ईरान पर अमेरिकी और इज़रायली साम्राज्यवादी-ज़ायनवादी हमले के मायने
आनन्द
पिछली 28 फ़रवरी को साम्राज्यवादी अमेरिका और पश्चिम एशिया में उसके लठैत ज़ायनवादी इज़रायल ने सभी अन्तरराष्ट्रीय क़ानूनों की धज्जियाँ उड़ाते हुए बिल्कुल एकतरफ़ा ढंग से ईरान पर हमला कर दिया। ग़ौरतलब है कि इस हमले के ठीक पहले अमेरिका और ईरान के बीच आण्विक हथियारों के मसले को लेकर ओमान की मध्यस्थता में बातचीत चल रही थी और ओमान के विदेश मंत्री के अनुसार बातचीत सकारात्मक दिशा में जा रही थी। लेकिन अमेरिका ने धोखाधड़ी की नयी मिसाल पेश करते हुए ईरान पर हमला करके अपना साम्राज्यवादी चेहरा दुनिया के सामने एक बार फिर से उजागर कर दिया।
यह बात दीगर है कि इस हमले की तात्कालिक वजह विशिष्ट सन्धि-बिन्दु से उत्पन्न हुए राजनीतिक कारक हैं। यह बात आज सामने आ चुकी है कि अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प एप्स्टीन फ़ाइल्स से पैदा हुए राजनीतिक संकट के भँवर में बुरी तरह फँसा हुआ था। इस मसले में ट्रम्प चूँकि व्यक्तिगत तौर पर खुद फँसा हुआ है, इसलिए इस बार इज़राइल इस विशिष्ट मसले की वजह से उसकी बाँह मरोड़ने में कामयाब रहा और ईरान पर हमले के लिए उसने ट्रम्प को मना लिया। यह बात भी किसी से छिपी नहीं है कि जेफ़री एप्स्टीन ख़ुद इज़रायल का एक एजेण्ट था, इसलिए ट्रम्प के तमाम कुकृत्यों में संलिप्तता के प्रमाण इज़रायल के पास होने की पूरी सम्भावना है। इज़रायल पिछले 45 वर्षों से अमेरिका को ईरान पर हमले के लिए उकसाता रहा है। लेकिन अभी तक किसी अमेरिकी राष्ट्रपति ने यह गुस्ताख़ी करने की हिम्मत नहीं की थी। हालाँकि इस गुस्ताख़ी के परिणाम भी अमेरिका और इज़राइल को हर बीतते दिन के साथ झेलने पड़ रहे हैं!
जवाबी कार्रवाई में ईरान ने इस साम्राज्यवादी हमले का मुँहतोड़ जवाब दिया है और उसने इज़रायल पर लगातार मिसाइलें दागकर वहाँ भयंकर तबाही मचायी है जिसकी वजह से बुज़दिल इज़रायली औपनिवेशिक सेना (आईडीएफ़) मुँह छिपाकर इधर-उधर भागती फिर रही है। इसके अलावा खाड़ी के देशों में स्थित अमेरिकी सैन्य अड्डों पर भी ईरान लगातार हमला कर रहा है और उन्हें बड़े पैमाने पर क्षति पहुँचा रहा है। ईरान ने होर्मूज़ जलसन्धि को बन्द करके दुनियाभर में प्राकृतिक गैस व तेल की क़ीमतों का संकट पैदा कर दिया है। अमेरिका में तो यह संकट और भी विकराल रूप ले रहा है क्योंकि अमेरिकी लोग ईंधन की भारी खपत करते हैं और पश्चिम एशिया के ईंधन पर उसकी पूरी अर्थव्यवस्था काफी ज़्यादा निर्भर है। यही कारण है कि ट्रम्प रोज़ कभी यूरोप व जापान के सामने यह रास्ता खुलवाने के लिए गुहार लगा रहा है, तो कभी चीन व रूस को इस मसले पर हस्तक्षेप करने के लिए सन्देश भेज रहा है!
