गिग वर्कर्स की हड़ताल और आगे के संघर्ष का रास्ता

अनन्त

बीते वर्ष की आख़िरी तारीख़ देशभर के गिग वर्कर्स के संघर्ष के दिन के तौर पर अंकित की जायेगी। उस दिन देशभर में तक़रीबन दो लाख गिग वर्कर्स ने अपनी माँगों को लेकर हड़ताल की जोकि गिग वर्कर्स की आज तक की सबसे बड़ी हड़ताल थी। हालाँकि यह उनकी पहली हड़ताल नहीं थी; ठीक एक हफ़्ते पहले यानी 25 दिसम्बर को भी वे एक हड़ताल आयोजित कर चुके थे। यह इसी कड़ी में उनकी अगली हड़ताल थी। दिल्ली, मुम्बई, हैदराबाद, पुणे जैसे देश के बड़े-बड़े महानगरों में 31 दिसम्बर की सुबह से देर रात तक गिग वर्कर्स इस हड़ताल का हिस्सा बने। ज़्यादातर श्रमिकों ने इस दौरान अपना फ़ोन बन्द रखा या अपने-अपने प्लैटफ़ॉर्म्स के ऐप्स से लॉगआउट रहे। कई जगहों पर श्रमिक एक साथ शान्तिपूर्ण तरीक़े से एकत्रित हुए, कोई नारेबाज़ी नहीं की महज़ शान्ति से काम का बहिष्कार किया। हालाँकि नियोक्ताओं और प्रशासन को यह भी मंज़ूर नहीं था और पुलिस ने आकर कई जगह पर श्रमिकों को डराया-धमकाया और काम पर वापस लौटने के लिए कहा। इसके पहले 25 दिसम्बर को क़रीब 40,000 श्रमिकों ने हड़ताल की थी। इस अवसर पर हैदराबाद में 2,000 श्रमिकों ने मोटरसाइकिल रैली भी निकाली थी।

31 दिसम्बर की हड़ताल का असर साफ़ तौर पर मालिक वर्ग और सरकारों के ऊपर दिख रहा था। यही कारण था कि ये सभी इस हड़ताल को “असफल” घोषित करने की हड़बड़ी में थे। हड़ताल को महज़ कुछ “शरारती तत्वों” की हरकत बता रहे थे। लेकिन हक़ीक़त यह है कि श्रमिकों की इस हड़ताल का असर ज़ोरदार था। एक ओर कम्पनियों ने प्रति ऑर्डर भुगतान की दर आम दिनों की तुलना में कहीं ज़्यादा बढ़ा दी थी तो दूसरी तरफ़ वे अन्य तरह के प्रोत्साहन राशि का प्रलोभन भी दे रहीं थीं। लेकिन इन तमाम प्लैटफ़ार्म कम्पनियों का असली मज़दूर-विरोधी चेहरा महज़ इस बात से उजागर हो जाता है कि ये शान्तिपूर्ण ढंग से एकत्रित श्रमिकों को पुलिस के द्वारा डरा-धमका भी रही थीं और जहाँ कहीं वे एकत्रित हो रहे थे वहाँ उन्हें पुलिस द्वारा तितर-बितर करवा रही थीं। यह श्रमिकों की हड़ताल का ही असर था कि सरकार को श्रमिकों की माँगों में से एक बेहद महत्वपूर्ण माँग पर ध्यान देना पड़ा। यह हड़ताल का ही भय था कि सरकार को इस मसले पर त्वरित हस्तक्षेप कर इन क्विक-कॉमर्स कम्पनियों से बन्द दरवाज़े के पीछे बैठक कर ‘दस-मिनट डिलीवरी’ जैसी भयानक मज़दूर-विरोधी सेवा को वापस लेने की “अपील” करनी पड़ी। हालाँकि मोदी सरकार अभी भी इन कम्पनियों से “अपील” ही कर रही है! ऐसी भयंकर अमानवीय सेवा तत्काल बन्द करने के लिए इन कम्पनियों को निर्देश नहीं जारी कर रही है! बहरहाल, इसके नतीजे के तौर पर अब ये कम्पनियाँ अपने प्लैटफ़ॉर्म्स से दस मिनट डिलीवरी जैसे स्लोगन हटा रही हैं।

गिग वर्कर्स हड़ताल पर क्यों गये?

