नरेन्द्र मोदी की इज़रायल यात्रा
फ़ासीवादियों और ज़ायनवादियों की प्रगाढ़ होती एकता!
प्रियम्वदा
26 फ़रवरी को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी एक बार फिर इज़रायल यात्रा पर गये। इससे पहले भी वह 2017 में इस सेटलर कोलोनियल राज्य की यात्रा पर जाने वाले भारत के पहले प्रधानमंत्री थे। अपने कार्यकाल में यह उनकी दूसरी यात्रा थी। यूँ तो 2014 के बाद से ही मोदी सरकार ने इज़रायल के साथ अपनी नज़दीकियाँ बढ़ायी हैं लेकिन प्रधानमंत्री की इस हालिया यात्रा को लेकर कई गम्भीर सवाल उठ रहे हैं। साथ ही, नरेन्द्र मोदी की इस यात्रा ने एक बार फिर फ़ासीवादी और ज़ायनवादी बर्बरों की घृणित एकता और वैचारिक साझेदारी को दुनिया के सामने उद्घाटित किया है।
पिछले तकरीबन ढाई सालों से इज़रायल फ़िलिस्तीनी आवाम का जनसंहार कर रहा है, उनकी जगह-ज़मीन पर कब्ज़ा करने के लिए बच्चों-बूढ़ों, बेगुनाह नागरिकों का क़त्लेआम कर रहा है, 1 लाख से अधिक फ़िलिस्तीनीयों को मौत के घाट उतार चुका है और पूरे ग़ज़ा को खण्डहर में तब्दील कर चुका है। इज़रायल के इस अमानवीय कृत्य के ख़िलाफ़ दुनियाभर के इंसाफ़पसन्द लोग सड़कों पर हैं, अलग-अलग देशों की सरकारें अपने देशों में जनदबाव और फ़िलिस्तीन के समर्थन में जुझारू आन्दोलनों के चलते इज़रायल की इस बर्बरता को रोकने के लिये उसपर दबाव बना रही हैं, उसके साथ अपने तमाम व्यापारिक, कूटनीतिक सम्बन्धों को तोड़ रही हैं। अन्तरराष्ट्रीय न्यायालय ने इज़रायली प्रधानमंत्री नेतन्याहू को युद्ध अपराधी घोषित करके उसकी गिरफ़्तारी के लिए वारण्ट जारी किया हुआ है। एक ऐसे वक़्त में फ़ासीवादी मोदी सरकार हत्यारे इज़रायली राज्य के साथ अपनी घनिष्ठता बढ़ा रही है। भारत उन देशों की सूची में शुमार रहा है जिसने फ़िलिस्तीन पर इज़रायली औपनिवेशिक क़ब्ज़े का शुरू से विरोध किया था और 1948 में इज़रायली सेटलर कोलोनियल परियोजना के बनने के ख़िलाफ़ खड़ा हुआ था। हालाँकि पिछले कुछ समय से फ़िलिस्तीनी मुक्ति-संघर्ष के साथ भारत की प्रतिबद्धता महज़ कागज़ी और औपचारिक-आधिकारिक गलियारों तक ही सीमित रह गयी थी लेकिन नरेंद्र मोदी ने अपनी इज़रायल यात्रा के दौरान इस औपचारिक प्रतिबद्धता को भी ख़त्म कर दिया है और खुलेआम ज़ायनवादियों के साथ दोस्ती का ऐलान करके भारत की जनता और फ़िलिस्तीनी क़ौम के साथ ऐतिहासिक विश्वासघात को अंजाम दिया है।
दो दिवसीय यात्रा के दौरान झूठ, फ़रेब और बेशर्मी का प्रदर्शन
इज़रायल पहुँचकर नरेन्द्र मोदी ने बेशर्मी की पराकाष्ठा करते हुए काफी बयानबाज़ी की। इज़रायली संसद क्नेसेट को संबोधित करते हुए कहा कि “वह इज़रायल पर 7 अक्टूबर के बर्बर आतंकवादी हमले की कड़ी निन्दा करते हैं और इज़रायलियों के दुःख और परेशानी की घड़ी में उनके साथ खड़े हैं।” इस बयान में फ़िलिस्तीनी अवाम के मुक्ति-संघर्ष को आतंकवादी हमला क़रार देना ठीक वैसा ही था जैसे हमारे देश में कोई 1857 के क्रान्तिकारियों को आतंकवादी कहे और भगतसिंह, सुखदेव, राजगुरू की ब्रिटिश साम्राज्यवादियों के ख़िलाफ़ लड़ाई को आतंकवादी गतिविधि क़रार दे!
