शिक्षा के निजीकरण की भेंट चढ़ गया यूपी के छात्र उज्जवल का जीवन

बिगुल संवाददाता

उत्तर प्रदेश के मुज़फ़्फ़रनगर ज़िले के बुढ़ाना स्थित डी.ए.वी. कॉलेज में मात्र परीक्षा शुल्क के विवाद ने एक मेहनतकश छात्र की जान ले ली। तीन दिन तक कॉलेज प्रशासन और पुलिस के चक्कर लगाने के बाद, जब हर दरवाज़ा बन्द मिला – तो उसने कॉलेज के भीतर ही अपने ऊपर पेट्रोल छिड़ककर आग लगा ली। यह कोई आत्महत्या नहीं थी; यह उस व्यवस्था के ख़िलाफ़़ एक आग का गोला था, जिसने शिक्षा को अधिकार नहीं, बल्कि “व्यापार” बना दिया है। यह आत्महत्या नहीं, बल्कि मुनाफ़ाख़ोर व्यवस्था द्वारा की गई हत्या है।

बी.ए. द्वितीय वर्ष का छात्र उज्जवल राणा एक साधारण किसान परिवार से था। जब कॉलेज प्रशासन ने कहा कि “पहले फ़ीस जमा करो, तभी परीक्षा दे पाओगे,” तो यह आदेश केवल उसके लिए नहीं था – यह उन लाखों छात्रों के लिए भी था जो आज देशभर में फ़ीस, किताबों और किराये के बोझ तले दबे हुए हैं। उज्जवल की ही तरह हज़ारों छात्र रोज़ इस व्यवस्था के “शिक्षा माफ़ियाओं” से जूझ रहे हैं। पिछले दो दशकों में सरकारों ने शिक्षा से धीरे-धीरे अपने हाथ खींच लिये हैं। मोदी सरकार की ‘नई शिक्षा नीति’ (NEP-2020) ने इस प्रक्रिया को और तेज़ कर दिया है। सरकारी विश्वविद्यालयों में बजट घटाया जा रहा है, फ़ीसें बढ़ाई जा रही हैं और ‘सेल्फ़-फ़ाइनेंस कोर्स’ के नाम पर निजी पूँजी को खुला न्योता दिया जा रहा है।

 सरकार कहती है – “शिक्षा में आत्मनिर्भर बनो,” लेकिन असल में इसका मतलब है कि ग़रीब और मेहनतकश वर्ग के बच्चों को विश्वविद्यालयों से बाहर धकेल दिया जाये, ताकि अमीर वर्ग और कॉरपोरेट यूनिवर्सिटी इस क्षेत्र पर क़ब्ज़ा कर सकें। आज पूरी उच्च शिक्षा “कॉरपोरेट बिज़नेस मॉडल” पर चल रही हैं – फ़ीस बढ़ाओ, ठेके पर पढ़ाई दो, ठेके पर सफ़ाई दो, और मुनाफा निजी हाथों में बाँटो! – यही आज की शिक्षा व्यवस्था की असली तस्वीर है। वहीं दूसरी तरफ डी.ए.वी. कॉलेज जैसी संस्थाएँ अब धार्मिक ट्रस्टों या निजी हाथों में पूँजी निवेश का ज़रिया बन गयी हैं। ऐसे में प्रशासन और पुलिस मिलकर ग़रीब छात्रों की आवाज़ को दबाने में जुटे हैं।

आज मोदी सरकार की नीतियाँ स्पष्ट रूप से शिक्षा-विरोधी हैं। सरकारी बजट में शिक्षा पर खर्च लगातार घटाया जा रहा है। सरकारी कॉलेजों का निजीकरण “स्व-वित्तपोषित” और “पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप” के नाम पर तेज़ी से बढ़ाया जा रहा है। छात्रवृत्तियाँ घटायी जा रही हैं, जिससे ग़रीब छात्रों के लिए पढ़ाई नामुमकिन होती जा रही है। विश्वविद्यालयों में जनवादी स्पेस लगातार संकुचित किया जा रहा है। शिक्षा पर यह हमला कोई आकस्मिक घटना नहीं है, बल्कि इस फ़ासीवादी निज़ाम की सुनियोजित नीति का हिस्सा है, जो ‘नई शिक्षा नीति 2020’ के ज़रिये व्यवस्थित रूप से लागू की जा रही है। इसके ज़रिये केन्द्र और राज्य विश्वविद्यालयों में आम घरों से आने वाले छात्रों के प्रवेश को जानबूझकर कठिन बना दिया गया है।

 उज्जवल ने अपने वीडियो सन्देश में इस पूँजीवादी व्यवस्था का असली चेहरा उजागर कर दिया था। उसकी यह मृत्यु केवल एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि उन तमाम आम घरों के छात्रों की भी है, जो आज बढ़ती फ़ीसों, घटती सीटों और घटते अवसरों की मार झेल रहे हैं। आज अधिकांश कैम्पसों में छात्रावासों की कमी, महंगी कैण्टीनें, खराब मेस, मेडिकल सुविधाओं का अभाव, साइकिल स्टैण्ड की कमी, शिक्षकों की कमी एक आम परिदृश्य है। लड़कियों के लिए “पिंक टॉयलेट” या “पिंक हॉल” जैसी घोषणाओं का महज़ दिखावा किया जा रहा है जबकि सच इस नौटंकी से कोसों दूर है। यह सब मिलकर बताता है कि शिक्षा किस तरह से आम छात्रों की पहुँच से बाहर होती चली जा रही है।

आज यह बात आम घरों से आने वाले छात्रों-नौजवानों को समझनी होगी कि फ़ीस वृद्धि की वजह से  उज्जवल द्वारा की गयी आत्महत्या असल में ‘हत्या’ है। और हत्यारी यह पूँजीवादी व्यवस्था और आज हमारे देश में मौजूद फ़ासीवादी निज़ाम है जिसने शिक्षा को एक बिकाऊ माल बना दिया है। हमें यह बात भी समझनी होगी कि शिक्षा के निजीकरण के ख़िलाफ़ देशव्यापी आन्दोलन को तेज़ किये बगैर हम ऐसे कई उज्जवलों को खोते रहेंगे! इसलिए हमें शिक्षा के निजीकरण के ख़िलाफ़ आज पुरज़ोर तरीक़े से आवाज़ बुलन्द करनी होगी। शिक्षा को मुनाफ़े का ज़रिया नहीं, बल्कि जनता का अधिकार बनाना होगा। छात्र उज्जवल की यह मौत व्यर्थ नहीं जानी चाहिए – यह नयी पीढ़ी को उस पूँजीवादी, मुनाफ़ाख़ोर व्यवस्था के ख़िलाफ़़ खड़े होने की चुनौती देती है जिसने एक मेहनतकश छात्र की ज़िन्दगी छीन ली जिसकी आँखों में हर नौजवान की तरह कई सपने रहे होंगे।

 

मज़दूर बिगुल, नवम्बर 2025

 

 

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