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असम में बाढ़ से 100 से ज़्यादा लोगों की मौत, लाखों लोग प्रभावित

मोदी सरकार के 2014 में सत्तासीन होने के बाद से ही पूरे देश में प्रकृति की लूट बेहद अधिक त्वरण के साथ हो रही है। कुदरत की लूट के रास्ते से हर क़ानूनी बाधा को धड़ल्ले से हटा दिया गया है। असम की बाढ़ के कुछ दिन बाद ही ‘मां गंगा के पुत्र’ की सरकार ने गंगा के बाढ़ क्षेत्र में निर्माण की रोक को हटाने का काम किया है! जब विपदा आती है तो भाजपा नेताओं द्वारा नेहरू और कांग्रेस पर ठीकरा फोड़ना शुरू कर दिया जाता है। असम के मुख्यमंत्री ने बाढ़ पर जवाबदेही से बचने का सबसे आसान रास्ता निकाला है। वह आसान रास्ता है धड़ल्ले से झूठ बोलने का! हेमंत शर्मा ने पहले कहा कि पूरे असम में कोयले की खानों से कोयला निकाला ही नहीं जाता है! फिर कहा कि सब नागालैण्ड की वजह से हो रहा है और नागालैण्ड की सरकार को यह देखना चाहिए! यानी अब बाढ़ को असम बनाम नागालैण्ड का मसला बनाया जा रहा है।  जब इससे भी बात नहीं बनी तो असम की भाजपा सरकार ने घाटी के लोगों में यह झूठ फैलाना शुरू कर दिया कि यह पहाड़ी लोगों की वजह से हो रहा है।! मज़ेदार बात यह है कि नागालैण्ड में भाजपा समर्थित सरकार है, असम में भाजपा और केन्द्र में भी भाजपा सरकार है लेकिन भाजपा के अनुसार इनमें से कोई भी इस बाढ़ के लिए जि़म्मेदार नहीं है!

कैसा है यह लोकतन्त्र और यह संविधान किनकी सेवा करता है? (उन्नीसवीं किस्त)

भारत की शक्तिशाली केन्द्रीय राज्यसत्ता से टकराकर उत्तर-पूर्व की छोटी-छोटी राज्य राष्ट्रीयताएँ भले ही अपनी मुक्ति न प्राप्त कर पायें, परन्तु वे हारेंगी भी नहीं। उनका संघर्ष तब तक चलता रहेगा जब तक उनके अलगाव और उपेक्षा की स्थिति बनी रहेगी। किसी काल्पनिक एकाश्मी राष्ट्रवाद में उनकी राष्ट्रीय भावनाओं का विलयन पूँजीवाद की चौहद्दी में सम्भव भी नहीं लगता। इसलिए उनके संघर्ष भी विसर्जित नहीं होंगे। नेतृत्व की कोई एक धारा जब समर्पण करेगी तो दूसरी धारा उभरकर सामने आयेगी और संघर्ष को ज़ारी रखेगी। इस समस्या का समाधान केवल और केवल एक समाजवादी राज्य के तहत ही सम्भव है जो सही मायने में विभिन्न राष्ट्रों और राष्ट्रीयताओं के आत्म-निर्णय के अधिकार और अलग होने के अधिकार के आधार पर एक संघात्मक ढाँचा विकसित करेगा।