ईरान पर अमेरिका-इज़रायल द्वारा थोपा गया साम्राज्यवादी युद्ध अमेरिकी साम्राज्यवाद और इज़रायली सेटलर उपनिवेशवाद की शर्मनाक हार के साथ ख़त्म होगा
सम्पादकीय अग्रलेख
ईरान पर साम्राज्यवादी अमेरिका और पश्चिम एशिया में उसके लठैत इज़रायल ने क़रीब चार हफ़्ते पहले हमला कर दिया। ग़ौरतलब है कि यह हमला ईरान को आणविक हथियार बनाने से रोकने के नाम पर किया गया था और हमले का अन्तिम लक्ष्य ईरान में सत्ता-परिवर्तन करने को बताया गया था। लेकिन सभी जानते थे कि ये कारण बस दुनिया को बताने के लिए गढ़े गये हैं। वास्तव में, जिस समय हमला किया गया, उस दौरान ईरान और अमेरिका के बीच ओमान की मध्यस्थता में समझौता-वार्ता जारी थी ताकि आणविक हथियारों के मसले पर कोई आम सहमति बनायी जा सके। ओमान ने हमले पर ताज्जुब जताते हुए बताया कि वार्ता में तरक्की हो रही थी और जल्द ही एक आम सहमति पर पहुँचने के आसार थे। ऐसे में अमेरिका ने हमला क्यों किया?
इसकी तात्कालिक वजह यह थी कि अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प, जिसकी फ़ितरत एक सड़कछाप गुण्डे और शोहदे जैसी है, एप्स्टीन फ़ाइल्स से पैदा हुए राजनीतिक संकट के भँवर में फँसा हुआ था। इस मसले में ट्रम्प के ऊपर बच्चियों के बलात्कार का आरोप है और उसके द्वारा किये गये कुकृत्यों के वीडियो प्रमाण भी मौजूद होने की गुंजाइश है। ट्रम्प प्रशासन लगातार इन प्रमाणों को मिटाने के प्रयासों में लगा हुआ है, हालाँकि इसमें अभी उसे पूरी सफलता नहीं मिल पा रही है। लेकिन चूँकि जेफ़री एप्स्टीन ख़ुद इज़रायल का एक एजेण्ट और दल्ला था, इसलिए ऐसे प्रमाण इज़रायल के पास होने की पूरी सम्भावना है। इज़रायल पिछले 45 वर्षों से अमेरिका को ईरान पर हमले के लिए उकसाता रहा है। लेकिन अभी तक किसी अमेरिकी राष्ट्रपति ने यह हिमाक़त करने की कोशिश नहीं की थी। लेकिन इस बार एक ऐसा अमेरिकी राष्ट्रपति इज़रायल को मिला जिसकी टुच्ची और आपराधिक हरक़तों की वजह से उसकी बाँह मरोड़कर अपना काम निकलवाना इज़रायल के लिए अपेक्षाकृत आसान था। वरना कोई वजह नहीं थी कि अमेरिका ईरान पर हमला करता।
अगर हम अमेरिकी पूँजीपति वर्ग और उसके शासक ब्लॉक को ही देखें तो यह स्पष्ट हो जाता है कि ईरान पर हमले को लेकर उसमें कोई आम सहमति नहीं थी। उल्टे उसका बड़ा हिस्सा इस हमले के ख़िलाफ़ था। ज़ाहिरा तौर पर, युद्ध शुरू हो जाने के बाद ट्रम्प की युद्ध शक्तियों को सीमित या रद्द करने के लिए वोट करना शासक ब्लॉक के लिए सम्भव नहीं था, क्योंकि वह अमेरिकी साम्राज्यवाद के लिए शर्मनाक स्थिति पैदा करता और उसके पहले से जारी राजनीतिक संकट को भी और ज़्यादा बढ़ाता। लेकिन यह स्पष्ट है कि न तो अमेरिकी पूँजीपति वर्ग फ़िलहाल यह हमला चाहता था, न ही सत्ताधारी रिपब्लिकन पार्टी में इसे लेकर कोई आम सहमति थी और न ही अमेरिकी पूँजीवादी विपक्ष इसे लेकर सरकार को समर्थन देने वाला था। अमेरिकी जनता का तो भारी बहुलांश ऐसा कोई युद्ध नहीं चाहता था और ट्रम्प के चुनाव जीतने की एक वजह ही उसका यह वायदा था कि वह अमेरिका को पश्चिम एशिया या दुनिया में कहीं भी ऐसे युद्ध में नहीं उलझायेगा। लेकिन इसके बावजूद अचानक यह हमला किया जाना स्पष्ट दिखलाता है कि यह राजनीतिक दूरदृष्टि से रिक्त ट्रम्प और उसके इर्द–गिर्द इकट्ठा नस्लवादी व साम्राज्यवादी युद्धोन्मादियों के गिरोह का एकतरफ़ा निर्णय था, जो एप्स्टीन फ़ाइल्स से पैदा राजनीतिक संकट और इज़रायल द्वारा किये जा रहे ब्लैकमेल में फँसे हुए हैं और उससे निकलने की कोशिशों में लगे हुए हैं।
