अनियोजित विकास, प्रकृति की लूट, भ्रष्टाचार, पर्यावरणीय तबाही से धराली जैसी आपदाओं की मार झेलने को अभिशप्त उत्तराखण्ड

अपूर्व मालवीय

आपदा के ज़ख्म

बीते पाँच अगस्त की दोपहर डेढ़ बजे उत्तराखण्ड के धराली में ऊपर पहाड़ों से एक ऐसा सैलाब आया जिसने धराली सहित पूरे उत्तराखण्ड को हिलाकर रख दिया। इस सैलाब में आधा धराली तबाह हो गया! ऊपर से आये लाखों टन के मलबे में पैतीस से चालीस होटल, मकान और दुकानें जमींदोज़ हो गईं। शुरुआती दौर में सरकार की तरफ़ से मरने और लापता होने वाले लोगों की संख्या को बहुत ही कम करके बताया गया।  लेकिन अब तक लगभग 70 लोगों के मरने और सैकड़ों लोगों के लापता होने की पुष्टि हो चुकी है। मरने वालों में अधिकतर संख्या बिहार और नेपाल के मज़दूरों की है जो वहाँ निर्माण से लेकर सेबों के बागों में काम करने के लिए आए थे। नेपाल के लापता 25 मज़दूर तो एक ही गाँव उसदोई के थे। उसदोई गाँव का केवल एक ही मज़दूर इस आपदा में बच पाया है, जो उस समय ऊँचाई वाले स्थान पर काम कर था!

इस एक आपदा ने सैकड़ों परिवारों की ज़िन्दगी को तबाह कर दिया! लोगों से उनका घर, उनके अपने, उनकी ज़िन्दगी भर की कमाई तो गई ही सैकड़ों मेहनतकश परिवारों में इकलौता कमाने वाला भी ख़त्म हो गया। इस आपदा ने सैकड़ों परिवारों को ऐसे ज़ख्म दिये हैं जो कभी भरने वाले नहीं हैं। वहीं दूसरी तरफ़ धराली में जो घर- परिवार इस आपदा से बचे हैं उनके सामने एक दूसरी आपदा खड़ी है! वह है उनके रोजी-रोटी की कमाई की! इस आपदा से पर्यटन और उससे जुड़े रोज़गार तो गए ही, जिनके सेबों के बाग और खेत है वहाँ भी अब काम करने के लिए कोई मज़दूर नही है। धराली में सेबों को स्टोर किया जाता था और उनकी ग्रेडिंग की जाती थी। लेकिन धराली में ना तो स्टोर बचा है न ही ग्रेडिंग मशीन और ना ही वहाँ काम करने वाले मज़दूर! ऐसे में इन सेबों से जुड़ा रोज़ी – रोज़गार का साधन भी लम्बे समय तक प्रभावित होने वाला है।

पिछले 25-30 सालों में उत्तराखण्ड में नदी के किनारे और उसके मुहाने पर बहुत तेजी से निर्माण कार्य हुए हैं। सारे नियम-क़ानूनों को ताक पर रखकर नदियों के किनारे, कैचमेण्ट एरिया में या पहाड़ों की सीधी ढलान पर निर्माण हो रहा है। इसमें उत्तराखण्ड की सरकार भी पीछे नहीं है। सरकारी विभागों, गेस्ट हाउसों से लेकर सेना और पैरा मिलिट्री के कैम्प तक नदियों के किनारे और पहाड़ी ढलानों पर बनाये जा रहे हैं। उत्तराखण्ड में दर्जनों ऐसे कस्बे और बस्तियाँ हैं जो धराली जैसी आपदाओं को बार-बार दोहराये जाने के लिए तैयार हैं। चाहे वो अगस्त्यमुनि, गोपेश्वर, श्रीनगर, घनसाली, भटवाड़ी, पौड़ी हो या जोशीमठ और उत्तरकाशी हो।

