मिड-डे-मील के तहत आने वाले स्कूलों की संख्या में अभूतपूर्व कमी! सरकारी स्कूलों की संख्या में भी भारी कमी!
कहने के लिए सरकार शिक्षा को हर किसी का अधिकार बताती है लेकिन असलियत इससे कोसों दूर है। पढ़ाई-लिखाई भी आज उन लोगों की ज़ागीर बन कर रह गयी है जिनके पास पैसा है। सरकारी शिक्षा तंत्र को बर्बाद कर दिया गया है जिसकी वज़ह से ग़रीब-मेहनतकश आबादी से आने वाले बच्चे शिक्षा से दूर होते जा रहे हैं। मिड-डे-मील में कमी और सरकारी स्कूलों के बन्द होने का असर बच्चों के साथ-साथ इस स्कीम के तहत काम करने वाले वर्कर्स पर भी पड़ेगा। देश में 26 लाख मिड-डे मील वर्कर्स हैं, जिनकी नौकरियाँ भी ख़तरे में हैं। भाजपा सरकार द्वारा इस योजना को बर्बाद किये जाने के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने की ज़रूरत है। यह बेहतर पोषण और शिक्षा के बुनियादी अधिकार को आम मेहनतकश आबादी के बच्चों से छीनने की तैयारी है।















