिकार प्राप्त होंगे। समाज के क्रान्तिकारी रूपान्तरण, शोषण के अन्त, जाति व्यवस्था-धर्मवाद तथा स्त्री-पुरुष असमानता के उन्मूलन हेतु मज़दूर वर्ग की सत्ता के लिए संघर्ष अपरिहार्य है। आर.डब्लू.पी.आई. मज़दूर वर्ग एवं मेहनतकश जनता को संगठित कर इस संघर्ष को नये संकल्प के साथ आगे बढ़ाने के लिए प्रतिबद्ध है।

इसके लिए संगठित ढाँचों का निर्माण, राजनीतिक चेतना का प्रसार और वर्ग आधारित एकता स्थापित करने के आह्वान को हमें स्वीकारना ही होगा |

 

मज़दूर बिगुल, जनवरी 2026

 

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