अपने बड़े पूँजीपतियों को खुश करने और विकास के नाम पर बड़ी पूँजी को आकर्षित करने के लिए तमाम भू-वैज्ञानिकों, पर्यावरणविदों की चेतावनियों को किनारे लगाते हुए उच्च हिमालयी क्षेत्रों में बड़े-बड़े बाँधों, चौड़ी सड़कों, बहुमंज़िला इमारतों का निर्माण किया जा रहा है। जिसका ख़ामियाजा आम जनता और स्थानीय आबादी को चुकाना पड़ा है। इसमें धराली अपवाद नहीं है।

आपदाओं के राज्य में सरकारी मशीनरी की कार्यप्रणाली

उत्तराखण्ड और हिमाचल जैसे राज्यों को ‘आपदाओं के राज्य’ का दर्जा दे दिया जाना चाहिए! क्योंकि पिछले दो दशकों से इन दोनों पहाड़ी राज्यों में जैसी आपदाएँ आ रही हैं वह पहले कभी नहीं देखी गयीं। इन राज्यों में आपदाओं की बारम्बारता पिछले एक दशक में कई गुना बढ़ी है। उत्तराखण्ड में पिछले एक दशक में 18,464 प्राकृतिक आपदाएँ आयी हैं। 2025 की शुरुआत से लेकर अगस्त के पहले हफ़्ते तक 700 से अधिक प्राकृतिक घटनाएँ हुई हैं जिसमें 209 लोगों की मृत्यु हो चुकी है और 500 से ज़्यादा लोग घायल हुए हैं। ऐसा कोई वर्ष नहीं बीतता है जब बारिश, बाढ़, भूस्खलन या बादल फटने से जान-माल की हानि न होती हो! पिछले आठ सालों में साढ़े तीन हजार से ज़्यादा लोगों ने इन आपदाओं में अपनी जान गवाई है। अरबों रुपयों की सम्पत्ति का नुकसान हुआ है! इसके बावजूद इन राज्यों में सरकारों की राहत और बचाव की कार्यप्रणाली एकदम लचर है! धराली आपदा के तीन-चार दिनों तक सरकार की तरफ़ से राहत और बचाव कार्य ही शुरू नहीं हो पाया था! क्योंकि धराली से नीचे हर्षिल में तिलना गाड के मलबे से गंगा नदी का जलस्तर उठ गया था और हर्षिल से लेकर धराली तक एक कृत्रिम झील बन गई। इस झील में गंगोत्री राजमार्ग का भी काफी हिस्सा डूब गया था। इस राजमार्ग का एक हिस्सा भूस्खलन से भी टूट गया। सवाल यह है कि जब आपदाएँ ऊपर पहाड़ों में आ रही हैं तो एसडीआरएफ-एनडीआरएफ से लेकर तमाम आपदा प्रबन्धन के विभाग और अफसरों को हमेशा नीचे से ही क्यों भेजा जाता है! इनका एक बेस ऊपर पहाड़ों में भी क्यों नहीं बनाया जाता है! लोगों को राहत पहुँचाने की बजाए सरकारों का ज़ोर हमेशा मृत्यु को और लापता लोगों के आँकड़ों को मैनेज करने पर ही होता है। धराली आपदा में भी धामी सरकार शुरुआती दौर में पाँच-सात लोगों की मौत की ही पुष्टि कर रही थी जो स्थानीय थे। बाद में स्थानीय लोगों और अपने परिजनों को खोजते हुए धराली पहुँचने वाले लोगों के दबाव को देखकर सरकार को मजबूरी में अपने आँकड़ों को बढ़ाना पड़ा। उत्तराखण्ड की धामी सरकार ने शुरुआती दौर में आपदा पीड़ित लोगों को पाँच-पाँच हजार के चेक देने की कोशिश की! यह भी आपदा पीड़ितों के साथ एक भद्दा मजाक था! बाद में इस राशि को 5 लाख किया गया, जो नाकाफ़ी ही है। यह राशि भी उन सैकड़ों मज़दूरों के परिवारों को मिल भी पाएगी या नहीं इसमें सन्देह है। क्योंकि ज्यादातर मज़दूर परिवार यह सिद्ध नहीं कर पायेंगे कि उनके परिजन धराली में ही रुके हुए थे या काम कर रहे थे।

कैसे आई यह आपदा!