इस हमले का ढाँचागत कारण यह है कि अमेरिकी साम्राज्यवाद के वर्चस्व के क़रीब चार दशकों से जारी और क़रीब दो दशकों से त्वरित हो चुके पराभव की प्रक्रिया एक नये चरण में पहुँच रही है। अमेरिकी वर्चस्व का ह्रास यूक्रेन युद्ध में रूस के हाथों अमेरिका-नीत नाटो की निरन्तर जारी हार में और ताइवान व दक्षिण चीन समुद्र के मसले में भी नज़र आता रहा है। उसके पहले, अफ़गानिस्तान से अमेरिका का दुम दबाकर भागना, इराक़ से पलायन और अफ्रीका में चीनी व रूसी साम्राज्यवाद के समक्ष बार-बार मिल रही रणनीतिक व कूटनीतिक हारों में भी अमेरिकी दबदबे का ख़ात्मा नज़र आता रहा है। ईरान युद्ध के दौरान भी ट्रम्प द्वारा यूरोप से मदद के लिए लगायी जा रही गुहारों, धमकियों और मिन्नतों से भी यह साफ़ ज़ाहिर हो रहा है कि इस साम्राज्यवादी दैत्य की हड्डियाँ अन्दर से गल चुकी हैं और वह अपनी सैन्य ताक़त के बूते, पुराने रणनीतिक क़रारों की निरन्तरता के बूते और पूरी दुनिया की प्रतिक्रियावादी पूँजीवादी सत्ताओं की रखवाली के वायदे के बूते टिका हुआ है। लेकिन ईरान ने यह भी दिखा दिया कि पश्चिमी साम्राज्यवाद के साथ समझौता करने वाली दुनिया की सभी प्रतिक्रियावादी सत्ताओं की रखवाली का अमेरिकी वायदा भी अब खोखला साबित हो चुका है क्योंकि पश्चिम एशिया में बहरीन, संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब, क़तर जैसी अमेरिका-समर्थक शाहों-शेखों की सत्ताओं वाले देशों पर हो रहे ईरानी हमलों से भी अमेरिका उनकी हिफ़ाज़त नहीं कर पा रहा है। वैश्विक पूँजीवाद के पुलिसमैन की भूमिका निभाने की औक़ात अमेरिका में नहीं रह गयी है, न ही डॉलर में पहले के समान वह ताक़त बची रह गयी है कि उसके ज़रिये किसी अन्य देश की बाँह मरोड़ी जा सके। अमेरिका ख़ुद पश्चिम एशिया के तमाम देशों में अपने सैन्य अड्डे तक ईरान के हमलों से नहीं बचा पा रहा है। जब किसी साम्राज्यवादी वर्चस्वकारी शक्ति का पतन होता है तो उसका शासक वर्ग इस गिरावट को रोकने के लिए आनन–फ़ानन में तरह–तरह की कोशिशें करता है, और इसी प्रक्रिया में भयंकर ग़लतियाँ भी करता है। इस प्रक्रिया में निश्चित तौर पर वह दुनिया भर में काफ़ी तबाही और क़त्लेआम भी मचाता है। लेकिन यह उसकी शक्ति का लक्षण नहीं होता, बल्कि उसके ह्रास और पतन का लक्षण होता है। ईरान पर हमला भी अमेरिकी साम्राज्यवाद की एक ऐसी ही नयी ग़लती है।
अमेरिका में ट्रम्प का राष्ट्रपति बनना स्वयं अमेरिकी साम्राज्यवाद और उसके शासक वर्ग के राजनीतिक संकट का लक्षण मात्र है। अपने पहले कार्यकाल में तो ट्रम्प अमेरिकी बुर्जुआ वर्ग का आम सहमति वाला उम्मीदवार ही नहीं था, लेकिन आर्थिक संकट के कारण पैदा हुई सामाजिक असुरक्षा व अनिश्चितता के चलते अमेरिकी गोरे टुटपुँजिया व टुटपुँजियाकृत गोरे मेहनतकश व अर्द्धसर्वहारा वर्ग के बीच पैदा हुए धुर-दक्षिणपन्थी उभार के कारण ट्रम्प ने चुनाव जीत लिया था। इस बार ट्रम्प छोटे-से अन्तर के साथ अमेरिकी पूँजीपति वर्ग का भी आम सहमति वाला उम्मीदवार बन गया था। लेकिन अब वह अन्तर समाप्त हो गया है। यह राजनीतिक उथल-पुथल और कुछ नहीं बल्कि एक गिरती हुई साम्राज्यवादी शक्ति के आन्तरिक अन्तरविरोधों के ही परिणाम हैं।
फ़िलिस्तीन व ग़ज़ा के मसले ने अमेरिकी शासक वर्ग के संकट को और भी ज़्यादा बढ़ाया है। इज़रायल द्वारा एक लाख से ज़्यादा फ़िलिस्तीनी नागरिकों, बच्चों, बूढ़ों, जवानों की हत्या ने झूठे प्रचार के आधार पर अमेरिकी जनता के बीच इज़रायल के लिए पैदा किये गये कृत्रिम समर्थन को समाप्त करने का काम किया है। अमेरिकी जनता का बड़ा हिस्सा अब इज़रायल के बारे में नकारात्मक राय रखता है। लेकिन अमेरिकी शासक वर्ग को अपने साम्राज्यवादी हितों की रक्षा के लिए इज़रायल की आवश्यकता है। इसलिए वह निरन्तर हत्यारे सेटलर उपनिवेशवादी इज़रायल को धन व हथियार मुहैया कराता रहता है, जिससे कि इज़रायल ग़ज़ा में अपने क़त्लेआम को जारी रख सके। इसके कारण भी अमेरिकी साम्राज्यवादी सत्ता व्यापक जनसमुदायों में अपनी वैधता को खो रही है। इसके कारण भी अमेरिकी शासक वर्ग का राजनीतिक संकट और गहरा रहा है।
