हमें अन्तरराष्ट्रीय स्त्री मज़दूर दिवस की क्रान्तिकारी विरासत को जानना होगा!
आज स्त्री मुक्ति की परियोजना को प्रतीकात्मक जश्न और रस्मी अनुष्ठानों से आगे ले जाने की ज़रूरत है!
ज्योति
देह नहीं होती है
एक दिन स्त्री
और उलट-पुलट जाती है
सारी दुनिया
अचानक!
– कात्यायनी
हर साल की तरह इस साल भी 8 मार्च यानी अन्तरराष्ट्रीय कामगार स्त्री दिवस आया और एक रस्मी क़वायद की तरह पूरी दुनिया में मनाया गया। इस दिन को पूँजी की ताक़तों और सत्ता के दिखावटी सरोकार ने सालाना अनुष्ठान में तब्दील कर अपने ही गौरवशाली इतिहास से काटकर रख दिया है। इस दिन की असली क्रान्तिकारी विरासत को मिटाने के मक़सद से ही इस दिन का नाम तक अन्तरराष्ट्रीय कामगार स्त्री दिवस से बदल कर अन्तरराष्ट्रीय स्त्री दिवस कर दिया गया। लेकिन आज जब महिलाओं के ख़िलाफ़ जघन्य अपराधों की बाढ-सी आ गयी है, तब इस प्रकार के ‘सालाना त्योहार’ इस दिन के महत्व को कम कर, उस क्रान्तिकारी विरासत से सीखने की हमारी ज़रूरत और चाहत को कुन्द करने का काम करते हैं।
आज देश की सत्ता में बैठे फ़ासिस्ट एक ओर “बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ” के नारे लगाते हैं और दूसरी ओर महिलाओं के उत्पीड़न और शोषण करने वाले अपराधियों-बलात्कारियों का माल्यार्पण कर उनका स्वागत-सत्कार करते हैं। एक ऐसे वक़्त में जब ख़ुद सरकारी एजेंसी राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के अनुसार वर्ष 2022 में महिलाओं के ख़िलाफ़ अपराध के 4,45,256 मामले दर्ज किये गये, तब महिला दिवस का मतलब सिर्फ़ बसों में मुफ़्त यात्रा, दुकानों में “स्पेशल ऑफ़र” और कुछ औपचारिक भाषण तक सीमित रह जाना किसी त्रासदी से कम नहीं है। वास्तव में यह दिन महज़ एकदिन के उत्सव या समझौते का दिन नहीं, बल्कि एक जुझारू संघर्ष का प्रतीक दिवस है।
उन्नीसवीं सदी में जब पूँजीवादी व्यवस्था अपने सबसे शोषणकारी दौरों में से एक में थी, तब स्त्री मजदूरों ने अपने अधिकारों के लिए आवाज़ उठायी। 1857 में न्यूयॉर्क, अमेरिका की कपड़ा मिलों में काम करने वाली महिलाओं ने 16 घण्टे की अमानवीय कार्य अवधि के ख़िलाफ़ और बेहतर मज़दूरी की माँग करते हुए प्रदर्शन किया। इस आन्दोलन को बुरी तरह कुचल दिया गया, लेकिन इससे संघर्ष की चिंगारी बुझी नहीं। दो साल बाद इन स्त्री कामगारों ने अपनी पहली यूनियन बनायी और 1908 में लगभग 20,000 स्त्री श्रमिकों ने न्यूयॉर्क में फिर प्रदर्शन किया। उनकी माँगें थीं ‘बेहतर काम की स्थितियाँ, मतदान का अधिकार और सम्मानजनक मज़दूरी’। इस आन्दोलन ने उस वक्त एक बड़े स्तर पर दुनिया का ध्यान आकर्षित किया। इसके बाद 1910 में कोपेनहेगेन में अन्तरराष्ट्रीय सम्मेलन के दौरान जर्मन क्रान्तिकारी मज़दूर नेता क्लारा ज़ेटकिन ने प्रस्तावित किया कि स्त्रियों के संघर्ष को सम्मान देने के लिए एक अन्तरराष्ट्रीय दिवस मनाया जाये। यह प्रस्ताव उस सम्मेलन में स्वीकार किये जाने के बाद यह दिन पहली बार अन्तरराष्ट्रीय कामगार स्त्री दिवस 19 मार्च, 1911 को ऑस्ट्रिया, डेनमार्क, जर्मनी और स्विट्ज़रलैंड में मनाया गया। उस वक़्त से 1921 तक हर साल फ़रवरी माह का आख़िरी रविवार अन्तरराष्ट्रीय स्त्री दिवस के रूप में मनाया जाता रहा।
