मोदी सरकार का “सरेण्डर” और भारतीय शासक वर्ग का चरित्र
सनी
हालिया समय में मोदी सरकार की विदेश नीति के कुछ फ़ैसलों और रुख़ के चलते विपक्षी दलों ने नरेन्द्र मोदी के अमेरिका और इज़रायल के आगे “सरेण्डर” पर तीखी टिप्पणी की है। केजरीवाल ने तो मोदी को ट्रम्प का ग़ुलाम भी बता दिया। इस रवैये पर भारत के क्रान्तिकारी कम्युनिस्ट खेमे की तरफ़ से भी अलग-अलग समझदारी पेश की गयी है। मोदी सरकार की “नतमस्तक” प्रतीत होती विदेश नीति जिस लघुकालिक सन्धि-बिन्दु और जिन आकस्मिक कारणों से पैदा हुई है उसका ठोस विश्लेषण करने की जगह नवजनवादी क्रान्ति के फ्रेमवर्क में फँसे कम्युनिस्टों ने इसे भारतीय पूँजीपति वर्ग के दलाल चरित्र का सत्यापन बता दिया है। यह सच है कि मोदी सरकार का हालिया दिनों में रुख़ 2014 के कार्यकाल से अपनाये गये आम रुख़ से अलग रहा है। मसलन अमेरिका के साथ व्यापारिक सौदा कर मोदी सरकार ने रूस से तेल ख़रीदना बन्द कर दिया। अमेरिका के राष्ट्रपति और उसके सेक्रेटरी द्वारा अमेरिका के साथ व्यापार सौदे पर भारत को “इजाज़त” देना या ट्रम्प का यह कहना कि उसने भारत को “अल्टीमेटम” दिया आदि बयानों को मोदी सरकार के अमेरिका के आगे “नतमस्तक” होने के उदाहरण के तौर पर पेश किया जा रहा है। मोदी सरकार ईरान पर इज़रायल और अमेरिका द्वारा हाल ही में थोपे गये साम्राज्यवादी युद्ध पर चुप रही और खामनेई की हत्या पर भी मोदी सरकार ने तत्काल कोई बयान जारी नहीं किया और इसपर भी चुप्पी साध ली। आइए, मोदी सरकार के इस बदले हुए रुख़ के आधार पर नवजनवादी क्रान्ति फ्रेमवर्क के पैरोकार कम्युनिस्टों द्वारा भारतीय शासक वर्ग को दलाल कहे जाने की बात की जाँच-पड़ताल करते हैं।
सबसे पहली बात तो यह कि मोदी सरकार का यह तात्कालिक रुख़ भारत के पूँजीपति वर्ग का रुख़ नहीं है। मोदी सरकार का यह तात्कालिक रवैया एप्स्टीन फ़ाइल्स में हरदीप पुरी, मोदी और अनिल अम्बानी के नाम आने और अदानी के अमेरिका में भ्रष्टाचार के मुक़दमे के कारण है। भारतीय पूँजीपति वर्ग की अन्य पार्टियाँ और उसके थिंक टैंक से लेकर अन्य प्रतिनिधि मोदी सरकार के आचरण की आलोचना रख रहे हैं। लेकिन फ़िलहाल हम अगर इस तर्क को एक पल के लिए मान भी लें कि मोदी सरकार का तात्कालिक रवैया भारतीय पूँजीपति वर्ग को अमेरिका का दलाल सिद्ध करता है तो हम एक हास्यास्पद उलझन में फँस जाते हैं। नवजनवादी क्रान्ति के पैरोकारों के तर्क के हिसाब से चूँकि भारत ने अमेरिका और इज़रायल के पक्ष में नीतिगत स्तर पर कुछ ऐसे तात्कालिक क़दम उठाये हैं जो कि उसे अमेरिका-इज़रायल का दलाल सिद्ध करते हैं तो हालिया दिनों के घटनाक्रम से यह सवाल भी फिर उठता है कि अमेरिका किसका दलाल है? क्योंकि ईरान पर हमला करने का फ़ैसला अमेरिकी पूँजीपति वर्ग की आम सहमति से लिया गया कोई फ़ैसला नहीं था बल्कि उसके विपरीत था और ट्रम्प ने भी मुख्यतः तात्कालिक वजहों से प्रेरित होकर इस क़िस्म