पर्यावरण के नाश के बाबत दो उद्धरण
“…इसलिए पूँजीवादी उत्पादन प्रौद्योगिकी का विकास करता है, और विभिन्न प्रक्रियाओं को एक सामाजिक समग्रता में संयोजित करता है, लेकिन यह केवल सम्पदा के मूल स्रोतों – मिट्टी और मज़दूर – को सोखकर करके ही ऐसा करता है।”
– कार्ल मार्क्स
“कोई कारख़ानेदार अथवा व्यापारी जब तक सामान्य इच्छित मुनाफ़े पर किसी उत्पादित अथवा खरीदे माल को बेचता है वह खुश रहता है और इस की चिन्ता नहीं करता कि बाद में माल और उस के खरीददारों का क्या होता है। इस क्रियाकलाप के प्राकृतिक प्रभावों के बारे में भी यही बात कही जा सकती है। जब क्यूबा में स्पेनी बागान मालिकों ने पर्वतों की ढलानों पर खड़े जंगलों को जला डाला और उन की राख से अत्यन्त लाभप्रद कहवा-वृक्षों की केवल एक पीढ़ी के लिए पर्याप्त खाद हासिल की, तब उन्हें इस बात की परवाह न हुई कि बाद में उष्णप्रदेशीय भारी वर्षा मिट्टी की अरक्षित परत को बहा ले जाएगी और नंगी चट्टाने ही छोड़ देगी! जैसे समाज के सम्बन्ध में वैसे ही प्रकृति के सम्बन्ध में भी वर्तमान उत्पादन-प्रणाली मुख्यतया केवल प्रथम, तात्कालिक परिणाम भर से मतलब रखती है। फिर हैरानी जताई जाती है कि इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए किये गये क्रियाकलाप के दूरवर्ती प्रभाव दूसरे ही प्रकार के, बल्कि मुख्यतया बिलकुल उलटे ही प्रकार के होते हैं।”
– फ़्रेडरिक एंगेल्स
(वानर से नर बनने में श्रम की भूमिका)
मज़दूर बिगुल, जनवरी 2026













