शाहबाद डेरी में घरेलू कामगार महिलाओं को शिक्षित-प्रशिक्षित करने के लिए चल रही है दिल्ली घरेलू कामगार यूनियन की रात्रि पाठशाला
सृष्टि
उत्तर पश्चिमी दिल्ली में स्थित शाहबाद डेरी की बस्तियों से सुबह-सुबह टिफ़िन का बक्सा और पानी की बोतल से भरा झोला लिये, हज़ारों की संख्या में महिलाओं का हुजूम निकलता है। इसमें से कुछ महिलाएँ बवाना की फैक्ट्री में जाती हैं तो कुछ आसपास में ताँबा-पीतल की छँटाई करने वाली कम्पनियों में जाती हैं। लेकिन इस हुजूम में ज़्यादातर महिलाएँ ऐसी होती हैं जो घरेलू कामगार के रूप में रोहिणी के अलग-अलग सेक्टर में काम करती हैं। जब सुबह-सुबह यूनियन की तरफ़ से पर्चा बाँटा जाता है तो कई महिलाएँ जल्दबाज़ी में कहती हैं कि हम क्या करेंगे इसका, पढ़े तो हैं नहीं! कुछ महिलाएँ रुककर बात करती हैं और कुछ महिलाएँ बिना कुछ बोले पर्चा लेकर अपने झोले में रख लेती हैं। इस भीड़ में 8वीं में पढ़ने वाली लड़कियों से लेकर बुजुर्ग महिलाएँ मिल जायेंगी जो महीने के 3 हज़ार रुपए कमाने के लिए दिनभर खटती हैं।
घरेलू कामगार महिलाओं में से अधिकतर महिलाएँ अशिक्षित हैं। इसलिए दिल्ली घरेलू कामगार यूनियन द्वारा महिलाओं को राजनीतिक रूप से शिक्षित-प्रशिक्षित करने के लिए यूनियन पाठशाला और अक्षर ज्ञान सिखाने के लिए रात्रि पाठशाला का आयोजन किया जा रहा है। यहाँ अक्षरज्ञान महज़ साक्षरता का प्रश्न नहीं है, बल्कि अपने आप को मुक्त करने के बारे में ज्ञान को प्राप्त करने का रास्ता है, उसका औज़ार है। लेकिन यूनियन पाठशाला में महज़ पढ़ना-लिखना ही नहीं सिखाया जाता है। यूनियन पाठशाला में देश-दुनिया के तमाम ज़िन्दा सवालों पर बातचीत की जाती है। जिस समाज में हम रहते हैं वह हमें चीज़ों को शासक वर्ग के नज़रिये से देखने का आदी बना देता है। इसमें स्कूल, कॉलेज, धर्म, मीडिया, क़ानून आदि सबका हाथ होता है। ये सभी शासक वर्ग की विचारधारा के उपकरण हैं और हमें शासक वर्ग के नज़रिये से दुनिया को देखने की आदत डलवाते हैं।
ऐसे में यूनियन पाठशाला के माध्यम से हम देश और दुनिया के तमाम मसलों को मज़दूर वर्ग के नज़रिये से देखने और समझने का प्रयास करते हैं। इसके अलावा रात्रि पाठशाला में महिलाओं को अक्षर ज्ञान जैसे ‘क’ से ‘ज्ञ’ तक ‘A’ से ‘Z’ तक, महिलाओं को नाम लिखना पढ़ना आदि बताया जाता है। मिसाल के तौर पर, पिछली क्लास में चित्रों के माध्यम से अंग्रेज़ी का अक्षर सिखाया गया।
