दिल्ली का जानलेवा प्रदूषण और आँगनवाड़ी केन्द्रों, बच्चों व आँगनवाड़ीकर्मियों के प्रति सरकार की अनदेखी!!

दिल्ली स्टेट आँगनवाड़ी वर्कर्स एण्ड हेल्पर्स यूनियन (DSAWHU) की ओर से

राजधानी में एक बार फिर प्रदूषण भयंकर स्तर पर पहुँच चुका है। हवा की गुणवत्ता इतनी ख़राब हो चुकी है कि लोग हर रोज़ बीमारियों की चपेट में आ रहे हैं। प्रदूषण से हो रहीं मौतों की संख्या दिन-ब-दिन बढ़ती जा रही है। डॉक्टरों का कहना है कि यह जनस्वास्थ्य के लिए बेहद चिन्ताजनक स्थिति है क्योंकि दिल्ली की हवा में साँस लेने का मतलब है अपने भीतर ज़हर लेना!

साल 2023 के एक आँकड़े के मुताबिक़ मरने वालों में हर 7 में से 1 व्यक्ति प्रदूषण की वजह से अपनी जान गँवा रहा है। प्रदूषण का सबसे घातक प्रभाव छोटे बच्चे पर पड़ता है। ऐसा इसलिए क्योंकि बच्चों का क़द छोटा होने की वजह से वे ज़मीन के नज़दीक होते हैं जहाँ हवा में प्रदूषकों का संकेन्द्रण सबसे अधिक होता है। वहीं दूसरी तरफ़ बच्चे बड़ों की अपेक्षा ज़्यादा तेज़ गति से साँस लेते हैं, जिसकी वजह से उनके शरीर में कम समय में ज़्यादा प्रदूषक तत्व जाते हैं। तीसरा यह कि बच्चों की रोग-प्रतिरोधक क्षमता भी इस ज़हरीले प्रदूषण को नहीं झेल पाती और हमारे देश में तो एक बड़ी संख्या ऐसे बच्चों की है जो कुपोषण के शिकार हैं जिसके कारण उन्हें न सिर्फ़ तात्कालिक तौर पर साँस और फेफड़े की बीमारियाँ हो रही हैं बल्कि उनके मष्तिष्क पर भी इसका बेहद प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है।

‘एनवायर्नमेंटल साइंस एंड पॉल्यूशन रिसर्च जर्नल’ में छपी 2021 की एक रिपोर्ट के मुताबिक़, राजधानी दिल्ली में दिवाली के बाद प्रदूषण के असहनीय स्तर पर पहुँचने से रोज़ाना अस्पतालों के इमरजेंसी रूम में जाने वालों की संख्या में लगभग 30 प्रतिशत की बढ़ोतरी देखने को मिली है। एक रिसर्च के मुताबिक़ वायु की ख़राब गुणवत्ता की वजह से दिल्ली में 2 लाख़ से अधिक स्कूली बच्चों के फेफड़ों को ऐसा नुकसान हुआ है जिसे ठीक नहीं किया जा सकता। हवा में मौजूद प्रदूषकों के अत्यधिक सम्पर्क में आने से बच्चों में कैंसर जैसी भयानक बीमारी के होने का ख़तरा भी मौजूद होता है।

पिछले कुछ वर्षों में और ख़ासकर इस वर्ष दिल्ली में प्रदूषण जिस क़दर बढ़ा है उससे यह अनुमान लगाया जा सकता है कि अब हालत कैसी होगी।

दिल्ली की आँगनवाड़ियों में लाखों बच्चे रोज़ाना जाते हैं लेकिन उनके प्रति सरकार पूरी तरह से आँख मूँद कर बैठी है! वायु प्रदूषण के बढ़ते ही सीएम ऑफ़िस के लिए 5.5 लाख के ‘एयर प्यूरिफ़ायर’ ख़रीद लिये जाते हैं लेकिन आँगनवाड़ियों और स्कूलों को खुला रखकर बच्चों को मरने के लिए छोड़ दिया जाता है। वायु प्रदूषण की चपेट में सबसे अधिक मेहनतकश आबादी और उनके घरों से आने वाले बच्चे आते हैं क्योंकि न तो उनके लिये एयर प्यूरीफ़ायर है, ना ही वे बेहतर पोषण हासिल कर सकते हैं और बीमार पड़ने पर न उन्हें बेहतर चिकित्सा सुविधा मिल पाती है। आँगनवाड़ी में जाने वाले अधिकांश बच्चे मज़दूरों-मेहनतकशों या निम्न-मध्यम वर्गीय परिवारों से आते हैं जिनके लिए उपरोक्त कारणों की वज़ह से इस जानलेवा प्रदूषण से बचने का कोई विकल्प सरकार ने नहीं छोड़ा है! आँगनवाड़ी केन्द्रों, बच्चों व आँगनवाड़ीकर्मियों के प्रति यह लापरवाही एक बार फ़िर भाजपा सरकार के जन-विरोधी, आँगनवाड़ीकर्मी-विरोधी चेहरे को हमारे सामने उजागर करती है।

