राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) का वहशी चेहरा एक बार फिर बेनक़ाब

अंजलि

हाल ही में केरल में एक दिल दहला देने वाली घटना सामने आयी है। इस घटना ने एक बार फिर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के ‘चाल-चेहरा-चरित्र’ को बेनक़ाब कर दिया है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सदस्य न केवल स्त्री-विरोधी, दलित-विरोधी, अल्पसंख्यक-विरोधी हैं बल्कि सम्पूर्ण मानवता के विरोधी भी हैं। केरल में आनन्दु के साथ हुई वीभत्सता आरएसएस की “संस्कृति” और “राष्ट्रभक्ति” के दावे को पूरी तरह नंगा करती है।

दरअसल केरल के एक 26 वर्षीय आईटी प्रोफेशनल आनन्दु अजी ने आरएसएस के सदस्यों द्वारा यौन उत्पीड़न और मानसिक उत्पीड़न को वर्षों तक झेलने के बाद ज़िन्दगी से हार मान ली और आत्महत्या कर ली। आनन्दु ने आत्महत्या करने से पहले अपना आख़िरी नोट इंस्टाग्राम पर शेयर कर बताया कि 3-4 साल की उम्र से ही आरएसएस की शाखा में उनके साथ बर्बर यौन शोषण होता रहा है जिसमें आरएसएस के स्थानीय नेता निधीश मुरलीधरन सहित कई नाम शामिल हैं। आनन्दु अपने अन्तिम नोट में नौजवानों को आरएसएस के लोगों से दोस्ती न करने की सलाह देते हैं। साथ ही यह भी बताते हैं की आरएसएस में इस तरह के शारीरिक और मानसिक शोषण के शिकार वह अकेले नहीं थे यानी और भी ऐसे बच्चे हैं जिनका बर्बर शोषण आज भी बदस्तूर जारी है।

आप देख सकते हैं कि यह घटना संघियों के बीमार दिमाग़ों को किस प्रकार उजागर करती है। फासीवादियों का इतिहास भी इस बात का प्रमाण है और उनका वर्तमान भी इस बात की ही पुष्टि करता है। इनके पूर्वज भी भयानक मनोविकृति और रुग्ण मानस का ही परिचय देते रहे हैं, वे चाहे जर्मनी के नात्सी रहे हों, या इटली के फ़ासीवादी रहे हों, या अपने देश के संघियों की फौज हो।

इन मानवता के दुश्मनों  के लिए मानव शरीर केवल भोग की वस्तु हैं जिसे ये पशुवत भोग लेना चाहते हैं। गुजरात दंगों से लेकर मुज़फ्फ़रनगर दंगों तक, कठुआ से लेकर हाथरस तक में इन नरपशुओं की बर्बरता पूरी दुनिया ने देखी है। ये संघी वैम्पायर समाज में तो लूट, शोषण, बलात्कार जैसे बर्बरता को अंज़ाम देते ही हैं, अपने संगठन में  भी उन लोगों को अपने हवस का शिकार बनाते रहते हैं जो उनके कुकर्मों को सर झुका कर सह लेते  हैं और अन्दर ही अन्दर घुटते हुए अन्ततः जीवन ख़त्म करने की दिशा में आगे बढ़ जाते हैं। केरल की यह जुगुप्सा पैदा करने वाली घटना भी संघ परिवार की इसी असलियत को सामने लाती है और इनके असली “संस्कारों” की कलई खोल देती है।

संघियों की मनोरुग्णता की यह कोई पहली घटना नहीं है। इसके पहले भी आरएसएस के कई सदस्यों पर इस तरह के गम्भीर आरोप लगाये जा चुके है। हमें समझना होगा कि आख़िर हर समय “चरित्र” और “संस्कार’ का जाप करने वाले चारित्रिक पतनशीलता में इस कदर गिरे हुए क्यों पाये जाते हैं? क्यों संघ परिवार और भाजपा से जुड़े लोगों का नाम ही सबसे अधिक यौन-उत्पीड़न से लेकर बलात्कार की घटनाओं में आगे आता है?

इसको समझने के लिए हमे संघ के पूरे ढाँचे को भी समझना होगा। संघ के ढाँचे में शुरू से ही समानता, जनवाद और सहमति के लिए कोई जगह नहीं रही है। लम्बे समय तक तो संघ का दरवाजा सिर्फ़ पुरुषों के लिए खुला था। बहुत बाद में समाज के रुख के हिसाब से संघ की महिला शाखा ‘राष्ट्र सेविका समिति’ बनायी गयी, हालाँकि इससे संघ की घनघोर स्त्री-विरोधी सोच और पितृसत्तात्मक विचारधारा व संस्कृति पर कोई असर नही पड़ा। दरअसल संघ से जुड़ी तमाम स्त्रियाँ खुद भयंकर तौर पर स्त्री-विरोधी और पितृसत्तात्मक मूल्यों की समर्थक हैं।