का मूर्खतापूर्ण फैसला लिया है। ट्रम्प के इस रवैये का कारण एप्स्टीन फ़ाइल्स में ख़ुद ट्रम्प का फँसा होना है और यह भी ग़ौरतलब है कि एप्स्टीन फ़ाइल्स के सबसे विवादास्पद हिस्से मोस्साद के पास हैं जिसके चलते इज़रायल ट्रम्प पर दबाव बना रहा है। ट्रम्प और उसके अधिकारियों ने भी ख़ुद यह स्वीकार किया कि इज़रायल के चलते अमेरिका इस युद्ध में शामिल हो रहा है। ईरान युद्ध ने न केवल ट्रम्प के सामाजिक आधार में दरारें पैदा की हैं बल्कि यह अमरीकी पूँजीपति वर्ग के नये राजनीतिक संकट को जन्म दे रहा है। ट्रम्प के ‘मेक अमेरिका ग्रेट अगेन’ (मागा) खेमे के जो केंट ने 17 मार्च को ‘नैशनल काउण्टर टेररिज़म सेण्टर’ के अध्यक्ष के पद से इस्तीफ़ा देते हुए भी यही दुहराया कि ईरान पर युद्ध “मज़बूत इज़रायली लॉबी” के चलते हो रहा है। बहरहाल, अगर मोदी द्वारा तात्कालिक तौर लिये गये फ़ैसलों से भारत अमेरिका का दलाल बन जाता है तो इस तर्क से नवजनवादी क्रान्ति के पैरोकारों को कहना चाहिए कि अमेरिका इज़रायल का दलाल है! आम राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में अमेरिका और इज़रायल का यह सम्बन्ध उलट है! इज़रायल अमेरिका और पश्चिमी साम्राज्यवाद के सैन्य चेकपोस्ट के रूप में उत्तरी अफ़्रीका-पश्चिमी एशिया में बनाया गया कृत्रिम राज्य है क्योंकि इस क्षेत्र में पूँजीवाद के लिए सबसे अहम रणनीतिक माल, तेल, के अकूत भण्डार हैं। दोनों बातें जोड़ने पर हमारे सामने यह समीकरण आता है: अमेरिका इज़रायल का दलाल है पर साथ ही इज़रायल अमेरिका का लठैत भी है! साफ़ है कि इनमें से कोई एक बात ही सही हो सकती है। इस हास्यास्पद तर्क पद्धति को ही आगे बढ़ाते हुए हम कह सकते हैं कि ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीअर स्टारमर अमेरिका का दलाल है! यह उपाधि ख़ुद ब्रिटेन की मीडिया ने दी भी है जिसने ब्रिटेन के प्रधानमंत्री को ट्रम्प की गोदी में बैठने वाला कुत्ता कहा! अतीत में भी टोनी ब्लेयर ने ब्रिटेन की संसद के ख़िलाफ़ जाकर ब्रिटेन को इराक़ युद्ध में अमरीकी हितों के पक्ष में झोंक दिया था। इस तरह तो ब्रिटेन का पूँजीपति वर्ग अमेरिका का दलाल हो जायेगा और वहाँ भी नवजनवादी क्रान्ति की मंज़िल मानी जानी चाहिए! यही बात जर्मनी के चांसलर पर भी लागू की जा सकती है। इन उदाहरणों से हम देख सकते हैं कि नवजनवादी क्रान्ति के पैरोकारों की तर्क-पद्धति किस तरह हमें हास्यास्पद नतीजों पर पहुँचाती है। दरअसल यह विश्लेषण तार्किक विश्लेषण नहीं है; बस अपने दिमाग़ में उपस्थित अवधारणा को विशिष्ट परिघटना पर आरोपित करने का उतावलापन है।