उपरोक्त तात्कालिक व ढाँचागत कारणों के चलते इज़रायल ट्रम्प को ईरान पर हमला करने की भारी भूल करने के लिए उकसाने में कामयाब रहा। अमेरिका-इज़रायल को यह लग रहा था कि अगर ईरान में सत्तासीन इस्लामी शासन के शीर्ष नेतृत्व, उसकी सेना व सशस्त्र बलों के शीर्ष नेतृत्व आदि की हत्या कर दी जाये, उसके शहरों पर कुछ समय के लिए भारी बमबारी कर दी जाय तो ईरान में जनता ही इस्लामी सत्ता का तख़्तापलट कर देगी और कोई अमेरिका-इज़रायल परस्त सत्ता वहाँ बिठायी जा सकती है। लेकिन आयतुल्ला ख़ामनेई और कई शीर्ष नेताओं की हत्या का उल्टा असर हुआ। इसने ईरानी क़ौम में अमेरिकी-इज़रायली हमले के ख़िलाफ़ एकजुटता का माहौल बना दिया।
ग़ौरतलब है कि अपने दमनकारी रवैये के कारण आयतुल्ला का प्रतिक्रियावादी धार्मिक कट्टरपन्थी शासन ईरानी जनता के एक अच्छे-ख़ासे हिस्से में अलोकप्रिय हो चुका था। लेकिन साथ ही ईरान अमेरिकी साम्राज्यवाद और इज़रायली सेटलर उपनिवेश के लिए पश्चिम एशिया में सबसे बड़ी चुनौती और ख़तरा भी बना हुआ था। साथ ही, फ़िलिस्तीन की आज़ादी का भी सबसे सुसंगत समर्थक ईरान ही था। ऐसे में, ईरान के भीतर पश्चिमी साम्राज्यवाद के विरुद्ध नफ़रत के कारण इस दमनकारी इस्लामी शासन का एक समर्थन आधार भी मौजूद रहा है। अमेरिकी हमले ने इस सामाजिक आधार को और अधिक विस्तारित कर दिया है। कहना ग़लत न होगा कि अगर अमेरिकी साम्राज्यवाद का दबाव न होता, तो इस बात की प्रबल सम्भावना थी कि ईरान की दमनकारी इस्लामी कट्टरपंथी सत्ता को ईरानी जनता कालान्तर में स्वयं ही उखाड़ फेंकती। यही सम्भावना कई लातिन अमेरिकी देशों में भी मौजूद रही है। लेकिन साम्राज्यवादी शोषण व दमन कई बार ऐसी दमनकारी सत्ताओं के लिए सीमित अर्थों में जनता को अपने पक्ष में गोलबन्द करने का उपकरण बन जाता है, जो विश्व राजनीति में वर्चस्वकारी साम्राज्यवादी शक्ति के विरुद्ध खड़ी हों।
बहरहाल, किसी भी देश में किसी भी सत्ता को क़ायम करना, उसका समर्थन करना या उसका विरोध करना, उसे उखाड़ फेंकना उस देश की जनता का काम होता है। इसमें अमेरिका या किसी भी दूसरे देश को हस्तक्षेप करने का कोई अधिकार नहीं है। अमेरिका ने अपने से ही दुनिया में “लोकतन्त्र” स्थापित करने का जो ठेका ले रखा है, उसकी असलियत सभी जानते हैं। वह कभी पश्चिम एशिया की शाहों–शेख़ों की सत्ताओं के विरुद्ध लोकतन्त्र स्थापित करने की बात क्यों नहीं करता जो कि भयंकर तानाशाह क़िस्म की राजतान्त्रिक सत्ताएँ हैं? वह फिलिप्पींस में पहले दुतेर्ते और अब मार्कोस जूनियर जैसी तानाशाहाना सत्ताओं को समर्थन क्यों देता है? वह थाईलैण्ड के सैन्य शासन को समर्थन क्यों देता है? उसने वर्षों तक चीले के बर्बर सैन्य तानाशाह पिनोशे को समर्थन क्यों दिया? और तो और, खु़द अमेरिका में काले लोगों, लातिनी लोगों, अन्य प्रवासियों और स्वयं श्वेत ग़रीब आबादी के प्रति अमेरिकी सत्ता कितनी लोकतान्त्रिक है, ये सभी जानते हैं। अभी बॉर्डर पेट्रोल पुलिस व ट्रम्प की अर्द्धफ़ासीवादी मिलिशिया आइस (ICE) जिस प्रकार अमेरिकी नागरिकों का क़त्लेआम कर रहे हैं, वह जगज़ाहिर है। इसलिए जब भी अमेरिका कहीं “लोकतन्त्र” स्थापित करने की बात करे, तो तुरन्त पता करें कि कहीं उस देश में प्राकृतिक गैस, तेल, या खनिजों के भण्डार तो नहीं हैं? कहीं वह देश अपना विदेशी व्यापार डॉलर को छोड़कर किसी अन्य मुद्रा में तो नहीं कर रहा है? कहीं वह देश स्वयं रूस या चीन जैसा शक्तिशाली देश होने के बजाय, अपेक्षाकृत पिछड़ा, कमज़ोर या छोटा देश तो नहीं है? अगर ऐसा है तो पूरी सम्भावना है कि वहाँ “लोकतन्त्र ख़तरे में” होगा और जल्द ही अमेरिका वहाँ “लोकतन्त्र” स्थापित करने की कोशिश करेगा, जैसा कि उसने अफ़गानिस्तान, लीबिया, इराक़, आदि में किया है! सारी दुनिया जानती है कि यह अमेरिकी साम्राज्यवादी हितों और आम तौर पर पश्चिमी साम्राज्यवादी हितों के लिए तमाम देशों की आज़ादी और सम्प्रभुता को निगलने के लिए किये जाने वाले हमले होते हैं, ताकि इन देशों को बेरोक-टोक साम्राज्यवादी लूट की चरागाह बनाया जा सके।
