अंकिता हत्याकाण्ड : न्याय के लिए एक बार फ़िर हज़ारों लोग सड़कों पर उतरे
मगर भाजपा बेशर्मी से ‘वीआईपी’ को बचाने में जुटी!
शिवा
अभी हाल ही में उत्तराखण्ड की राजधानी देहरादून में अंकिता भण्डारी को न्याय दिलाने के लिए हजारों की संख्या में लोग सड़कों पर उतर पड़े! पूरे उत्तराखण्ड में अंकिता केस की सुप्रीम कोर्ट या हाई कोर्ट के जज की निगरानी में सीबीआई जाँच और “वीआईपी” का नाम उजागर करने की माँग को लेकर जगह-जगह कई दिनों तक छोटे-बड़े प्रदर्शन होते रहे। देहरादून में हजारों की संख्या में लोगों ने मुख्यमन्त्री आवास का घेराव भी किया। जिसके दबाव में आकर धामी सरकार ने सीबीआई जाँच की मंजूरी तो दे दी लेकिन जज की निगरानी में जाँच होगी इस पर कोई स्पष्टता नहीं दी। साथ ही पूरा सरकारी अमला और भाजपा अन्त तक अंकिता केस में “वीआईपी” के होने को लेकर इन्कार ही करते रहे।
तीन साल पहले सितम्बर 2022 में हुए अंकिता भण्डारी हत्याकाण्ड ने पूरे उत्तराखण्ड को झोकझोर दिया था! अंकिता एक आम ग़रीब घर की लड़की थी। जिसने अपने परिवार के भरण-पोषण के लिए पौड़ी जिले के यमकेश्वर स्थित वंतरा रिजॉर्ट में रिसेप्शनिस्ट का काम शुरू किया था। इस रिजॉर्ट का संचालक भाजपा नेता विनोद आर्य का बेटा पुलकित आर्य और उसके दो सहयोगी सौरभ भास्कर और अंकित थे। 18 सितम्बर को अचानक अंकिता के ग़ायब होने की ख़बर आती है। घटना के छह दिन बाद 24 सितम्बर को रिजॉर्ट से कुछ किलोमीटर दूर चीला बैराज में उसकी लाश मिलती है। अंकिता की हत्या की ख़बर मिलने पर उसके दोस्त ने उससे अन्तिम बातचीत और चैट को शेयर करते हुए बताया कि उस पर किसी “वीआईपी” को “एक्स्ट्रा” सर्विस देने का दबाव बनाया जा रहा था। घटना में “वीआईपी” का नाम आने के बाद से ही अंकिता को न्याय दिलाने के लिए उठे आन्दोलन में ये प्रमुख माँग उसी समय से बन गयी थी कि उस “वीआईपी” का नाम उजागर किया जाये और उसे कड़ी से कड़ी सजा दिलायी जाये! लेकिन धामी सरकार का रवैया इस मुद्दे को किसी भी क़ीमत पर दबाने का था। घटना के तुरन्त बाद ही उत्तराखण्ड की भाजपा सरकार ने रिजॉर्ट के उस हिस्से को जहाँ अंकिता रहती थी और जहाँ इस पूरी घटना को सामने लाने वाले साक्ष्य मिल सकते थे वहाँ आनन-फानन में बुलडोजर चलवा दिया! पुलकित आर्य और उसके दोनों साथियों को गिरफ़्तार कर लिया गया। लेकिन जिस “वीआईपी” को “एक्स्ट्रा” सर्विस देने के लिए अंकिता पर दबाव बनाया गया और उसकी हत्या तक कर दी गयी उसके नाम को उजागर करने के बजाय पूरा महकमा चुप्पी मारे बैठा रहा।
मामले की जाँच के लिए एक एसआईटी गठित की गयी। तीन साल बाद 30 मई 2025 को इसी एसआईटी की रिपोर्ट के आधार पर कोटद्वार की अपर जिला एवं सत्र न्यायालय ने अभियुक्तों को दोषी ठहराते हुए उन्हें आजीवन कारावास की सजा सुनायी। इसके बाद भी जनअसन्तोष शान्त नहीं हुआ। अंकिता के माता-पिता के साथ ही इन्साफ़पसन्द लोग भी इस अधूरे न्याय को स्वीकार करने के बजाए मामले में “वीआईपी” का नाम उजागर करने को लेकर सीबीआई जाँच की माँग करते रहे।