दूसरी बात, हमें यह समझना चाहिए कि फ़ासीवादी पार्टी और धुर-दक्षिणपन्थी पार्टियों और उसके नेतृत्व की अपने वर्ग से सापेक्षिक स्वायत्तता किसी भी अन्य पूँजीवादी दल के मुक़ाबले अधिक होती है। आम तौर पर ही हर राजनीतिक पार्टी अपने वर्ग से सापेक्षिक तौर पर स्वायत्त होती है और पार्टी का नेतृत्व पार्टी से सापेक्षिक तौर पर स्वायत्त होता है। फ़ासीवादी पार्टी और आम तौर पर धुर दक्षिणपन्थी पार्टियों में ‘सुप्रीम लीडर’ और उसके इर्द-गिर्द खड़ा छोटा-सा गुट पार्टी के नेतृत्व से भी सापेक्षिक तौर पर अधिक स्वायत्त होता है। फ़ासीवादी पार्टियों का संघटन ही ‘फ़्यूहरर कल्ट’ के इर्द-गिर्द होता है यानी ‘फ़्यूहरर कल्ट’ फ़ासीवादी पार्टियों के ढाँचे में आन्तरिक तौर पर ही शामिल होता है। भाजपा में मोदी का ‘कल्ट’ इस तरह ही खड़ा हुआ है। इतिहास में मुड़कर देखें तो जर्मनी में हिटलर का ‘कल्ट’ खड़ा किया गया था तो इटली में ‘ड्यूस’ के तौर पर मुसोलिनी का भी ‘कल्ट’ ऐसे ही खड़ा किया गया था। इस तरह का ‘कल्ट’ अन्य धुर-दक्षिणपन्थी नेताओं में भी देखा जा सकता है, मसलन पुतिन और ट्रम्प जैसे नेता भी अपनी पार्टी से इस क़िस्म की सापेक्षिक स्वायत्तता रखते हैं। जब किसी आकस्मिक राजनीतिक घटना के चलते ‘सुप्रीम लीडर’ के हाथ से सत्ता की बागडोर छिनने का ख़तरा मण्डराता है तब वे अक्सर ही अपने वर्ग की चाहत के ख़िलाफ़ जाने से बाज़ नहीं आते हैं। अपनी सत्ता को बचाने के लिए ‘सुप्रीम लीडर’ की छवि वाले नेता किसी अति तक जाने से भी नहीं चूकते हैं। यही मौजूदा समय में एक तरफ़ मोदी तो दूसरी तरफ़ ट्रम्प के साथ हो रहा है। इस बात को नहीं समझना, फासीवाद व अन्य धुर-दक्षिणपंथी राजनीति की विशिष्ट विशिष्टता को नहीं समझना है।
तीसरी बात यह कि मोदी का तथाकथित “नतमस्तक” रवैया इस “दलाल” पूँजीपति वर्ग की अन्य पार्टियों, थिंक टैंक व उसके अन्य प्रतिनिधियों में नहीं दिखायी दे रहा है। राहुल गाँधी ने भी ख़ुद संसद में यह कहा कि वह यह समझते हैं कि सामान्य परिस्थितियों में मोदी सरकार इस क़िस्म के झुकने का रवैया नहीं दिखाती लेकिन अडानी और एपस्टीन के मसलों के चलते ही मोदी इस क़िस्म का व्यवहार कर रहे हैं। इस बात को कुछ तथ्यों से समझा जा सकता है। मोदी सरकार ने पिछले साल जून में ईरान पर थोपे गए युद्ध में तुरन्त ही ईरान से सम्पर्क स्थापित किया था और दोनों पक्षों को युद्ध ख़त्म करने की सलाह दी थी। इस साल जारी युद्ध में पहले मोदी सरकार ने चुप्पी साधे रखने का काम किया और ईरान से कोई संवाद स्थापित न कर इज़रायल और अमेरिकी युद्ध का ही समर्थन किया था, परन्तु देश के भीतर गैस का संकट बढ़ने पर मोदी सरकार ने खामनेई की मृत्यु पर शोक भी जताया और ईरान के राष्ट्रपति से लेकर विदेश मंत्री से भी कई बार बात की। ट्रम्प द्वारा पिछले साल अगस्त माह में पचास प्रतिशत टैरीफ़ लगाकर मोदी सरकार की बाँह मरोड़ने की कोशिश की गयी और व्यापारिक सौदा करने का दबाव बनाया गया जिसके जवाब में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ख़ुद बीजिंग पहुँच गये और रूस और चीन के साथ व्यापारिक सम्बन्धों को बहाल करने की बात की। यह रवैया आम तौर पर भी 2014 के बाद से मोदी सरकार की विदेश नीति से मेल