7 अक्टूबर 2023 वह दिन था जब ग़ज़ा के यातना शिविर में क़ैद लोगों ने बग़ावत की थी अपनी जगह-ज़मीन के लिए, अपनी आज़ादी के लिए। फ़िलिस्तीन के मामले में असली आतंकवादी तो ज़ायनवादी इज़रायल है और उसको शह देने वाली पश्चिमी साम्राज्यवादी ताक़तें हैं जिनकी मदद से इज़रायल दशकों से फ़िलिस्तीन में भीषण रक्तपात और नरसंहार करता आया है। ऐसी औपनिवेशिक ताक़तों के ख़िलाफ़ प्रतिरोध का जनता को पूर्ण अधिकार होता है और फ़िलिस्तीनी जनता ने 7 अक्टूबर को यही किया। पिछले आठ दशकों से इज़रायली सेटलर कोलोनियल परियोजना फ़िलिस्तीनियों की हत्या, विस्थापन, दमन और उत्पीड़न को अंजाम देती आयी है। मगर इस पूरी स्थिति को नज़रअन्दाज़ करते हुए और अबतक भारत सरकार की फ़िलिस्तीनी राष्ट्रीय मुक्ति के प्रति बची-खुची पक्षधरता के ख़िलाफ़ जाकर एकतरफ़ा तरीके से प्रधानमंत्री ने उपनिवेशवादियों और अपने हत्यारे ज़ायनवादी भाइयों के पक्ष में बोला! यह फ़ासीवादी ताक़तों द्वारा भारत के आम अवाम और फ़िलिस्तीनी अवाम के मुक्ति-संघर्ष के साथ किया गया धोखा है। मोदी की यात्रा ने फ़ासीवादियों और ज़ायनवादियों की असल मंशा को भी उजागर कर दिया और यह साबित कर दिया कि दोनों ही मानववद्रोही ताक़तें हैं।
इसके बाद मोदी ने ग़ज़ा पर क़ब्ज़े को बनाये रखने के लिए बनाये गये “बोर्ड ऑफ़ पीस” जैसी अमेरिकी साम्राज्यवादी साज़िश और ढोंग का भरपूर समर्थन किया। एक ऐसे समय में जब अन्तरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय तक ने नेतन्याहू को “युद्ध अपराधी” घोषित किया है और दुनियाभर के अवाम ने उसे इन्सानियत का दुश्मन बताया है तब प्रधानमंत्री मोदी उसे अपना “भाई” बता रहे हैं और इज़रायल को “भारत का फ़ादरलैंड” (पितृभूमि) क़रार दे रहे हैं! मोदी सरकार का यह घृणित रवैया न सिर्फ़ फ़िलिस्तीनी अवाम की पीठ में छुरा घोंपने के समान है बल्कि भारतीय जनता के साथ भी किया गया छल है।
एप्स्टीन फ़ाइल्स के खुलासे के साथ मोदी की इज़रायल यात्रा पर उठते सवाल
नरेन्द्र मोदी द्वारा इज़रायल की यह दो-दिवसीय यात्रा एक ऐसे समय में हुई है जब जेफ़री एपस्टीन जैसे पतित व्यक्ति के साथ भाजपा के नेताओं-मंत्रियों और अम्बानी जैसे पूँजीपतियों की संलिप्तता का मामला सामने आया था। जेफ़री एप्सटीन एक गलीज़ नरभक्षी था और बच्चियों के साथ बलात्कार व यौन अपराध का अन्तरराष्ट्रीय रैकेट चलाता था। उसके घृणित कारनामे न केवल पूँजीवादी समाज की सड़ाँध और गलाज़त को प्रदर्शित करते हैं बल्कि दुनिया भर के शासक वर्गों की पतनशीलता को भी उघाड़ कर रख देते हैं। ऐसे घृणित व्यक्ति के साथ भाजपा के नेताओं और खुद नरेन्द्र मोदी के कथित सम्बन्ध आम जनता के लिए कई सवाल खड़े कर रहे