पानीपत रिफ़ाइनरी के असंगठित मज़दूरों का संघर्ष : अमानवीय शोषण-उत्पीड़न के ख़िलाफ़ श्रमिकों के गुस्से का विस्फोट

बिगुल संवाददाता

पिछले कुछ दिनों के दौरान देशभर की रिफ़ाइनरियों और पावर प्लाण्टों में मज़दूरों के बड़े संघर्ष हुए हैं। इनमें बरौनी रिफ़ाइनरी (बिहार), पानीपत रिफ़ाइनरी (हरियाणा), ओबरा पावर प्लाण्ट (सोनभद्र, यूपी), अल्ट्राटेक सीमेण्ट प्लाण्ट (रीवा, एमपी), अदानी पावर प्लाण्ट (सिंगरोली, एमपी), थर्मल पावर प्रोजेक्ट (बक्सर, बिहार), अदानी पावर प्लाण्ट (रायपुर, छत्तीसगढ़) आदि के संघर्ष प्रमुख हैं। इन संघर्षों ने एक बार फिर से यह दिखा दिया है कि मुनाफ़े पर आधारित इस व्यवस्था में शोषण के ख़िलाफ़ मज़दूरों की बग़ावतें लाज़िमी हैं। धन्नासेठों की चाकरी में लगी शासन-सत्ता द्वारा तानाशाही के बल पर इन विद्रोहों को दबाया और कुचला तो जा सकता है लेकिन इन्हें ख़त्म नहीं किया जा सकता। अमानवीय शोषण-उत्पीड़न और दमन के ख़िलाफ़ मज़दूरों के अन्दर पलता आक्रोश सतह के नीचे खदबदाता रहता है और फिर अन्ततोगत्वा कोई छोटी-सी घटना भी इसमें पलीता लगाने का काम कर देती है। जुझारू तेवर वाले उपरोक्त संघर्षों में से ज़्यादातर या लगभग सभी का चरित्र स्वतःस्फूर्त वाला रहा। यानी इन सभी संघर्षों में श्रमिकों को संगठित करने वाले, माँगों को सूत्रबद्ध करने वाले और समझौता वार्ता में मज़दूर पक्ष को सांगोपांग ढंग से पेश करने वाले नेतृत्व का अभाव देखने को मिला। निश्चय ही अपने बीच से सही नेतृत्व चुनकर यूनियन के रूप में संगठित होना फ़िलहाल इन सभी जगहों के संघर्षों के लिए ज़रूरी तात्कालिक कार्यभार बनता है।

हरियाणा के पानीपत में स्थित ‘इण्डियन ऑयल कॉरपोरेशन लिमिटेड’ में कार्यरत श्रमिकों का संघर्ष 23 फ़रवरी से शुरू हुआ था। ‘बिगुल मज़दूर दस्ता’ के साथी शुरू से ही इस आन्दोलन के समर्थन में मौजूद रहे थे। दो दिन पहले हुई एक दुर्घटना जिसमें कई श्रमिक घायल हो गये थे, ने इस संघर्ष को भड़काने में चिंगारी का काम किया। इसके बाद रिफ़ाइनरी के विस्तार और निर्माण कार्यों में लगे हज़ारों ठेका श्रमिकों ने हड़ताल और प्रदर्शन शुरू कर दिया। रिफ़ाइनरी में कार्यरत हज़ारों श्रमिक काम करने की अमानवीय परिस्थितियों, शोषण और प्रशासनिक उदासीनता से हद से ज़्यादा परेशान थे। यहाँ कार्यरत मज़दूर काम के घण्टे, ओवरटाइम, परिवहन व्यवस्था, शौचालय की सुविधा, ईएसआई-पीएफ़, कैण्टीन की सुविधा, सुरक्षाकर्मियों के ख़राब व्यवहार आदि जैसे मुद्दों को लम्बे समय से उठाते रहे थे। लेकिन रिफ़ाइनरी प्रशासन ने इनकी माँगों पर कभी कोई ध्यान नहीं दिया।