उधर ईरान की जवाबी कार्रवाई से बौखलाकर इज़रायल लेबनान में भी भीषण बमबारी कर रहा है। इस प्रकार समूचा पश्चिम एशिया युद्ध की आग में झुलस रहा है। इस आग की लपटें पूरी दुनिया में तेज़ी से फैल रही हैं क्योंकि भारत और चीन (हालाँकि ईरान द्वारा चीन को ईंधन की आपूर्ति में कोई कमी नहीं की गयी है) सहित दुनिया के तमाम देशों में तेल और गैस का मुख्य स्रोत पश्चिम एशिया के देश ही हैं। इस क्षेत्र में जारी युद्ध की वजह से दुनियाभर में भीषण ऊर्जा संकट पैदा हो गया है जो आने वाले दिनों में पूँजीवादी आर्थिक संकट को और ज़्यादा गहराने का काम करेगा। कहने की ज़रूरत नहीं कि इस संकट का सबसे ज़्यादा असर दुनियाभर के मेहनतकश अवाम पर पड़ रहा है। हम अपने देश में भी देख सकते हैं कि रसोई गैस में हो रही किल्लत का असर तो सबपर पड़ा है, लेकिन मज़दूरों के घरों में तो चूल्हा बुझने की नौबत आ गयी है। इसकी वजह न केवल मोदी सरकार की हालिया विदेश नीति है बल्कि उसकी आपराधिक लापरवाही और काहिली भी है। ऐसे में हम मज़दूरों के लिए भी यह लाज़िमी हो जाता है इस युद्ध के कारणों को जाना-समझा जाये और अपना नज़रिया स्पष्ट किया जाये।
ईरान पर हुए साम्राज्यवादी हमले के तात्कालिक कारण
ऊपर हमने चलते-चलते ईरान पर इस साम्राज्यवादी हमले के तात्कालिक कारण की चर्चा की थी। लेकिन यदि हम ईरान पर हुए हमले के तात्कालिक कारणों को एक सही राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में समझना चाहते हैं तो हमें सबसे पहले हाल के महीनों में अमेरिका की राजनीति में हुए कुछ अहम घटनाक्रमों पर नज़र दौड़ानी होगी। ध्यान देने वाली बात यह है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने पिछले साल दूसरी बार राष्ट्रपति पद सँभालने से पहले अपनी चुनावी सभाओं में लोगों से वायदा किया था कि सत्ता में आने के बाद वह अमेरिका को विदेशी युद्धों में नहीं झोंकेगा। हालाँकि सत्ता में आने के बाद उसने अमेरिकी साम्राज्यवाद के लगातार गिरते वर्चस्व को सँभालने के लिए अपना असली उग्र रूप दिखाना शुरू कर दिया और ग्रीनलैण्ड से लेकर पूरे अमेरिकी महाद्वीप पर अपना दावा ठोंकने लगा। अभी इसी साल की शुरुआत में ट्रम्प ने वेनेज़ुएला पर साम्राज्यवादी हमला करके उसके राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को अगवा कर लिया था। अमेरिका के भीतर उसने प्रवासी मज़दूरों के ख़िलाफ़ मुहिम छेड़ दी जिसके ख़िलाफ़ उसे वहाँ लोगों के विरोध प्रदर्शन का सामना करना पड़ा। इसी बीच अमेरिका के भीतर विदेशी व्यापार सम्बन्धी ट्रम्प की उग्र नीतियों की आलोचनाएँ बढ़ने लगीं और अमेरिका के सर्वोच्च न्यायालय ने अमेरिका द्वारा अन्य देशों पर लगाये गये बेतहाशा आयात शुल्कों को ग़ैर-क़ानूनी करार दे दिया।