संघी अपने पूर्वज फ़ासिस्टों की तरह ही स्त्रियों को बच्चा पैदा करने वाली मशीन और पति को खुश करने वाली सेविका से ज़्यादा कुछ नहीं समझते हैं। दूसरी तरफ ये स्त्रियों को नरक का द्वार भी समझते हैं! यही वजह है कि संघ में सरसंघचालक आजीवन अविवाहित रहता है और पूरावक़्ती कार्यकर्ता भी अविवाहित रहते हैं। चूँकि संघ का ढाँचा ही समानता, जनवाद, तार्किकता और किसी भी प्रकार की सहमति को कुचलकर खड़ा हुआ है इसलिए सहज मानवीय भावनाओं जैसे समानता, जनवाद , सहमति आदि पर कोई रिश्ता बनता ही नहीं है। यही कारण है कि कई प्रकार के यौन अपराधों में संघ परिवार से जुड़े लोग संलिप्त पाये जाते हैं। इस प्रकार की बर्बरताओं के उदाहरणों  से इतिहास भरा हुआ है।

अगर वर्तमान की बात करें तो आरएसएस कार्यकर्ता सतीश मिश्रा ने अपनी ही बेटी के साथ बलात्कार किया। आईआईटी बीएचयू में बन्दूक की नोक पर संघ के छात्र विंग ‘अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद’ के सदस्यों ने एक छात्रा के साथ सामूहिक बलात्कार किया और पीड़िता का वीडियो भी बनाया। कुलदीप सिंह सेंगर से लेकर चिन्मयानन्द, बृजभूषण शरण सिंह तक का मामला किसी भी संजीदा व्यक्ति को भला कैसे भूल सकता है। हर मामले में इन अपराधियों को सत्ता का संरक्षण प्राप्त था।

ये इनके “संस्कारों” का ही प्रमाण है कि कठुआ में बच्ची के साथ निर्मम बलात्कार की घटना पर संघी भाजपाई तिरंगा यात्रा निकाल रहे थे, बिलकीस बानो के आरोपियों का ज़मानत के बाद पर माला पहनाकर स्वागत किया जा रहा था और आईआईटी बीएचयू के गैंगरेप के आरोपी की ज़मानत होने पर केक काटकर स्वागत किया जा रहा था!

आये-दिन मोदी सरकार और तमाम भाजपा सरकारों  द्वारा आसाराम और राम रहीम जैसे बलात्कारियों को पेरोल पर बाहर निकलने का मौक़ा दिया जाता है। ऐसी स्थिति में इन बर्बर बलात्कारियों के हौसले बुलन्द ही होंगे। देश के शीर्षस्थ पद पर विराजमान प्रधानमंत्री मोदी कर्नाटक में प्रज्ज्वल रेवन्ना जैसे बलात्कारी और यौन अपराधी के साथ मंच साझा करते है जिसपर 2800 महिलाओं के साथ रेप का मामला है। जब शासन-प्रशासन से लेकर देश के सबसे बड़े “राष्ट्रवादी” संगठन यानी संघ परिवार में इस तरह के लोग भरे हों तो समझा ही जा सकता है कि आज देश की आम स्त्रियों और बच्चों को सबसे बड़ा खतरा भाजपा और संघ परिवार से ही है। यह ज़ाहिर है कि आज के दौर में ऐसी भयानक मानसिकता को पोषित करने का काम भाजपा और संघ के लोग ही कर रहे हैं। ये लोग आज पूरे समाज के पोर-पोर में पितृसत्तात्मक मूल्य-मान्यताओ को फैलाने का काम कर रहे हैं। संघ के ही सरसंघचालक मोहन भागवत का निर्भया काण्ड के बाद बयान आया था कि स्त्रियों को लक्ष्मण रेखा नहीं लाँघनी चाहिए! केवल यह बयान ही दिखला देता है कि यह संगठन किस प्रकार के घटिया प्रतिक्रियावादी विचारों का वाहक है।

आज हमे यह समझना होगा फ़ासीवाद एक धुर-दक्षिणपंथी प्रतिक्रियावादी सामाजिक आन्दोलन होता है जो समाज को पीछे ले जाने का काम करता है और भारत में संघ परिवार यही काम कर रहा है। फ़ासीवादी विचारधारा समानता, जनवाद व तार्किकता के विरोध में खड़ी होती है और दलित-विरोधी, अल्पसंख्यक-विरोधी, स्त्री-विरोधी होने के साथ ही हर प्रकार के जेंडरगत और लैंगिक दमन और उत्पीड़न को बढ़ावा देती है। यह विचारधारा दरअसल सम्पूर्ण मानवता और प्रगति के विरोध में खड़ी है। इसलिए हमारा यह फ़र्ज़ बनता है कि हमें हर ऐसी घटना का विरोध करना चाहिए तथा जनता के बीच संघ के “चाल, चरित्र, चेहरे” को नंगा करके इनके “संस्कार” और “शुचिता” की पोल-पट्टी खोल देनी चाहिए। इसके साथ ही जनता के बीच लगातार  समानता, जनवाद, तार्किकता और सच्चे सेक्युलरिज़्म से लैस विचारों का प्रचार-प्रसार करने के लिए अपने कार्यभार सुनिश्चित करने चाहिए।

 

मज़दूर बिगुल, नवम्बर 2025

 

 

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