मज़दूर वर्ग का स्पष्ट नज़रिया यह है कि किसी भी देश को किसी अन्य देश में “लोकतन्त्र” स्थापित करने, किसी दमनकारी सत्ता को हटाने आदि के नाम पर हमला करने, या किसी भी रूप में हस्तक्षेप करने का कोई अधिकार नहीं है। यह उस देश की जनता का कार्यभार होता है कि वह किसी सत्ता को स्थापित करे या उखाड़ फेंके। यदि किसी देश ने किसी अन्य देश पर हमला करके क़ब्ज़ा किया हो, तो वह देश स्वयं हमलावर माना जायेगा और उसके क़ब्ज़े से किसी देश को स्वतन्त्र कराने के लिए किसी अन्य देश द्वारा हस्तक्षेप एक दूसरा मसला है और निश्चित स्थितियों में वह बिल्कुल सही हो सकता है। मसलन, सोवियत यूनियन की सेनाओं ने हिटलर के नात्सी जर्मनी को हराकर यूरोप के कई देशों को मुक्त किया। लेकिन अगर ऐसी स्थिति न होती, तो सोवियत यूनियन का यह काम नहीं था कि वह ख़ुद जर्मनी पर हमला कर जर्मनी को नात्सी शासन से मुक्त कराये। यह जर्मन जनता का कार्यभार था, चाहे वह उसमें सफल हो पायी हो या न हो पायी हो। इस काम में कोई अन्य देश विचारधारात्मक व राजनीतिक तौर पर संघर्षरत जनता को समर्थन दे सकता है, किसी अन्य साम्राज्यवादी देश द्वारा संघर्षरत जनता के विद्रोह को दबाने के लिए किये जाने वाले हस्तक्षेप को रोक सकता है, लेकिन स्वयं उस देश की जनता को किसी तानाशाह से मुक्त करना, स्वयं उस देश की जनता का काम होता है। इसलिए हम हर हालत में किसी भी देश में किसी भी बहाने के नाम पर साम्राज्यवादी हस्तक्षेप की मुख़ालफ़त करते हैं। यह अमेरिका को दिव्य रूप से प्राप्त अधिकार नहीं है कि वह तय करे कि किस देश में किसका और कैसा शासन हो। यह हर देश की जनता को तय करना होता है।
वैसे जिस बहाने के नाम पर यह हमला किया गया, यानी ईरान को आणविक हथियार विकसित करने से रोकने के नाम पर, वह बहाना ही विचित्र और असमानतापूर्ण है। अमेरिका के पास आणविक हथियार हैं, पश्चिम एशिया में उसके टट्टू इज़रायल के पास आणविक हथियार हैं, उसके सहयोगी साम्राज्यवादी देशों ब्रिटेन, फ्रांस, आदि के पास आणविक हथियार हैं तो वे कैसे तय कर सकते हैं कि ईरान के पास आणविक हथियार न हों? या तो समूची दुनिया को आणविक हथियारों से मुक्त किया जाय, या फिर हर देश को अपनी सुरक्षा के लिए ऐसे हथियार विकसित करने का अधिकार होना चाहिए! निश्चित रूप से, आम तौर पर मज़दूर वर्ग का नज़रिया आणविक हथियारों और जनसंहार के अन्य हथियारों के विरुद्ध है। लेकिन यह दुनिया में एकसमान ही लागू किया जा सकता है। कुछ देशों को ऐसे हथियार रखने का अधिकार हो और बाक़ी देशों को नहीं, यह चल ही नहीं सकता है।
वैसे तो ईरान आणविक हथियार विकसित करने की बात से लगातार इंकार करता रहा था, लेकिन अगर वह ऐसा वाक़ई कर भी रहा था, तो इस पर बोलने का अमेरिका या इज़रायल को कोई अधिकार नहीं है। एक पूँजीवादी दुनिया में यह एक आज़ाद देश का अपना अधिकार है। लेकिन 1945 के बाद जो विश्व राजनीतिक व्यवस्था अमेरिकी प्रभुत्व के मातहत अस्तित्व में आयी, उसमें समानता नाम की कोई चीज़ कभी थी ही नहीं। उसके पहले भी नहीं थी, लेकिन 1945 में आये ब्रेटनवुड्स तन्त्र ने समानता के किसी भी भ्रम को समाप्त कर दिया। आज उस ब्रेटन वुड्स व्यवस्था के नियमों का भी कोई अर्थ नहीं रह गया है! वेनेज़ुएला पर हमला कर उसके चुने गये राष्ट्रपति को अगवा कर लिया जाना, ईरान पर एकतरफ़ा तरीक़े से हमला कर दिया जाना, उसके पहले ग़ज़ा में एक लाख से ज़्यादा फ़िलिस्तीनियों का क़त्ले-आम कर दिया जाना, अन्तरराष्ट्रीय अदालत में वारण्ट निकलने के बावजूद नेतनयाहू व अन्य हत्यारों को खुला घूमने दिया जाना…ये सब अन्तरराष्ट्रीय पूँजीवादी क़ानूनों और व्यवस्था का ही तो उल्लंघन है! लेकिन इन क़ानूनों का दिखावटी पालन भी तभी तक होता है, जब तक साम्राज्यवादी संकट गहराया नहीं होता। साम्राज्यवादी संकट के गहराने और उसके फलस्वरूप तमाम साम्राज्यवादी देशों में राजनीतिक संकट के गहराने के साथ इन क़ानूनों का दिखावटी पालन भी असम्भव होता जाता है और जनता के सामने इसकी असलियत अधिक से अधिक सामने आती जाती है। यही आज हो रहा है।