इसके अलावा ईरान पर हमले के पहले जिस तात्कालिक कारण ने ट्रम्प के राजनीतिक संकट को बढ़ाने में सबसे अहम भूमिका अदा कि वह था एपस्टीन फ़ाईल्स का खुलासा होना। अमेरिका में यौन अपराधों से जुड़ा यह बहुत बड़ा मामला सुर्ख़ियों में था जिसमें यह सामने आया कि बच्चियों के यौन शोषण का मानवद्रोही धन्धा चलाने वाले जेफ़री एपस्टीन नामक अमेरिकी व्यवसायी के रिश्ते अमेरिका ही नहीं बल्कि दुनिया के तमाम देशों के शासकों और रईसों के साथ थे जिनमें ट्रम्प भी शामिल था। एपस्टीन फ़ाइल्स के इन ख़ुलासों के बाद डोनाल्ड ट्रम्प के समर्थकों के बीच भी उसकी लोकप्रियता का ग्राफ़ गिरने लगा था और उसकी सत्ता पर ही सवालिया निशान खड़े होने लगे थे। ट्रम्प प्रशासन लगातार इन प्रमाणों को मिटाने के प्रयासों में लगा हुआ है, हालाँकि इसमें अभी उसे पूरी सफलता नहीं मिल पा रही है।
यही वह राजनीतिक परिदृश्य था जिसमें ट्रम्प ने इज़रायल के साथ मिलकर ईरान पर हमला करने का फ़ैसला किया। अगर हम अमेरिकी पूँजीपति वर्ग और उसके शासक ब्लॉक की बात करें तो यह स्पष्ट हो जाता है कि ईरान पर हमले को लेकर उसमें कोई आम सहमति नहीं थी। उल्टे उसका बड़ा हिस्सा इस हमले के ख़िलाफ़ था। हालाँकि युद्ध शुरू होने के बाद वह इससे पीछे हट भी नहीं सकता था क्योंकि यह अमेरिकी साम्राज्यवाद के बढ़ते संकट को और गहरा बना देता।
उधर इज़रायल में नेतन्याहू बहुत पहले से ही ईरान के ख़िलाफ़ युद्ध छेड़ने के लिए ट्रम्प को ललकार रहा था। पिछले साल भी अमेरिका व इज़रायल ने ईरान पर 12 दिनों का युद्ध थोपा था। ग़ज़ा में ढाई साल तक नरसंहार करने के बाद भी इज़रायल अपने मंसूबों में कामयाब नहीं हो सका। हमास व हिज़बुल्लाह के शीर्ष नेतृत्व को ख़त्म करने के बावजूद वह फ़िलिस्तीनी राष्ट्रीय मुक्ति संघर्ष को कोई प्राणान्तक चोट नहीं पहुँचा पाया है। फिलिस्तीन के समर्थन में दुनिया की जनता के आन्दोलनों का ही दबाव है कि आज इज़रायल दुनिया में अधिक से अधिक अलग-थलग पड़ता जा रहा है और कई देशों में जनता स्वतःस्फूर्त तरीक़ों से इज़रायली पर्यटकों को भगा रही है। नेतन्याहू ईरान पर हमला करके इज़रायल में युद्धोन्माद बनाये रखना चाहता है ताकि वह प्रधानमंत्री की गद्दी पर बना रहे। उधर ट्रम्प इस मुग़ालते में जी रहा था कि वह वेनेज़ुएला की ही तरह महज़ कुछ दिनों में ईरान में सरकार गिराने या अपने मनमाफ़िक व्यक्ति के हाथ में सरकार की बागडोर सौंपने में कामयाब हो जायेगा और इस प्रकार अमेरिका के भीतर अपनी गिरती लोकप्रियता को फिर से हासिल कर लेगा।
हमले के पहले ही दिन अमेरिका और इज़रायल द्वारा ईरान के शासक व शीर्ष सैन्य अधिकारियों की हत्या करने के बावजूद ईरान की सत्ता नहीं गिरी और उसने तुरन्त ही ज़बरदस्त जवाबी कार्रवाई शुरू कर दी। यही नहीं, उसने इज़राइल और पश्चिम एशिया में अमेरिका के सैन्य ठिकानों को बुरी तरह से तबाह किया है। हर गुज़रते दिन के साथ अमेरिका और इज़रायल को यह बात समझ आ रही है कि ईरान इराक़ नहीं है। 