खाता है। रूस-उक्रेन युद्ध से लेकर ब्रिक्स और एससीओ में भागीदारी और रूस से अमेरिकी दबाव की मुख़ालफ़त करके भी तेल ख़रीदने की नीति मोदी सरकार की ही रही है। वास्तव में 1947 के बाद से भारतीय शासक वर्ग का ऐसा ही रवैया रहा है। निर्गुट आन्दोलन, सूएज़ नहर विवाद से लेकर मोदी सरकार के कार्यकाल में कनाडा के साथ हुए राजनयिक विवाद के दौरान इसे देखा जा सकता है। मोदी सरकार की नीतियों में आया परिवर्तन आकस्मिक है और यह एक विशेष तात्कालिक राजनीतिक सन्धि-बिन्दु की उपज है। जनवरी अन्त में एक तरफ़ अमेरिकी कोर्ट ने अमेरिकी एजेंसी ‘यूएस सिक्योरिटीज़ एण्ड एक्सचेंज’ कमीशन को अडानी को ई-मेल के ज़रिये भ्रष्टाचार के मुक़दमे का नोटिस भेजने की अनुमति दी और लगभग इस समय ही एपस्टीन फ़ाइल्स में हरदीप पुरी, मोदी और अम्बानी का नाम भी आया। फ़रवरी माह की शुरुआत में ही मोदी सरकार ने अमेरिका से व्यापारिक सौदा कर लिया।
अतः पूँजीपति वर्ग और विशेषतः भारत जैसे सापेक्षिक तौर पर पिछड़े पूँजीवादी देशों के पूँजीपति वर्ग के विशिष्ट राजनीतिक सन्धिबिन्दु से जन्मे आकस्मिक व्यवहार के आधार पर हम उसका चरित्र निर्धारण दलाल पूँजीपति वर्ग के रूप में नहीं कर सकते हैं। अगर इस पैमाने का इस्तेमाल किया जाये तो दुनिया के समस्त पूँजीपति वर्ग दलाल होंगे, मगर तब यह सवाल रह जायेगा: किसके? हमने देखा कि इस पैमाने पर अमेरिका को इज़रायल का दलाल, ब्रिटेन और जर्मनी को अमेरिका और अन्ततः इज़रायल का दलाल कहा जा सकता है! पूँजीपति वर्ग के चरित्र का निर्धारण वर्ग के राजनीतिक अर्थशास्त्र के वैज्ञानिक आधार पर किया जाना चाहिए। राजनीतिक अर्थशास्त्रीय विश्लेषण से साफ़ होता है कि भारत के पूँजीपति वर्ग का चरित्र औद्योगिक-वित्तीय पूँजीपति वर्ग का है और इसे अपने घरेलू बाज़ार पर नियंत्रण चाहिए जिस कारण से यह दलाल हो ही नहीं सकता है।
मोदी सरकार के तात्कालिक विशिष्ट राजनीतिक सन्धि बिन्दु और आकस्मिकता से उपजे फौरी रवैये के आधार पर भारत के पूँजीपति वर्ग के चरित्र का निर्धारण नहीं किया जा सकता है। मोदी सरकार अगर अपने इस रुख़ पर क़ायम रही तो भारत का शासक वर्ग और राज्य एक राजनीतिक संकट की ओर बढ़ेंगे। शासक वर्ग के ब्लॉक की एकता में दरारें पड़ेंगी और सत्ता अपनी जन वैधता खो देगी जो प्रक्रिया आगे चलकर सामाजिक और राजनीतिक, दोनों ही क़िस्म की उथल-पुथल को जन्म दे सकती है। राजनीतिक संकट इस वजह से ही उपजेगा कि भारतीय शासक वर्ग दलाल नहीं है। दलाल शासक वर्ग के भीतर राजनीतिक संकट पैदा होने की कोई गुंजाइश ही नहीं होती है। यही बात अमेरिका में ट्रम्प पर भी लागू होती है। इसलिए जो लोग इस वक़्त मोदी सरकार के तात्कालिक रवैये से दूरगामी राजनीतिक निष्कर्ष निकालने का उतावलनापन दिखा रहे हैं, वे दरअसल राजनीतिक मोतियाबिंद का शिकार हैं।
मज़दूर बिगुल, मार्च 2026














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