जो भी हो, ईरान पर हमला अमेरिका और इज़रायल की भारी भूल साबित हो रहा है। ईरान ने अमेरिकी हमले का मुँहतोड़ जवाब देते हुए पश्चिम एशिया में अमेरिकी सैन्य ठिकानों को तबाह या क्षतिग्रस्त कर दिया है, उनकी सेनाओं को इधर-उधर भागने और मुँह छिपाने पर मजबूर कर दिया है, इज़रायल में भयंकर तबाही मचा दी है जो अभी भी जारी है, होर्मूज़ जलसंधि को बन्द करके दुनिया भर में प्राकृतिक गैस व तेल की क़ीमतों का संकट पैदा कर दिया है। हालत यह है कि ट्रम्प रोज़ कभी यूरोप व जापान के सामने यह रास्ता खुलवाने के लिए गिड़गिड़ा रहा है, तो कभी चीन व रूस के सामने। कभी वह ईरान को युद्धविराम के सन्देश ओमान के रास्ते भिजवा रहा है, तो कभी पाकिस्तान से मध्यस्थता कर युद्धविराम करवाने की अपील कर रहा है। लेकिन ऊपर से ट्रम्प ईरान में युद्ध के लक्ष्य के पूरा होने का दावा कर रहा है, उनकी सेना, हवाई शक्ति आदि को नष्ट कर देने की बात कर रहा है, जो कि उसकी आदत है: बड़बोले झूठे दावे करना। सारी दुनिया ट्रम्प पर हँस रही है, ठीक उसी तरह जैसे सारी दुनिया और हमारा देश इस समय मोदी पर हँस रहा है। ईरान जिस तरह से अपने हमलों की बारम्बारता और शक्ति बढ़ाता जा रहा है उससे स्पष्ट है कि ट्रम्प के ये दावे शर्मनाक स्थिति को छिपाने के लिए किये जाने वाले प्रयास हैं। ईरान अपनी तरफ़ से वार्ता का कोई प्रस्ताव नहीं भेज रहा है और ट्रम्प के इन दावों को ख़ारिज कर रहा है कि युद्धविराम को लेकर उससे कोई बात हुई है। वह ऐसी बात करने की फिलहाल कोई इच्छा भी ज़ाहिर नहीं कर रहा है। उसने शर्त रखी है कि कोई भी बात तभी होगी जब पश्चिम एशिया से अमेरिकी सैन्य ठिकानों को हटाया जाय और स्थायी तौर पर सैन्य हस्तक्षेप की सम्भावना को ख़त्म किया जाय, फ़िलिस्तीनी जनता का क़त्ले-आम और क़ौमी दमन बन्द किया जाय और इज़रायल के कब्ज़े और हमले को रोका जाय।
ईंधन का संकट दुनिया के तमाम देशों में गहराने लगा है। ईरान अपने मित्र देशों के ईंधन के जहाज़ों को जाने दे रहा है, लेकिन बाक़ी सारी दुनिया के लिए उसने होर्मूज़ का रास्ता बन्द कर रखा है। अमेरिका या किसी देश में यह औक़ात नहीं है कि होर्मूज़ जलसन्धि पर ईरान से निपट पाये और उसे खुलवा पाये। अमेरिकी लोग ईंधन की भारी खपत करते हैं और पश्चिम एशिया के ईंधन पर पूरी अर्थव्यवस्था ही बुरी तरह से निर्भर है। यही हालत यूरोप के साम्राज्यवादी देशों की भी है। रूस ईंधन के मामले में कमोबेश आत्मनिर्भर है और चीन को ईंधन की आपूर्ति में कोई कमी नहीं की गयी है। इसलिए उन्हें ईरान द्वारा की गयी इस नाकेबन्दी से कोई असर नहीं पड़ रहा। भारत के प्रधानमन्त्री मोदी ने ख़ुद अपने और अपने मन्त्रियों के एप्स्टीन फ़ाइल में फँसे होने और अपने चहेते अडाणी के अमेरिका में फर्जीवाड़े के केस में फँसे होने के कारण, भारत की विदेश नीति में एक परिवर्तन कर अपने आपको सीधे अमेरिकी–इज़रायली खेमे के नज़दीक कर दिया था। यह भयंकर मूर्खता अब रंग ला रही है। मोदी हर दूसरे रोज़ ईरान के नेता पेज़ेशकियान को फ़ोन कर ईंधन आने देने के लिए गिड़गिड़ा रहे हैं, लेकिन कोई फ़ायदा नहीं हो रहा है। देश की जनता एलपीजी की कमी के कारण त्राहिमाम कर रही है, और कुछ राज्यों में जो चुनाव आने वाले हैं, उसके बाद पेट्रोल और डीज़ल की क़ीमतों में भी मोदी सरकार भारी बढ़ोत्तरी निश्चित ही करेगी। मोदी ने 23 मार्च को संसद में बोल ही दिया है कि जनता को कोरोना में पैदा हुए हालात जैसे हालात के लिए तैयार रहना चाहिए!