गिग वर्कर्स कम तथा अस्थिर आय, असुरक्षित कार्यस्थितियों, लम्बे कार्यदिवस व अत्यधिक कार्य दबाव, एल्गोरिदम आधारित नियन्त्रण व मनमाने तरीक़े की दण्ड व्यवस्था तथा श्रम अधिकारों व सामाजिक सुरक्षा का अभाव आदि वजहों के ख़िलाफ़ संघर्षरत हैं।

‘नेशनल काउंसिल फॉर अप्लाइड इकोनॉमिक रिसर्च’ के एक सर्वेक्षण के मुताबिक एक गिग वर्कर हफ़्ते में औसतन 69 घण्टे तक काम करता है। यानी सप्ताह में बिना एक दिन की छुट्टी के प्रतिदिन क़रीब 10 घण्टे। मान लीजिये कि हफ़्ते में किसी दिन वह ब्रेक लेता है तो बाक़ी के छह दिन 11.5 घण्टे काम कर रहा होता है। इतने घण्टे खटने-पीसने के बावजूद वह बमुश्किल दिन का 500/600 रुपए तक ही कमा पाता है। यानी औसतन प्रति घण्टे मात्र 50 से 70 रुपए। 2020 की एक रिपोर्ट के मुताबिक 47% गिग वर्कर्स बिना उधार लिए अपने ज़रूरी खर्चों तक का वहन नहीं कर पाते हैं।

दरअसल गिग अर्थव्यवस्था के साथ यह विभ्रम जुड़ा हुआ है कि बेरोज़गार युवा व छात्र ‘पार्टटाइम जॉब’ के तौर पर गिग वर्क करते हैं। शुरुआत में गिग कार्य को परिवार की आय का पूरक स्रोत माना जाता था और कभी-कभी छात्रों तथा/या बेरोज़गारों के लिए अतिरिक्त आय का साधन समझा जाता था। हालाँकि एक सर्वेक्षण के मुताबिक लगभग 88% गिग वर्कर्स अपनी मुख्य आजीविका के रूप में गिग कार्य पर ही निर्भर हैं। पिछले लम्बे समय से प्रति-डिलीवरी भुगतान में लगातार कमी की गयी है जबकि ईंधन, वाहन रखरखाव और अन्य खर्च बढ़ते जा रहे हैं। ज़्यादातर गिग वर्कर्स का वास्तविक मासिक आय स्तर न्यूनतम मज़दूरी से भी कम रह जाता है। प्रोत्साहन (incentives) और भुगतान दरें बिना पूर्व सूचना के बदल दी जाती हैं जिससे आय पूरी तरह अनिश्चित हो जाती है। असल में इन श्रमिकों की वास्तविक आय न्यूनतम वेतन से भी काफ़ी कम होती है।

गिग वर्कर्स चाहे वह राइडर अथवा डिलीवरी पार्टनर हों या फिर “डार्क स्टोर”, वेयर हाउस, गोदामों आदि में काम करने वाले श्रमिक हों, सभी अत्यधिक कार्य दबाव झेलने तथा असुरक्षित कार्यस्थितियों में काम करने के लिए विवश होते हैं। 10-मिनट या अति-तेज़ डिलीवरी मॉडल के कारण मज़दूरों पर अत्यधिक समय दबाव डाला जाता है। विभिन्न क्विक-कॉमर्स प्लैटफ़ॉर्म्स द्वारा अल्ट्रा-फास्ट डिलीवरी कराने की हड़बड़ी उपभोक्ताओं की वास्तविक आवश्यकता से नहीं बल्कि स्वयं इन प्लैटफ़ॉर्मों के बीच ज़्यादा से ज़्यादा बाज़ार पर कब्ज़ा करने की बढ़ती प्रतिस्पर्धा से प्रेरित है, जिसका खामियाज़ा एक आम श्रमिक अपनी जान तक देकर भुगतता है।

