पेट्रोल-डीज़ल के दामों में पिछले 11 दिनों में चौथी बार बढ़ोतरी से मेहनतकश आबादी बेहाल
इस आर्थिक आपदा के लिए मोदी सरकार की जनविरोधी नीतियाँ ज़िम्मेदार हैं
देशभर में पेट्रोल-डीज़ल के दामों में आज एक बार फिर भारी इज़ाफ़ा हुआ है। पिछले 11 दिनों में पेट्रोल-डीज़ल की क़ीमतें चौथी बार बढ़ाई गई हैं। कुल मिलाकर अब तक पेट्रोल-डीज़ल की क़ीमतों में दो सप्ताह से भी कम समय में क़रीब साढ़े सात रुपये प्रति लीटर की बढोतरी हो चुकी है। आने वाले दिनों में तेल की क़ीमतें और भी बढ़ सकती हैं। इस प्रकार मोदी सरकार देश की जनता को ज़ोर का झटका धीरे-धीरे दे रही है ताकि लोगों को इस बढ़ोतरी की भयावहता का अन्दाज़ा न लगे। लेकिन जिसके पास इफ़रात पैसा नहीं है उनसे तो यह क्रूर सच्चाई छिपाये नहीं छिप रही है क्योंकि उनके घरों का बजट तो उलट-पुलट हो रहा है। मेहनत-मजूरी करके अपना पेट पालने वाली आबादी के लिए तो पेट्रोल-डीज़ल की क़ीमतों में इस बढ़ोतरी का सीधा असर उनके पेट में पहुँचने वाले आहार में और भी ज़्यादा कटौती के रूप में सामने आएगा। तेल की क़ीमतों में बढ़ोतरी की वजह से परिवहन की लागत बढ़ेगी जिसकी वजह से अन्य बुनियादी चीज़ों की क़ीमतें आसमान छूने वाली हैं। ज़ाहिरा तौर पर इस देश की मेहनतकश जनता के लिए यह एक आर्थिक आपदा से कम नहीं है। सरकार के मंत्री और गोदी मीडिया के चाटुकार एंकर इस आपदा के लिए महज़ बाह्य कारणों जैसे ईरान युद्ध की वजह से अन्तरराष्ट्रीय बाज़ार में तेल की बढ़ती क़ीमतों को ज़िम्मेदार बता रहे हैं और जनता को किफ़ायत बरतने की नसीहतें दे रहे हैं। परन्तु क्या यह सच है कि पेट्रोल-डीज़ल की क़ीमतों में यह भीषण बढ़ोतरी अवश्यंभावी थी और सरकार के पास अन्तरराष्ट्रीय बाज़ार में तेल की क़ीमतों में हुई बढ़ोतरी का बोझ जनता पर डालने के अलावा और कोई चारा नहीं था? आइए देखते हैं!
अव्वलन तो जिस देश में 84 फ़ीसदी कच्चा तेल आयात होता हो उसकी सरकार को अपनी विदेश नीति इस प्रकार संचालित करनी चाहिए जिससे कि अन्तरराष्ट्रीय तेल बाज़ार में होने वाली उथल-पुथल से निपटा जा सके और ऊर्जा की बेरोकटोक आपूर्ति सुनिश्चित हो सके। परन्तु मोदी सरकार के बेतुकी विदेश नीति के चलते अमेरिका व इज़रायल से बढ़ती नज़दीकी की वजह से ईरान और रूस जैसे तेल समृद्ध देशों से भारत की दूरी बढ़ी है जिसका सीधा असर देश में तेल की आपूर्ति पर हो रहा है। इसके अतिरिक्त अगर इस सरकार को इस देश की जनता की तकलीफ़ों की ज़रा भी परवाह होती तो आसानी से ऐसा तरीक़ा निकाला जा सकता था जिससे अन्तरराष्ट्रीय बाज़ार में तेल की क़ीमतों में होने वाली बढ़ोतरी का बोझ ग़रीब मेहनतकश जनता पर पड़ने के बजाय आर्थिक रूप से सक्षम वर्ग पर पड़ता। परन्तु मोदी सरकार की पूँजीपरस्त व जनविरोधी आर्थिक नीतियों ने इसका ठीक उलट किया है। एक ओर जहाँ आम जनता में बढ़ती महँगाई को लेकर हाहाकार मचा है वहीं रईसज़ादों की विलासिता में दिन-दूनी रात चौगुनी रफ़्तार से इज़ाफ़ा हो रहा है।
पिछले 12 सालों में मोदी सरकार ने पेट्रोल-डीज़ल के दामों के सम्बन्ध में जो नीतियाँ बनायी हैं उनपर सरसरी निगाह डालने से ही इस सरकार का जनविरोधी चरित्र स्पष्ट हो जाता है। आज यह सरकार अन्तराष्ट्रीय बाज़ार में तेल की क़ीमतों में बढ़ोतरी का हवाला दे रही है, परन्तु ऐसा नहीं है कि अन्तरराष्ट्रीय बाज़ार में तेल की क़ीमतों में पहली बार इतनी बढ़ोतरी हुई है। अतीत में ऐसे भी दौर रहे हैं जब अन्तरराष्ट्रीय बाज़ार में तेल की क़ीमतें आज से कहीं ज़्यादा रही हैं, परन्तु आम जनता पर इतना बोझ पहले कभी नहीं पड़ा। इस समय अन्तरराष्ट्रीय बाज़ार में तेल की क़ीमत क़रीब 98 डॉलर प्रति बैरल है। 