धराली में आया सैलाब कोई अप्रत्याशित नहीं था। 6 अगस्त 1978 में भी ऐसा ही सैलाब आया था लेकिन तब ये आपदा नहीं बन पाया था! कारण, उस समय खीर गंगा के जल ग्रहण क्षेत्र और उसके ठीक मुहाने पर मानव निर्माण नहीं हुआ था। लेकिन आज नदी के दोनों तटों के बेहद करीब और खीर गंगा के ठीक मुहाने पर ही जहाँ वह भागीरथी में मिलती है बहुमंजिला होटल्स, रिसॉर्ट, दुकानें और घर बन गए हैं। जिसने इस सैलाब को आपदा में बदल दिया!

इस आपदा के 10-12 दिनों बाद ये स्पष्ट हो चुका है कि ये आपदा ग्लेशियर डिपॉजिट-मोरेन के नीचे आने से आई है। 4800 मीटर की ऊँचाई पर भारी बारिश के कारण ऊपर से लाखों टन का मोरेन तेजी से नीचे आया। खड़ी ढलान होने की वजह से उसका वेग भी ज़्यादा था। ये ग्लेशियर डिपॉजिट 5 अगस्त की दोपहर डेढ़ बजे से शाम 6 बजे तक छः चक्रों में आया। पहले ही चक्र में बीस से पच्चीस फीट ऊँचाई के मलबे में सब कुछ तबाह हो गया! लेकिन शाम 6 बजे तक जो मलबा आता रहा उसने धराली में खीर गंगा के मुहाने पर चालीस फीट से ऊपर तक मलबे का ढेर लगा दिया। इस चालीस फीट के मलबे को हटाना या उसमें दबे लोगों को निकालना लगभग नामुमकिन है। आज की स्थिति में उस मलबे के ऊपर से नदी बह रही है। दो से तीन फीट खोदने के बाद ही वहाँ पानी भरना शुरू हो जा रहा है। ऐसे में धामी सरकार जो मलबे में तलाशी अभियान चला रही है, वो बस एक खानापूर्ति ही है।

लेकिन इस घटना ने भू-वैज्ञानिकों और पर्यावरणवादियों को एक दूसरी चिन्ता से घेर दिया है। असल में उच्च हिमालयी क्षेत्रों में 4000 मीटर से ऊपर भारी बारिश नहीं होती थी। लेकिन जलवायु परिवर्तन से लेकर उच्च हिमालयी क्षेत्रों में सिर्फ़ पूँजीपतियों को फ़ायदा पहुँचाने के लिए तथाकथित विकास के नाम पर जो विनाश की परियोजनाएँ चलायीं जा रही हैं ये उसी का नतीजा है! धराली में आया ग्लेशियर डिपॉजिट 4800 मीटर पर मौजूद था। इससे 200 मीटर ऊपर श्रीकण्ठ ग्लेशियर का बेस और उससे 200 मीटर ऊपर श्रीकण्ठ ग्लेशियर मौजूद है। अगर 4800 मीटर पर भारी बारिश होने लगी है तो वो 5000 या 5200 मीटर पर भी हो सकती है। ऐसे में ग्लेशियर के बेस के खिसकने या ग्लेशियर के ही टूट कर गिरने की सम्भावना है। इससे अन्दाज़ा लगाया जा सकता है कि अगर ये घटना होती है तो धराली ही क्या 2013 में आयी केदारनाथ की आपदा भी छोटी पड़ जायेगी! ये ऊपर पहाड़ों से लेकर नीचे मैदानों तक को तबाह कर सकती है।

पहाड़ों को ऊपर से उजाड़ और अन्दर से खोखला करने की योजनाएँ!