ईरान युद्ध के मामले पर भी चुप्पी साधे रखना और अमेरिका–इज़रायल को मौन समर्थन देना भारतीय पूँजीपति वर्ग का आम सहमति का फ़ैसला नहीं था। यह मोदी और उसके क़रीबी गिरोह के आपसी हितों के मद्देनज़र लिया गया फ़ैसला था, जो एप्स्टीन फ़ाइल्स और अडाणी फ़ाइल्स में फँसे होने के कारण मोदी-शाह ने अपनी सत्ता को बचाने के लिए लिया है। यही वजह है कि भारतीय पूँजीपति वर्ग के शासक ब्लॉक की एकता में भी स्पष्ट दरारें दिखायी दे रही हैं, सत्ता की बची-खुची जनवैधता तेज़ी से घट रही है और यह भारतीय पूँजीपति वर्ग को तेज़ी से एक नये आन्तरिक राजनीतिक संकट की ओर ले जा रहा है। अगर मोदी सरकार की विदेश नीति इसी प्रकार बनी रही, तो यह राजनीतिक संकट बढ़ता ही जायेगा। यह अपनी ख़ुद की कुर्सी बचाने के लिए भारतीय फ़ासीवाद के ‘सुप्रीम लीडर’ मोदी द्वारा की गयी समझौतापरस्ती और मूर्खता है, जिसकी क़ीमत अब देश की जनता चुका रही है और आगे और ज़्यादा चुकायेगी। ऐसे माहौल में फिर से सारा ठीकरा ईरान युद्ध पर फोड़ने की कोशिश की जायेगी, हिन्दू-मुसलमान का शोर मचाया जायेगा, समूचा गोदी मीडिया अपनी दलाली को नये चरम पर ले जायेगा और झूठ की ऐसी बारिश करेगा कि हर सच की आवाज़ को उसमें डुबा दिया जाय।
बहरहाल, अभी स्थिति यह है कि अमेरिका–इज़रायल यह युद्ध हार रहे हैं। हताशा में वे ईरान की आम नागरिक जनता पर बमबारी कर रहे हैं जिसमें डेढ़ हज़ार से ज़्यादा ईरानी मारे जा चुके हैं। लेकिन ईरान की मिसाइल क्षमता और सैन्य क्षमता पर उनके वार का असर बेहद सीमित है, जो ईरान के बढ़ते हमलों से साबित हो रहा है। अमेरिका और इज़रायल अपने मारे गये सैनिकों व नागरिकों की सही संख्या को नहीं बता रहे हैं। उनके भी सैंकड़ों में होने को कई स्वतन्त्र एजेंसियों ने पुष्ट किया है। ईरान ने होर्मूज़ का रास्ता बन्द कर विश्व साम्राज्यवाद के सरगना अमेरिका की आर्थिक नब्ज़ पकड़ ली है। ट्रम्प छटपटा रहा है और अपनी भयंकर भूल से किसी तरह इज़्ज़त बचाकर निकलने की कोशिश में लगा है। इज़रायल को यह भय सता रहा है कि अगर अमेरिका किसी सन्धि या वार्ता के बाद युद्ध से पीछे हट जाता है, तो वह क्या करेगा? ईरान के सामने अकेले टिकने की उसकी एक दिन की भी औक़ात नहीं है और अप्रत्यक्ष अमेरिकी सहायता भी ईरान से युद्ध में उसे बचा नहीं सकती है। यह पिछले साल 12 दिन के युद्ध के दौरान भी साबित हो गया था, जब ईरान पर हमला करने के बाद ईरान के जवाबी हमले से बिलबिलाया इज़रायल छाती पीटते अमेरिका के पास मदद के लिए भागा था। रूस व चीन की धुरी ने प्रत्यक्ष हस्तक्षेप नहीं किया है, लेकिन एक लाल रेखा खींच दी है: अगर इज़रायल आणविक हथियारों को इस्तेमाल करता है, तो वे भी वैसा ही जवाब स्वयं इज़रायल को देंगे या ईरान के ज़रिये देंगे। इसलिए, आणविक हथियारों का इस्तेमाल होने की सम्भावना नगण्य है। इसलिए अमेरिका के हार के साथ “जीत गया-जीत गया” चिल्लाते हुए भागने के बाद इज़रायल के पास भी अन्त में युद्ध से भागने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचेगा।
कुल मिलाकर, यह युद्ध अमेरिकी साम्राज्यवादी वर्चस्व को मज़बूत करने के बजाय, उसके जारी ह्रास को और त्वरित करने का काम कर गया है। इज़रायल का भावी अस्तित्व हमेशा से प्रश्नों के घेरे में था, लेकिन अब यह साफ़ होता जा रहा है कि आने वाले वर्षों या दशकों के दौरान इस सेटलर उपनिवेशवादी राज्य का ख़ात्मा तय है। स्वयं इज़रायली पत्रकार, इतिहासकार, बुद्धिजीवी और उसके शासक वर्ग के लोग यह दबे स्वर में मान रहे हैं कि ज़ायनवाद एक राजनीतिक विचारधारा व प्रतिक्रियावादी फ़ासीवादी नस्लवादी आन्दोलन के तौर पर अपने अन्तिम चरण में है। कुछ यह भी मान रहे हैं इज़रायली सेटलर उपनिवेशवादी राज्य के दिन अब गिने हुए हैं।