थे। एप्स्टीन 2008 में ही यौन अपराधी साबित हो चुका था, मगर इसके बावजूद 2017 में अनिल अम्बानी, हरदीप सिंह पुरी आदि का एप्सटीन के साथ मेलजोल और अमेरिकी अधिकारियों के साथ मीटिंग्स का कार्यक्रम बनाना किन वज़हों से हो सकता है? क्या यह राजनीतिक व व्यापारिक फ़ायदों के लिए था या फ़िर निजी फ़ायदों के लिए? एप्स्टीन स्वयं एक ज़ायनवादी था और इज़रायली ख़ुफ़िया एजेंसी मोस्साद का एजेण्ट था। उसके साथ रिश्तों की बात सामने आने पर दुनिया के कई रसूख़दार व्यक्तियों को गिरफ़्तार किया गया है और कई से उनके पदों से इस्तीफ़े ले लिये गये हैं। सिर्फ़ डोनाल्ड ट्रम्प का अमेरिका और मोदी का भारत ही ऐसे देश हैं, जहाँ एप्सटीन फ़ाइलों में नाम आने के बाद भी किसी पर कार्रवाई तो दूर, जाँच की भी घोषणा नहीं की गयी है। सवाल है कि 2008 में एप्स्टीन की घिनौनी असलियत दुनिया के सामने आने के बाद भी भाजपा के नेताओं की बातचीत ऐसे घृणित, बलात्कारी व्यक्ति के साथ क्यों हो रही थी?
मोदी की 2017 की इज़रायल यात्रा भी सन्देह के दायरे में है। मोदी सरकार की 6 जुलाई 2017 की यात्रा के बाद, एप्स्टीन ने किसी व्यक्ति को ईमेल करते हुए लिखा कि “भारतीय प्रधानमंत्री मोदी ने उससे सलाह ली और वह अमेरिकी राष्ट्रपति के लिए इज़रायल में नाचा-गाया और यह काम कर गया।”
नरेन्द्र मोदी के हालिया इज़रायल यात्रा से वापस आने के अगले ही दिन ईरान पर अमेरिका और इज़रायल ने एकतरफ़ा हमला कर दिया और इसके शोर में एप्स्टीन फ़ाइल्स मामले पर मिट्टी डाल दी गयी क्योंकि इन दोनों देशों के नेता ख़ुद इस काण्ड में बुरी तरह से फँसे हुए हैं। पश्चिमी देशों के कई टिप्पणीकारों का कहना है कि अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प द्वारा ईरान पर हमले के पीछे बड़ा कारण एप्स्टीन फ़ाइल्स में फँसा होना ही है, जिसका फ़ायदा नेतन्याहू उठा रहा है। इज़रायल-अमेरिका के सामने मोदी सरकार इस क़दर झुकी हुई है कि ईरान पर हमले में 175 छोटी बच्चियों की हत्या और उनके शीर्ष नेतृत्व की हत्या के बाद क़रीब एक हफ़्ते तक भारत सरकार ने हमले की निन्दा करना तो दूर, शोक सन्देश तक नहीं व्यक्त किया। यह सब अनायास नहीं था। मोदी सरकार की तमाम तिकड़मों के बावजूद ये सभी तथ्य इस बात की ओर इशारा करते हैं कि एप्सटीन फ़ाइल्स के कुकृत्यों में भारत के फ़ासीवादियों की भी संलिप्तता है।
भाजपा राज में इज़रायल के साथ बढ़ते व्यापारिक व कूटनीतिक रिश्ते