हरियाणा के पानीपत में स्थित इस रिफ़ाइनरी की विभिन्न इकाइयों और विस्तार योजनाओं में 30 से 40 हज़ार मज़दूर-कर्मचारी काम करते हैं। इनमें से ज़्यादातर श्रमिक ठेकेदारों के तहत कार्यरत हैं। यहाँ बड़ी ठेकेदार कम्पनियों और छोटे ठेकेदारों का पूरा जाल मौजूद है जिनके ज़रिये मज़दूरों को काम पर रखा जाता है। ये ठेकेदार कम्पनियाँ और छोटे ठेकेदार मज़दूरों पर जोंक की तरह चिपके रहते हैं और उनके थोड़े-से वेतन से भी “अपना हिस्सा” उड़ाते रहते हैं। तमाम कम्पनियों में दमन और शोषण का सबसे ज़्यादा सामना ठेका श्रमिकों को ही करना पड़ता है। जानकारी के अनुसार पानीपत रिफाइनरी की कुल रिफ़ाइनिंग क्षमता लगभग 15 मिलियन टन प्रति वर्ष (एमटीपीए) तक पहुँच चुकी है लेकिन हज़ारों ठेका मज़दूर, जो इस रिफ़ाइनरी के निर्माण, रखरखाव और उत्पादन कार्यों में लगे हैं, आज अपने बुनियादी अधिकारों तक से महरूम हैं। यहाँ कार्यरत मज़दूरों के आरोप हैं कि उनपर 12-12 घण्टे काम कराने का दबाव बनाया जाता है, ओवरटाइम का समुचित भुगतान नहीं होता, वेतन में देरी होती है, ईएसआई-पीएफ़ जैसे अधिकार नहीं मिलते और आवाज़ उठाने पर ठेकेदारों द्वारा काम से निकालने की धमकियाँ दी जाती हैं। यही नहीं काम करने के हालात बेहद अमानवीय हैं। श्रमिकों को पेयजल, शौचालय, परिवहन, कैण्टीन और पर्याप्त सुरक्षा उपकरण जैसी मूलभूत सुविधाएँ भी ठीक से नहीं मिलती हैं। रिफ़ाइनरी जैसे संवेदनशील और जोखिमपूर्ण कार्यस्थल पर इन अमानवीय हालात में श्रमिकों से काम लिया जाना सीधे तौर पर उनके जीवन के साथ खिलवाड़ है। ध्यान रहे श्रमिकों के ये हालात तो तब हैं जब मज़दूर-कर्मचारी विरोधी चार श्रम संहिताओं को अभी लागू होना है। ये श्रम संहिताएँ लागू होने के बाद श्रमिकों की स्थिति का अन्दाज़ा सहज ही लगाया जा सकता है।

इस अमानवीय और असंवेदनशील रवैये से तंग आकर श्रमिकों ने जैसे ही शान्तिपूर्ण प्रदर्शन और हड़ताल का रास्ता अपनाया, वैसे ही पुलिस और सीआईएसएफ़ के जवान मुस्तैदी के साथ इन्हें दबाने में जुट गये। लेकिन श्रमिकों के संख्याबल और इनके बुलन्द हौसलों के सामने पुलिस-प्रशासन पंगु नज़र आया। श्रम विभाग से लेकर डीसी-एसपी समेत पूरा प्रशासनिक अमला आनन-फ़ानन में तुरन्त सक्रिय हो गया और श्रमिकों को वापस काम पर भेजने की जुगत भिड़ाने लगा। 23 फरवरी को जब मज़दूरों का गुस्सा फूट पड़ा तो रिफ़ाइनरी प्रशासन और स्थानीय प्रशासन को मजबूर होकर हरकत में आना पड़ा। श्रमिकों की ताक़त के सामने प्रशासन तत्काल समझौते की टेबल पर आ गया। मज़दूरों की काम के घण्टे, ओवरटाइम के दुगुने रेट, साप्ताहिक छुट्टी से लेकर पेयजल, परिवहन सुविधा, शौचालय जैसी माँगों को कागज़ पर तात्कालिक तौर पर मान लिया गया है लेकिन इन्हें लागू कितना किया जायेगा यह थोड़े वक़्त बाद ही स्पष्ट हो जायेगा। ज़ाहिरा तौर पर बिना संगठन और यूनियन के पुरानी रीत के लौटने में ज़्यादा वक़्त नहीं लगेगा। फ़िलहाल श्रमिकों में इस बात को लेकर खासा रोष है कि उनकी वेतन वृद्धि से जुड़ी सबसे बुनियादी माँग को नज़रअन्दाज़ कर दिया गया। इस संघर्ष के दौरान एक कमी जो सामने आयी वह थी श्रमिकों की कोई यूनियन न होना। रिफ़ाइनरी प्रशासन ने भी इस कमी को जल्द ही भाँप लिया था। इस चीज़ ने मज़दूरों की मोलभाव करने की ताक़त को भी कमज़ोर किया। मज़दूरों ने जुझारू और शानदार संघर्ष लड़ा लेकिन कोई ईमानदार यूनियन और संगठन नहीं होने की सूरत में यह संघर्ष 28 फ़रवरी तक आते-आते कमज़ोर पड़ने लगा। रिफ़ाइनरी प्रशासन से लेकर पुलिस तंत्र और ठेकेदारों के पूरे गठजोड़ ने हड़ताल को वापस करवाने के लिए एड़ी-चोटी का ज़ोर लगा रखा था।