इस मामले में हालिया उबाल तब देखने को मिला जब भाजपा के ही एक पूर्व विधायक सुरेश राठौर की पत्नी उर्मिला सनावर ने एक ऑडियो रिकॉर्डिंग वायरल करते हुए उस “वीआईपी” के नाम को उजागर करने का दावा किया। कथित तौर पर यह “वीआईपी” भाजपा का राष्ट्रीय महासचिव दुष्यन्त कुमार गौतम है जो वर्तमान में उत्तराखण्ड का भाजपा प्रभारी भी है। इस रिकार्डिंग के सामने आने के बाद जनता के सब्र का बाँध टूट गया और हज़ारों लोग और तमाम जनसंगठन सड़कों पर उतर पड़े। जाहिर है कि यह जनअसन्तोष केवल एक अंकिता को लेकर नहीं था। बल्कि भाजपा के 11 सालों के शासनकाल में देशभर में हजारों अंकिताओं के साथ जो बर्बरता और दरिंदगी होती रही है और ये “बलात्कारी जनता पार्टी” (बीजेपी) बलात्कारियों-अपराधियों और हत्यारों का जिस तरह से संरक्षण करती रही है, भ्रष्टाचार के नए-नए कीर्तिमान स्थापित करती रही है, उसके ख़िलाफ़ भी था। इस घटना ने एक बार फिर भाजपा के “स्त्री हितैषी” चरित्र की नंगी सच्चाई को बेनक़ाब किया है। उत्तराखण्ड की भाजपा सरकार पूरे मामले को शुरू से ही दबाने, सबूतों को मिटाने की कोशिश करती रही और उक्त “वीआईपी” को संरक्षण देती रही। इस पूरे मामले को लम्बा खींचने, टालमटोल करने और जन भावनाओं से अलग सीबीआई जाँच न कराने की धामी सरकार का रवैया इस सन्देह को मजबूत करता है कि घटना में भाजपा के बड़े नेता शामिल हैं। यहाँ तक कि इस घटना को पुरज़ोर तरीके से उठाने वाले पत्रकार आशुतोष नेगी को गिरफ़्तार कर लिया गया। अंकिता का केस लड़ने वाले वकील के ऊपर भी दबाव बनाया गया।
ये कोई पहला मामला नहीं है जब भाजपा और संघ ने बलात्कारियों-अपराधियों को बचाने में, उनको संरक्षण देने में एड़ी-चोटी का ज़ोर लगाया हो! इतना ही नहीं इस “संस्कारी पार्टी” में बलात्कारियों-अपराधियों के स्वागत की एक नई परम्परा ही शुरू कर दी गई है। अभी कुलदीप सिंह सेंगर के जमानत के शर्मनाक फ़ैसले आने के बाद ये लोग फूल-माला लेकर ‘बलात्कारी स्वागत’ हेतु पहुँच गये थे। यह अलग बात है कि जन दबाव के चलते सुप्रीम कोर्ट को ये फ़ैसला रद्द करना पड़ा। कठुआ में आठ साल की बच्ची के बलात्कारियों के समर्थन में भाजपाइयों ने तिरंगा रैली निकाली थी। बिलकिस बानो के बलात्कारियों की रिहाई के बाद भाजपा नेताओं द्वारा अच्छे “संस्कारी ब्राह्मण” होने के लिए बलात्कारियों का फूल-माला से स्वागत किया गया था। आई.आई.टी बी.एच.यू के गैंगरेप के आरोपी की ज़मानत होने पर केक काटकर स्वागत किया गया था। इतना ही नहीं अभी बिहार चुनाव के बाद बिहार के मुख्यमन्त्री नीतीश कुमार ने एक मुस्लिम महिला के चेहरे से उसका नक़ाब खींच दिया जिसके समर्थन में भाजपा नेताओं ने उबकाई लाने वाले बयान तक दिए। पिछले साल महिला पहलवानों ने बृजभूषण शरण सिंह के ख़िलाफ़ यौन शोषण का आरोप लगाया तो “स्त्री सम्मान” की बात करने वाली भाजपा ने पूरी ताक़त से अपराधी का बचाव किया और अब वह सभी आरोपों से बरी हो चुका है।
‘बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ’ का नारा उछालकर देश का प्रधानमन्त्री बने नरेन्द्र मोदी कर्नाटक में प्रज्वल रेवन्ना जैसे बलात्कारी और अपराधी के साथ मंच साझा करता है और उसके लिए चुनाव प्रचार करता है, जिस पर 2800 महिलाओं के साथ बलात्कार करने और वीडियो क्लिप बनाने का वीभत्स मामला है। ये ही हैं भाजपा का “संस्कार”, “सुचिता” और “स्त्री सम्मान”!