इज़रायल के साथ भारत के रिश्तों में गरमाहट नवउदारवाद के पदार्पण के साथ ही आनी शुरू हो गयी थी जब 1992 में नरसिंह राव की सरकार ने इज़रायल के साथ राजनयिक रिश्तों की शुरुआत की। उसके बाद देवगौड़ा के संयुक्त मोर्चे की सरकार ने बराक मिसाइल के समझौते पर हस्ताक्षर करके इज़रायल के साथ सामरिक सम्बन्धों की नींव रखी थी। आगे अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली राजग सरकार इज़रायल के साथ सम्बन्धों को नयी ऊँचाइयों पर ले गयी। यही वह दौर था जब इज़रायल के नरभक्षी प्रधानमन्त्री एरियल शैरोन ने भारत की यात्रा की। यह किसी इज़रायली प्रधानमन्त्री की पहली भारत यात्रा थी। 2004 से 2014 के बीच मनमोहन सिंह के नेतृत्व में कांग्रेस शासन ने भी इज़रायल के साथ सामरिक सम्बन्धों में विस्तार की प्रक्रिया जारी रखी।
लेकिन 2014 में मोदी के नेतृत्व में हिन्दुत्ववादी फ़ासीवादियों के सत्ता में पहुँचने के बाद से ही इज़रायल के साथ क़रीबी में जो छलाँग लगी उसका असल कारण फ़ासीवादियों और ज़ायनवादियों की वैचारिक एकता में निहित है। हमारे देश के फ़ासिस्टों और इज़रायली ज़ायनवादी हत्यारों का भाईचारा आज किसी से छुपा नहीं है। वैसे तो ये दोनों ही अपने आप को प्राचीन धर्म और संस्कृति का ध्वजधारक बताते हैं मगर असल में इनका प्राचीन सभ्यता और संस्कृतियों से कोई लेना-देना नहीं है। जिस प्रकार हिन्दू धर्म और हिन्दुत्व की फ़ासीवादी विचारधारा एक नहीं है, वैसे ही यहूदियों का धर्म और ज़ायनवाद भी एक नहीं है। दोनों ही अपने आप को पूरे धर्म का प्रतिनिधित्व करने वाला बताते हैं। परन्तु ये दोनों ही मानवद्रोही विचारधाराएँ आधुनिक पतनशील पूँजीवाद की पैदाइश हैं और उसी की सेवा करती हैं। एक नक़ली दुशमन की छवि का निर्माण इन दोनों विचारधाराओं की ख़ासियत है। भारत में हिन्दुत्व फ़ासीवादियों के लिए वह नक़ली दुश्मन मुसलमान है और ज़ायनवाद के लिए वह नक़ली दुश्मन फ़िलिस्तीनी अरब क़ौम है जिसका बहुलांश मुसलमान है, हालाँकि अन्य धर्मों के अरब लोग भी फ़िलिस्तीनी क़ौम का हिस्सा हैं। इसीलिए हमारे देश में संघ और भाजपा द्वारा फ़िलिस्तीन-इज़रायल के मसले को धार्मिक झगड़े के तौर पर पेश किया जाता है, जबकि असलियत यह है कि इसका धर्म से कोई लेना-देना है ही नहीं और यह फ़िलिस्तीन के क़ौमी दमन और उसकी राष्ट्रीय आज़ादी का मसला है। संघी फ़ासीवादी देश के बड़े पूँजीपतियों, अडानी-अम्बानी की सेवा करते है, तो वहीं ज़ायनवाद पश्चिम एशिया में पहले प्रमुखतः ब्रिटिश साम्राज्यवाद के हितों की हिफ़ाज़त करता था और अब अमेरिकी साम्राज्यवाद का लठैत और गुण्डा बना हुआ है। पूँजीवाद-साम्राज्यवाद के हितों की हिफ़ाज़त करने के लिए ये प्राचीन सभ्यता-संस्कृति का जाप केवल लोगों को गुमराह कर शोषण और लूट को बदस्तूर बनाये रखने के लिए करते हैं। इसी विचारधारात्मक एकता की ज़मीन पर हमारे देश के “नॉन-बायोलॉजिकल प्रधानमंत्री” मदरलैंड-फ़ादरलैंड का जाप करते हुए लोट-पोट हुए जा रहे हैं!
