मज़दूरों के संघर्ष के दवाब के कारण बढ़ा हरियाणा में न्यूनतम वेतन! आन्दोलन के दबाव में हरियाणा सरकार को मज़दूरों के लिए न्यूनतम मज़दूरी बढ़ाने की घोषणा करनी पड़ी!

गुड़गाँव-मानेसर औद्योगिक पट्टी में काम करने वाले कई कम्पनियों के ठेका मज़दूर पिछले कुछ दिनों से हड़ताल पर हैं। 2 अप्रैल को होण्डा कम्पनी से शुरू हुई वेतन बढ़ोतरी की मांग अब पूरे ऑटोमोबाइल और एक्सपोर्ट सेक्टर की कंपनियों तक फैल गई है। हड़ताल में एक्सपोर्ट लाइन की कम्पनियों रिचा ग्लोबल, रूप पॉलिमर और मॉडलमा के मज़दूर बड़ी संख्या में शामिल रहे। मज़दूरी में महँगाई के हिसाब से बढ़ोतरी, बेहतर कार्यस्थिति और अन्य कई बुनियादी माँग को लेकर मज़दूरों ने काम ठप्प कर दिया है। कम्पनी प्रबन्धन और सरकार द्वारा हड़ताल को तोड़ने की तमाम तिकड़मों के बाद भी जब मज़दूर डटे रहे तो बीते दिन आख़िरकार हरियाणा के मुख्यमंत्री नायाब सिंह सैनी को मज़दूरी में बढ़ोतरी का ऐलान करन पड़ा। अकुशल मज़दूरों के लिये पहले 11,257₹ की मज़दूरी तय थी जिसे बढ़ाकर अब 15,220₹ करने की घोषणा की गयी है। अर्धकुशल मज़दूरो का वेतन 12,430₹ से बढ़कर 16,780₹ किया गया। कुशल मज़दूरों का वेतन भी 13,704₹ से बढ़कर 18,500₹ हो गया है।
हालाँकि बढ़ती महँगाई को देखते हुए यह बढ़ोतरी भी नाकाफ़ी है मगर हरियाणा सरकार को यह घोषणा मज़दूरों के आन्दोलन के दवाब में आकर करनी पड़ी है। यह हमारे संघर्ष की एक बड़ी जीत है और हमने एक बार फिर यह साबित कर दिखाया है कि मज़दूरों की एकता के आगे मालिक और कम्पनी प्रबन्धन की कोई भी चाल काम नहीं आने वाली है।
मालूम हो कि आज देश कई राज्यों में मज़दूर अपनी बेहद बुनियादी माँगों को लेकर आन्दोलनरत है। गुड़गांव-मानेसर के मज़दूर भी इसी कड़ी का हिस्सा है। इस पूरे औद्योगिक क्षेत्र की कम्पनियाँ सालों से श्रम क़ानूनों की धज्जियाँ उड़ा रही है और खुलेआम मज़दूरों के हक़-अधिकारों को लूटती हैं और उनपर कोई कार्यवाही नहीं होती है। पिछले 12 सालों में तो मोदी सरकार ने मालिकों को मज़दूरों की श्रम-शक्ति को लूटने की खुली छूट दे दी है। देशभर में आम मेहनतकश आबादी इस सरकार की ग़रीब-विरोधी, मज़दूर-विरोधी नीतियों के कहर को झेल रहें थे और अभी हालिया एलपीजी संकट के बाद से तो लोगों के ऊपर मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा। मोदी सरकार की बदइंतज़ामी और सिलेण्डर की कालाबाज़ारी को रोक पाने में इनकी असफ़लता का सबसे बड़ा ख़ामियाजा भी मज़दूर वर्ग को उठाना पड़ रहा है। सरकार की तरफ़ से कोई ठोस क़दम न उठाये जाने के बाद मज़दूरों के पास सड़क पर उतरने के अलावा कोई और रास्ता नहीं बचा नहीं था। इसलिये, होण्डा के मज़दूरों की माँगों से शुरू हुई हड़ताल जंगल की आग की तरह पूरी औद्योगिक पट्टी में फैल गयी और मज़दूरों ने काम बन्द कर सड़क पर उतरना शुरू कर दिया।
हड़ताल से जहाँ एक तरफ़ मालिकों के मुनाफ़ा का पहिया रुक गया था वहीं दूसरी तरफ़ भाजपा सरकार मज़दूरों के बढ़ते जनाक्रोश से भयाक्रान्त थी इसलिए उन्हें आनन-फानन में आज बुधवार रात 8:30 बजे मज़दूरों के वेतन में इस मामूली बढ़ोतरी की बात कहनी पड़ी है। इस घोषणा के बाद भी मज़दूरों का संघर्ष अभी थमा नहीं है। अस्थायी ठेका मज़दूरों की माँग है की महँगाई को देखते हुए कम से कम मज़दूरी 20 हज़ार मासिक की जाये। इसके साथ ही ओवरटाइम का डबल रेट से भुगतान हो, ईएसआई,पीएफ़ जैसी सुविधाएँ सुनिश्चित की जाये और कार्यस्थल पर सुरक्षा के पुख्ता इंतज़ाम किये जायें इत्यादि। इन सभी माँगों के पूरे होने तक संघर्ष जारी रहेगा। कम्पनी और पुलिस प्रशासन के घटिया नापाक इरादों के आगे हम झुकने वाले नहीं हैं। ऑटोमोबाइल पट्टी के मज़दूरों ने एक बार फिर यह साबित किया है कि अगर हम एक हो जाए तो मालिकों और उनकी सरकार को झुकना पड़ता है।
आज ज़रूरत है कि मानेसर, धारुहेड़ा, बावल से लेकर पूरी औद्योगिक पट्टी के मज़दूरों को साथ आने की और अपने संघर्ष को और तेज़ करने की। अगर आज हम इस मामूली बढ़ोतरी को लेकर पीछे हटते हैं तो कल से मालिकों के शोषण और दमन का पाटा और गति पकड़ेगा और तब हमारा एकजुट होना भी मुश्किल बना दिया जायेगा। इसलिए, सभी माँगों को लिखित तौर पर माने जाने तक हमें डटे रहना होगा और अपनी एकता को और व्यापक बनाना होगा। इसी के दम पर हमने पहले भी मालिकों और उनकी सरकार को झुकाया है और आज भी उन्हें हमारी सभी माँगों को मानने पर मज़बूर होना पड़ेगा।
मज़दूर एकता ज़िन्दाबाद!
लड़ेंगे! जीतेंगे!!