कवि शमशेर बहादुर सिंह की जन्मशती पर उनकी एक प्रसिद्ध कविता

(ग्वालियर में लाल झण्डे पर रोटियाँ टाँगकर जब मज़दूरों ने जुलूस निकाला था तो ग्वालियर रियासत सरकार ने उन पर गोलियाँ चलवायी थीं। 12 जनवरी, 1944 की उसी घटना का एक शब्दचित्र प्रस्तुत करती है यह कविता।)
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य’ शाम है
य’ शाम है
कि आसमान खेत है पके हुए अनाज का
लपक उठीं लहू-भरी दराँतियाँ
– कि आग हैः
धुआँ-धुआँ
सुलग रहा
गवालियार के मजूर का हृदय
कराहती धरा
कि हाय-मय विषाक्त वायु
धूम तिक्त आज
रिक्त आज
सोखती हृदय
गवालियार के मजूर का।
ग़रीब के हृदय
टँगे हुए
कि रोटियाँ
लिये हुए निशान
लाल-लाल
जा रहे
कि चल रहा
लहू-भरे गवालियार के बजार में जलूसः
जल रहा
धुआँ-धुआँ
गवालियार के मजूर का हृदय।

मज़दूर बिगुल, जनवरी 2011