रूस में 1917 की फ़रवरी क्रान्ति के दौरान जब युद्ध रोकने, भोजन, आवास और बेहतर जीवन स्थितयों की माँग को लेकर बड़ी संख्या में स्त्रियों ने प्रदर्शन किया तब स्त्रियों के इस आन्दोलन से पैदा होने वाली आग ने ज़ारशाही को राख़ करने में महती भूमिका अदा की। यही क्रान्तिकारी आग आगे बढ़कर केरेंस्की की आरज़ी सरकार का ध्वंस करने में कामयाब हुई जब बोल्शेविक पार्टी और मज़दूर वर्ग के महान नेता लेनिन के नेतृत्व में मज़दूर वर्ग ने सोवियत रूस में इतिहास की पहली सचेतन मज़दूर क्रान्ति को अंजाम दिया और मज़दूर राज की स्थापना की। इस क्रान्तिकारी परिवर्तन को अंजाम देने में स्त्रियों की एक बड़ी आबादी का शामिल होना भी एक अहम कारक था। सोवियत रूस की समाजवादी सत्ता ने पहली बार स्त्रियों को चूल्हे-चौखट से आज़ाद किया और उनको मताधिकार मिला। चूँकि ऐतिहासिक तौर पर स्त्रियों का यह जुझारू प्रदर्शन भी 8 मार्च को शुरू हुआ था, इसलिए अंत में इसी तारीख़ को अन्तरराष्ट्रीय कामगार स्त्री दिवस के रूप में चुना गया।
संघर्षों की गर्मी कुछ देशों तक ही सीमित नहीं रही बल्कि इसकी आँच दुनिया भर में औपनिवेशिक दमन झेल रहे देशों तक भी पहुँची। अन्तरराष्ट्रीय कामगार स्त्री दिवस की क्रान्तिकारी विरासत से प्रेरणा लेते हुए औपनिवेशिक देशों की स्त्रियों ने भी दमन और उत्पीड़न के जुए से आज़ादी के लिए बड़े पैमाने पर राष्ट्रीय मुक्ति संघर्षों में न केवल भागीदारी की बल्कि कई जगहों पर आन्दोलनों का नेतृत्व भी किया। इन दशाब्दियों में दुनियाभर की स्त्रियों ने पूँजी और पितृसत्ता के ख़िलाफ़ अपने अधिकार के लिए कई संगठित लड़ाइयाँ लड़ीं और कई अधिकार हासिल भी किये। भारत में भी राष्ट्रीय आन्दोलन से लेकर तमाम मज़दूरों-मेहनतकशों के आन्दोलन में औरतों ने बड़े पैमाने पर शिरकत की।
इतिहास हमेशा इस बात का गवाह रहा है कि बिना संघर्ष किये, बिना लड़े, कुछ भी हासिल कर पाना मेहनतकश जनता के लिए नामुमकिन है। आज हमारे देश में भी मज़दूर-मेहनतकशों के हालात बेहद खराब है। खास तौर पर मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद से यह स्थिति और भयावह होती चली गयी है। स्त्रियों की बात करें तो आज के भारत में उनकी स्थिति बद से बदतर होती जा रही है। आज के दौर में स्त्री कामगारों को पुरुषों के मुकाबले लगभग 67 प्रतिशत ही वेतन मिलने के बाद हुक्मरानों द्वारा स्त्री-पुरुष समानता की लच्छेदार बात करना भी एक मज़ाक़ से कम नहीं लगता है। भारत में बड़ी संख्या में स्त्रियाँ असंगठित क्षेत्र में काम करती हैं, जहाँ 12–14 घण्टे काम करने के बावजूद उन्हें न तो समान वेतन ही मिलता है और न ही कोई सामाजिक सुरक्षा ही मिलती है। यही नहीं, आर्थिक मंदी के समय सबसे पहले स्त्री कामगारों की ही छंटनी होती है और आर्थिक तेज़ी के दौर में उन्हें सस्ते श्रम के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। आज की सड़ी-गली पूँजीवादी व्यवस्था और इसकी बीमार संस्कृति ने स्त्रियों को सिर्फ़ उपभोग की वस्तु मात्र बना कर रख दिया है। स्त्रियाँ आज पूँजीवाद और पूँजीवादी पितृसत्ता की दोहरी गुलामी झेल रही हैं।