1979 के बाद से ईरान में एक दमनकारी धार्मिक कट्टरपंथी पूँजीवादी सत्ता होने के बावजूद विश्व पूँजीवाद के विशिष्ट समीकरणों के कारण वह लगातार पश्चिमी साम्राज्यवाद के विरुद्ध खड़ा रहा है। फ़िलिस्तीन की आज़ादी का वह बिना शर्त समर्थन करता रहा है। अमेरिकी साम्राज्यवाद और इज़रायली ज़ायनवाद की वह मुसलसल मुख़ालफ़त करता रहा है। इसकी वजह से घरेलू तौर पर बेहद अलोकप्रिय हो जाने के बावजूद साम्राज्यवादी आक्रमण की सूरत में देश की जनता का एक अच्छा-ख़ासा हिस्सा इस सत्ता के इर्द-गिर्द इस विशिष्ट मसले पर गोलबन्द होता रहा है और आज भी हो रहा है। इसके अलावा रूस-चीन की साम्राज्यवादी धुरी भी ईरान के पीछे खड़ी है जो उसे तकनोलॉजिकल और सैन्य मदद के अलावा आर्थिक तौर पर भी मदद पहुँचा रही है।
यह लेख लिखे जाने तक युद्ध को शुरू हुए 20 दिन हो चुके हैं लेकिन अमेरिका और इज़रायल वहाँ सत्ता-परिवर्तन के अपने घोषित लक्ष्य के नज़दीक भी नहीं दिख रहे हैं। ईरान पर हमला अब ट्रम्प के गले की हड्डी बन गया है। अगर ईरान में सत्ता-परिवर्तन के बिना यह युद्ध समाप्त होता है तो इसे अमेरिकी साम्राज्यवाद की एक बड़ी शर्मनाक हार के रूप में देखा जायेगा। जैसा कि हमने कहा है, अमेरिका के शासक वर्ग के बीच भी इरान पर हमले को लेकर कोई सहमति नहीं बन पायी थी। अब अमेरिका के भीतर भी ट्रम्प की छीछालेदर हो रही है। इसलिए अमेरिका व इज़रायल के लिए आने वाले दिन काफ़ी बुरे साबित होने वाले हैं, इतना तय है।
ईरान पर हुए साम्राज्यवादी हमले के ढाँचागत कारण
अमेरिका और इज़रायल द्वारा ईरान पर किये गये हमले के तात्कालिक कारणों को जानने के साथ ही साथ हमें उन ढाँचागत कारणों को भी समझना होगा जो इस प्रकार के साम्राज्यवादी हमलों की जड़ में हैं। आज हम जिस साम्राज्यवादी दुनिया में जी रहे हैं उसमें प्राकृतिक संसाधनों, कच्चे माल के स्रोतों और बाज़ारों पर नियंत्रण के लिए दुनिया के तमाम देशों में साम्राज्यवादी ताक़तों के बीच होड़ मची हुई है। यह होड़ मुख्य रूप से आज के साम्राज्यवाद की दो धुरियों – अमेरिका के नेतृत्व में पश्चिमी साम्राज्यवादी धुरी और चीन व रूस की साम्राज्यवादी धुरी – के बीच जारी है। पश्चिम एशिया में तेल व गैस के अकूत भण्डार होने के कारण यह अन्तर-साम्राज्यवादी प्रतिस्पर्द्धा समय बीतने के साथ लगातार तीखी होती गयी है। विश्व पूँजीवादी व्यवस्था में अपना दबदबा क़ायम रखने के लिए ये साम्राज्यवादी ताक़तें पश्चिम एशिया के देशों में तेल की निकासी से लेकर उसके परिशोधन व यातायात के क्षेत्रों में अपने निवेश को बढ़ाती आयी हैं।