पूँजीवादी विश्व एक भारी उथल–पुथल की ओर बढ़ रहा है। अपनी चौधराहट खोता कोई भी साम्राज्यवादी देश शान्ति के साथ साम्राज्यवादी वर्चस्व का ताज किसी और साम्राज्यवादी ताक़त के सिर नहीं रखता है। वर्चस्व के ढाँचे में कोई भी परिवर्तन बड़े युद्धों या युद्धों के सिलसिले के साथ ही होता है। यह युद्धों का सिलसिला वास्तव में रूस और चीन की साम्राज्यवादी धुरी के उभार के साथ ही शुरू हो गया था। इराक़ युद्ध, अफ़गानिस्तान युद्ध, दूसरा इराक़ युद्ध, यूक्रेन युद्ध, और अब ईरान युद्ध अमेरिका के दीर्घकालिक पराभव के इसी सिलसिले का हिस्सा हैं।
जब भी साम्राज्यवादी संकट गहराता है तो वह विश्व साम्राज्यवाद की सबसे अहम गाँठ यानी फ़िलिस्तीन की क़ौमी आज़ादी के सवाल के क्षेत्र में भी अपने आपको प्रकट करता है। वजह यह है कि समूचा पश्चिम एशिया विश्व के सर्वाधिक रणनीतिक माल यानी जीवाश्म ईंधन का सबसे बड़ा भण्डार है; साथ ही, वह भूराजनीतिक तौर पर यूरोप, रूस, अफ्रीका और एशिया के बीच स्थित है। और पश्चिम एशिया में पश्चिमी साम्राज्यवाद के हितों की रक्षा का काम करने वाला लठैत है इज़रायल। और इज़रायल के अस्तित्व के लिए ज़रूरी है फ़िलिस्तीनी क़ौम का निरन्तर दमन, जनसंहार और विस्थापन। और यह दमन, जनसंहार और विस्थापन समूचे अरब जगत में पश्चिमी साम्राज्यवाद के संकट को बेतरह बढ़ा रहा है। इसके कारण, इन देशों में मौजूद शाहों-शेख़ों की सत्ताएँ भी इन देशों की जनता के बीच भयंकर अलोकप्रिय हैं। यही वजह है कि अरब जगत में होने वाले हर जनउभार, हर आन्दोलन में तमाम सवालों के साथ फ़िलिस्तीन की आज़ादी और इज़रायली सेटलर उपनिवेशवादी राज्य के ख़ात्मे का सवाल अहम होता है। यही वजह है कि एक छोटे से देश फ़िलिस्तीन का राष्ट्रीय मुक्ति युद्ध विश्व साम्राज्यवाद की एक प्रधान गाँठ के रूप में अपने आपको बार–बार प्रकट करता रहा है और तब तक करता रहेगा जब तक कि फ़िलिस्तीन आज़ाद नहीं हो जाता है।
ईरान युद्ध पश्चिमी साम्राज्यवाद के पश्चिम एशिया में उखड़ते पाँवों को और तेज़ी से उखाड़ने का काम कर रहा है। निश्चित ही इसका यह अर्थ नहीं है कि यह प्रक्रिया तत्काल ही पूरी हो जायेगी। लेकिन इसकी गति निश्चित ही बढ़ गयी है। अमेरिका और इज़रायल को समझ आ गया है कि ईरान इराक़ नहीं है। वह कहीं ज़्यादा विशाल है, सैन्य तौर पर कहीं ज़्यादा मज़बूत है और उसकी सत्ता का चरित्र भी सद्दाम की सत्ता के चरित्र से भिन्न है। सद्दाम ने पश्चिम एशिया में अपने क्षेत्रीय दबदबे को बनाने के लिए पश्चिमी साम्राज्यवाद से तमाम समझौते भी किये थे, ख़ास तौर पर ईरान से प्रतिस्पर्द्धा के मसले पर। लेकिन इसके विपरीत 1979 के बाद से ईरान एक दमनकारी धार्मिक कट्टरपंथी पूँजीवादी सत्ता होने के बावजूद विश्व पूँजीवाद के विशिष्ट समीकरणों के कारण निरन्तरतापूर्ण तरीक़े से पश्चिमी साम्राज्यवाद के विरुद्ध खड़ा रहा है। फ़िलिस्तीन की आज़ादी का वह बिना शर्त समर्थन करता रहा है। अमेरिकी साम्राज्यवाद और इज़रायली ज़ायनवाद का वह निरन्तर विरोध करता रहा है। इसकी वजह से घरेलू तौर पर बेहद अलोकप्रिय हो जाने के बावजूद साम्राज्यवादी आक्रमण की सूरत में देश की जनता का एक अच्छा–ख़ासा हिस्सा इस सत्ता के इर्द–गिर्द इस विशिष्ट मसले पर गोलबन्द हो जाता है। सद्दाम हुसैन की सत्ता के मामले में ऐसी बात नहीं थी। इसके अलावा, ग़ज़ा व फ़िलिस्तीन से अलग, ईरान सेना व उन्नत हथियारों से वंचित कोई देश भी नहीं है। और तीसरी बात यह कि उसके पीछे रूस की तकनोलॉजिकल और सैन्य शक्ति और चीन की आर्थिक शक्ति भी लगातार एक साये के समान खड़ी है। इसलिए अमेरिका व इज़रायल के लिए आने वाले दिन काफ़ी बुरे साबित होने वाले हैं, इतना तय है।