2013 की केदारनाथ आपदा से लेकर धराली की त्रासदी तो एक बानगी है। धराली में जो हो रहा है वो सिर्फ इसी क्षेत्र तक सीमित नहीं है, बल्कि हिमालय रीजन की एक पूरी पट्टी है, जिसपर बसे कई शहर, कस्बे व गाँव  इस तरह के खतरनाक भू-स्खलन, धँसाव व उच्च तीव्रता के भूकम्प जोन में आते हैं। इसे समझने के लिये इसके भूगोल को समझना जरूरी है।  धराली में जो हो रहा है वो उत्तराखण्ड के कई पर्यटक स्थलों, शहरों, कस्बों और गाँवों में भी शुरू हो चुका है। फर्क बस इतना है कि कहीं यह प्रक्रिया धीमी है तो कहीं बहुत तेज है। निम्न से लेकन उच्च हिमालयी क्षेत्र की संवेदनशीलता, इसके जंगलों के काटे जाने, चौड़ी सड़कों और बड़े  बाँधों की परियोजनाओं के नुकसान पर बहुत सारे भूवैज्ञानिकों, पर्यावरणविदों के लेकर अनेक ऐक्टिविस्टों तक ने अपनी शंकाएँ, रिपोर्ट और सुझाव आदि जारी किये हैं। पूरा हिमालय अभी कच्चा व युवा पहाड़ है। जो लगातार बन रहा है। ये वो क्षेत्र है जहाँ भारतीय टेक्टोनिक प्लेट यूरेशियन प्लेट से टकराती है। इस कारण यह क्षेत्र भू-स्खलन व भूकम्प के प्रति बहुत ही ज्यादा संवेदनशील है। लेकिन प्राइवेट कम्पनियों से लेकर पूँजीवादी राजसत्ता तक को इसकी परवाह नहीं है। राजनीतिक पार्टियों को चुनाव के लिये पूँजीपतियों से करोड़ों का चन्दा मिलता रहे, नेताओं-नौकरशाहों की जेब गरम होती रहे! अमीरों की विलासिता और मुनाफे की अन्धी हवस में हिमालय के इस क्षेत्र में उन परियोजनाओं को लागू किया जा रहा है, जो पर्यावरण के साथ ही साथ हिमालय और पूरे उत्तर भारत के मैदानी इलाके की आबादी के जान-माल के लिए बहुत ही खतरनाक है। सबसे ज्यादा भूकम्प की तीव्रता वाले सिस्मिक जोन 4 और 5 के क्षेत्र में आने वाले टिहरी और पंचेश्वर बाँध जैसी बड़ी-बड़ी जल विद्युत परियोजनाएँ चलायी जा रही हैं जो किसी भी समय पहाड़ों से लेकर उत्तर-भारत के एक बहुत बड़े भू-भाग को बहा और डुबा देने की क्षमता रखती हैं। ये बड़े-बड़े बाँध हिमालय के ऐसे क्षेत्रों में बनाये गये हैं और बनाये जा रहे हैं, जहाँ भूकम्प का सर्वाधिक ख़तरा है। पंचेश्वर बाँध जैसी परियोजना अपने आप में इतनी खतरनाक है कि इसके डूब क्षेत्र में पिथौरागढ़ जिले के 87 गाँव तो आयेंगे ही साथ ही हिमालय की कई वनस्पतियों, जीव-जन्तुओं, पक्षियों और मछलियों की कई प्रजातियों का अस्तित्व संकट में आ जायेगा। अभी उत्तराखण्ड में 25 जल विद्युत  परियोजनाएँ चल रही हैं। जबकि 197 परियोजनाएँ विभिन्न नदी घाटियों में प्रस्तावित हैं।