ईरान में तेल और गैस के विशाल भण्डार हैं जिसकी वजह से अमेरिकी साम्राज्यवाद ने अपनी गिद्ध दृष्टि बहुत पहले से ही ईरान पर डाली हुई है। 1953 में अमेरिकी साम्राज्यवादियों ने ईरान की लोकतांत्रिक तरीक़े से चुनी हुई डॉ. मुसद्दक़ की सरकार का तख़्तापलट करके अमेरिकापरस्त मोहम्मद रज़ा शाह पहलवी की सत्ता को स्थापित किया था। परन्तु ईरान में 1979 में हुई इस्लामी क्रान्ति के बाद अमेरिकी साम्राज्यवाद को इस इलाक़े में शाह के रूप में एक प्रमुख सहयोगी को गँवाना पड़ा। ईरान की मौजूदा सत्ता को कमज़ोर करने के लिए अमेरिकी साम्राज्यवाद पिछले कई दशकों से उसपर भीषण आर्थिक प्रतिबन्ध लगाता आया है। इसका नतीजा यह हुआ कि इक्कीसवीं सदी में ईरान की क़रीबी रूस व चीन की उभरती हुई साम्राज्यवादी धुरी से बढ़ती गयी है। यही नहीं, चीन की कम्पनियों ने न सिर्फ़ ईरान में बल्कि खाड़ी के तमाम देशों में भी ज़बर्दस्त निवेश किया है और कई मायनों में वे अमेरिकी व यूरोपीय तेल कम्पनियों को मात दे रही हैं।
दरअसल विश्व में पिछले कुछ समय से जारी घटनाक्रम अमेरिकी साम्राज्यवाद के वर्चस्व के लगातार क्षरित होते जाने की प्रक्रिया को बयान करता है जो प्रक्रिया अब एक नये चरण में पहुँच रही है। अमेरिकी वर्चस्व का ह्रास यूक्रेन युद्ध में रूस के हाथों अमेरिका-नीत नाटो की लगातार जारी हार में और ताइवान व दक्षिण चीन समुद्र के मसले में भी दिखलायी देता रहा है। उसके पहले, अफ़गानिस्तान और इराक़ से अमेरिका का कायरतापूर्ण पलायन और अफ्रीका में चीनी व रूसी साम्राज्यवाद के समक्ष बार-बार मिल रही रणनीतिक व कूटनीतिक हारों में भी अमेरिकी दबदबे में आयी गिरावट स्पष्ट तौर पर दिखलायी पड़ती है। सच कहें तो आज के दौर में अमेरिका की वैश्विक पूँजीवाद के कांस्टेबल की भूमिका अदा करने की भी औक़ात नहीं रह गयी है। इसके अलावा डॉलर में भी अब पहले के समान वह ताक़त नहीं बची रह गयी है कि उसके ज़रिये अमेरिका पहले की तरह किसी अन्य देश से रिश्तों की शर्तें तय कर सकता हो। मौजूदा साम्राज्यवादी युद्ध में तो अमेरिका ख़ुद पश्चिम एशिया के तमाम देशों में अपने सैन्य अड्डों तक को ईरान के हमलों से नहीं बचा पा रहा है! अन्य पश्चिमी साम्राज्यवादी देश भी खुलकर ट्रम्प के पक्ष में नहीं आ रहे हैं। ये सभी अमेरिकी साम्राज्यवाद की गिरती हालत के ही संकेत हैं।
स्पष्ट है कि उपरोक्त कारणों से पश्चिम एशिया साम्राज्यवाद की दो धुरियों के बीच की प्रतिस्पर्द्धा का मुख्य अड्डा बना हुआ है। इसके अलावा इस क्षेत्र में फ़िलिस्तीन की मौजूदगी मौजूदा साम्राज्यवादी संकट को और गहरा बना देती है। बेशक़ विश्व साम्राज्यवाद की सबसे अहम गाँठ फ़िलिस्तीन की क़ौमी आज़ादी का सवाल ही है। पिछले डेढ़ वर्षों के घटनाक्रम ने इस बात की ताईद एक बार फिर से कर दी है और इस बात की भी ताईद कर दी है कि इज़रायल के सेटलर उपनिवेशवादी राज्य का ख़ात्मा तय है और उसके दिन गिने-चुने बचे हैं। जहाँ तक ईरान का प्रश्न है, तो तेल के विशाल भण्डार की वजह से वह कई दशकों से अमेरिकी साम्राज्यवाद के निशाने पर रहा है, हालाँकि ट्रम्प से पहले कोई भी अमेरिकी राष्ट्रपति ईरान पर हमला करने का दुस्साहस नहीं कर पाया था। ट्रम्प ने वेनेज़ुएला में अपनी