क्विक-कॉमर्स प्लैटफ़ॉर्म्स के वेयर हाउस को कम्पनियाँ “डार्क स्टोर” कहती हैं और असल में यह श्रमिकों के लिए डार्क स्टोर ही होता है। ये ऐसे स्टोर्स होते हैं जहाँ आम ग्राहक सीधे जाकर खरीदारी नहीं कर सकता है। ऑनलाइन ऑर्डर करने के बाद यहाँ से ही उनके दरवाज़े तक सामान डिलीवर किया जाता है। इन “डार्क स्टोर्स” को कहीं भी बना दिया जा रहा है। जर्जर इमारतों से लेकर अँधेरे बेसमेंट तक जिसको जहाँ मौक़ा लगा वहाँ ऐसे स्टोर्स खोल लिए। कम्पनियाँ चाहती हैं कि अधिक से अधिक ऐसे स्टोर्स रिहायशी इलाक़े के बीच हों ताकि जल्दी से जल्दी और ज़्यादा से ज़्यादा ग्राहकों तक पहुँचा जा सके। इन स्टोर्स को बनाने को लेकर कोई क़ानूनी पैमाना नहीं लागू होता है। यहाँ श्रमिकों की आवाजाही के लिए बेहद संकुचित रास्ता होता है जिसके दोनों तरफ़ बड़े-बड़े रैंकों में सामान रखा होता है। हर तरफ़ सामान बिखरा होता है जिससे टकराने, उलझने और गिरने का खतरा बना रहता है। “डार्क स्टोर” अथवा वेयरहाउस के श्रमिक, जिन्हें ‘पिकर्स’ कहा जाता है, उनका काम ऑनलाइन ऑर्डर रिसीव करने के बाद भागदौड़ कर सारे सामान पैक कर आगे राइडर्स अथवा डिलीवरी पार्टनर को उपलब्ध कराना होता है और इस काम को करने के लिए उन्हें केवल कुछ सेकेंड्स का समय मिलता है। ‘पिकर्स’ को मज़दूरी के तौर पर हर पिकिंग आइटम पर केवल कुछ पैसे ही मिलते हैं।

“डार्क स्टोर” से उठाने के बाद अब उस सामान को उपभोक्ता तक तय समय के अन्दर पहुँचाने का दबाव डिलीवरी पार्टनर्स पर होता है। समय पर डिलीवरी के लिए उन्हें ट्रैफिक नियमों की अनदेखी करनी पड़ती है, जिससे दुर्घटनाओं का ख़तरा बढ़ जाता है। काम करने के लिए कोई सुरक्षा उपकरण नहीं होता, बीमा और दुर्घटना के बाद सहायता अक्सर अपर्याप्त या नाममात्र की होती है। हालाँकि कम्पनियाँ सरकार के हस्तक्षेप के बाद अपने प्लैटफ़ॉर्म्स से दस मिनट डिलीवरी जैसे वायदे हटा रही हैं या उसे दूसरे ढंग से कह रही हैं। लेकिन श्रमिकों पर असल दबाव प्रति ऑर्डर भुगतान का दर गिरा कर डाला जाता है। श्रमिकों को अपनी बुनियादी ज़रूरतें भी पूरी करने के लिए अधिक से अधिक ऑर्डर डिलीवर करने की आवश्यकता होती है।

इतने दबाव में और  इतने कम पैसे पर काम करने के बावजूद श्रमिकों को ऐप्स के मनमाने तौर तरीकों का सामना करना पड़ता है जिससे काम की निरन्तरता और आमदनी की निरन्तरता अनिश्चित बनी रहती है। एक गिग वर्कर के लिए काम का आवण्टन, रेटिंग, प्रोत्साहन और दण्ड पूरी तरह ऐप के एल्गोरिदम द्वारा तय किया जाता है। बिना स्पष्ट कारण बताये आईडी ब्लॉक या अकाउण्ट डी-एक्टिवेट कर दिया जाता है। श्रमिकों द्वारा इन फ़ैसलों के ख़िलाफ़ अपील या शिक़ायत करने की कोई प्रभावी तथा पारदर्शी व्यवस्था उपलब्ध नहीं होती है।