वहीं दूसरी तरफ चारधाम सड़क परियोजना (ऑल वेदर रोड) से लेकर ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेल परियोजना तक ने हिमालय को जो नुकसान पहुँचाया है और पहुँचा रहे हैं उसकी भरपायी शायद ही कभी हो पाये। चार-धाम परियोजना में 92 हजार पेड़ों को काटा जाना है। जिसमें अभी तक 70 हजार से ज्यादा पेड़ों को काटा जा चुका है। सड़क काटने में निकलने वाला मलबा सीधे नदियों में डाल दिया जा रहा है। इससे नदियों का जल स्तर बढ़ने, धारा के प्रवाह बदलने के साथ ही जलीय जीवों और वनस्पतियों तक का अस्तित्व संकट में पड़ गया है। वहीं ऋषिकेश- कर्णप्रयाग रेल परियोजना में 126 किलोमीटर की लाइन में 105 किलोमीटर लाइन सुरंगों के अन्दर से जायेगी। इन सुरंगों को बनाने के लिए ड्रिलिंग और विस्फोट लगातार जारी है। जो इसकी ऊपरी सतह को कमजोर तो कर ही रहा है साथ ही उन भू-गर्भीय जल स्रोतों को भी बाधित कर रहा है जिसके ऊपर स्थानीय आबादी की पानी और सिचाईं के लिए निर्भरता है। इन दोनों योजनाओं ने  इस पूरे युवा और कच्चे पहाड़ को ऊपर से उजाड़ और भीतर से खोखला कर दिया है। हिमालय जैसे पहाड़ों में विकास की जो तकनीक अपनायी जा रही है वही तकनीक उसके विनाश का सबब बन रही है। इसी तरह की भौगोलिक स्थिति वाले दुनिया के कई देशों ने अपने यहाँ भी पहाड़ों में परिवहन और यातायात के साधनों का विकास किया है लेकिन प्रकृति को तबाह करके नहीं, बल्कि उसके साथ तालमेल बिठाकर। उन तकनीकों का इस्तेमाल करके जो इन पहाड़ों की संवेदनशीलता को नुकसान पहुँचाये बगैर मानव की जरूरतों को पूरा करे। लेकिन भारत जैसे देश में पूरी अंधेरगर्दी के साथ पूँजीपरस्त नीतियों को लागू किया जा रहा है।

इन परियोजनाओं का असर पिछले कुछ सालों से पूरे हिमालय में दिखायी भी दे रहा है। अतिवृष्टि, बादल फटना, भू-स्खलन, भू-धँसाव की घटनाएँ बहुत ज्यादा बढ़ गयी हैं। पीने के पानी और सिंचाई के प्राकृतिक जलस्रोत लगातार सूखते जा रहे हैं।  प्राकृतिक आपदायें लोगों पर कहर बनकर टूट रही हैं, बावजूद इसके ये परियोजनाएँ बदस्तूर बढ़ती जा रही हैं। ग्लोबल वार्मिंग के कारण पहले भी उच्च हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियरों के पिघलने की रफ्तार काफी बढ़ी है। लेकिन विकास और पर्यटन को बढ़ावा देने के नाम पर पूरे हिमालय में जो तबाही मचायी जा रही है उसका खामियाजा उत्तर भारत के साथ दक्षिण एशिया की एक बड़ी आबादी को भुगतना पड़ेगा। एक रिपोर्ट के मुताबिक पिछले 90 सालों में गंगोत्री ग्लेशियर 1.7 किलोमीटर पीछे गया है। हर साल यह 20 से 22 मीटर पीछे जा रहा है। हिमालय रीजन के इस क्षेत्र में सैकड़ों ग्लेशियरों के पिघलने की रफ्तार काफी बढ़ी है। जहाँ सामान्यतः यह 0.3 मीटर से 0.8 मीटर हुआ करती थी, वहीं यह 5 से 7 मीटर तक पहुँच चुकी है। यह रफ्तार अगर ऐसे ही बरकरार रही तो आने वाले कुछ दशकों में उत्तर भारत की एक बहुसंख्यक और दक्षिण एशिया की चालीस प्रतिशत आबादी पीने के साफ पानी, सिचाईं आदि के साथ जलीय स्रोतों के उन तमाम संसाधनों से वंचित हो जायेगी, जो लोगों के रोजी-रोटी और रोजगार का जरिया हैं।

मुनाफ़े की अन्धी हवस और अमीरों की विलासिता को पूरा करने का अड्डा बनता हिमालय!