सफलता के नशे में चूर होकर और नेतन्याहू के उकसावे में आकर ईरान पर हमला तो कर दिया, परन्तु समय बीतने के साथ यह स्पष्ट होता जा रहा है कि उसके प्रशासन ने इस प्रक्रिया में ईरान की सैन्य क्षमता को कम करके आँका था और इस युद्ध में उतरने से पहले उसकी कोई दीर्घकालिक योजना नहीं थी। रूस व चीन हालाँकि इस युद्ध में प्रत्यक्ष रूप से शामिल नहीं हुए हैं, लेकिन जिस सटीकता के साथ ईरान इज़रायल व खाड़ी के देशों में हमले कर रहा है उससे यह स्पष्ट है कि उसे रूस व चीन से हथियारों, ख़ुफ़िया जानकारी और सैटेलाइट तस्वीरों के रूप में मदद मिल रही है।
पश्चिम एशिया और ईरान में जारी युद्ध के निहितार्थ
पश्चिम एशिया में जारी युद्ध केवल ईरानी जनता की तकलीफ़ों को ही नहीं बढ़ा रहा है बल्कि समूचे पश्चिम एशिया की आम मेहनतकाश जनता की मुसीबतों को बढ़ा रहा है। पूँजीवाद-साम्राज्यवाद दुनिया को बर्बादी, अस्थिरता और अनिश्चितता के अलावा कुछ दे भी नहीं सकते हैं। चूँकि रूस और चीन प्रत्यक्ष रूप से इस युद्ध में शामिल नहीं हो रहे हैं इसलिए यह युद्ध किसी विश्व युद्ध की शक़्ल अख़्तियार करता नहीं नज़र आ रहा है। लेकिन इतना तो तय है कि इस क्षेत्रीय युद्ध के भीषण दुष्परिणाम होंगे। पश्चिम एशिया की इस अस्थिरता का असर भारत सहित दुनिया के तमाम देशों में ऊर्जा संकट के रूप में पहले से ही दिखना शुरू हो गया है।
अगर यह युद्ध और लम्बा खिंचता है तो यह संकट और भयावह होता जायेगा जिसका असर मेहनतकश अवाम की ज़िन्दगी और आजीविका पर होगा। भारत के करीब 1 करोड़ लोग खाड़ी के तमाम देशों में काम कर रहे हैं। यह युद्ध सीधे तौर पर उनकी ज़िन्दगी में उथल-पुथल मचा रहा है। विश्व बाज़ार में तेल की क़ीमतों में हो रही बढ़ोत्तरी का असर आने वाले दिनों में भारत में भी पेट्रोल व डीज़ल की बढ़ती कीमतों और बढ़ती महँगाई के रूप में सामने आयेगा जो अर्थव्यवस्था के संकट को और गहराने का काम करेगा। ऐसे में यह शर्मनाक बात है कि हमारे देश का प्रधानमंत्री इस युद्ध को रोकने का प्रयास करने के बजाय इज़रायल और अमेरिका के साथ गलबहियाँ कर रहा था। ईरान पर साम्राज्यवादी हमले के 2 दिन पहले तक नरेन्द्र मोदी इज़रायल के दौरे पर थे और ग़ज़ा के बच्चों के क़त्लेआम को अंजाम देने वाले अन्तरराष्ट्रीय अपराधी नेतन्याहू से गले मिलकर हर हाल में इज़रायल का साथ देने की कसमें खा रहे थे। वैसे देखा जाये तो गुजरात का कसाई अगर ग़ज़ा के कसाई से गले मिल रहा है तो इसमें कोई ताज्जुब की बात नहीं है! अब जब यह स्पष्ट हो गया है कि इस हमले से भारत में ऊर्जा संकट और आर्थिक संकट बढ़ने वाला है, तो शासक वर्गों के तमाम बुद्धिजीवी और कूटनीतिज्ञ विशेषज्ञ भी मोदी सरकार की आलोचना कर रहे हैं। स्पष्ट है कि मोदी सरकार का अमेरिका और इज़रायल की ओर तात्कालिक झुकाव देश की मेहनतकश अवाम के हित में तो बिल्कुल भी नहीं है। साथ ही भारत के पूँजीपति शासक वर्ग के बीच भी मोदी सरकार की वर्तमान विदेश नीति को लेकर आम सहमति नहीं है।