2014 में जब मोदी सरकार सत्ता में आयी थी उसके पहले अन्तरराष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल की क़ीमत 100 डॉलर प्रति बैरल से भी ज़्यादा थी और एक समय तो वह 140 डॉलर प्रति बैरल तक जा पहुँची थी, परन्तु उस समय देश में पेट्रोल की क़ीमत 60 रुपये प्रति लीटर के आसपास हुआ करती थी। ऐसे में सोचने की बात है कि जब अन्तरराष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल की क़ीमत उस समय से कम ही चल रही है तो फिर हमें आज पेट्रोल के लिए 110 रुपये प्रति लीटर यानी लगभग दोगुना क्यों देना पड़ रहा है? इस बीच मुद्रास्फ़ीति में हुई बढ़ोतरी और डॉलर के मुक़ाबले रुपये के मूल्य में हुई गिरावट की एक भूमिका है परन्तु केवल उसके आधार पर पेट्रोल की क़ीमतों में हुई इतनी भारी बढ़ोतरी को नहीं समझा जा सकता। असली कारण समझने के लिए हमें यह जानना होगा कि पिछले 12 सालों में मोदी सरकार की पेट्रोलियम नीति क्या रही है।
ग़ौरतलब है कि कच्चे तेल के आयात में आए ख़र्च और तेल के परिशोधन तथा परिवहन में हुए ख़र्च के अलावा पेट्रोल व डीज़ल की बाज़ार क़ीमतों में एक बड़ा हिस्सा केन्द्र व राज्य सरकारों द्वारा लगाये गए करों का होता है। मोदी सरकार ने पिछले 12 सालों में पेट्रोल-डीज़ल पर बेतहाशा केन्द्रीय कर लगाए हैं जो एक तरह से आम जनता की जेबों पर डाका है। आज यह सरकार अन्तरराष्ट्रीय बाज़ार में तेल की क़ीमतों में बढ़ोतरी का हवाला देकर पेट्रोल की क़ीमत बढ़ा रही है, परन्तु इस सरकार के सत्ता में आने के बाद एक लम्बा अरसा ऐसा रहा था जब अन्तरराष्ट्रीय बाज़ार में तेल की क़ीमतें बेहद कम थीं। 2015-16 के दौरान तो तेल की क़ीमतें 30 डॉलर प्रति बैरल तक के निचले स्तर पर जा पहुँची थीं। उसके बाद भी कई सालों तक कच्चे तेल की क़ीमत 40-50 डॉलर के आसपास थी। उस समय हमारे नॉन-बॉयलॉजिकल प्रधानमंत्री महोदय कहा करते थे कि यह उनके अच्छे नसीब की बदौलत है। परन्तु उनके अच्छे नसीब का कोई फ़ायदा इस देश की आम जनता को नहीं हुआ क्योंकि केन्द्र सरकार ने ठीक उसी समय पेट्रोल-डीज़ल पर केन्द्रीय एक्साइज़ डूयूटी में भारी बढ़ोतरी कर दी थी और इस प्रकार अन्तरराष्ट्रीय बाज़ार में तेल की क़ीमतों में हुई भारी गिरावट के बावजूद पेट्रोल-डीज़ल की क़ीमतें लगातार बढ़ती गईं। एक समय तो ऐसा भी आया जब पेट्रोल-डीज़ल पर केन्द्रीय एक्साइज़ ड्यूटी 32 प्रतिशत के आसपास जा पहुँची थी। कोरोना के समय भी अन्तरराष्ट्रीय बाज़ार में तेल की क़ीमतों में भारी गिरावट हुई थी, परन्तु उस समय भी उसका लाभ आम जनता को नहीं हुआ और पेट्रोल-डीज़ल की क़ीमतों में कोई गिरावट नहीं हुई।
ऐसे में इस सरकार से यह सवाल बनता है कि जब अन्तरराष्ट्रीय बाज़ार में तेल की क़ीमतों में हुई भारी गिरावट का फ़ायदा आम जनता को नहीं हुआ तो फिर आज कच्चे तेल की क़ीमत में हो रही बढ़ोतरी का ख़ामियाज़ा आम जनता क्यों भुगते? पिछले 12 सालों में मोदी सरकार ने जहाँ अप्रत्यक्ष करों के रूप में आम जनता पर करों का बोझ बढ़ाया है वहीं पूँजीपतियों और सेठ-व्यापारियों को करों में अरबों रुपयों की रियायत दी है। प्रभावी कॉरपोरेट कर को 35 प्रतिशत से घटाकर 25 प्रतिशत से भी कम कर दिया गया है। अगर आज इस सरकार को ग़रीबों-मज़दूरों आह सुनायी देती तो वह आसानी से पेट्रोल-डीज़ल पर लगाये जा रहे केन्द्रीय करों में ज़्यादा कटौती करके उसकी भरपायी धन्नासेठों पर करों का बोझ बढ़ाकर कर सकती थी। परन्तु सरकार की प्राथमिकता लोगों की भूख शान्त करना नहीं बल्कि धन्धा करने की सहूलियत सुनिश्चित करना है। यही वजह है देश की जनता त्राहि-त्राहि कर रही है और धन्नासेठों की ऐय्याशियाँ बढ़ती जा रही हैं। इस प्रकिया में इस सरकार का जनविरोधी चरित्र ज़्यादा से ज़्यादा उजागर होता जा रहा है।













Recent Comments