मोदी के इज़रायल दौरे और मोदी सरकार द्वारा ‘बोर्ड ऑफ पीस’ जैसी साम्राज्यवादी साज़िश के समर्थन पर देशव्यापी विरोध प्रदर्शन!

15 फ़रवरी 2026, फ़िलिस्तीन के साथ एकजुट भारतीय जन (IPSP) ने प्रधानमंत्री मोदी के इज़रायल दौरे का विरोध करते हुए देश के कई शहरों में विरोध प्रदर्शन आयोजित किया। इस प्रदर्शन में कई अन्य छात्र-युवा, नागरिक और मज़दूर संगठन भी शामिल हुए। दिल्ली में जन्तर-मन्तर पर हुए प्रदर्शन में कई सामाजिक कार्यकर्ता, प्रोफेसर व बुद्धिजीवी भी शामिल रहे। दिल्ली के अलावा मुंबई, हैदराबाद, पुणे, रोहतक, विशाखापत्तनम, विजयवाड़ा, पटना और कोलकाता में लोगों ने विरोध में आवाज़ उठायी।

फ़िलिस्तीनी जनता के नरसंहार में शामिल इज़रायल के साथ मोदी सरकार द्वारा नजदीकियाँ बढ़ाये जाने की लोगों ने कड़े शब्दों में भर्त्सना की और साथ ही ट्रम्प प्रशासन द्वारा लाये गये तथाकथित “बोर्ड ऑफ़ पीस’ में मोदी सरकार के शामिल होने के ख़िलाफ़ भी बात रखी।

फ़िलिस्तीन में नरसंहार को अंज़ाम देने वाले इज़रायल और अमेरिका ने 16 जनवरी 2026 को ग़ज़ा के “पुनर्निर्माण” की “योजना” के दूसरे चरण को शुरू करने के लिए तथाकथित “शांति बोर्ड” (बीओपी) के गठन की घोषणा की। अमेरिकी साम्राज्यवाद के नेतृत्व वाली यह संस्था ग़ज़ा के शासन को अपने हाथ में लेगी और वहाँ शान्ति क़ायम करेगी। यह फ़िलिस्तीन की आवाम के साथ एक क्रूर मज़ाक नहीं तो और क्या है?

 

असल में ‘बोर्ड ऑफ पीस’ ग़ज़ा की पूरी तबाही के बाद उस पर अपना शिकंजा कसने के लिए अमेरिका द्वारा तैयार किया गया एक तंत्र है, जिसमें फिलिस्तीनियों को उनके अपने भविष्य पर ही फैसला लेने का कोई अधिकार नहीं दिया गया है। यहाँ सवाल यह है कि ग़ज़ा का भविष्य तय करने वाला अमेरिका आख़िर होता कौन है? अपनी ही ज़मीन के पुनर्निर्माण और शासन के फैसलों से ग़ज़ा की अवाम को पूरे तरीक़े से बाहर कर दिया गया है। यह योजना ज़ायनवादी आतंकवादी इज़रायल और साम्राज्यवादी अमेरिका को ग़ज़ा को पूरी तरह नियंत्रित और अपने अधीन करने की खुली छूट देती है। वास्तव में यह परियोजना पश्चिम एशिया में अमेरिका-इज़रायल साम्राज्यवादी गठजोड़ के हितों को साधने और उसे पुख़्ता करने के लिए रची गयी एक साम्राज्यवादी साज़िश है। ‘शान्ति योजना’ का ढोंग इसके चार्टर ड्राफ्ट से ही साफ़ हो जाता है, जिसमें हैरान कर देने वाली बात यह है कि कहीं भी ग़ज़ा शब्द का ज़िक्र तक नहीं किया गया है! दिलचस्पी की बात यह है कि नवम्बर 2025 में पारित संयुक्त राष्ट्र के जिस प्रस्ताव में फ़िलिस्तीनी राज्य के लिए एक विश्वसनीय मार्ग की बात की गयी थी, उसे 3 महीने होने से पहले ही कूड़ेदान में फेंक दिया गया है! यह सोची-समझी साज़िश साम्राज्यवादी विस्तारवाद के लिए लायी गयी है।

भारत सरकार का पक्ष शुरू से ही फ़िलिस्तीनी आवाम के मुक्ति-संघर्ष के समर्थन में रहा है मगर भाजपा के सत्तासीन होने के बाद से फ़िलिस्तीन के प्रति इनके रुख में काफ़ी तेज़ी से बदलाव आया है। नरेन्द्र मोदी इज़रायल का दौरा करने वाले पहले प्रधानमंत्री बन चुके हैं। जहाँ वह एक तरफ़ अरब देशों के विदेश मंत्रियों को फ़िलिस्तीन के प्रति भारत के समर्थन का भरोसा दिलाते हैं, वहीं दूसरी ओर इज़रायल के साथ उनकी प्रगाढ़ होती मित्रता किसी से छुपी हुई नहीं है और अब तो वह इज़रायल के भ्रमण पर भी जा रहें है। यह पूरी तरह साफ़ है कि भाजपा की केन्द्र सरकार ने इज़रायल को अन्तरराष्ट्रीय समर्थन देकर उसके नरसंहार को परोक्ष रूप से जायज़ ठहराया है। यह फ़िलिस्तीन की जनता की पीठ में छुरा घोंपने के समान है। भले ही कागजों पर वे फ़िलिस्तीनी राज्य का समर्थन करने का ढोंग करते हों लेकिन ये ढोंग अन्तरराष्ट्रीय मंच पर अपनी छवि बचाने की एक खोखली और शर्मनाक कोशिश मात्र हैं। यह एक बार फिर मोदी सरकार के दोमुँहें और अवसरवादी चरित्र को बेनकाब करता है।

देशव्यापी प्रदर्शन के दौरान शामिल नागरिकों ने ये माँगें उठायीं :

1) भारत सरकार तत्काल अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के ‘बोर्ड ऑफ़ पीस’ के निमन्त्रण को ठुकराये।

2) इज़रायल के साथ सभी आधिकारिक कार्यक्रमों को रद्द कर ज़ायनवादी सत्ता से तमाम रिश्ते मसलन राजनीतिक, सैन्य, सांस्कृतिक और राजनयिक सम्बन्ध खत्म करे।

3)  प्रधानमंत्री अपनी इज़रायल यात्रा तत्काल रद्द करें।

इसके साथ ही उन्होंने कहा कि हम भारत की न्यायप्रिय जनता से अपील करते हैं कि वे फ़िलिस्तीनी राष्ट्रीय मुक्ति संघर्ष के साथ खड़े होते हुए भाजपा सरकार पर नरसंहार के गुनहगार इज़रायल के साथ सभी रिश्ते तोड़ने के लिए दबाव बनाएँ और फ़िलिस्तीन की मुक्ति के लिये संघर्ष तेज़ करें।

 

मज़दूर बिगुल, मार्च 2026

 

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