इसके अलावा पानीपत रिफ़ाइनरी के श्रमिकों को अगर अपने भावी संघर्षों को मज़बूती देनी है तो उन्हें अपने संघर्ष में श्रमिक आन्दोलन में मौजूद अर्थवाद, स्वतःस्फूर्तवाद, अराजकतावादी संघाधिपत्यवाद जैसी विभिन्न विजातीय प्रवृत्तियों से भी सावधान रहना होगा। वैसे श्रमिकों को अपने हालिया आन्दोलन के दौरान भी इन प्रवृत्तियों के वाहक तथाकथित नेताओं की कारगुज़ारियों का कड़वा अनुभव हुआ। ‘बिगुल’ के पाठकों के सामने भी इसका ज़िक्र करना ग़लत नहीं होगा। मज़दूरों के 23 फ़रवरी को हड़ताल पर चले जाने के बाद अगले दिन से ही कई मज़दूर संगठनों और यूनियनों ने इस संघर्ष का समर्थन किया। 24 और 25 फ़रवरी को मज़दूर बड़े पैमाने पर हड़ताल जारी रखते हुए रिफ़ाइनरी के P-25 स्टेशन पर एकत्रित हुए थे। 25 फ़रवरी को प्रशासन द्वारा रिफ़ाइनरी के ठेकेदार को एक लिखित आदेश में कुछ बुनियादी श्रम क़ानून लागू करने का आश्वासन दिया गया, जिसे देर शाम रिफ़ाइनरी गेटों पर चस्पा कर दिया गया। ज़ाहिरा तौर पर इस एकतरफा ‘समझौते’ में प्रशासन ने केवल काग़ज़ों पर श्रम क़ानून लागू करने की बात कही, जिनकी धज्जियाँ ठेकेदार और प्रधान नियोक्ता आईओसीएल बहुत पहले से ही उड़ाते रहे थे। देर शाम मज़दूरों के बीच यह बात भी फैल गयी कि न्यूनतम मज़दूरी ‘सी’ कैटेगरी के हिसाब से दी जायेगी, जबकि पानीपत रिफ़ाइनरी की श्रेणी ‘बी’ या ‘ए’ होनी चाहिए। इसलिए मजदूरों ने तीसरे दिन यानी 25 फ़रवरी को भी हड़ताल जारी रखी और रोष प्रदर्शन करते हुए रिफ़ाइनरी गेट पर मीटिंग की।