इन गिग तथा प्लैटफ़ॉर्म वर्कर्स के लिए किसी भी प्रकार का कोई श्रम अधिकार तथा सामाजिक सुरक्षा मौजूद नहीं है। नये लेबर कोड, जिन्हें लेकर इतना हो-हल्ला मचाया जा रहा है कि अब पहली बार गिग तथा प्लैटफ़ार्म वर्कर्स श्रम क़ानूनों के दायरे में आयेंगे, दरअसल मोदी सरकार के तमाम जुमलों की तरह केवल एक जुमला है, और न केवल जुमला है बल्कि मज़दूर वर्ग के श्रम अधिकारों पर अब तक का सबसे बड़ा हमला भी है। दरअसल हक़ीक़त यह है कि नये लेबर कोड ऐसे श्रमिकों को महज़ परिभाषित करते हैं लेकिन औपचारिक तौर पर कोई वास्तविक हक़-अधिकार नहीं देते। सच्चाई यह है कि गिग वर्कर्स को कर्मचारी नहीं बल्कि “स्व-रोज़गारप्राप्त” माना जाता है। यही कारण है कि उन्हें न्यूनतम वेतन, सवेतन अवकाश, भविष्य निधि, पेंशन, स्वास्थ्य बीमा और सामूहिक सौदेबाज़ी जैसे अधिकार नहीं मिलते। इसके अलावा अधिकांश सामाजिक सुरक्षा योजनाएँ भी व्यवहार में इनपर लागू नहीं होती हैं। इन्हीं उपरोक्त कारणों की वजह से गिग तथा प्लैटफ़ार्म वर्कर्स हड़ताल करने के लिए विवश थे।

गिग वर्कर्स की मुख्य माँगें

श्रम मंत्रालय को सौंपे गये ज्ञापन में हड़ताली श्रमिकों की तरफ़ से निम्न छह माँगें पेश की गयीं। पहला, प्लैटफ़ार्म कम्पनियों का श्रम क़ानूनों के अन्तर्गत विनियमन हो। कम्पनियाँ अपनी मर्ज़ी से नियम बनाती और बदलती हैं, उनके ऊपर किसी भी प्रकार की जवाबदेही नहीं होती है। मौजूदा श्रम कानूनों में उनके लिए श्रमिकों के प्रति कोई बाध्यकारी देनदारी नहीं है।

दूसरा, असुरक्षित “10-मिनट डिलीवरी” मॉडल पर प्रतिबन्ध लगाया जाये। कम्पनियाँ ग्राहकों को बेहद कम समय में सेवा तथा सामान पहुँचाने का वायदा करती हैं। इन अव्यावहारिक समय-सीमाओं के कारण “डार्क स्टोर” के पिकर्स तथा डिलीवरी पार्टनर्स दोनों को अत्यधिक शारीरिक व मानसिक दबाव झेलना पड़ता है, जिस कारण दुर्घटनाओं की सम्भावनाएँ बढ़ती हैं। डिलीवरी समय तय करते समय ट्रैफिक, मौसम और सुरक्षा को प्राथमिकता दी जाये।

तीसरा, मनमाने ढंग से आईडी ब्लॉक करने और दण्ड लगाने की प्रथा समाप्त की जाये। बिना परिस्थितियों की जाँच किये, बिना कोई कारण बताये किसी भी वर्कर की आईडी ब्लॉक अथवा अकाउण्ट डी-एक्टिवेशन पर रोक लगायी जाये। किसी भी दण्डात्मक कार्रवाई से पहले सुनवाई और अपील का अधिकार मिले। तथा एल्गोरिदम आधारित फैसलों में मानवीय हस्तक्षेप अनिवार्य हो। इसके अलावा श्रमिकों के शिकायत निवारण की प्रभावी व्यवस्था हो। इसके लिए स्वतन्त्र और पारदर्शी शिकायत निवारण तन्त्र बनाया जाये। केवल ऐप या ऑटो-रिप्लाई के बजाय वास्तविक सुनवाई हो।

चौथा, मज़दूरी की व्यवस्था न्यायसंगत तथा पारदर्शी हो। श्रमिकों को किये जाने वाले भुगतान का कोई एक निश्चित स्वरूप नहीं है। भुगतान प्रणाली पारदर्शी हो ताकि मज़दूर को यह स्पष्ट हो कि उसे किस काम के लिए कितना भुगतान मिल रहा है। प्रति-डिलीवरी दरों में कटौती बन्द की जाये। न्यूनतम आय अथवा न्यूनतम मासिक मज़दूरी की गारण्टी दी जाये।