इस युद्ध का असर हमारे देश पर भी पड़ रहा है और आगे भी पड़ेगा। मोदी सरकार ने सिर्फ़ अपनी सत्ता बचाने के लिए स्वयं भारतीय पूँजीपति वर्ग की आम सहमति से भी अलग जाते हुए, अपनी विदेश नीति में जो मूर्खतापूर्ण क़दम उठाये हैं, उसका ख़ामियाज़ा अभी से ही देश के मेहनतकश लोग भुगत रहे हैं। मोदी ने ख़ुद ही बोल दिया है कि कोरोना जैसे हालात के लिए जनता तैयार रहे! ऐसे में, इस सरकार और इसकी जनविरोधी नीतियों के विरुद्ध देश की जनता को जुझारू एकजुटता बनानी होगी, हिन्दू–मुसलमान के झगड़े और दंगे पैदा करने की संघ परिवार और भाजपा सरकार की हर साज़िश को नाकाम करना होगा, गोदी मीडिया का पूर्ण बहिष्कार करना होगा और अपने अधिकारों के लिए धर्म और जाति के बन्धनों और बँटवारों को तोड़कर सड़कों पर उतरना होगा। साथ ही, दुनिया भर के मेहनतकश अवाम और दमित क़ौमों के साथ हमें अपनी एकजुटता ज़ाहिर करते हुए अमेरिकी साम्राज्यवाद और इज़रायली ज़ायनवाद का पुरज़ोर विरोध करना होगा। जिस देश की जनता अन्य देशों की जनता पर होने वाले ज़ुल्म के ख़िलाफ़ नहीं बोलती वह ख़ुद भी अपने देश के हुक्मरानों के ज़ुल्म का शिकार होते रहने के लिए अभिशप्त होती है।
दुनिया भर की मेहनतकश जनता की एकजुटता आज साम्राज्यवाद के लिए एक चुनौती बन रही है, जैसा कि फ़िलिस्तीन के सवाल पर दुनिया भर में हुए आन्दोलनों ने दिखलाया। स्पेन, आयरलैण्ड, निकारागुआ, वेनेज़ुएला, कोलम्बिया आदि कई देशों की पूँजीवादी सत्ताओं को जनआन्दोलनों के दबाव में इज़रायल से तमाम रिश्ते तोड़ने भी पड़े। यह शासक वर्ग की प्रगतिशीलता नहीं है, बल्कि दुनिया की जनता के आन्दोलनों का ही दबाव है कि आज इज़रायल दुनिया में अधिक से अधिक अलग-थलग पड़ता जा रहा है। हमारे देश में फ़िलिस्तीन के सवाल पर जागरूकता की ऐतिहासिक तौर पर कमी रही है और साथ में मोदी सरकार के साम्प्रदायिक फ़ासीवादी एजेण्डा के तहत यह जागरूकता और भी कम हुई थी। लेकिन इस बार ग़ज़ा में हुए जनसंहार ने भारतीय जनता के एक विचारणीय हिस्से में भी यह जागरूकता पैदा करना शुरू कर दिया है। ‘फ़िलिस्तीन के साथ एकजुटता में भारतीय जन’ (आईपीएसपी) व ‘बीडीएस इण्डिया’ जैसे जनसंगठनों व अभियानों और ‘भारत की क्रान्तिकारी मज़दूर पार्टी’ (आरडब्ल्यूपीआई) ने इसमें विशेष भूमिका निभायी है। ईरान युद्ध के मसले पर भी देश के इन संगठनों ने सबसे पहले आवाज़ उठायी। नतीजतन, देश की जनता में इन मसलों को लेकर जागरूकता बढ़ी है, संघी प्रचार और साम्राज्यवादी प्रचार का असर पहले से कम हुआ है और अधिक से अधिक लोग साम्राज्यवादी अमेरिका, ज़ायनवादी इज़रायल और हमारे देश में मौजूद संघी फ़ासीवाद व उनके गठजोड़ की असलियत को समझ रहे हैं। ऐसा इसलिए भी हो रहा है कि देश की जनता के जीवन पर इस गठजोड़ के विनाशकारी प्रभावों को भी स्पष्ट तौर पर देखा जा सकता है।
ईरान युद्ध विश्व की राजनीति में एक नयी करवट की ओर ले जा रहा है। इस युद्ध के बाद साम्राज्यवाद के वैश्विक समीकरणों में निश्चित ही परिवर्तन की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी। इससे सर्वाधिक फ़ायदा रूस–चीन साम्राज्यवादी धुरी को मिलेगा और सबसे ज़्यादा नुक़सान अमेरिका–ब्रिटेन धुरी व यूरोपीय संघ धुरी को होगा। पश्चिमी साम्राज्यवाद की दोनों ही धुरियों के बीच की और उनकी आन्तरिक एकता भी भयंकर दबाव में है। नतीजतन, आने वाले समय में साम्राज्यवाद का राजनीतिक संकट और गहरायेगा और कालान्तर में इससे भी बड़े युद्धों को जन्म देगा। ये युद्ध पूरी दुनिया में ही जनता के लिए भयंकर स्थितियाँ पैदा करेंगे लेकिन विशेष तौर पर सापेक्षिक रूप से पिछड़े पूँजीवादी देशों में जनअसन्तोष बेहद तेज़ी से बढ़ेगा। क्रान्तिकारी शक्तियों को इस आने वाले समय की तैयारी तत्काल करनी होगी। मज़दूर वर्ग के हिरावल को आने वाले उथल-पुथल के लिए अपने आपको तैयार करना होगा।
मज़दूर बिगुल, मार्च 2026