दिनभर काम करने के बाद भी महिलाएँ समय से पढ़ने आती हैं। हर इन्सान की तरह हम कामगार औरतों में भी सबकुछ को जानने-समझने की उतनी ही चाहत और ललक होती है। लेकिन हमारे समाज में मज़दूरों और विशेष तौर पर स्त्री मज़ूदरों की इस जिज्ञासा की बचपन में ही हत्या कर दी जाती है। पाठशाला में आने वाली महिलाएँ अपने काम के बारे में, कार्यस्थल पर होने वाली समस्याओं के बारे में भी बताती हैं। कुछ दिन पहले एक घरेलू कामगार महिला ने बताया कि वह जिस कोठी में काम करती हैं वहाँ की लिफ़्ट का प्रयोग नहीं कर सकतीं। इतना ही नहीं, जिस घर में वह काम करती हैं उनको बाहर ही अपना टिफ़िन वाला झोला रखने को बोला जाता है। वे घर का बाथरूम तक इस्तेमाल नहीं कर सकतीं जिसकी वजह से उन्हें ढेरों बीमारियों का सामना भी करना पड़ता है। लंच करने के लिए उन्हें पार्कों में जाना पड़ता है। कई महिलाओं ने बताया की ‘मालकिन बासी खाना, पुराने कपड़े जिससे अब उनका मन भर गया है, वह हमें पकड़ा देती है।’ ऐसा अपमानजनक और ग़ैर-बराबरी का बर्ताव किस तरह हमारे अन्दर की इन्सानियत को मारता है, यह हम ही जानते हैं। हमें इन्सान होने की शर्तों से ही वंचित कर दिया जाता है और सालों बाद हम पाते हैं कि हम ख़ुद ही अपने आपको इंसान की तरह नहीं देखते। इस विमानवीकरण से लड़ना सीखना और अपने आपको फिर से इन्सान के तौर पर देखना और इन्सान की ही तरह गरिमा की माँग करना भी यूनियन पाठशाला की पाठ्यक्रम का हिस्सा है।
अपनी तमाम व्यस्तताओं के बावजूद महिलाओं में पढ़ने-लिखने, नयी चीज़ों को सिखने की ललक है और सीखकर इस दुनिया को बदल देने की चाहत भी! जिस तरह से एक-एक अक्षर बोर्ड पर से देखकर वह बनाती हैं, उसमें साफ़ दिखता है कि पढ़ने लिखने और सीखने की कोई उम्र नहीं होती। देश-दुनिया, प्रकृति, समाज और विचारों को जानने की भी कोई उम्र नहीं होती है। जैसा कि एक लेखक ने कहा था, इंसान जब मर जाता है तब वह सपने देखना बन्द नहीं करता बल्कि जब वह सपने देखना बन्द कर देता है, तब वह मर जाता है।
महिलाएँ बहुत ध्यान से सारी बातें सुनती हैं और उनके कई सवाल भी होते हैं। वे यूनियन कार्यकर्ताओं से बाद में मिलने पर भी सवाल पूछती हैं। पिछली यूनियन पाठशाला में ‘फ़िलिस्तीन में हो रहे ज़ायनवादी इज़रायल द्वारा नरसंहार और भारत की मेहनतकश जनता को क्यों आज फ़िलिस्तीन के समर्थन में खड़ा होना चाहिए’ पर चर्चा हुई। उसके बाद भी महिलाओं ने मिलकर फ़िलिस्तीन के मसले पर अपने प्रश्न रखे। इतना ही नहीं उसके अगले दिन अभियान चलाते समय एक महिला जो पाठशाला आती हैं उन्होंने फ़िलिस्तीन की मौजूदा परिस्थिति के बारे में पूछा। उनकी आँखों में जो सीखने की, जानने की और उनके हालातों को बदल देने की चाहत है वह कभी भी धूमिल नहीं होगी।
ये आँखें हैं तुम्हारी
तकलीफ़ का उमड़ता हुआ समन्दर
इस दुनिया को
जितनी जल्दी हो बदल देना चाहिए।
– गोरख पाण्डेय की कविता की पंक्तियाँ
मज़दूर बिगुल, अगस्त 2025















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