पाँचवाँ, स्वास्थ्य व दुर्घटना बीमा तथा पेंशन सहित सामाजिक सुरक्षा मिले। दुर्घटना बीमा, स्वास्थ्य बीमा और जीवन बीमा अनिवार्य किया जाये। वृद्धावस्था सुरक्षा और पेंशन जैसी योजनाएँ लागू की जाएँ। सभी गिग वर्कर्स का पंजीकरण कर उन्हें वास्तविक लाभ दिया जाए, केवल काग़ज़ी योजनाओं की घोषणा नहीं की जाये।

छठा, गिग वर्कर्स को केवल नाममात्र के लिए नहीं बल्कि वास्तविक तौर पर श्रम कानूनों के दायरे में लाया जाये। उन्हें श्रमिक का दर्जा तथा क़ानूनी अधिकार मिले। उनके लिए न्यूनतम मज़दूरी, सामूहिक सौदेबाज़ी और यूनियन व संगठन बनाने के अधिकार मान्य किए जाएँ।

इनके अलावा उनकी अन्य माँगें सुरक्षित कार्यस्थितियाँ तथा काम के घण्टे और विश्राम के नियमन से जुड़ी हैं। श्रमिकों की माँग है कि उन्हें हेलमेट, रेनकोट, जैकेट जैसे सुरक्षा उपकरण निःशुल्क उपलब्ध कराये जाएँ। किसी भी दुर्घटना की स्थिति में क़ानूनी रूप से कम्पनी की स्पष्ट ज़िम्मेदारी तय हो। कार्य से जुड़ी मानसिक और शारीरिक सुरक्षा को मान्यता दी जाए। अत्यधिक लम्बे (10–14 घण्टे) कार्यदिवस पर रोक लगे। काम के दौरान के प्रतीक्षा समय व दो ऑर्डर मिलने के बीच के अन्तराल का भी भुगतान किया जाए, उस समय को भी काम के हिस्से के तौर पर माना जाये। श्रमिकों के साप्ताहिक अवकाश और पर्याप्त विश्राम समय को सुनिश्चित किया जाए।

आगे के संघर्ष का रास्ता

गिग अर्थव्यवस्था तेज़ी से विस्तारित हो रही है। नीति आयोग के एक अनुमान के मुताबिक 2030 तक गिग अर्थव्यवस्था के तहत काम करने वाले श्रमिकों की संख्या 2.35 करोड़ तक हो जायेगी। आज यह संख्या क़रीब 1.5 करोड़ है। जिस गति से इसका विस्तार हो रहा है उसी गति से श्रमिकों की कार्यस्थितियाँ भी बद से बदतर हो रही हैं। निश्चित रूप से आने वाले समय में हम गिग वर्कर्स के बड़े-बड़े संघर्ष देखेंगे।

आज के ये संघर्ष शुरुआती संघर्ष हैं। आज गिग वर्कर्स की बड़ी आबादी असंगठित और एक दूसरे से कटी हुई है। गिग काम की अस्थायी प्रकृति और एक ही कार्यस्थल पर एक साथ काम न करने की स्थिति मज़दूरों के संगठित होने और उन्हें संगठित करने में विशेष चुनौतियाँ पैदा करती है। लेकिन इसके बावजूद जिस तर्ज़ पर इस हड़ताल ने श्रमिकों को अपने वर्ग हितों के प्रति सचेत किया है, वह निश्चित तौर पर आने वाले समय के संघर्षों में श्रमिकों को व्यापक स्तर पर गोलबन्द होने में मदद करेगा।

25 दिसम्बर तथा 31 दिसम्बर की हड़ताल के पहले कोविड काल में ओला, ऊबर तथा स्विगी के श्रमिकों ने बड़ी संख्या में लेकिन अलग-अलग प्रदर्शन किये थे जिसके नतीजे के तौर पर गिग तथा प्लैटफ़ार्म वर्कर्स की कुछ यूनियनें अस्तित्व में आयी थीं। 25 दिसम्बर तथा 31 दिसम्बर की हड़ताल में अब तक सबसे अधिक श्रमिकों ने शिरकत की है और एक साथ कई अलग-अलग कम्पनियों के श्रमिक हड़ताल पर गये हैं। यह पहले के उन संघर्षों, जिसमें कि एक ही तरह के गिग वर्कर्स या एक ही कम्पनी अथवा एक ही शहर के कुछ स्टोर्स के श्रमिकों की हड़ताल हुआ करती थी, के मुक़ाबले एक आगे बढ़ा हुआ क़दम है।

