हरियाणा श्रम विभाग का ‘वर्क स्लिप घोटाला’: भाजपा सरकार के “सुशासन” में लूट का लाइसेंस और मज़दूरों के अधिकारों पर हमला
आशु, हरियाणा
भाजपा द्वारा हरियाणा विधानसभा चुनाव से पहले मतदाताओं को लाभार्थी बनाकर किया गया 1500 करोड़ रुपये का घोटाला अब उजागर हो रहा है। भाजपा लोकसभा से लेकर विधानसभा चुनावों तक राज्य मशीनरी, यानी चुनाव आयोग, पुलिस-प्रशासन, नौकरशाही आदि में घुसपैठ करके और लाभार्थी योजनाओं (लाडली योजना, आजीविका मिशन आदि) के ज़रिये पैसे के बदले मतदान करवाकर चुनावों में हेरा-फेरी और चोरी करती रही है। इसी कड़ी में 2024 के हरियाणा विधानसभा चुनाव के नतीजे भी शामिल हैं। चुनावों से पहले ज़मीन पर भाजपा के खिलाफ़ ज़बरदस्त लहर मौजूद थी, तब भी पार्टी का स्पष्ट बहुमत से जीतना आम लोगों के लिए हैरानी का सबब बना। लेकिन उस चुनाव में भाजपा–संघ की जातिगत बँटवारे की राजनीति के साथ-साथ पैसों का भी बड़ा खेल हुआ था, जिसकी परतें अब मुख्यमन्त्री नायब सिंह सैनी और अनिल विज की आपसी खींचतान के चलते खुलती जा रही हैं।
पिछले महीने श्रम मन्त्री अनिल विज ने हरियाणा के श्रम विभाग में 1500 करोड़ रुपये के घोटाले को लेकर प्रेस विज्ञप्ति जारी की। श्रम विभाग में सामने आया यह ‘वर्क स्लिप स्कैम’ कोई साधारण घोटाला नहीं, बल्कि मेहनतकशों व मज़दूरों के हक़ पर सीधा डाका है। मन्त्री अनिल विज के आदेश पर हुई जाँच ने ख़ुद-ब-ख़ुद पूरे सिस्टम में व्याप्त भष्टाचार और भाजपा-संघ परिवार के असली “चाल-चरित्र-चेहरे” को उजागर कर दिया है। हरियाणा भवन एवं अन्य सन्निर्माण कर्मकार कल्याण बोर्ड से जुड़े इस घोटाले में 13 ज़िलों की जाँच के दौरान 91 प्रतिशत ‘वर्क स्लिप’ फ़र्ज़ी पायी गयीं। क़रीब 6 लाख ‘वर्क स्लिप’ की जाँच में केवल 53 हज़ार वैध निकलीं, जबकि शेष पूरी तरह फ़र्ज़ी थीं। यह साफ़ दिखाता है कि योजनाएँ मज़दूरों के लिए नहीं, बल्कि दलालों, अफ़सरों और सत्ताधारी संरक्षण में पल रहे भ्रष्ट नेटवर्क के लिए चलायी जा रही थीं।
जाँच में यह भी सामने आया कि 2.21 लाख पंजीकृत मज़दूरों में से सिर्फ़ 14,240 ही वास्तविक पात्र थे। कई इलाक़ों में पूरे के पूरे गाँव ‘फ़र्ज़ी मज़दूरों’ के गाँव बन गये। कन्यादान, बच्चों की शिक्षा, मकान निर्माण और पेंशन जैसी योजनाओं में जमकर बन्दरबाँट हुई। एक-एक फ़र्ज़ी मज़दूर को औसतन ढाई लाख रुपये तक का लाभ दिलाया गया, जबकि असली निर्माण मज़दूर—जो निर्माण स्थलों पर खून-पसीना बहाता है—90 दिन की वेरिफ़िकेशन प्रक्रिया के लिए दफ़्तर-दफ़्तर भटकता रहता है। बिना रिश्वत के उसका काम नहीं होता है। यह व्यवस्था सीधी-सीधी लूट की व्यवस्था है जिसमें आम जनता पर लादे गये करों से वसूले गये सैकड़ों करोड़ रुपये का नुकसान हुआ और असली मज़दूर अपने हक़ से वंचित रह गये।
ज्ञात हो कि 2018 में ऑनलाइन सिस्टम के नाम पर मज़दूरों को लूटने का लाइसेंस दे दिया गया था। यूनियनों से वेरिफ़िकेशन का अधिकार छीन लिया गया और पंचायत सचिवों व पटवारियों को यह ताक़त सौंप दी गयी थी। नतीजा—‘वर्क स्लिप’ के नाम पर खुली दलाली। मज़दूर संगठनों के द्वारा जब इस लूट के खि़लाफ़ आवाज़ उठायी गयी तब सरकार ने उनकी एक नहीं सुनी और मनमाने फ़रमान जारी कर दिये। आज हालात यह हैं कि श्रम बोर्ड हो, मनरेगा हो, बीपीएल राशन कार्ड हो या प्रधानमन्त्री आवास योजना हो—हर जगह असली मज़दूर ‘फ़र्ज़ी’ साबित किया जा रहा है और फ़र्ज़ी लाभार्थी मलाई खा रहे हैं! यह कोई प्रशासनिक “सुधार” नहीं, बल्कि सुनियोजित मज़दूर-विरोधी साज़िश है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जाँच के नाम पर सरकार केवल खानापूर्ति कर रही है, जबकि पिछले छह महीनों से भवन निर्माण मज़दूरों की वेबसाइट तक बन्द पड़ी है और ज़रूरतमंद मज़दूरों को कोई सुविधा नहीं मिल रही है। तमाम जनपक्षधर ताक़तों द्वारा आरोप लगाये जा रहे हैं कि फ़र्ज़ी मज़दूरों की फ़ौज खड़ी कर भाजपा द्वारा विधानसभा चुनावों में पैसे बाँटे गये और वोट बटोरे गये, जबकि असली मज़दूरों के अधिकारों पर डाका डाला गया। पिछले तीन महीनों से भवन निर्माण मज़दूर यूनियनों का संयुक्त मोर्चा लगातार माँग कर रहा है कि इस घोटाले में ज़िम्मेदार अफ़सरों और राजनीतिक संरक्षण देने वालों पर कड़ी कार्रवाई हो। साथ ही, यूनियनों को फिर से वेरिफ़िकेशन का अधिकार दिया जाये, फ़र्ज़ीवाड़ा बन्द किया जाये और असली मज़दूरों को उनका हक़ मिले—वरना मज़दूर चुप नहीं बैठेंगे तथा संघर्ष और तेज़ होगा।
मज़दूर बिगुल, जनवरी 2026