अंकिता भण्डारी का मसला एक बर्बर स्त्री-उत्पीड़न का मसला है। यह एक स्त्री-अधिकार, जनवादी-अधिकार और नागरिक आज़ादी का मसला है और एक सत्तारूढ़ पार्टी के चरम भ्रष्ट होने का नमूना है, जिसके ख़िलाफ़ जनता सड़कों पर उतर पड़ी। अंकिता को न्याय दिलाने के साथ ही अगर हम इस लड़ाई को आगे ले जाना चाहते हैं तो हमें कुछ मसलों पर स्पष्ट समझ बनानी होगी। पहली बात यह कि, भाजपा चाहे जितना स्त्री हितैषी होने का दावा करती रहे हमें इसके असली चाल-चेहरे-चरित्र को जनता के सामने उजागर करते रहना होगा। दूसरी बात, न्यायपालिका पर आँख मूँदकर भरोसा नहीं किया जा सकता है। आज तो तमाम अन्य संस्थाओं की तरह इसे भी अन्दर से फ़ासीवादियों द्वारा खोखला कर दिया गया है और जो थोड़ा-बहुत प्रति-सन्तुलन का काम न्यायपालिका पूँजीवादी व्यवस्था में शासक वर्ग के दूरगामी हितों के मद्देनज़र किया करती थी, अब वह भी नहीं कर सकती है। यहाँ पर भी ऐसे लोगों को बैठाया गया है जो संघ या भाजपा से जुड़े रहे हैं। ये आवारा कुत्तों के मसले का तो स्वतः संज्ञान ले सकते हैं, लेकिन जनता के मुद्दे इन्हें नहीं दिखते। कुलदीप सिंह सेंगर जैसे बर्बर अपराधी को बरी करना हो तो इनके हाथ नहीं काँपते! आज के दौर में न्यायपालिका पर न्याय के लिए भरोसा करना आकाश-कुसुम की अभिलाषा के समान है। अगर कोई जज कोई ऐसा फ़ैसला दे भी देता है जो किसी भाजपा नेता या संघी प्रशासक के विरुद्ध जाता हो, तो सरकारें उस फ़ैसले को लागू करने से खुलेआम इन्कार कर देती हैं और फिर जज को ही ठिकाने लगा दिया जाता है। संभल का मसला इस बात की ताईद करता है।
तीसरी और अन्तिम बात ये कि अंकिता को न्याय दिलाने के लिए उत्तराखण्ड में चल रहे आन्दोलन में एक धारा ऐसी मौजूद है जो हर मुद्दे को पहाड़ बनाम मैदान में बाँटकर कमज़़ोर और दिग्भ्रमित करने का ख़तरनाक काम कर रही है। ‘पहाड़ की बेटी के नारे लगाये जा रहे हैं! इनसे पूछा जाना चाहिए कि क्या निर्भया उनकी बेटी नहीं थी? क्या मैदान की बेटी के साथ इस तरह की बर्बरता होगी तो वह खामोश होकर बैठ जाएँगे? इनकी राजनीति के भी असली मक़सद को समझना होगा और जनता के सामने उजागर करना होगा।
मज़दूर बिगुल, जनवरी 2026