26 तारीख़ को जब मैनेजमेण्ट ने मज़दूरों के प्रतिनिधिमण्डल को बातचीत के लिए बुलाया तो इसमें ‘सीटू’ (सीपीएम से सम्बद्ध केन्द्रीय ट्रेड यूनियन) तथा ‘मासा’ (मज़दूर अधिकार संघर्ष अभियान जोकि शंकरजी की बारात और भानुमति के कुनबे-नुमा कई संगठनों का मंच है!) के घटक संगठन सीएसटीयू के प्रतिनिधि भी शामिल हुए। गेट मीटिंग में बिना तथ्यों की पड़ताल किये सीएसटीयू (मासा के घटक) के नेताओं ने मज़दूरों के बीच वेतन कैटेगरी को लेकर भ्रम फैलाया। मैनेजमेण्ट के साथ लम्बी वार्ता के बाद लेबर कमिश्नर व आईओसीएल प्रशासन केवल श्रम क़ानूनों को लागू करने का लिखित समझौता करने को तैयार था, लेकिन कैटेगरी बढ़ाने या न्यूनतम मज़दूरी में वृद्धि को लेकर उन्होंने साफ़ मना कर दिया। वार्ता के बाद सीटू और सीएसटीयू ने मज़दूरों को “समझाने” की कोशिश की, लेकिन अधिकतर ठेका मज़दूर इस पर असमंजस में थे। इसका मुख्य कारण सीएसटीयू द्वारा मज़दूरों के बीच कैटेगरी को लेकर फैलाया गया भ्रम भी था। सीएसटीयू और मासा के रवैये पर मासा के ही घटक संगठन के एक नेता ने फ़ेसबुक पोस्ट में इसपर सवाल भी उठाये थे। अगले दिन यानी 27 फ़रवरी के दिन मज़दूर चार नम्बर गेट पर एकत्रित हुए और तीन नम्बर गेट तक रैली के रूप में पहुँचे। इस दिन भी मैनेजमेण्ट ने प्रतिनिधियों को वार्ता के लिए बुलाया। पहले दिन की वार्ता में एड़ियाँ उचकाकर वार्ता में शामिल होने वाले सीएसटीयू के प्रतिनिधियों ने वार्ता में जाने से साफ़ इन्कार कर दिया! इनके रवैये से खफ़ा होकर सीटू के नेता भी वार्ता के लिए नहीं गये।

28 फ़रवरी, यानी हड़ताल के छठे दिन भी मज़दूर रिफ़ाइनरी के गेट नम्बर चार पर सभा करते रहे और रैली निकालकर गेट नम्बर तीन तक पहुँचे। लेकिन इस दिन रैली में मज़दूरों की संख्या पहले की तुलना में काफी कम थी। पूरे रिफ़ाइनरी क्षेत्र में पुलिस-प्रशासन, बाउंसरों और ठेकेदारों की मौजूदगी भी पहले से अधिक थी, जो साफ़ तौर पर मजदूरों को आतंकित करने के लिए थी ताकि कमज़ोर पड़ती हड़ताल को किसी भी तरह तोड़ा जा सके। रैली के बाद गेट मीटिंग के दौरान एक बार फिर प्रशासन ने वार्ता के लिए बुलाया, लेकिन सीएसटीयू ने इस दिन फिर बैठक में शामिल होने से इन्कार कर दिया। अन्ततः पाँच श्रमिक ही वार्ता के लिए गये। पुलिस-प्रशासन के दबदबे में हुई वार्ता के बाद इन पाँचों श्रमिकों को प्रशासन ने “सहमत” कर लिया, जिसमें इस बात की पूरी सम्भावना है कि उन पर दबाव डाला गया होगा। अब सीएसटीयू के इस रवैये को कैसे देखा जाये!? यानी जब आन्दोलन अपने चढ़ान पर था तो चेहरा चमकाने के लिए वार्ताकार की भूमिका में सबसे आगे और जब आन्दोलन उतार की ओर जाता दिखा तो वार्ताकार का कोट खूँटी पर टाँग दिया गया और पर्यवेक्षक की भूमिका में आ गये! यानी मीठा-मीठा गप-गप और कड़वा-कड़वा थू! यही नहीं मासा का एक और कारनामा भी दर्शनीय है। मासा ने अपने फ़ेसबुक पेज से इस संघर्ष से सम्बन्धित 27 फ़रवरी से पहले की सभी पोस्टें अपने फ़ेसबुक पेज से हटा दीं या उन्हें प्राइवेट कर दिया। इसका कारण अभी तक हमारी समझ में नहीं आया है!

