हंजूरी

सर्वेश्वर दयाल सक्सेना

काम न मिलने पर
अपने तीन भूखे बच्चों को लेकर
कूद पड़ी हंजूरी कुएं में
कुएं का पानी ठण्डा था।
 
बच्चों की लाश के साथ
निकाल ली गयी हंजूरी कुंए से
बाहर की हवा ठण्डी थी।
 
हत्या और आत्महत्या के अभियोग में
खड़ी थी हंजूरी अदालत में
अदालत की दीवारें ठण्डी थीं।
 
फिर जेल में पड़ी रही हंजूरी
पेट पालती
जेल का आकाश ठण्डा था।
 
लेकिन आज जब वह जेल के बाहर है
तब पता चला है
 
कि सब कुछ ठण्डा ही नहीं था –
सड़ा हुआ था
सड़ा हुआ है
सड़ा हुआ रहेगा।
 
कबतक?