पिछले 20 दिनों के घटनाक्रम से इतना तो स्पष्ट है कि साम्राज्यवादी अमेरिका और ज़ायनवादी इज़रायल ईरान में सत्ता-परिवर्तन के अपने लक्ष्य को पूरा कर पाने की स्थिति में तो बिलकुल भी नहीं हैं। ऐसे में यह युद्ध और लम्बा खिंचने की सम्भावना बढ़ती जा रही है। अगर इस युद्ध के बाद ईरान की मौजूदा सत्ता आन्तरिक कारणों से गिर भी जाती है, जिसकी सम्भावना फिलहाल नगण्य ही प्रतीत होती है, तब भी अमेरिकी साम्राज्यवाद के लिए अपनी मनमाफ़िक सरकार बनाना बेहद मुश्किल होगा क्योंकि ऐसी किसी भी अमेरिका-इज़रायल परस्त सरकार के ख़िलाफ़ जनविद्रोह शुरू हो जायेगा और ईरान में गृहयुद्ध जैसी स्थिति पैदा हो जायेगी। अगर ईरान की मौजूदा सरकार इस युद्ध के बाद बच जाती है, जिसकी सम्भावना ही फ़िलहाल ज़्यादा नज़र आ रही है, तो उसके लिए भी युद्ध में हुई तबाही के बाद की परिस्थिति को सँभालना बहुत चुनौतीपूर्ण होगा। जो भी हो, इतना तो तय है कि निकट भविष्य में ईरान की जनता की ज़िन्दगी की बदहाली बढ़ने ही वाली है। साम्राज्यवाद और पूँजीवाद के रहते ईरान की मेहनतकश अवाम की मुश्किलों का समाधान नहीं होने वाला है।
आज जबकि अमेरिका और इज़रायल ने ईरान पर साम्राज्यवादी हमला किया है तो निश्चित रूप से ईरान की जनता के सम्मुख इस समय प्रधान अन्तरविरोध यह साम्राज्यवादी हमला ही है और ऐतिहासिक तौर पर भी ईरान की जनता अमेरिकी साम्राज्यवाद से बेपनाह नफ़रत करती रही है। यही कारण है कि वहाँ की दमनकारी सत्ता अलोकप्रिय होने के बावजूद भी ऐसे तमाम मौकों पर जनता को अपने पीछे गोलबन्द करने में कामयाब रही है। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि ईरान के मौजूदा निज़ाम के पास ईरान की जनता की आकांक्षाओं को पूरा करने की क्षमता नहीं है। 1979 की इस्लामी क्रान्ति के बाद से ईरान में जो सत्ता मौजूद है वह पूँजीवाद का विकल्प खड़ा करने के बजाय शिया इस्लाम की चाशनी में लिपटा नवउदारवादी पूँजीवादी विकास का एक ख़ास क़िस्म का मॉडल ही परोस रही है। समय बीतने के साथ ही साथ यह स्पष्ट होता जा रहा है कि ईरान की इस्लामी क्रान्ति वहाँ की जनता की समस्याओं का समाधान कर पाने में फिसड्डी साबित हुई है। ईरान की जनता की समस्याओं का समाधान साम्राज्यवाद और पूँजीवाद विरोधी समाजवादी क्रान्ति के ज़रिये ही मुमकिन है, भले ही इस प्रक्रिया में कितना भी समय लगे। ईरान के मेहनतकश अवाम, छात्रों-नौजवानों और जनपक्षधर बुद्धिजीवियों को आज से ही ऐसी समाजवादी क्रान्ति की तैयारी करनी होगी। इसके अलावा यह भी तय है कि आने वाला वक़्त पूरी दुनिया के लिए ही उथल-पुथल से भरा वक़्त होगा। ईरान के साथ-साथ हमारे देश की क्रान्तिकारी शक्तियों को भी इसके लिए अपनी कमर कस लेनी होगी।
मज़दूर बिगुल, मार्च 2026













Recent Comments