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वीबी-ग्रामजी: रोज़गार की गारण्टी या ग्रामीण मज़दूरों के अधिकारों में कटौती

सरकारी आँकड़ों के अनुसार, जुलाई 2026 में वीबी-ग्रामजी के तहत केवल 7.67 करोड़ व्यक्ति-दिवस रोज़गार पैदा हुआ, जबकि जुलाई 2025 में मनरेगा के तहत 15.33 करोड़ व्यक्ति-दिवस रोज़गार मिला था। व्यक्ति-दिवस का मतलब है—एक व्यक्ति को एक दिन का मिला रोज़गार। यानी एक साल में रोज़गार में क़रीब 50 प्रतिशत की भारी गिरावट आयी है। सरकार भले ही नयी योजना को ‘गारण्टी’ और ‘विकास’ के नाम से प्रचारित करे, लेकिन ज़मीन पर सवाल यह है कि जब रोज़गार ही घट रहा है तो यह कैसी रोज़गार गारण्टी है?

मोदी सरकार द्वारा ग्रामीण रोज़गार गारण्टी क़ानून (मनरेगा) को ख़त्म करने की चाल को नाकाम करो!

मनरेगा को समाप्त करना और कृषि के पीक सीज़न में 60 दिनों की तथाकथित ‘काम बन्दी’ लागू करना, दरअसल धनी किसानों और ग्रामीण पूँजीपति वर्ग को सस्ते मज़दूरों की निरन्तर सप्लाई सुनिश्चित करने की योजना है। तथ्य यह साबित करते रहे हैं कि मनरेगा के चलते ग्रामीण मज़दूरों की सौदेबाज़ी की ताक़त बढ़ी थी और वे दिहाड़ी मज़दूरी को लेकर बेहतर मोल-भाव कर पा रहे थे। लेकिन मनरेगा के ख़त्म होने से और 60 दिनों के ‘कार्य बन्दी’ के बाद बेरोज़गार मज़दूरों को मजबूरी में कम मज़दूरी पर काम करने के लिए बाध्य किया जायेगा। यही मोदी सरकार की वास्तविक मंशा है—ग्रामीण और शहरी श्रम बाज़ार को पूँजीपतियों के पक्ष में पूरी तरह झुका देना।