इज़रायल के साथ बढ़े व्यापारिक और कूटनीतिक रिश्तों में भी इस एकता की झलक देखने को मिलती है। चन्द उदाहरणों के ज़रिये हम इसे समझ सकते हैं। 2014 में प्रधानमन्त्री की अध्यक्षता वाली सुरक्षा मामलों की कैबिनेट कमेटी ने इज़रायल की 262 बराक मिसाइलों की ख़रीद को हरी झण्डी दे दी। ग़ौरतलब है कि इन्हीं बराक मिसाइलों की ख़रीद को लेकर 2001 में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार के समय में एक घोटाला सामने आया था जिसमें जार्ज फर्नाण्डीस, उनकी सहयोगी और नौसेना के एक अधिकारी सुरेश नन्दा का नाम शामिल था। इस घोटाले में फर्नाण्डीस की पार्टी से जुड़े रहे आर.के. जैन को गिरफ़्तार भी किया गया था। इसके बावजूद मोदी सरकार ने इज़रायल से अपनी मित्रता का सबूत देते हुए एक बार फिर से इस सौदे को मंज़ूरी दे दी थी। अमेरिका के अलावा भारत उन चन्द गिने-चुने देशों में है जिसका इज़रायल के साथ सामरिक और व्यापारिक सम्बन्ध लगातार फल-फूल रहा है। भारत इज़रायल द्वारा बेचे जाने वाले हथियारों का दुनिया में सबसे बड़ा ख़रीदार है और भारत को हथियारों की सप्लाई करने वाले देशों में इज़रायल का स्थान दूसरा है। केवल रक्षा के क्षेत्र में ही नहीं इज़रायल हमारे देश के कई राज्यों में जल संरक्षण, सिंचाई आदि के क्षेत्र में तकनीकी सहायता के लिए सेन्टर ऑफ एक्सीलेंस के ज़रिये अपने पाँव पसार चुका है। जनता के आन्दोलनों को कुचलने के तौर-तरीके भारत की पुलिस और सेना को सिखाने के लिये इज़रायल की पुलिस व खुफ़िया एजेंसी मोस्साद को नियमित तौर पर भारत आने की छूट है। अपने देश के भीतर प्रतिरोध को कुचलने के लिए खुफ़िया पेगासस ऐप भी मोदी सरकार को इज़रायली जायनवादियों से ही मिला है। मोदी और नेतन्याहू सरकार पेगासस जैसे ख़ुफ़िया तन्त्र, जिसे अब तक का सबसे उन्नत व ख़तरनाक जासूसी स्पाइवेयर माना जा रहा है, के ज़रिये प्रतिरोध की आवाज़ों का दमन करने का काम कर रही हैं। पेगासस का इस्तेमाल मज़दूरों के आन्दोलनों को कुचलने से लेकर कश्मीर और उत्तर-पूर्व में दमित क़ौमों के उत्पीड़न के लिए करने में भारतीय हुक्मरान कोई कोर-कसर नहीं छोड़ रहे हैं। इतना ही नहीं, हिन्दुत्ववादी फ़ासीवादी अपने वैचारिक रिश्तेदार ज़ायनवादियों के ‘बर्बर इज़रायली मॉडल’ से नित-नये जनविरोधी हथकण्डे सीख रहे हैं।
अक्टूबर 2023 में इज़रायल में जब मजदूरों की कमी हुई तब हज़ारों भारतीय मज़दूरों को मोदी सरकार द्वारा इज़रायल में मरने के लिये भेज दिया गया। इज़रायलियों द्वारा भारतीय नागरिकों के साथ दोयम दर्जे के व्यवहार की घटनाएँ आम बात हैं लेकिन इसपर मोदी सरकार की चुप्पी इस बात को दर्शाती है कि ये दोनों ताक़तें अवाम के हितों को कुचलकर अपनी एकता क़ायम रखने का काम करती हैं। वहीं इज़रायल भारतीय मिसाइलों का इस्तेमाल फ़िलिस्तीनी अवाम के नरसंहार के लिए कर रहा है, यानी फ़िलिस्तीनी जनता की हत्या में दोनों ही भाई-भाई हैं। यह ज़ायनवादियों और फ़ासीवादियों की मज़बूत होती एकता का सूचक है जो केवल फ़िलिस्तीनी जनता के ही दुश्मन नहीं हैं बल्कि पूरी दुनिया के मेहनतकश अवाम के दुश्मन हैं।
यही कारण है कि दुनियाभर के तमाम इंसाफ़पसन्द लोग, जो फ़िलिस्तीनी जनता के मुक्ति संघर्ष के पक्ष में खड़े हैं, इन ज़ायनवादी-फ़ासीवादी हत्यारों की एकता के ख़िलाफ़ भी बोल रहे हैं। भारत के भी इंसाफ़पसन्द अवाम ने मोदी की दूसरी इज़रायल यात्रा का विरोध किया है और भारत की जनता के क्रान्तिकारी संघर्ष के साथ विश्वासघात बताते हुए मोदी की इज़रायल यात्रा की भर्त्सना की है।
मज़दूर बिगुल, मार्च 2026