जो लोग स्त्रियों की ग़ुलामी का हल और स्त्री मुक्ति का रास्ता अस्मितावादी राजनीति या नारीवाद में देखते हैं, वे भूल जाते हैं कि स्त्री उत्पीड़न की जड़ में आज यही पूँजीवादी व्यवस्था है जिसकी चौहद्दी को ऐसे तमाम सुधारवादी लोग लांघना ही नहीं चाहते हैं। ऐसी लोग इस बात को भूल जाते हैं कि स्त्री उत्पीड़न के मसले को स्त्री बनाम पुरुष की लड़ाई तक सीमित या अपचयित कर देना दरअसल स्त्रियों के संरचात्मक उत्पीड़न और उनके व्यवस्थागत दमन की हक़ीक़त को नज़रअंदाज़ करना है जिसकी शुरुआत वर्ग समाज और निजी सम्पत्ति के उद्भव से हुई थी और वर्तमान दौर में इस उत्पीड़न को बनाये रखने में पूँजीवाद, पूँजीपति वर्ग और पूँजीवादी राज्य की भूमिका को नकारना है। स्त्री मुक्ति की परियोजना को समस्त जनसमुदायों की मुक्ति की परियोजना से अलग करके व्यक्तिगत विद्रोह तक सीमित कर देने से बहुसंख्यक स्त्रियों की वास्तविक स्थिति में परिवर्तन नहीं लाया जा सकता है।
आज ज़रूरत है कि हम स्त्री दिवस की क्रान्तिकारी विरासत से परिचित हों, इसके असली महत्व को समझें और इस विरासत को आगे बढ़ायें। आज ज़रूरत है कि स्त्रियों की स्वतंत्रता और समान अधिकारों के लिए संगठित होकर नये सिरे से संघर्षों की शुरुआत की जाये। इसके साथ ही जो अधिकार संघर्षों के बूते अब तक हासिल किये गये हैं उनकी हिफाज़त की जाये और उन्हें ज़मीनी स्तर पर लागू कराने की माँग को लेकर जुझारू तरीक़े से लगातार संघर्ष किये जायें। इसके अलावा स्त्री मुक्ति आन्दोलन को शहरी उच्च मध्यवर्गीय दायरे से बाहर लाकर इसे मेहनतकश वर्ग की व्यापक आबादी तक ले जाये जाने की भी ज़रूरत है और इसे एक जन आन्दोलन में तब्दील करने की ज़रूरत है। वैसे भी स्त्री उत्पीड़न और पितृसत्ता के विरुद्ध लड़ने का काम केवल स्त्रियों का काम नहीं है। पूँजीवादी पितृसत्तात्मक सोच के विरुद्ध निरंतर वैचारिक और व्यावहारिक संघर्ष चलाते हुए आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक स्तर पर स्त्री-पुरुष की पूर्ण समानता के लिए सतत संघर्ष कर ही हम अपनी विरासत को सच्चे मायनों में जीवित रख सकते हैं। आज यह समझना बेहद ज़रूरी है कि पितृसत्ता के ख़िलाफ़ कोई भी संघर्ष यदि पूँजीवाद-विरोधी संघर्ष से अलग होगा तो वह प्रभावी नहीं हो सकता। इसी प्रकार यह भी समझना उतना ही ज़रूरी है कि आधी आबादी की सक्रिय भागीदारी के बिना मजदूर वर्ग और आम मेहनतकश भी अपनी मुक्ति की लड़ाई को सफलतापूर्वक अंजाम नहीं दे सकते हैं।
… … …
अपराजिता
(सृष्टिकर्ता ने नारी को रचते समय बिस्तर, घर, ज़ेवर, अपवित्र इच्छाएँ, ईर्ष्या, बेईमानी और दुर्व्यवहार दिया –’मनु‘)
उन्होंने यही
सिर्फ़ यही दिया हमें
अपनी वहशी वासनाओं की
तृप्ति के लिए
दिया एक बिस्तर
जीवन घिसने के लिए,
राख होते रहने के लिए
चौका-बरतन करने के लिए
बस एक घर
समय-समय पर
नुमाइश के लिए गहने पहनाए
और हमारी आत्मा को
पराजित करने के लिए
लाद दिया उस पर
तमाम अपवित्र इच्छाओं
और दुष्कर्मों का भार।
पर नहीं कर सके पराजित वे
हमारी अजेय आत्मा को
उनके उत्तराधिकारी
और फिर उनके
उत्तराधिकारियों के उत्तराधिकारी भी
नहीं पराजित कर सके जिस तरह
मानवता की अमर-अजय आत्मा को
उसी तरह नहीं पराजित कर सके वे
हमारी अजेय आत्मा को
आज भी वह संघर्षरत है
नित-निरन्तर
उनके साथ
जिनके पास खोने को सिर्फ़ ज़ंजीरें ही हैं
बिल्कुल हमारी ही तरह!
– कात्यायनी
मज़दूर बिगुल, मार्च 2026













Recent Comments