भाजपा सरकार, जो सत्ता में आने से पहले प्रदूषण को रोकने के नाम पर तमाम डींगें हाँक रही थी, की असलियत तब सामने आ गयी जब दिल्ली की जनता को मूर्ख बनाते हुए इसने यह कहा कि इस बार दिल्ली में पटाख़े जलाने से कोई प्रदूषण हुआ ही नहीं और वहीं दूसरी तरफ़ हवा की गुणवत्ता मापने वाली मशीनों के डाटा को कम करने की कवायद में जुट गये! इस तरह की हरकतें न सिर्फ़ लोगों के साथ धोखा है बल्कि उनके जीवन के साथ खिलवाड़ है। प्रदूषण की समस्या पर इनकी आँख तब खुली जब दिल्ली में जन प्रदर्शनों का सिलसिला शुरू हुआ। इसकी वजह से रेखा गुप्ता सरकार ने दिखावे के लिए कुछ क़दम उठाने शुरू कर दिये हैं जैसे छोटे बच्चे के स्कूलों को हाइब्रिड मोड में करने की नौटंकी, पुरानी गाड़ियों पर रोक लगाना इत्यादि।

लेकिन यह सारे क़दम प्रदूषण की समस्या को कम करने में रत्तीभर भी कारगर नहीं हैं क्योंकि यह असल में बढ़ते प्रदूषण का कारण हैं ही नहीं। प्रदूषण का सबसे बड़ा कारण सालभर फ़ैक्ट्रियों से निकलने वाला हानिकारक धुँआ और गैस है जिस पर कोई रोक-टोक नहीं लगायी जाती है और ठण्ड के समय में प्रदूषण के चरम पर पहुँचने पर कुछ दिखावटी काम शुरू कर दिये जाते हैं। इसके अलावा निजी वाहनों, जिसमें सबसे अधिक कारें शामिल हैं, से निकालने वाला धुआँ भी प्रदूषण का एक बड़ा कारण है। साथ ही, हरियाणा और पंजाब में सर्दी के वक़्त किसानों (मुख्य तौर पर धनी किसानों-कुलकों द्वारा) द्वारा पराली जलाना भी दिल्ली में प्रदूषण की समस्या को बढ़ाता है। इन सबके अलावा, दिल्ली में प्रदूषण का एक कारण दिवाली के वक़्त पटाख़ों पर कोई नियंत्रण न होना भी है और साथ ही सस्ते व बेहतर सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था की अनुपलब्धता है। जब तक इन कारणों पर काम नहीं किया जायेगा तब तक आम जनता, छोटे बच्चे ऐसे ही मरने के लिए मजबूर रहेंगे!

हमारी माँग है कि इस आपातकालीन स्थिति को नियंत्रित करने के लिये रेखा गुप्ता सरकार त्वरित तौर पर निम्नलिखित कदम उठाये :

1) प्रदूषण के वास्तविक कारणों से निपटने के लिए दीर्घकालिक योजना बनायी जाये और उसे जनता के सामने पेश किया जाये।

2) छोटे बच्चों पर प्रदूषण का जानलेवा असर देखते हुए, तात्कालिक तौर पर इससे बचाव के लिए (स्थिति में नियंत्रण होने तक) आँगनवाड़ियों और छोटे बच्चों के स्कूलों को बन्द रखा जाये।

3) सार्वजनिक परिवहन की सुविधा को बेहतर किया जाये जिससे कि लोगों के लिए आसानी से सफ़र करने का विकल्प मौजूद हो और निजी वाहनों से हो रहे प्रदूषण पर रोक लगायी जा सके।

4) प्रदूषण के कारण होने वाली बीमारियों के इलाज के लिए तुरन्त निःशुल्क और उचित स्वास्थ्य सेवा मुहैया करायी जाये।

 

मज़दूर बिगुल, नवम्बर 2025

 

 

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