आज गिग वर्कर्स को दो तरह से अपनी एकता विस्तारित करनी होगी। पहला, तमाम तरह के गिग-प्लैटफ़ार्म वर्कर, डिलीवरी पार्टनर, पिकर्स, राइडर्स, चाहे वे ओला, उबर, रैपिडो आदि जैसे प्लैटफॉर्म्स के साथ जुड़कर सवारी उठाने का काम करते हों, या ब्लिंकिट, इंस्टमार्ट, बिगबास्केट, जियोमार्ट आदि क्विक-कॉमर्स प्लेटफ़ॉर्म्स के साथ जुड़े पिकर्स तथा डिलीवरी पार्टनर्स हों, या ज़ोमैटो, स्विगी जैसे फूड डिलीवरी प्लेटफ़ॉर्म्स के डिलीवरी पार्टनर्स आदि हों सभी तरह के प्लैटफ़ॉर्म्स आधारित ट्रांसपोर्टेशन वर्कर्स की एक न्यूनतम साझा माँग बनती है, इसीलिए उन्हें एकसाथ एकजुट और लामबन्द होने की ज़रूरत है।

दूसरा, मौजूदा हड़ताल मुख्य रूप से बड़े महानगरों तक ही सीमित रही। कई राज्य राजधानी स्तर तक के शहरों के प्लैटफ़ार्म वर्कर्स इससे दूर और कटे हुए थे। जबकि आज छोटे-छोटे शहरों से लेकर गाँव-कस्बों तक यह अर्थव्यवस्था फैल रही है। इसलिए पूरे देश में ऊपर से लेकर नीचे तक के श्रमिकों को एकजुट और गोलबन्द करने की ज़रूरत है।

हम गिग मज़दूरों को भी यह समझना होगा कि अपनी एकता को और व्यापक तथा जुझारू बनाने के लिए ज़रूरी है कि हम चुनावी पार्टियों और एनजीओ-समर्थित यूनियनों के दायरे से बाहर निकलकर अपनी स्वतन्त्र क्रान्तिकारी यूनियनें खड़ी करें। क्रान्तिकारी ताक़तों को भी इस स्वतःस्फूर्त एकजुटता को सचेतन रूप से स्थापित, संगठित और स्थायी एकता में तब्दील करना होगा। एक क्रान्तिकारी यूनियन के बैनर तले ही देशभर में काम करने वाले करोड़ों गिग मज़दूरों को संगठित किया जा सकता है और एक समुचित रणनीति के ज़रिये प्लैटफ़ार्म कम्पनियों को झुकाया जा सकता है।

आज जब गिग कम्पनियों के मालिक रिकॉर्डतोड़ बिक्री का जश्न मना रहे हैं और अकूत मुनाफ़ा पीटने के नशे में चूर हैं तब यह कोई नहीं जानता कि गिग मज़दूरों की पीड़ा और गुस्सा कब एक संगठित आक्रोश की सुनामी में बदल जायेगा। उम्मीद है कि मज़दूर इन शुरुवाती हड़तालों के बाद राजनीतिक रूप से और परिपक्व होंगे तथा अपने वर्ग हितों के प्रति और अधिक सचेत होंगे। वे इन हड़तालों की कमियों-खामियों  को समझेंगे, उन्हें दूर करेंगे और अपने हक़ व सम्मान की लड़ाई में पहले से अधिक मज़बूती के साथ फिर से एकजुट होंगे। इतिहास का यह सबक़ है कि शोषण और अन्याय के ख़िलाफ़ चल रहे संघर्ष में मज़दूर हार-जीत दोनों से सीखते हैं। मज़दूरों की कई असफल लड़ाइयाँ ही आगे आने वाले बड़े संघर्षों की बुनियाद बनती हैं। जब तक पूरे अधिकार नहीं मिलते तब तक संघर्ष जारी रहता है।

 

मज़दूर बिगुल, जनवरी 2026

 

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