आपस की बात
काम की तलाश में
आनन्द, गुड़गाँव
काम की तलाश में घूम रहे हैं लोग,
एक मौका पाने को तरस रहे हैं लोग,
फ़ैक्टरियों, दुकानों, कारख़ानों में,
हर जगह पूछ रहे हैं लोग,
कि क्या कोई जगह ख़ाली है,
हर जगह यही जवाब मिलता है,
कोई जगह ख़ाली नहीं है।
सड़कों, चौराहों, नुक्कड़, गलियों व,
फ़ैक्टरी इलाकों मे घूमते हुए मिल जाते हैं लोग,
काम की तलाश में बड़े परेशान हैं लोग,
आखिर समझ में नही आता कि इतनी बड़ी,
मज़दूर आबादी का ही भाग्य क्यों मारा जाता है,
भगवान इन्हीं लोगों से क्यों नाराज रहता है,
एकबारगी तो मन बगावत करके कहता है,
कि कोई भगवान-अगवान नहीं होता।
बड़े परेशान हैं लोग,
काम की तलाश मे घूम रहे हैं लोग,
एक-दूसरे की जाति-धर्म को दोष देते हैं लोग,
भाई-भतीजे, बुजुर्गों-रिश्तेदारों को दोष देते हैं लोग,
ऐसा होता, ऐसा न होता,
तो बहुत अच्छा होता कहते हैं लोग,
एकबारगी तो मन कहता है,
कि क्या बहुत नादान या मूर्ख हो गये हैं लोग,
जो यह नहीं समझ पा रहे हैं कि
यह पूँजी की व्यवस्था है,
इस बेरोज़गारी की ज़िम्मेदार यह व्यवस्था है,
जल्द से जल्द बदल डालें इस व्यवस्था को,
नही तो यूँ ही परेशान होकर काम की तलाश में,
घूमते रहेंगे हम सब लोग।
मज़दूर बिगुल, सितम्बर 2014














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