सीएसटीयू की मौक़ापरस्ती रिफ़ाइनरी के मज़दूरों के सामने भी उजागर हो गयी। आम सभा में मजदूरों ने उनसे सवाल किया कि जब आप शुरुआती वार्ता में शामिल हो सकते थे तो अब क्यों नहीं हुए। इस पर सीएसटीयू और मासा के प्रतिनिधि कोई स्पष्ट जवाब नहीं दे पाये और बगलें झाँकते नज़र आये। आम सभा में ही ‘बिगुल मज़दूर दस्ता’ के साथियों ने भी सीएसटीयू की इस मौक़ापरस्ती पर सवाल उठाये। इसके नेताओं ने अपनी परिचित ‘मज़दूरवाद’ की लाइन दोहराते हुए कहा कि यह मज़दूरों का आन्दोलन है, इसलिए मज़दूर ही फ़ैसला करेंगे, मासा तो केवल सहयोग के लिए आया है! इस पर सवाल उठाया गया कि यदि सब कुछ मज़दूर ही तय करेंगे, तो आप यहाँ किस भूमिका में आये हैं? इस तर्क से तो इन्हें पहली वार्ता में भी शामिल नहीं होना चाहिए था। शुरुआती फ़ेसबुक पोस्टों में तो इनके द्वारा चीज़ों को ऐसे पेश किया जा रहा था जैसे लगे कि मासा आन्दोलन का नेतृत्व कर रहा है लेकिन जब हड़ताल कमज़ोर पड़ने लगी तो इन्होंने अपनी भूमिका बदलने में मिनट भी नहीं लगाया। दरअसल यह वही संगठन है जिसने मारुति से लेकर होण्डा तक के मज़दूर आन्दोलनों जैसे कई सम्भावनाशील संघर्षों में भी अवसरवादी भूमिका निभाकर इन्हें कमज़ोर किया था। पिछले दिनों इन्होंने मारुति के पुराने काण्ट्रैक्ट मज़दूरों को नौकरी दिलाने की मीठी गोली दी थी। इसे लेकर ऐसा तूमार बाँधा गया था कि पूछिए मत! लेकिन मारुति में काम कर चुके पुराने ठेका श्रमिकों को जल्द ही समझ में आ गया कि उनका इस्तेमाल करने के लिए यह सब कारगुज़ारी की जा रही है तो वे इनके झाँसे में नहीं आये। पानीपत रिफ़ाइनरी के अपने मज़दूर साथियों को हम यही कहेंगे कि इस तरह की विजातीय और अवसरवादी प्रवृत्तियों से उचित दूरी बनाकर ही रहना चाहिए।

पानीपत रिफ़ाइनरी के मज़दूरों ने हड़ताल के दौरान जो कुछ भी हासिल किया है उसकी सुरक्षा एक ही सूरत में की जा सकती है और वह है श्रमिकों के बीच से बनी उनकी अपनी ईमानदार जुझारू यूनियन का निर्माण, जिसमें सभी श्रमिक साथी मज़बूती के साथ संगठित हों। वेतन वृद्धि जैसी जायज़ माँग, जिसे श्रमिक मनवा नहीं पाये, उसे भी मज़बूत यूनियन और संगठन शक्ति के द्वारा ही हासिल किया जा सकता है। केन्द्र सरकार द्वारा पानीपत रिफ़ाइनरी के वेतन ग्रेड को ‘बी’ से भी घटाकर ‘सी’ कर दिया गया है जोकि मज़दूरों के साथ भद्दा मज़ाक है। आज महँगाई के समय में जब हर चीज़ के दाम आसमान छू रहे हैं तब रिफ़ाइनरी जैसे जोखिमभरे व कठिन काम में लगे श्रमिकों को ‘सी’ ग्रेड का वेतन दिया जाना कहीं से भी जायज़ नहीं है। हमें हमारी मेहनत का पूरा फल मिलना चाहिए जोकि असल में मेहनतकशों के राज में ही सम्भव है। किन्तु एक मानवीय जीवन जीने के लिए काम के घण्टे छह और 26 दिन के हिसाब से न्यूनतम वेतन कम से कम 30 हज़ार रुपये तय किया जाना चाहिए। अकुशल श्रमिक को 30 हज़ार के वेतन को मानक मानकर अन्य श्रमिकों के वेतन में भी इसी अनुसार बढ़ोत्तरी की जानी चाहिए। एक गरिमापूर्ण जीवन जीने का अधिकार हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है। इस अधिकार को हासिल करने के लिए स्वयं को एक मज़बूत यूनियन के रूप में संगठित करना एक बुनियादी पूर्वशर्त है। तमाम श्रम अधिकारों के साथ-साथ यूनियन बनाने का अधिकार भी ऐसा अधिकार है जिसे हासिल करने के लिए मज़दूर वर्ग के हमारे पुरखों ने शानदार कुर्बानियाँ दी हैं।

 

मज़दूर बिगुल, मार्च 2026