हिमालय की पूरी पारिस्थितिकीय के तबाह होने और इन ग्लेशियरों के पिघलने की रफ्तार को सरकार की इन तथाकथित विकास और पर्यटन उद्योग को बढ़ावा देने की योजनाओं ने और बढ़ा दिया है। ऑल वेदर रोड से लेकर ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेल लाइन और अभी हाल ही में प्रस्तावित टनकपुर-बागेश्वर रेल लाइन जैसी परियोजनाएँ अमीरों को उनकी ऐय्याशियों के लिए अड्डा बनाने के अलावा और क्या हैं जिसमें ये तबका साप्ताहिक अवकाश पर अपनी फर्राटेदार गाड़ियों को चौड़ी-चौड़ी सड़कों पर दौड़ाते हुए सीधे हिमालय के शिखरों पर पहुँचे और वहाँ उधमचौकड़ी मचाते, प्लास्टिक के कचरों को फैलाते अपनी छुट्टियाँ बिताए और चला जाये! हिमालय के उन संवेदनशील इलाकों में हर तरह की सुख-सुविधा से युक्त बहुमंजिला इमारतें, होटल और रिजॉर्ट बनाये जा रहे हैं जहाँ धरती पर एक छोटी सी भी कम्पन बहुत बड़े भू-स्खलन को जन्म दे सकती है। लेकिन इससे सरकारों को कुछ फर्क नहीं पड़ता है। उसे अपने आकाओं की विलासिता के लिए सरअंजाम पूरा करने का हुक्म जो मिला हुआ है! इसके विनाश को भुगतना तो आम मेहनतकश जनता को है।

धराली तो एक झाँकी है!

हिमालय के पर्यावरण की तबाही के अलग-अलग कारणों को मिलाकर अगर देखा जाये तो इसके बुनियाद में पूँजीवादी व्यवस्था की अराजकता, अमीरों की विलासिता और मुनाफे की अन्धी हवस है। हिमालय की आपदा केवल धराली जैसे गाँवों, शहरों, कस्बों की नहीं है बल्कि ये एक राष्ट्रीय आपदा है। छोटे-मोटे आन्दोलनों से इस समस्या का समाधान सम्भव नहीं है। हिमालय की इस तबाही को राष्ट्रीय फलक पर लाने और एक व्यापक आन्दोलन खड़ा करने की आज ज़रूरत है। नहीं तो बड़ी-बड़ी ठेका कम्पनियों को फायदा पहुँचाने, अमीरों की विलासिता और मुनाफे की अन्धी हवस में जिस प्रकार पूरे हिमालय की पारिस्थितिकीय तन्त्र को बर्बाद किया जा रहा है, आने वाले वक़्त में इसका खामियाजा पूरे उत्तर भारत को भुगतना पड़ सकता है। सरकारों के लिए ये आपदाएँ मौसमी चक्र बन चुकीं हैं, जो आती और जाती रहती हैं। उसके लिए जनता उजड़ती-बसती रहती है। लेकिन मुनाफ़ा निरन्तर जारी रहना चाहिए!

धराली जैसी घटनाओं को तभी रोका जा सकता है जब तक उच्च हिमालयी क्षेत्रों में बड़ी बड़ी परियोजनाओं को रोका जाये! सड़कों के चौड़ीकरण के नाम पर हजारों लाखों पेड़ों को काटना बन्द किया जाए! नदियों के किनारे और कैचमेण्ट एरिया में निर्माण को बन्द किया जाये! पहाड़ी ढलानों पर बहुमंजिला इमारतों को बनने से रोका जाये! पहाड़ी कस्बों, गाँवों और शहरों में ड्रेनेज सिस्टम को दुरुस्त किया जाये! और सबसे बड़ी बात टूरिज्म और विकास के नाम पर हिमालयी विनाश को जन्म देने वाली तमाम पूँजीपरस्त, मुनाफाखोर परियोजनाओं को बन्द किया जाये! वरना इसके अलावा धराली की पुनरावृत्ति को रोकना असम्भव है।

 

मज़दूर बिगुल, अगस्त 2025

 

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मज़दूरों के महान नेता लेनिन